Anatmaj - 3 - Last Part in Hindi Fiction Stories by Mallika Mukherjee books and stories PDF | अनात्मज - बांग्ला एकांकी नाटक - भाग 3 (अंतिम भाग)

Featured Books
Categories
Share

अनात्मज - बांग्ला एकांकी नाटक - भाग 3 (अंतिम भाग)

मूल बांग्ला से हिन्दी में अनूदित एकांकी नाटक “अनात्मज”

भाग 3  (अंतिम)

पात्र : सचिन, बिपाशा, अनिरुद्ध, सुहास

 

सचिन: नहीं...नहीं, ये गलत है। ये सरासर गलत है। इससे बड़ा झूठ और कोई नहीं हो सकता। मैं तुम्हारा पिता नहीं हूँ। तुम मेरे बेटे नहीं हो। (बिपाशा हाथ जोड़कर मना करने की गुहार लगाती है।)

सुहास: क्या मैं आपका बेटा नहीं हूँ?

सचिन: नहीं, नहीं, तुम मेरे बेटे नहीं हो, सुहास। देखना चाहते हो?

(वह सुहास का हाथ पकड़कर उसे खींचता है और अगले कमरे में ड्रेसिंग टेबल पर ले जाता है।)

सचिन: लो, ठीक से देखो। इस दर्पण के सामने हम साथ-साथ खड़े हैं। मैं तुम में नहीं हूँ। तुम मुझमें नहीं हो। बिन्दु मात्र भी समानता नहीं है। तुम्हारी आँखें, नाक, कान, चेहरा... कहीं भी मेरी छवि नहीं है।

बिपाशा: (हैरान होकर) आप क्या कर रहे हैं? इसे आप क्या कह रहे हैं...सचिन?

सचिन: मैं बस सच कह रहा हूँ। सुहास, तुममें मेरा खून नहीं है। तुम्हारे जन्म में मेरी कोई भूमिका नहीं है। तुम मेरे पुत्र नहीं हो।

बिपाशा: सचिन, आपने मुझसे वादा किया था। मुझे भिक्षा दी थी।

सचिन: बीते समय में किया कोई भी वादा मुझे आज नहीं रोक सकता। मैं बोलूंगा। आज तक चुप रहकर मेरा दम घुट रहा है। मुझे सच बोलना ही होगा।

सुहास: (आर्द्र  स्वर में) पापा, क्या मैं आपका बेटा नहीं हूँ?

सचिन: नहीं सुहास, तुम मेरे बेटे नहीं हो।

सुहास: क्या मेरे शरीर में आपका खून नहीं है?

(सचिन चुप हो जाता है। बिपाशा स्तब्ध रह जाती है। कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा जाता है।)

सुहास: क्या मेरे शरीर में आपका खून नहीं है?

(सचिन सिर झुका लेता है। बिपाशा लड़खड़ाते हुए सुहास को पकड़ लेती है।)

बिपाशा: सुहास... मेरे पास आओ, बेटा।

सुहास: पापा, मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ, फिर भी मैं आपका कोई नहीं हूँ?

(माहौल में सन्नाटा पसरा हुआ है। सुहास कमरे से बाहर चला जाता है।)

बिपाशा: (काँपती हुई आवाज़ में) शायद कातिल को भी माफ़ी मिल जाए। सिर्फ़ मुझे ही माफ़ी नहीं मिली!

(सचिन अपने बाल नोचता है, फिर अचानक बोलता है)

सचिन: माफ़ी? मुझे किसने माफ़ किया? किस गुनाह के लिए मुझे ऐसी सज़ा मिली?

बिपाशा: ये सब मेरी गलती है। मैं इसे स्वीकार करती हूँ। मैंने आपसे एक स्त्री होने के नाते कोई सम्मान नहीं माँगा था। मैंने तो बस अपने बेटे के लिए रहने की जगह माँगी थी। आपने मुझसे वादा किया था। आज आपने वो वादा तोड़ दिया।

सचिन: मैंने कोई वादा नहीं तोड़ा। बिलकुल भी नहीं।

बिपाशा: (दुखी होकर) अगर मैं यहाँ से चली जाऊँ तो क्या आप खुश होंगे?

सचिन: कहाँ जाओगी तुम?

बिपाशा: मेरी पूरी जिंदगी गुजर गई, अभी तक आश्रय नहीं मिला। मैं कहीं भी चली जाऊंगी। तुम दोबारा शादी कर लेना और...

सचिन: शादी? फिर से? हा...हा… मैंने एक बार जहर पी लिया तो मुझे पता चल गया कि उससे कितनी जलन होती है। दोबारा शादी कर लूँ?

बिपाशा: बस... आघात और आघात। आप सिर्फ आघात देने में मानते हैं। हर स्त्री की तुलना मुझसे मत कीजिए। एक स्त्री ने गुनाह किया है, इसलिए समस्त स्त्री जाति को बदनाम मत कीजिए।

(सुहास दौड़ते हुए कमरे में दाखिल होता है। उसकी कमीज़ पर खून लगा है। उसके बाएँ हाथ की नस से खून बह रहा है। उसने अपने बाएं हाथ को अपने दाहिने हाथ से पकड़ रखा है।)

सुहास: पापा...खून, मम्मी...खून रुक ही नहीं रहा।

सचिन: (अपने बेटे को पास खींचते हुए) खून? इतना खून? कैसे हुआ ये?

बिपाशा: क्या हुआ बेटा? इतनी चोट कैसे पहुँची?

सुहास: पापा, खून रुक ही नहीं रहा।

सचिन: ओह, मैं क्या करूँ बिपाशा? मैं क्या करूँ?

बिपाशा: बताओ बेटा, तुम्हें ये चोट कैसे लगी?

सुहास: मैंने चाकू से खुद को काट लिया। मम्मा, मैंने खुद को काट लिया।

बिपाशा: क्यों? बेटा, तुमने ऐसा भयानक काम क्यों किया? बताओ बेटा...

सचिन: (सुहास को छाती से लगाते हुए) तुमने ये क्या किया, पागल? मेरी बात पर गुस्सा होकर तुमने ये क्या किया?

सुहास: देखो, कितना सारा खून! (सचिन की छाती पर गिर जाता है। बेहोश हो जाता है।)

बिपाशा: क्या हुआ? क्या हुआ बेटा?

सचिन: (सुहास के गाल थपथपाते हुए) सुहास...सुहास...

बिपाशा: उसे क्या हुआ?

सचिन: (अपनी पैंट की जेब से रुमाल निकालकर सुहास के हाथ पर बांधते हुए, उसे अपने कंधों पर उठाते हुए) मैं हॉस्पिटल जा रहा हूँ, मुझे लगता है वह बेहोश हो गया है।

बिपाशा: मैं भी आ रही हूँ।

सचिन: नहीं, कोई ज़रूरत नहीं।

(सचिन जल्दी से बाहर जाता है। बिपाशा कुछ कदम आगे बढ़ती है। मंच के पीछे से सचिन की आवाज़ आती है, 'टैक्सी'। टैक्सी के रुकने की आवाज़, दरवाज़ा खुलने और बंद होने की आवाज़, फिर टैक्सी के चलने की आवाज़ आती है। बिपाशा वापस आती है और सचिन के बिस्तर पर बैठ जाती है। फिर वह तकिए पर सिर रखकर रोने लगती है। थोड़ी देर में अनिरुद्ध बाईं ओर के कमरे में प्रवेश करता है। बिपाशा को देखकर वह बीच वाले दरवाज़े से दाहिनी ओर के कमरे में आता है।)

अनिरुद्ध: तुम... इस कमरे में? रो रही हो? क्या हुआ? क्या हुआ बिपाशा? (बिपाशा आँखें पोंछती है।) क्या हुआ बिपाशा?

बिपाशा: अच्छा हुआ कि तुम आ गए।

अनिरुद्ध: मैं आए बिना रह नहीं सका। मैं पूरी जिंदगी भागता रहा हूँ। लेकिन अब नहीं। इतना खून! क्या हुआ बिपाशा?

बिपाशा: कुछ नहीं। सुहास के हाथ में चोट लग गई है। सचिन उसे हॉस्पिटल ले गए हैं।

अनिरुद्ध: हॉस्पिटल?

बिपाशा: जल्दबाजी मत करो। मुझे लगता है सुहास को सुरक्षित और उचित आश्रय मिल गया है। मैं तो बस उसके कुशल होने की खबर मिलते ही यहाँ से जाना चाहती हूँ।

अनिरुद्ध: क्या तुम यहाँ से जाना चाहती हो?

बिपाशा: जी हाँ, मैं वहाँ जाना चाहती हूँ जहाँ सुहास के ये आरोप मुझ तक न पहुँच सकें कि तुम  अच्छी माँ नहीं हो।

अनिरुद्ध: मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। सच क्या है, बताओगी?

बिपाशा: अनि, टैक्सी बुला लो, मैं तैयार होकर आती हूँ।

अनिरुद्ध: (खुशी से) क्या तुम सच में मेरे साथ आओगी, बिपा?

बिपाशा: नहीं।

अनिरुद्ध: तो फिर?

बिपाशा: ये सब मैं तुम्हें बाद में बताऊंगी। पहले टैक्सी बुलाओ, मैं आ रही हूँ।

(बिपाशा बाहर चली जाती है। अनिरुद्ध थोड़ी देर बाद चला जाता है। मंच कुछ पलों के लिए खाली हो जाता है। सचिन अपने कमरे में प्रवेश करता है। वह बीच वाले दरवाजे से बिपाशा के कमरे में आता है। वह चिल्लाता है।)

सचिन: बिपाशा... बिपाशा

(बिपाशा दौड़ती हुई आती है। उसने अपनी साड़ी बदल ली है।)

बिपाशा: तुमने मुझे बुलाया? क्या तुमने मुझे बुलाया?

सचिन: डॉक्टर सुहास को ऑपरेशन थिएटर में ले गए हैं। मैं तुम्हें लेने आया हूँ।

बिपाशा: अब वो कैसा है? वह ठीक तो हो जाएगा ना?

सचिन: डॉक्टर ने कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है। समय पर उसे उपचार मिल गया। अगर ज़रा सी भी देर हो जाती, तो पता नहीं क्या होता।

बिपाशा: क्या डॉक्टर ने आपको कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है?

सचिन: हाँ, हाँ, उन्होंने यही कहा। शायद खून चढ़ाने की ज़रूरत पड़ सकती है। मैंने कहा है कि  मैं खून दूंगा। ज़रूरत पड़ी तो मैं अपने शरीर का आखिरी कतरा तक दे दूंगा।

बिपाशा: सचिन, मुझे पता है कि अब वो ठीक हो जाएगा। अब उसे कोई डर नहीं है।

सचिन: चलो, तुम तैयार हो ना?

बिपाशा: नहीं।

सचिन: क्या तुम सुहास से नहीं मिलना चाहती?

बिपाशा: मुझे पता है कि सुहास ने आखिरकार तुम्हारा दिल जीत लिया है। अब इस घर में मेरी कोई ज़रूरत नहीं है।

सचिन: तुम क्या कहना चाहती हो?

बिपाशा: मैं यहाँ से जाना चाहती हूँ। यहाँ से जाने का इतना खूबसूरत मौका फिर कभी नहीं मिलेगा।

सचिन: असंभव, ऐसा नहीं हो सकता।

(बाहर एक टैक्सी रुकने की आवाज आती है। थोड़ी देर में, अनिरुद्ध दाहिनी ओर के कमरे में प्रवेश करता है और बिपाशा और सचिन की बातचीत सुन लेता है। सचिन बिपाशा के सामने खड़ा हो जाता है।)

सचिन: जाना चाहती हूँ, कहने से मैं थोड़ी तुम्हें जाने दूंगा।

बिपाशा: नादानी मत कीजिए, मुझे जाने दीजिए।

सचिन: नहीं, बिपाशा, ये कैसे हो सकता है? जब सुहास लौटेगा तब...

बिपाशा: मुझे जाने दीजिए। अगर सुहास फिर से मेरी तरफ देखकर कहेगा कि मम्मी, तुम अच्छी नहीं हो, मम्मी, तुम बुरी हो तो..

(बिपाशा की आवाज़ डर और पीड़ा से भरी हुई है)

सचिन: (दृढ़ता से) नहीं, तुम यहाँ से नहीं जा सकतीं। मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा।

बिपाशा: मुझे जाने दीजिए, सचिन, प्लीज़... जब वो वापस आएगा...

सचिन: तब मैं उससे कहूँगा, सुहास, तुम मेरे... तुम हमारे बेटे हो।

बिपाशा: क्या कहा आपने? जरा फिर से कहिये।

सचिन: बिपाशा, सुहास सिर्फ तुम्हारा बेटा नहीं है, वो हमारा बेटा है, हम दोनों का बेटा है।

(बिपाशा सचिन के पैर छूती हैं। सचिन बिपाशा के कंधे पर हाथ रखकर वहीं खड़े हो जाते हैं। अनिरुद्ध धीरे-धीरे बाहर चला जाता है। टैक्सी के जाने की आवाज़ सुनाई देती है। संगीत बज रहा है।)

----------------- समाप्त ---------------