मूल बांग्ला से हिन्दी में अनूदित एकांकी नाटक “अनात्मज”
भाग 2
पात्र : सचिन, बिपाशा, अनिरुद्ध, सुहास
(सुहास जल्दी से चला जाता है। बिपाशा आह भरती है और सारे पुरस्कार और घड़ी लेकर अंदर चली जाती है। कुछ क्षणों के लिए मंच खाली रहता है। सुहास दाहिनी ओर के कमरे में प्रवेश करता है जो सचिन का कमरा है। लाइट जलाता है। अपने पिता के कपड़े व्यवस्थित करता है, हेंगर में जामा टांगता है। धुली हुई चादर बिस्तर पर बिछाता है। तकिए में कवर लगाता है। बिपाशा दाहिनी ओर के कमरे में प्रवेश करती है।)
सुहास: देखो मम्मा, मैंने सब कुछ ठीक से रख दिया ना?
बिपाशा: तुमने सब कुछ बहुत अच्छे से रख दिया है। चलो अब चलते हैं। तुम्हारे पापा आ रहे होंगे।
सुहास: रुको, इस जग में अभी पानी भरना बाकी है।
(वह खाली जग लेकर बाहर जाता है। बिपाशा चादर को फिर से ठीक करती है। सुहास जग में पानी लाता है, जग को टीपॉय पर रखता है और उसके ऊपर गिलास रख देता है।)
सुहास: मम्मा, आज पापा खुश हो जाएंगे, है ना?
बिपाशा: सुहास, रोज़ाना इतनी बेइज्ज़ती, इतना अपमान और इतनी गालियाँ सुनने के बावजूद तुम पापा के लिए इतना सब क्यों करते हो?
सुहास: चाहे वो मुझे गाली भी दे। कोई बात नहीं, वो मेरे पापा हैं। मम्मा, तुम्हें पता है? पापा बहुत अकेले हैं। अकेलेपन की वजह से उनका ऐसा हाल हो गया है। वो तुमसे बात नहीं करते। वो मुझसे बहुत नफरत करते हैं। पता नहीं क्यों? (बिपाशा दर्द से आँखें बंद कर लेती है।) मम्मा, मुझे लगता है पापा के मन में कोई गहरा दुख छिपा है।
बिपाशा: तुम्हें कैसे पता चला?
सुहास: मैंने पापा को अक्सर अकेले में रोते हुए देखा है।
बिपाशा: बेटा, तुम किसी और बात पर चर्चा करो। चलो उस कमरे में चलते हैं। मुझे यहाँ डर लग रहा है।
सुहास: क्यों? क्या हुआ मम्मा?
बिपाशा: (खुद को संभालते हुए) नहीं...कुछ नहीं। उनके आने का समय हो गया है। चलो चलते हैं। अगर उन्होंने हमें यहाँ देख लिया, तो उनका गुस्सा बेकाबू हो जाएगा। तुम जानते हो।
सुहास: (बिपाशा के कंधे पर सिर रखते हुए) पापा आज झगड़ा नहीं करेंगे। तुम देखना।
बिपाशा: (सुहास के सिर पर हाथ फेरते हुए) बेटा, अगर तुम्हें कभी पता चला कि तुम्हारी मम्मा बहुत बुरी है, तो तुम क्या करोगे? क्या मुझसे नफरत करोगे?
सुहास: (बिपाशा को गले लगाते हुए) मम्मा, तुम ऐसे बेकार के सवाल क्यों पूछ रही हो? मुझे ये बिल्कुल पसंद नहीं।
बिपाशा: (अचानक नज़र में आने पर) अरे...अरे बेटा...तुम्हारी गर्दन पर नाखून से खरोंचने के इतने निशान क्यों है?
सुहास: बिल्लू से झगड़ा हो गया था।
बिपाशा: तुम बिल्लू से क्यों लड़ते रहते हो? बेटा... पिछली बार भी तुमने...
सुहास: वो मेरे पापा के बारे में बुरा-भला बोलता है। मज़ाक करता है। ताने मारता है।
बिपाशा: किस बात पर मज़ाक करता है? बताओ... किस बात पर मज़ाक करता है?
सुहास: (मुँह पर उंगली रखकर) चुप हो जाओ मम्मा... (कान लगाकर सुनता है, फिर धीमी आवाज़ में) मुझे लगता है पापा आ रहे हैं।
बिपाशा: ओह... चलो बेटा, उस कमरे में चलते हैं।
(दोनों उठकर बाईं ओर के कमरे में जाते हैं। सुहास उत्सुकता से खड़ा है। बिपाशा के चेहरे पर डर का भाव है। सचिन थके हुए, मुरझाए और रूखे चेहरे के साथ अपने कमरे में प्रवेश करता है। वह घूरती नज़रों से चारों ओर देखता है। धीरे से बिस्तर पर बैठ जाता है। अपने जूते उतारता है। बिस्तर के नीचे से चप्पल निकालकर पहन लेता है। जब अपनी कमीज़ खोलकर हैंगर पर टांगने जाता है तो हैरान होता है।)
सचिन: फिर से... फिर से मेरे कमरे को किसने सजाया? मेरे कपड़े किसने धोए? चादर किसने बदलीं? बिना मेरी अनुमति के मेरे कमरे में कौन आया? (फिर से बिस्तर पर बैठ जाता है।) दया... मुझ पर इतनी दया, इतनी सहानुभूति क्यों दिखा रहे हो? मुझे किसी की दया, किसी की सहानुभूति की ज़रूरत नहीं है।
(बाईं ओर के कमरे में बिपाशा स्तब्ध खड़ी है। सुहास अपने पिता के कमरे की ओर बढ़ता है। बिपाशा उसका हाथ पकड़कर उसे रोकती है।)
बिपाशा: तुम कहाँ जा रहे हो?
सुहास: मैं पापा के कमरे में जा रहा हूँ।
बिपाशा: अभी नहीं। अभी मत जाओ बेटे।
सुहास: मैं जाऊँगा, मम्मा... मेरा हाथ छोड़ दो।
बिपाशा: नहीं, मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगी।
(सुहास हल्के झटके अपना हाथ छुड़ा लेता है और चला जाता है।)
सचिन: मेरे कमरे की गंदगी से किसे फर्क पड़ता है? इस घर में मेरे गंदे कपड़ों से किसे परेशानी है? मैंने किसी को अपनी मर्ज़ी से जीने से नहीं रोका है, तो मुझे क्यों रोका जा रहा है?
(सुहास आकर सचिन के पीछे खड़ा हो जाता है। सचिन उसे देख नहीं पाता।)
सचिन: कावर्ड...जवाब तक नहीं दे रहे। किसी में हिम्मत भी नहीं कबूल करने की...
सुहास: पापा...
सचिन: कौन...कौन है? अरे...तुम? क्या बात है?
सुहास: मैंने आपका कमरा सजा दिया है पापा। मैंने सब कुछ खुद किया है।
सचिन: क्यों? तुमने ये सब क्यों किया? (खड़ा हो जाता है।)
सुहास: बस, अब से मैं आपके सारे काम करूँगा, पापा। मैं सब कुछ व्यवस्थित और साफ-सुथरा रखूँगा।
सचिन: तुम्हें कुछ नहीं करना है। मैंने कह दिया।
सुहास: क्यों पापा?
सचिन: बस, मुझे ये सब पसंद नहीं है।
सुहास: आपको ये क्यों पसंद नहीं है?
सचिन: ऐसे सवाल मत पूछो। मुझे ये पसंद नहीं है।
सुहास: (भारी आवाज़ में) पापा, आपको ये क्यों पसंद नहीं है? आप अपने कपड़े खुद धोते हैं। अपना कमरा खुद साफ करते हैं। तो मेरे करने में क्या दिक्कत है?
सचिन: (कुछ देर सुहास को घूरने के बाद हाथ जोड़कर कहता है) सुहास, मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूँ। मैं तुमसे विनती करता हूँ। मुझे तुम लोगों से कुछ नहीं चाहिए था। तुम सब मिलकर मेरी अकेले रहने की आज़ादी छीनने की साज़िश क्यों रच रहे हो? क्या मुझे अपने घर में कुछ देर आराम करने का भी अधिकार नहीं है?
(सचिन चप्पल और कुर्ता पहनकर बाहर जाता है। सुहास बिस्तर पर बैठकर रोता है। थोड़ी देर बाद, वह अपनी आँखें मलता है, लाइट बंद करता है और बाहर चला जाता है। बाईं ओर के कमरे में बिपाशा स्तब्ध बैठी दिखाई देती है। अनिरुद्ध अंदर आता है। बिपाशा का ध्यान नहीं है।)
अनिरुद्ध: बिपाशा, सचिन बाबू के कमरे में अंधेरा देखकर मुझे लगा कि वो घर पर नहीं हैं, इसलिए... (बिपाशा चुप बैठी रहती है।) तुम ऐसे क्यों बैठी हो? (फिर भी बिपाशा ध्यान नहीं दे रही। अनिरुद्ध बिपाशा के कंधे पर हाथ रखते हैं) अरे... बिपा...
बिपाशा: (दुखी आवाज़ में) मुझे मत छुओ। मत छुओ मुझे।
अनिरुद्ध: क्या हुआ बिपाशा?
बिपाशा: तुम्हारे स्पर्श से सब कुछ जल गया। मेरा शरीर, मेरा घर, मेरी दुनिया, सब कुछ।
अनिरुद्ध: ये सब क्या कह रही हो?
बिपाशा: मैं सच कह रही हूँ। आप शनि के रूप में मेरे जीवन में आए हैं। मुझे छोड़ क्यों नहीं देते? क्या आप मुझे राख में बदलने के बाद ही छोड़ेंगे?
अनिरुद्ध: (दुखी स्वर में) लेकिन मैं... मैं तो सुहास से मिलने आया हूँ। तुमने मुझे अनुमति दी थी।
बिपाशा: नहीं, तुम नहीं आओगे। अब कभी नहीं आओगे? सुहास तुमसे नफरत करता है, सुना तुमने? हाँ... वो तुमसे नफरत करता है। ही हेटस यू। (बिपाशा कुछ देर तक अनिरुद्ध को गुस्से भरी निगाहों से देखती रहती है।)
अनिरुद्ध: (सिर झुकाए हुए) ठीक है, मैं जा रहा हूँ। (दरवाजे की ओर बढ़ता है।)
बिपाशा: जाओ, तुम सब जाओ। पाप की चिता मैंने ही जलाई है। तुम इसमें क्यों जलना चाहते हो?
(अनिरुद्ध खड़ा होता है। पीछे मुड़कर एक कदम आगे बढ़ता है।)
बिपाशा: जाओ, वापस क्यों आए? यह किसी के अतीत को रौंदकर चले जाने का तुम्हारा तरीका है। जाओ।
(इसी बीच, सुहास दाहिनी ओर के कमरे में प्रवेश करता है। उसके हाथ में सारे पुरस्कार हैं। वह उन्हें बिस्तर पर रख देता है और चुपचाप अनिरुद्ध और बिपाशा की बातें सुनता है।)
अनिरुद्ध: (आगे आकर बिपाशा का हाथ पकड़ते हुए) क्या हुआ? तुम्हें क्या हुआ है? क्या तुम मुझे भी नहीं बताओगी?
बिपाशा: बस, मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती। अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती।
अनिरुद्ध: क्या तुम्हारे मन में कोई आशंका है?
बिपाशा: मेरा हृदय किसी बुरी आशंका से कांप रहा है। मैं पागल हो जाऊंगी।
अनिरुद्ध: बिपाशा, मैंने तुम्हें कई बार कहा है। आज मैं फिर कह रहा हूँ, इस तरह खुद को खत्म ना करो। इस तरह खुद को तड़पा तड़पाकर मत मारो।
(बिपाशा अपना हाथ छुड़ा लेती है। कुछ देर चुप रहती है।)
बिपाशा: तो मैं और क्या कर सकती हूँ?
अनिरुद्ध: तुम्हारे साथ हुए अन्याय की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है। मुझे प्रायश्चित करने का एक मौका दो। प्लीज... मेरे साथ चलो।
बिपाशा: आप मुझे कहाँ ले जाएँगे?
अनिरुद्ध: मेरे साथ... मेरे घर...
बिपाशा: तुम्हारे घर? फिर तुम्हारा परिवार, तुम्हारी पत्नी, तुम्हारी बेटी का क्या होगा...? तुम्हारे पिता, जो जानते थे कि मेरे गर्भ में तुम्हारे वंशकी संतान पल रही है; फिर भी उन्होंने कोई दया नहीं दिखाई... कोई करुणा नहीं दिखाई, उसका क्या?
अनिरुद्ध: मैं उन लोगों के सामने अपनी गलती स्वीकार करूँगा। मैं माफी माँगूँगा। मैं सहानुभूति की भीख माँगूँगा।
बिपाशा: लेकिन अगर तुम्हें माफ़ी नहीं मिली तो?
अनिरुद्ध: जो होना है वो होगा। लेकिन मैं...
बिपाशा: (गहरी साँस लेते हुए) नहीं... अब कुछ नहीं होगा अनिरुद्ध, बहुत देर हो चुकी है। बहुत देर हो चुकी है।
अनिरुद्ध: क्यों नहीं हो सकता?
बिपाशा: मैं सचिन को छोड़कर कहीं नहीं जा सकती।
अनिरुद्ध: एक निरर्थकता से चिपके रहने का क्या फायदा?
बिपाशा: तुमने सचिन को देखा नहीं है। ऐसा लगता है जैसे वह मृत्यु की साधना कर रहे हैं। अकेले... बिलकुल अकेले, तुम उनसे और कितना छीनना चाहते हो?
(दोनों कुछ पल चुपचाप बैठे रहते हैं)
बिपाशा: अनिरुद्ध, मुझे समझ में नहीं आता कि कि मुझे क्या हो गया है। एक तरफ अतीत का दर्द, दूसरी तरफ भविष्य का डर... मैंसचिन को छोड़ना नहीं चाहती और न ही तुम्हें खोना चाहती हूँ।
अनिरुद्ध: मैं तुम्हारे साथ रहूँगा, बिपा, हमेशा तुम्हारे साथ। अगर कभी ऐसा दिन आया, तो मैं इसे साबित कर दूँगा। मैं उतना निर्दयी नहीं हूँ जितना तुम सोचती हो।
(सुहास बगल वाले कमरे से उनकी बातचीत सुन रहा था। अचानक, कई दिनों से बंद पड़ा दोनों कमरों के बीच का दरवाज़ा वह खोल देता है। अनिरुद्ध और बिपाशा चौंक जाते हैं। वे तुरंत एक-दूसरे से दूर हट जाते हैं।)
सुहास: (घृणा भाव से) मम्मा, तुम बिल्कुल भी अच्छी नहीं हो। तुम बहुत बुरी हो। मम्मा बहुत बुरी है।
बिपाशा: तुमने क्या कहा, सुहास?
सुहास: मुझे तुमसे नफरत है। हाँ मम्मा...मुझे तुमसे नफरत है।
बिपाशा: क्या तुम्हें एहसास है कि तुम क्या कह रहे हो?
सुहास: मम्मा, मैं तुम्हें कितना प्यार करता था! लेकिन अब मैं तुमसे नफ़रत करता हूँ।
बिपाशा: (चिल्लाते हुए) चुप रहो। सुहास, चुप रहो। क्या तुम ये बात अपनी माँ से कह रहे हो?
सुहास: मैं कहूँगा, जरूर कहूँगा। मैं तुमसे नफ़रत करता हूँ।
अनिरुद्ध: सुहास, तुम किसे क्या कह रहे हो तुम्हें नहीं पता।
सुहास: (नफ़रत से) तुम लोगों ने मेरे पापा को बहुत दुख पहुँचाया है। तुम लोग बहुत बुरे हो।
अनिरुद्ध: सुहास…
सुहास: आप यहाँ मत आना। अब से कभी हमारे घर मत आना। कभी नहीं आना।
बिपाशा: सुहास, चुप रहो? ये तुम क्या कह रहे हो? क्या तुम्हें पता है ये तुम्हारे कौन हैं?
सुहास: मैं कुछ नहीं जानना चाहता। मुझे कुछ नहीं जानना है।
बिपाशा: (दोनों हाथों से सुहास को हिलाते हुए) तुम्हें जानना होगा। तुम्हें आज ही जानना होगा।
अनिरुद्ध: (बिपाशा को छुड़ाते हुए) बिपाशा, क्या तुम पागल हो गई हो?
बिपाशा: हाँ, मैं पागल हो गई हूँ। तुम सब ने मिलकर मुझे पागल बना दिया है।
अनिरुद्ध: बिपाशा, सुनो... मेरी बात सुनो।
बिपाशा: नहीं, मैं किसी की कोई बात नहीं सुनना चाहती। मुझ पर दया करो... मुझ पर दया करो। मुझे मार डालो, मुझे मार डालो।
(घर से बाहर निकल जाती है। अनिरुद्ध और सुहास उसे देखते रह जाते हैं। अनिरुद्ध सुहास के पास आता है।)
अनिरुद्ध: सुहास, तुम सही कह रहे हो, मैं अच्छा इंसान नहीं हूँ। अगर तुम नहीं चाहते, तो मैं कभी नहीं आऊँगा, लेकिन मेरी एक विनती है कि कभी भी तुम्हारी माँ को गलत न समझना। यहाँ तुम्हारे सिवा उसका कोई नहीं है।
(सुहास दूसरी तरफ मुंह करके खड़ा होता है। अनिरुद्ध कुछ देर खड़ा रहता है और फिर चला जाता है। थोड़ी देर बाद सुहास सचिन के कमरे में जाता है। वह बिस्तर पर बैठ जाता है। बाईं ओर के कमरे की रोशनी बीच वाले दरवाजे से दाहिनी ओर के कमरे में आती है। वातावरण सदमे से भरा हुआ है। बाहर सड़क से वाहनों की आवाज आ रही है और दूर कहीं रेडियो पर कोई गाना बज रहा है। सचिन दाहिनी ओर के कमरे में प्रवेश करता है। सुहास को बैठा देखकर और बीच वाला दरवाजा खुला देखकर वह आश्चर्यचकित हो जाता है।)
सचिन: कौन है? (लाइट जलाते हुए)
सुहास: पापा, आप गए आप?
सचिन: तुम... इस कमरे में क्या कर रहे हो?
(सुहास पापा के पैर छूता है)
सचिन: रहने दो... रहने दो। मुझे ये अच्छा नहीं लगता। तुम इस कमरे में क्यों बैठे हो?
सुहास: पापा, आज मेरे स्कूल में प्राइज डिस्ट्रीब्यूशन का कार्यक्रम था।
सचिन: पहले मेरे सवाल का जवाब दो। तुम इस कमरे में क्यों आये हो? बीच वाला दरवाजा किसने खोला?
सुहास: मैं आपको मेरे प्राइज दिखाने आया हूँ। देखिए मैंने कितने प्राइज जीते हैं! ये कप...
सचिन: मुझे कुछ नहीं सुनना। ये सब लो और यहाँ से चले जाओ।
सुहास: पापा, मैंने गायन और वाद-विवाद में भी प्रथम प्राइज जीता है।
सचिन: मुझे अकेला छोड़ दो। सुहास, तुम यहाँ से जाओ।
सुहास: मैं नहीं जाऊँगा, पापा।
सचिन: तुमने क्या कहा? नहीं जाओगे?
सुहास: मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा, पापा।
सचिन: तुम्हें जाना ही होगा।
सुहास: नहीं, पापा, मैं आपको अब और अकेला नहीं छोड़ूंगा।
सचिन: तुम्हें जाना होगा।
सुहास: (भारी स्वर में) मेरी क्या गलती है, पापा? आप मुझसे प्यार क्यों नहीं करते?
सचिन: तुम यहाँ से जा रहे हो या नहीं?
सुहास: नहीं, मैं नहीं जाऊंगा।
(कुछ क्षणों के लिए माहौल तनावपूर्ण हो जाता है।)
सचिन: मैं आखिरी बार पूछ रहा हूँ, तुम यहाँ से जा रहे हो या नहीं?
सुहास: मैं क्यों जाऊँ? मेरी क्या गलती है?
(अचानक, सचिन खूंटी से लटकी बेल्ट को खींचता है और वह सुहास पर वार करने लगता है।)
सचिन: तुम नहीं जाओगे? अब...अब जाओगे या नहीं? बोलो...बोलो... अब जाओगे या नहीं? बोलो...बोलो... अब जाओगे या नहीं?
(सुहास बिलकुल भी विरोध नहीं करता। उसकी पिटाई होती रहती है। वह बिस्तर से गिर जाता है। बिपाशा दाहिने कमरे की ओर दौड़ती है। वह बीच वाले दरवाजे के पास खड़ी हो जाती है। वह जोर से बोलती है।)
बिपाशा: उसे छोड़ दीजिए। ये आप क्या कर रहे हैं? उसे छोड़ दीजिए।
(सचिन अचानक रुक जाता है। सुहास रो रहा है। बिपाशा रोना रोकने की कोशिश कर रही है। सचिन उन दोनों को देखता है, बेल्ट फेंककर बिस्तर पर बैठ जाता है। सुहास उसके पैरों के पास पड़ा है। उसकी सिसकियाँ थम रही हैं।)
सचिन: मैंने क्या किया? ये मैंने क्या किया...?
सुहास: (सचिन के पैर पकड़ते हुए) पापा, मुझे आपके साथ रहने दीजिए।
सचिन: (सुहास को दोनों हाथों से पकड़ते हुए) सुहास... सुहास बेटा, तुम्हें बहुत चोट लगी है, है ना?
सुहास: पापा, मुझे आपके साथ रहने दीजिए।
सचिन: मैं तुम्हें बहुत डाँटता हूँ, तुमसे नफरत करता हूँ, तुम्हें दूर धकेलना चाहता हूँ; फिर भी तुम इस मृत व्यक्ति के पास क्यों लौट आते हो?
सुहास: पापा... आप मेरे पिता हैं।