ruho ka soda - 21 in Hindi Fiction Stories by mamta books and stories PDF | रूहों का सौदा - 21

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रूहों का सौदा - 21

​अध्याय 21: लौरा का क्रोध और रुद्र से टकराव

​महागुरु की घोषणा सुनते ही लौरा का चेहरा अपमान और क्रोध से लाल हो गया। उसके भीतर एक आग सी जल उठी। वह बिना किसी को कुछ कहे, सीधे कन्या गुरुकुल की ओर बने अपने कक्ष की ओर भागी। उसकी चाल में इतनी तेज़ी थी कि कोई उसे रोक नहीं पाया।
​क्रोध का तांडव
​अपने कक्ष में पहुँचते ही लौरा ने भीतर से कुंडी लगा ली। फिर जो हुआ, वह क्रोध का तांडव था। तलवारों की खनक, लकड़ी के टूटने की आवाज़ें और बर्तनों के बिखरने की ध्वनि पूरे परिसर में गूँजने लगी। उसने अपने शस्त्रों को ज़मीन पर पटका, आसन को उलट दिया और दीवार पर टंगे गुरुओं के चित्रों को भी तोड़ दिया।
​उसकी आँखों से आँसू नहीं, बल्कि आग बरस रही थी। "यह पक्षपात है! यह धोखा है! क्या मेरा सारा पुरुषार्थ व्यर्थ है?" वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रही थी।
​कन्या गुरुकुल की छात्राएं और कुछ आचार्य उसे रोकने और समझाने आए, लेकिन लौरा ने किसी की बात नहीं सुनी। वह हर उस आवाज़ को अनसुना कर रही थी जो उसे शांत करने की कोशिश कर रही थी।
​रुद्र का हस्तक्षेप
​तभी, बीच-बचाव करने के लिए स्वयं रुद्र वहाँ पहुँचा। उसने देखा कि लौरा अपने क्रोध में सब कुछ नष्ट कर रही है और कोई उसे संभाल नहीं पा रहा है।
​रुद्र ने द्वार पर पहुँचकर ऊँची आवाज़ में कहा, "लौरा! यह क्या कर रही हो? अपने क्रोध में तुम अपनी ही शिक्षा का अपमान कर रही हो!"
​यह आवाज़ सुनते ही लौरा पलटी। उसकी लाल आँखों में क्रोध अब रुद्र पर केंद्रित हो गया। "तुम! तुम्हें यहाँ आने की हिम्मत कैसे हुई? तुम ही तो हो जिसके कारण मुझे किनारे किया गया है! तुम्हें यह सब इसलिए मिल रहा है क्योंकि तुम महागुरु के 'करीबी' हो!"
​उसने अपनी तलवार उठाई और पूरी ताकत से रुद्र की ओर झपटी। "यदि मेरा कौशल बेकार है, तो आज तुम्हारे शस्त्र से ही यह सिद्ध हो जाएगा!"
​रुद्र ने अपने आप को बचाने के लिए अपनी तलवार खींची। दोनों के शस्त्रों के टकराने की 'खन्न-खन्न' की आवाज़ पूरे गुरुकुल में गूँज उठी। जो छात्र और आचार्य अभी तक बाहर खड़े थे, वे इस अप्रत्याशित युद्ध को देखकर स्तब्ध रह गए।



​ अनियंत्रित क्रोध और मर्यादा का उल्लंघन

​कक्ष के भीतर और बाहर का वातावरण अग्नि के समान दहक रहा था। रुद्र और लौरा की तलवारें जब आपस में टकरातीं, तो उनसे निकलने वाली चिंगारियाँ कमरे के अंधेरे को चीर देती थीं। बाहर खड़े आचार्य विक्रम और आचार्या वसुंधरा ने उन्हें रोकने के लिए कई बार आदेश दिए, यहाँ तक कि स्वयं महागुरु की गंभीर आवाज़ गूँजी— "रुद्र! लौरा! रुक जाओ! यह मर्यादा के विरुद्ध है!"
​लौरा की ललकार
​लेकिन लौरा पर जैसे किसी अज्ञात शक्ति का साया था। उसने महागुरु की आज्ञा को अनसुना कर दिया। उसने एक ज़ोरदार प्रहार रुद्र की तलवार पर किया और चिल्लाकर बोली, "नहीं महागुरु! आज मैं नहीं रुकूँगी! आपने मुझे मुकाबले से बाहर करके यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि मैं कमज़ोर हूँ। लेकिन आज मैं सबको यह दिखा कर ही रहूँगी कि मैं इस रुद्र के मुकाबले में बराबरी पर खड़ा होने की योग्यता रखती हूँ। अगर यह श्रेष्ठ है, तो आज इसे साबित करना होगा!"
​उसकी आवाज़ में वह दर्द था जो वर्षों की मेहनत के बाद मिले अपमान से पैदा होता है। उसने अपनी गति और बढ़ा दी। उसकी तलवार किसी नागिन की तरह रुद्र के बचाव को भेदने की कोशिश कर रही थी।
​रुद्र का रक्षात्मक युद्ध
​रुद्र की स्थिति बहुत कठिन थी। वह लौरा को चोट नहीं पहुँचाना चाहता था, लेकिन लौरा का हर प्रहार जानलेवा था। वह केवल बचाव कर रहा था, जिससे लौरा और भी अधिक क्रोधित हो रही थी।
​"मुझ पर दया करना बंद करो रुद्र! अपनी पूरी शक्ति से लड़ो, वरना आज इस कक्ष की दीवारें तुम्हारे रक्त से रंग दी जाएंगी!" लौरा ने गरजते हुए कहा और एक ऐसा घुमावदार प्रहार किया कि रुद्र के हाथ से उसकी तलवार छूटते-छूटते बची।
​गुरुकुल के छात्र और छात्राएं सन्न खड़े थे। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि लौरा महागुरु के आदेश का उल्लंघन कर देगी। यह अब केवल एक अभ्यास नहीं था, यह एक विद्रोह था—एक ऐसी योद्धा का विद्रोह जिसे अपनी पहचान खोने का डर था।