which was ignored in Hindi Children Stories by कमल चोपड़ा books and stories PDF | किया जो अनदेखा

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किया जो अनदेखा

​किया जो अनदेखा
कमल चोपड़ा   
     ​सजग स्कूल से लौटा तो माँ झुंझला रही थी— "अब ये मिक्सी खराब हो गई। अभी छह महीने पहले ही तो खरीदी थी; इतनी महँगी और बड़ी कम्पनी की थी फिर भी पता नहीं इतनी जल्दी कैसे खराब हो गयी?"     ​"मैं तो आज मैंगो शेक बनवाकर पीने की सोच रहा था। छह महीने पहले ली थी तो इतनी जल्दी खराब कैसे हो गयी।"     ​"पता नहीं?"      ​कुछ देर चुप रहने के बाद मां बोली— "वैसे तो कोई भी चीज कभी भी खराब हो सकती है।... शर्मा इलेक्ट्रोनिकवाले ने इसकी गारंटी भी दी थी।"     ​सजग उठकर खड़ा हो गया— "तो चिन्ता किस बात की? लाओ मिक्सी मुझे दो, मैं अभी शर्मा इलेक्ट्रोनिक्स के शोरूम पर जाता हूँ और इसे ठीक करवाकर लाता हूँ।"    ​माँ उसे मना करती रही— "तू रहने दे, तेरे बाबूजी आयेंगे तो वे खुद इसे ले जाकर दुकानदार से बात करेंगे।" पर सजग नहीं माना; मिक्सी को उसने थैले में डाला, कंधे पर लटकाया और अपनी बैसाखी लेकर चल पड़ा।    ​दुकानदार ने मिक्सी को आगे-पीछे से देखा फिर बोला, "नहीं-नहीं-नहीं, ये मिक्सी तो हमारे यहाँ की नहीं है। कोई रसीद है तो लेकर आओ.......?"      ​मिक्सी उठाकर चुपचाप घर लौट आने के सिवाय सजग के पास कोई चारा नहीं था। वह घर पहुँचा तो उसके पापा भी घर लौट चुके थे। उसने सारी बात बताई तो माँ बोली, "दुकानदार ने बच्चा समझकर इसे टरका दिया है?"     ​सजग बोला, "दुकानदार रसीद माँग रहा है।"    ​पापा बोले— "रसीद तो.....!" याद करने की कोशिश करते हुए पापा ने कहा— "रसीद तो उन्होंने दी ही नहीं थी।"    ​"दुकानदार ने एक कार्ड दिया था। उसके पीछे कुछ लिखा था। वह लेकर चलते हैं।"     ​दुकानदार ने कार्ड को उलट-पलटकर देखा फिर कहा— "नहीं-नहीं-नहीं.. कार्ड पर जनवरी की तारीख पड़ी हुई है, अब चल रहा है अगस्त, मतलब मिक्सी को खरीदे हुए आपको सात महीने हो गये हैं? मतलब छह महीने से ऊपर? है न! हमारी गारंटी छह महीने की थी। इसलिये हम इसे ठीक नहीं करवा सकते।"     ​सजग ने उसे टोकते हुए कहा— "गारंटी तो एक साल की होती है।"    ​"नहीं-नहीं-नहीं... तुम्हारे पास पक्की रसीद होती तो एक साल की गारंटी होती। अगर बिल वाली मिक्सी ली होती तो एक साल की गारंटी थी वो पाँच हजार रुपयों की होती। बिना पक्के बिल की मिक्सी चार हजार रुपयों की पड़ती है। पर इसमें हमारी तरफ से गारंटी छह महीने की होती है।"    ​"पर आपने ही तो कहा था कि बिना बिल की ले लो, बढ़िया कम्पनी की है। खराब ही नहीं होगी।"    ​"नहीं-नहीं-नहीं, पर मैंने ये नहीं कहा था कि खराब हो ही नहीं सकती? इनसान का ही भरोसा नहीं, तो कौन सी चीज है जो खराब नहीं होती। बिजली के उपकरणों का तो कुछ भरोसा होता ही नहीं। नहीं-नहीं-नहीं, ​आप जाइये यहाँ से। मेरा टाइम खराब मत करो।"     ​विवश होकर वे शोरूम से बाहर निकल आये। बाहर आकर सजग ने पापा से पूछा, "अब क्या करें?"    ​कुछ देर सोचने के बाद पापा ने कहा, "मैं एक मिस्त्री को जानता हूँ जो इस तरह के बिजली के उपकरण ठीक करने में माहिर है। देखते हैं क्या कहता है?"    ​मिस्त्री ने मिक्सी को खोलकर देखा और कहा, "अरे! अंदर से इसकी मोटर वगैरह-वगैरह जल गयी है। एक हजार रुपये लगेंगे।"    ​"अरे इसे खरीदे हुए अभी छह महीने भी नहीं हुए इतनी महंगी और बढ़िया कम्पनी की ली थी फिर भी .........?"     ​"बढ़िया कम्पनी की? कौन कहता है ये मिक्सी बढ़िया कम्पनी की है? ये तो लोकल... घटिया और डुप्लीकेट है....।"     ​सजग ने मिस्त्री की बात काटते हुए कहा, "ये देखो, इस पर कम्पनी का नाम लिखा हुआ है। इधर से स्टीकर लगा हुआ है।"    ​"ये सब नकली हैं। जिस मर्जी कम्पनी का स्टीकर चाहो, जितने चाहो छपे-छपाये मिल जाते हैं। स्क्रीन प्रिंटिंग, लेजर प्रिंटिंग ओरिजनल से भी बढ़िया। हरिनगर बस स्टैंड के पीछेवाली गली में दो-तीन ऐसे प्रिंटर हैं उनसे जैसा मर्जी किसी भी कम्पनी का जो मर्जी छपवा लो। डुप्लीकेट चीज पर लगा लो, ग्राहक तो यही कुछ देखता है और विश्वास कर लेता है। दुकानदारों को भी ज्यादा मुनाफा होता है। इसीलिये वो भी नकली चीजें ही ग्राहक को उल्लू बनाकर बेचते हैं। आपको बिल लेना चाहिये। आप दुकानदार का कुछ नहीं बिगाड़ सकते क्योंकि आपके पास कोई पक्का बिल तो है नहीं, आपको मिक्सी का पक्का बिल लेना चाहिये था। कार्ड का क्या है, कार्ड पर तो ​सिर्फ तारीख ही लिखी है। बाजार में तो हर चीज नकली बिक रही है। खाने-पीने की चीजों से लेकर पहनने-ओढ़ने तक........।"      ​पापा को अपनी गलती महसूस हो रही थी। पर अब क्या कर सकते थे। मिस्त्री को मिक्सी ठीक करने के लिये कहकर वे घर लौट आये। देर रात तक सजग को नींद नहीं आई। सारी रात वह सोचता ही रहा। बाजार में नकली चीजें बिक रही हैं पर कोई कुछ करता ही नहीं। वर्ना नकली चीजें तो कितनी खतरनाक हैं। कितना गलत हो रहा है। सरला दीदी ने कहा ही था कहीं कुछ गलत होता दिखे तो उसे अनदेखा मत करो, मुझे कुछ करना ही होगा।     ​अगले दिन वह हरिनगर बस स्टैण्ड के पीछे वाली गली में जा पहुँचा। थोड़ा आगे चलने पर उसे एक प्रिंटर का बोर्ड नजर आया। वह अन्दर चला गया। सामने एक छोटा-सा ऑफिस बना हुआ था। अन्दर मूँछोंवाला एक आदमी बैठा था। वह बोला, "कहिये क्या काम है?"    ​"ऐसा है जी, मेरे एक मामा जी हैं। वो खाने-पीने का सामान बनाते हैं। बिस्कुट, चिप्स, नमकीन वगैरह-वगैरह। वे नामी और बढ़िया कम्पनियों का स्टीकर और थैलियाँ छपवाना चाहते हैं। वे सुल्तानपुर रहते हैं। वहाँ तो ऐसा कोई मिला नहीं जो बढ़िया कम्पनी की स्टीकर और थैलियाँ उन्हें छापकर दे सके। उन्होंने कहा कि तुम पता करके बताओ कि यह सब कहाँ से छपवाया जा सकता है।"     ​मूँछोंवाला आदमी जोर से हँसा— "यहाँ पर पहले से तैयार मिल जायेगा। देसी-विदेसी जिस कम्पनी का चाहो....... कम्पनियों का स्टीकर क्या चीज हैं? हम तो करंसी, नोट, डाक टिकटें, स्टाम्प पेपर बहुत कुछ छाप चुके हैं। ​रुको, मैं तुम्हें कुछ सैम्पल दे देता हूँ। तुम अपने मामा को दिखा देना, उन्हें पसंद आयें तो आकर हमें मिल लेंगे।"      ​वह सैम्पल लेकर चला आया। वहाँ से वह सीधा पुलिस थाने पहुँचा और सारी बात बताई। थानेदार ने कुछ देर सोचा फिर बोला, "वाकई डुप्लीकेसी की आजकल बहुत समस्या है, इन्हें पकड़ना होगा। कुछ ही देर बाद छापा मारकर पुलिस ने मूँछोंवाले प्रिन्टर को धर-दबोचा। थाने लाकर उससे पूछा तो उसने कई जनों के नाम-पते बताये जो उससे नकली मैटेरियल और स्टिकर बनवाते थे और अपने बनाये नकली माल की पैकिंग पर स्टिकर लगाकर बेचते थे। एक-साथ सात-आठ नकली सामान बनानेवालों के पकड़े जाने पर शहरभर में चर्चा होने लगी थी।      ​सभी लोग सजग की प्रशंसा कर रहे थे। सजग कह रहा था, "सबको पता भी होता है कि गलत हो रहा है। लोग देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। इसीलिये अपराधी बच जाते हैं। कुछ तो करना चाहिये वर्ना जो गलत हो रहा है उसका परिणाम भी हमें ही भुगतना पड़ेगा। उसके खिलाफ हमें कुछ कदम तो उठाने ही चाहिये।"