The greatest knowledge in Hindi Spiritual Stories by prem chand hembram books and stories PDF | सबसे बड़ा ज्ञान

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सबसे बड़ा ज्ञान

🌾 सबसे बड़ा ज्ञान
उत्तर भारत के एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक गरीब लड़का रहता था।
उसके पिता खेतों में मजदूरी करते थे और माँ एक साधारण गृहिणी थीं।
भारत के किसान प्रायः कठिन जीवन जीते हैं, इसलिए रामू का परिवार भी अभावों से घिरा हुआ था।
फिर भी रामू का मन पढ़ने में बहुत लगता था।
रामू का एक छोटा भाई था—भागी।
वह जन्म से ही कमजोर था।
गरीबी और अभाव ने जैसे अपनी सारी कठोरता उसी पर उतार दी थी।
जो बच्चा कभी “माँ-माँ” कहकर आँगन में दौड़ा करता था, वह धीरे-धीरे कमजोर होता गया।
उसका सिर शरीर से बड़ा होने लगा और शरीर दिन-प्रतिदिन सूखता गया।
रामू के माता-पिता उसे बड़े-बड़े डॉक्टरों के पास ले गए,
पर सभी ने लगभग एक ही बात कही—
“माँ के गर्भ में उचित पोषण के अभाव के कारण यह बीमारी हुई है।”
यह सुनकर रामू की माँ का हृदय मानो टूट गया।
उसकी आँखों में दुःख का समंदर उमड़ पड़ा।
उसने झाड़-फूँक भी कराई, ताबीज भी बंधवाए,
पर किसी चीज़ का कोई असर नहीं हुआ।
इसी बीच सावन का महीना आ गया।
बारिश की बूँदों से धरती की प्यास बुझने लगी।
सूखी झाड़ियों में फिर से हरी पत्तियाँ निकल आईं।
चारों ओर हरियाली छा गई।
चिड़ियों की मधुर आवाजें ऐसी लगती थीं, मानो कहीं विवाह में शहनाई बज रही हो।
पर उसी घर के भीतर एक माँ की आँखों से सावन की तरह आँसू बह रहे थे।
तीन दिन से भागी ने आँखें नहीं खोली थीं।
माँ रोते-रोते कहती—
“हे भगवान! इसे इस तरह तिल-तिल कर क्यों मार रहे हो?
अगर लेना ही है तो एक पल में ले लो।”
रामू यह सब देख नहीं पाता था।
और फिर वही हुआ जिसका डर था—
एक दिन भागी हमेशा के लिए शांत हो गया।
माँ की करुण पुकार से पूरा गाँव शोक में डूब गया।
घर में जैसे जीवन की रोशनी बुझ गई।
🌿 रामू की खोज
भागी की मृत्यु के बाद रामू का मन संसार से उचट गया।
वह अक्सर सोचता—
“यदि भगवान हैं, तो इतना दुःख क्यों है?”
“बेटे, तुम किसी के दुःख का कारण न बनो,
कोई तुम्हारा दुःख का कारण न बनेगा।”
स्कूल में कही गई यह पंक्ति सहसा उसके मन में गूँज उठी।
एक पल के लिए वह सोचने को मजबूर हुआ—
अभी तो भागी ठीक से स्कूल भी नहीं जा पाता था,
फिर यह किसी के दुःख का कारण कैसे बना?
उसके मन में अनगिनत प्रश्न हिलोरें मारने लगे।
मन में उठे इस ज्वार ने उसे जिज्ञासु बना दिया।
एक दिन भोर के समय, जब पूरा गाँव सो रहा था,
रामू बिना किसी से कुछ कहे घर से निकल पड़ा।
उसे दुःख का कारण जानना था।
उसे जीवन का सत्य जानना था।
वह कई दिनों तक भटकता रहा।
कभी जंगलों से गुजरता,
कभी नदियों के किनारे बैठ जाता।
भूख लगती तो जो मिल जाता, खा लेता।
कभी-कभी उपवास ही रहना पड़ता।
यह मानो भगवान की कठिन परीक्षा थी,
पर रामू का संकल्प अडिग था।
🌿 संत से भेंट
एक दिन वह एक आश्रम पहुँचा।
वहाँ कई संत और साधु रहते थे।
सब अपने-अपने ध्यान और साधना में लगे रहते।
रामू चुपचाप एक कोने में बैठ गया।
तभी एक वृद्ध संत की दृष्टि उस पर पड़ी।
उन्होंने उसे देखते ही अपने पास बुलाया।
संत ने शांत स्वर में पूछा—
“बेटा, तुम कौन हो?
और तुम्हारी आँखों में इतना दुःख क्यों है?”
रामू की आँखों से आँसू बहने लगे—
“बाबा, मैं रामू हूँ, दूर गाँव से आया हूँ।
मैं बहुत दुःखी हूँ, बाबा।”
फिर उसने सारी बातें बता दीं।
संत बोले—
“मुझे बहुत दुख हुआ, रामू, तुम्हारी कहानी सुनकर।”
रामू बोला—
“बाबा, मुझे इस संसार की बहुत सारी बातें विरोधाभास प्रतीत होती हैं।”
संत बोले—
“बेटा, ईश्वर के वचन में कोई विरोधाभास नहीं होता।
बस हम उन बातों को तभी जान और समझ पाएंगे,
जब हम ज्ञान-चक्षु को जागृत करेंगे।”
रामू ने पूछा—
“बाबा, इसके लिए क्या वेद, उपनिषद, धर्मग्रंथ काफी नहीं हैं?”
संत बोले—
“नहीं बेटा, सब अभ्यास से होता है।
ये हमें पूर्णतः ज्ञान नहीं देते, बल्कि ज्ञानोपार्जन के रास्ते बताते हैं।
इसलिए कहा गया है—
‘अनुभूति द्वारा जो जाना जाए, वही ज्ञान है।
ज्ञान को ही वेद कहते हैं, और वेद अखंड है।
भक्ति-विहीन ज्ञान मात्र वाचक ज्ञान होता है।’”
रामू ने पहली बार इतने गंभीर शब्द सुने।
उसका अंतर्मन प्रफुल्लित हो उठा।
रामू बोला—
“परंतु बाबा, मेरे भाई ने न तो कोई पाप किया
और न ही किसी के दुःख का कारण बना था।”
संत कुछ देर गंभीर मुद्रा में आकाश की ओर देखते रहे।
फिर बोले—
“बेटा, यही तो भ्रम है।
हम जिसको अपना समझते हैं, क्या वास्तव में वह हमारा अपना है?
यहाँ कोई किसी का अपना नहीं है, बेटा।
सब पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार ही जन्म लेते हैं।
भगवान बड़े दयालु हैं।
वे न किसी को दुःख देते हैं, न सुख।
मनुष्य स्वयं कर्म करता है,
और उन्हीं कर्मों के अनुसार अगला जन्म निर्धारित होता है।”
रामू ने पूछा—
“बाबा, तो क्या रिश्ते-नाते झूठे हैं?”
संत बोले—
“नहीं बेटा,
इसी से तो भगवान पल-पल परीक्षा लेते हैं।
संसार के अधिकतर मनुष्य इस परीक्षा में असफल हो जाते हैं,
क्योंकि इस संसार को अज्ञानता ने ढँक रखा है।
ज्ञान का अनुसंधान न करना ही सबसे बड़ा पाप है।”
रामू संत के चरणों में गिर पड़ा।
संत ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया।
फिर धीरे से बोले—
“लोग कहते हैं, यह जगत मिथ्या है।”
रामू ने पूछा—
“बाबा, यदि यह जगत मिथ्या है, तो फिर इतनी आसक्ति क्यों?”
संत मुस्कराए—
“पहले स्वयं को जानो, बेटा।
फिर धीरे-धीरे आँखों से पर्दा हटेगा।
मुझे लगता है, अब तुम अपने भाई की मृत्यु का उतना ग़म नहीं करोगे।
प्रत्येक आत्मा पूर्णतः स्वतंत्र है।
किसी आत्मा का किसी आत्मा से संबंध केवल कर्म का होता है।”
दूर एक कोने में बैठा एक युवक ध्यान से दोनों की बातें सुन रहा था।
उसे भी अपने सभी प्रश्नों के उत्तर मिल गए थे।
उसका पूरा परिवार एक सड़क दुर्घटना में नष्ट हो गया था।
तब से वह भी ज्ञान की खोज में भटक रहा था।
उसे कबीरदास की पंक्ति याद आ गई—
“दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय।”
रामू ने आश्रम में संतों की बहुत सेवा की।
गुरुजनों की सेवा से प्रसन्न होकर एक दिन वृद्ध संत ने उसे दीक्षा दे दी।
दीक्षा के बाद रामू का जीवन पूर्णतः बदल गया।
उसका चिंतन गहरा और परिपक्व हो गया।
अब वह लोगों से कहता—
“वैचारिक क्रांति सबसे बड़ी क्रांति है।
यह क्रांति पहले स्वयं को, फिर घर, समाज और राष्ट्र को बदल सकती है।
हमारी चिंतन धारा इष्ट-केन्द्रित होनी चाहिए।
जहाँ इष्ट नहीं होता, वहाँ अनिष्ट का वास होता है।
इष्टमुखी चलन से प्रवृत्ति-नियंत्रण होता है,
प्रवृत्ति-नियंत्रण से भक्ति आती है,
भक्ति का गाढ़त्व प्रेम है,
और प्रेम से अहिंसा उत्पन्न होती है।
यही वास्तविक धर्म है।
धर्म केवल आचरण नहीं, बल्कि अनुभूति है।”
कई वर्षों बाद रामू अपने गाँव लौटा।
पर अब वह पहले वाला रामू नहीं रहा था।
अब लोग उसे “बाबा रामदास” के नाम से जानते थे।
🌼 संदेश
इस संसार में दुःख, सुख, मिलन और बिछोह—
सब कर्मों की धारा में बहते हुए क्षण हैं।
हम जिसे अपना समझते हैं,
वह भी केवल एक पड़ाव मात्र का साथी होता है।
दुःख हमें तोड़ने नहीं,
अपितु जगाने आता है।
जब मनुष्य स्वयं से प्रश्न करता है,
तो उसका अंतर्मन जिज्ञासु हो उठता है।
तब वह मानता नहीं, बल्कि जानने का प्रयास करता है।
यही प्रयास यदि निरंतर हो,
तो वह ज्ञान का अधिकारी हो उठता है।
इसी से उसका वास्तविक ज्ञान-चक्षु जागृत होता है।
इस अवस्था तक पहुँचने पर
मनुष्य दुःख, अवसाद, भय और तनाव से मुक्त जीवन जी सकता है।
“मन दुष्ट होने से ही रोगों का घर बनता है।”
“साध कर चलने से ही रोगों पर विजय प्राप्त होती है।”
जयगुरु 🙏🙂