पार्ट 1 ( सल्तनत की राख )
चारों तरफ एक ऐसी रोशनी थी जो धूप से छनकर, हल्की सी अयान के चेहरे पर पड़ रही थी। अयान रॉय, अपनी कोठी की बालकनी में खड़ा था। हवा में, एक शाही रसूख की महक थी। उसने अपनी शर्ट की आस्तीन को, थोड़ा ऊपर सरकाया।
जहाँ उसकी कलाई पर, वो प्लैटिनम का भारी कड़ा, सूरज की किरणों को मात दे रहा था। वो कड़ा सिर्फ जेवर नहीं था, वो रॉय खानदान की धमक थी। जो चीख-चीख कर कहती थी कि, अयान के कदमों में दुनिया झुकती है।
तभी माहिरा की खिलखिलाहट गूँजी। उसने अयान की आँखों पर, अपनी ठंडी हथेलियाँ रख दीं। अयान मुस्कुराया, "माहिरा, ये कड़ा और मेरा हाथ... ये दोनों अब तुम्हारे हवाले हैं।" माहिरा ने कड़े को छूते हुए कहा, "वादा करो अयान, ये चमक कभी फीकी नहीं पड़ेगी।"
तभी, मंजर एकदम से काला पड़ गया...
माहिरा का हाथ, धुंआ बनकर उड़ गया। एक खौफनाक परछाईं सामने आई।
अयान को अपनी गर्दन पर, एक तेज़ सुई की चुभन महसूस हुई। कोई उसकी कलाई से, वो कड़ा, बेरहमी से नोच रहा था।
अंधेरे में, एक ज़हरीली आवाज़ गूँजी— "तेरी सल्तनत और तेरी पहचान... आज से ये सब मिट्टी है!"
"नहीं...अयान, एक रूह कंपा देने वाली चीख के साथ उठ बैठा। उसकी छाती, धौंकनी की तरह तेज़ चल रही थी। पूरा शरीर पसीने से तर-बतर था, जैसे अभी समंदर से निकल कर आया हो।
उसने फटी-फटी आँखों से, चारों तरफ देखा। कहाँ गया वो झूमर? कहाँ गई वो बालकनी? सामने बाँस की खपच्चियों वाली, एक कच्ची छत थी। जिस पर फटा हुआ, नीला तिरपाल लगा था।
हवा में फूलों की महक नहीं, बल्कि सड़ी हुई मछलियों की तेज़ बदबू, और समंदर के नमक का शोर था।
अयान ने अपनी कलाई पर बंधे उस कड़े को, अपनी उंगलियों से जोर से भींचा। उसकी आँखें लाल थीं, और गला भर आया था।
उसने करीम चाचा की तरफ देखा, और तड़पकर बोला”"चाचा... ये सपना मुझे चैन से जीने नहीं देता। वो आलीशान घर, वो खुशियाँ, और वो 'माहिरा' नाम की लड़की... आखिर कौन थी वो?
क्यों उसका नाम सुनते ही, मेरे सीने में कुछ होने लगता है? और सबसे ज़्यादा ये कड़ा... जब भी मैं इसे छूता हूँ, इसका ये भारीपन मुझे पागल कर देता है।
मुझे ऐसा लगता है जैसे ये कड़ा मेरी रूह का हिस्सा है, पर मुझे कुछ याद क्यों नहीं आता?मैं आखिर हूँ कौन चाचा?
अयान ने अपना हाथ चाचा के सामने फैला दिया, जहाँ वो कड़ा, अपनी पूरी धमक के साथ चमक रहा था।
"बताइए न चाचा... मैं यहाँ कैसे आया? ये कड़ा आज भी मेरी कलाई पर है, तो फिर मेरी यादें कहाँ मर गई हैं? ये अधूरापन मुझे अंदर ही अंदर खा रहा है चाचा। मुझे बस ये जानना है, कि मेरे साथ हुआ क्या था।"
करीम चाचा ने एक ठंडी सांस भरी, और अयान के उस कड़े वाले हाथ को, अपने खुरदरे हाथों में थाम लिया। उनकी आँखों में भी आंसू थे।
"बेटा अयान... सच तो ये है कि तू मुझे उस काली रात में, समंदर की लहरों के बीच अधमरा मिला था। लहरें तुझे पत्थरों पर पटक रही थीं, और तू अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था। तेरे जिस्म पर हज़ारों ज़ख्म थे, पर तूने अपनी मुट्ठी में इस कड़े को ऐसे जकड़ा हुआ था, जैसे यही तेरी आख़िरी उम्मीद हो।"
चाचा की आवाज़ भारी हो गई, "मैं तुझे वहाँ से उठा कर लाया। हफ़्तों तक तू मौत और ज़िंदगी के बीच झूलता रहा। जब तुझे होश आया, तो तुझे अपना नाम तक याद नहीं था। तू अपनी सारी यादें, उस खारे पानी की गहराई में छोड़ आया है।"
चाचा ने उसे गौर से देखा और बोले, "ये जो तू सपने देख रहा है, ये तेरे पुराने जनम के वो टुकड़े हैं, जिन्हें कोई तुझसे नहीं छीन पाया।
ये 'कड़ा' और ये 'माहिरा'... यही तेरी वो पहचान है, जो तुझे सच तक ले जाएगी। पर अभी तू कमज़ोर है अयान... अभी सिर्फ अपनी जान बचा, और इस बस्ती की धूल में खुद को छिपा ले।”
करीम चाचा ने अयान के कंधे को ज़ोर से झकझोरा, जैसे उसे उन सुनहरी यादों के मलबे से बाहर खींच रहे हों। उनकी आवाज़ में अब फिक्र के साथ-साथ एक कड़वाहट भी थी।
"बस कर बेटा! इन यादों का पीछा करेगा, तो आज की रोटी भी हाथ से निकल जाएगी। क्या तुझे आज काम पर नहीं जाना? उस होटल में बर्तन मांजने नहीं जाना क्या? मालिक पहले ही टेढ़ा चलता है, अगर आज भी देर से पहुँचा, तो वो तुझे कच्चा चबा जाएगा।"
अयान ने एक लंबी और ठंडी सांस भरी। उसने अपनी उस कलाई को देखा, जिस पर वो कड़ा अब भी चमक रहा था। उसने धीरे से अपने फटे हुए कुर्ते की आस्तीन नीचे की, और उस कड़े को दुनिया की नज़रों से छिपा लिया।
करीम चाचा ने लोटा मेज़ पर पटका और बोले, "सुन, आज समंदर किनारे वाले उस होटल में भीड़ ज़्यादा होगी। मालिक ने साफ़ कहा था, कि अगर वक़्त पर नहीं आए, तो कल से अपनी ये मनहूस शक्ल मत दिखाना।
ये कड़ा और ये माहिरा तुझे रोटी नहीं देंगे अयान, ये मज़दूरी ही तुझे ज़िंदा रखेगी। उठ, और चुपचाप काम पर निकल जा।"
अयान बिना कुछ बोले खड़ा हुआ। उसकी आँखों में अब वो दर्द नहीं, बल्कि एक अजीब सी खामोशी थी। उसने दीवार पर टंगा वो पुराना और मटमैला थैला उठाया।
दरवाज़े से बाहर कदम रखते हुए, उसने पीछे मुड़कर देखा और धीमी आवाज़ में बोला”
"जा रहा हूँ चाचा। पेट की आग यादों से बड़ी होती है, ये आज समझ आ गया।"
वो झोंपड़ी से बाहर निकला, जहाँ बाहर मछुआरों की बस्ती का शोर, और समंदर की लहरों की गर्जना उसका इंतज़ार कर रही थी।
अयान रॉय, जो कभी मखमल पर सोता था, अब कीचड़ और पसीने वाली दुनिया में अपना पहला कदम रख चुका था।
(लेखक की कलम से..)
दोस्तों, अयान की कहानी अब उस मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहाँ एक तरफ उसके आलीशान अतीत की धुंधली यादें हैं और दूसरी तरफ पेट की भूख और बस्ती की ये बेरहम हकीकत।
अब आप लोग ही बताइए, आपको क्या लगता है?
क्या अयान इस होटल की मज़दूरी और बेइज़्ज़ती को अपनी किस्मत मान लेगा?
या फिर उसकी कलाई पर बंधा वो रहस्यमयी 'कड़ा' उसे उसकी खोई हुई सल्तनत और 'माहिरा' तक वापस खींच ले जाएगा?
क्या आपको लगता है कि करीम चाचा सब कुछ सच बोल रहे हैं? या वो भी कुछ छिपा रहे हैं
? कमेंट में अपनी थ्योरी बताएं!" बने रहिए हमारे साथ पार्ट 2 में।