Doli of dreams. - 1 in Hindi Women Focused by softrebel books and stories PDF | सपनों की डोली। - 1

Featured Books
Categories
Share

सपनों की डोली। - 1

बड़ी मशक्कत के बाद एक अच्छा रिश्ता हाथ लगा था , नारायणी के पिता इसे हाथ से जाने देना नहीं चाहते थे।
इस लिए मुंह मांगा दान दक्षिणा देकर, विवाह की सारी रस्में अदा की गईं।
नारायणी और नारायण दोनों ही विवाह उपरांत हाथ जोड़ कर सभी बड़ों से आशीर्वाद ले रहे थे और बैकग्राउंड में बज रहा था।
"महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी"
आशीर्वाद लेकर वर और वधु कोहबर में पहुंचे और कोहबर की सारी रस्में हंसी मज़ाक और सालियों की ठिठोलियो के साथ पूरी की गईं।
रात का इंतजार समाप्त हुआ और भोर की लालिमा से पहले पहले नारायण और नारायणी की विदाई कर दी गई।
वहां ससुराल में भी नव वधु के स्वागत में तनिक भी कमी नहीं रही पूरे विधि विधान के साथ चौठारी भी सम्पन्न हुआं।
सब कुछ हंसी खुशी से बीत रहा था।एक या सावा महीना नहीं,पूरे छः माह तक नारायणी के ससुराल वालों ने उसे बैठा के के खिलाया।
अर्थात अभी चूल्हा छुआई या पहली रसोई की रस्म आज की तरह दुल्हन के आते ही अगले दिन नहीं हो जाता था।
तब दुल्हन को सवा महीना या छः महीना तक घर के रीति रिवाज ,अनाज का मात्रा,परिवार वालों का रहन-सहन,खान-पान और आदतों को समझने के लिए समय दिया जाता था।
ताकि स्थिर से समझ बुझ कर जब काम करेगी बहु तो गलतियां होने की संभावनाएं कम हो जाएंगी और गृह युद्ध होने से बचेगा।
अंततः ऐसा ही हुआ नारायणी शांति परिवार की शांति बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रही थी।
पहले दादिया सास ,फिर नारायणी की सास और अब स्वयं नारायणी ।
शादी के डेढ़ साल बाद देवर की शादी उसने अपने ही किसी रिश्तेदारी में तय करवा दिया था। परिवार के बड़ों और देवर के साथ नारायणी लड़की वाले के यहां लेकर गई थी।
सभी को लड़की पहली नजर में ही पसंद आ गई थी। पंडित जी ने पत्रा निकाला,सात महीने बाद का लग्न बैठाया गया,कुंडली मिलाई गई और तारीख तय कर दी गई।
नारायणी अपने ससुराल वालों के साथ लड़की के यहां से लौट की रही थी कि उसकी तबियत थोड़ी बिगड़ गई ,बीच रास्ते से गाड़ी वापस की गई और वही पास के गांव से सटे किसी हॉस्पिटल में नारायणी का इलाज हुआ।
डॉक्टर ने बताया था कि घबराने की कोई बात नहीं है नारायण जी आप पिता बनने वाले है।
परिवार में खुशी का ठिकाना नहीं था।
इस पीढ़ी का पहला वारिस घर आने वाला था,नारायणी 2 माह की गर्भवती थी।
उसके परिवार वालों ने घर जाते ही उसकी देख रख शुरू कर दी ,केवल जरूरी काम ही वह स्वयं करती थी।
ताकि हाथ पैर के नस चलते रहे बाकी का पूरा समय उसने बिस्तर पर बैठ के बिताया था।
समय के साथ नारायणी की गोद ने दो जुड़वा बेटियों और एक बेटे को जन्म दिया ।
सब कुछ मंगल मय बीत रहा था। तीनों बच्चे ,घर परिवार,सास ससुर समेत जेठान देवरान की भी आपस में खूब बन रही थी।
धीरे धीरे नई नवेली बहुरिया आखिर तक परिवार के रंग में रम ही जाती है।
नारायणी जब भी मायके जाती थी उसके मुंह नहीं थकते थे, ससुराल की बड़ाई करते करते। मानो सपनों की डोली मायके से उठ महल में उतारी गई हो ।
जैसे मिल गया हो उसे उसके वरमाला में बजने वाला गाना अनुसार उसके महलों का राजा।