खतरनाक शुहागरात
अध्याय 1: वादा
हवा में गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखरी हुई थीं और मंदिर की घंटियों की गूंज अभी भी कानों में बसी हुई थी। रात का सन्नाटा धीरे-धीरे शहर की दूर तक फैली रौशनी को निगल रहा था। करण अपनी नई दुल्हन, नैना का हाथ थामे पांच सितारा होटल के लिफ्ट की ओर बढ़ रहा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी, जो एक सामान्य दूल्हे की उत्तेजना से कहीं अधिक गहरी और रहस्यमयी लग रही थी।
नैना ने साड़ी के पल्लू को ठीक किया और करण की तरफ देखा। वह आज बेहद खूबसूरत लग रही थी, लेकिन उसकी आँखों में एक उथल-पुथल थी, जिसे वह छिपाने की कोशिश कर रही थी। शादी का दिन हर लड़की के लिए सपनों जैसा होता है, लेकिन नैना के लिए यह एक ऐसे वादे की शुरुआत थी, जिसे वह पूरा करने पर तुली हुई थी।
लिफ्ट के दरवाजे खुले और वे अपने सुइट में दाखिल हुए। कमरा फूलों से सजा हुआ था। बड़े से डबल बेड पर गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखरी थीं और एक तरफ शैंपेन की बोतल बर्फ की बाल्टी में रखी थी। माहौल रोमांटिक था, लेकिन हवा में एक अजीब सा भारीपन था।
करण ने पीछे से आकर नैना की कमर पकड़ ली। "आखिरकार... यह रात आ ही गई," उसने फुसफुसाते हुए कहा।
नैना की सांसें थम सी गईं। उसने करण के हाथों को धीरे से हटाया और मुड़कर उसकी आँखों में देखा। "करण... मुझे एक बात बतानी है।"
करण के चेहरे पर वही रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। "हम सबके पास बताने के लिए कुछ न कुछ होता है, नैना। लेकिन क्या यह सही समय है?"
"यही सबसे सही समय है," नैना ने दृढ़ता से कहा। "मैं तुमसे शादी इसलिए नहीं कर रही हूँ क्योंकि मैं तुमसे प्यार करती हूँ।"
करण थोड़ा पीछे हटा, उसकी भौहें तन गईं। "तो फिर?"
नैना ने गहरी सांस ली। "मैं तुम्हें मारने आई हूँ।"
कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा पसर गया। फिर करण जोर से हंसने लगा। "बहुत खूब! यह तो बेहद दिलचस्प शुरुआत है। लेकिन क्या तुमने यह पता लगाया कि मैंने तुमसे शादी क्यों की?"
अब नैना की बारी थी हैरान होने की। "तुम... तुम्हारा क्या मतलब है?"
करण ने अपनी जेब से एक तस्वीर निकाली और नैना की तरफ बढ़ा दी। तस्वीर धुंधली थी, लेकिन उसमें साफ दिख रहा था - एक आदमी खून से लथपथ जमीन पर पड़ा था, और उसके बगल में खड़ी एक लड़की, जो नैना थी।
"यह तस्वीर तुम्हारे भाई राजीव की हत्या के बाद ली गई थी, है न?" करण की आवाज़ में अब मखमली अंदाज नहीं था, बल्कि फौलादी सुर थे।
नैना के पैरों तले जमीन खिसक गई। यह वही तस्वीर थी जिसके बारे में उसे लगता था कि उसे नष्ट कर दिया गया है। उसके भाई राजीव की हत्या पांच साल पहले हुई थी, और पुलिस ने उसे एक सड़क दुर्घटना करार दे दिया था। लेकिन नैना जानती थी कि यह हत्या थी, और उसके पीछे करण का हाथ था।
"तुम... तुम जानते थे?" नैना की आवाज़ कांप रही थी।
"बिल्कुल जानता था। मैं तुम्हारे हर कदम पर नजर रख रहा था, नैना। मैं जानता था कि तुम मुझसे बदला लेने के लिए मेरे करीब आई हो। लेकिन मैंने तुम्हें रोका क्यों नहीं? क्योंकि मैं भी तुम्हारे जरिए अपना एक मकसद पूरा करना चाहता था।"
"क्या मकसद?" नैना ने बमुश्किल शब्दों को बाहर निकाला।
"तुम्हारे भाई के पास एक चीज थी... एक पेन ड्राइव। उसमें मेरे बिजनेस पार्टनर्स के खिलाफ सबूत थे। मैंने उसे मारा, लेकिन वह पेन ड्राइव नहीं मिली। मुझे पता है कि वह तुम्हारे पास है।"
नैना को अब सब समझ आ गया। यह शादी कोई प्रेम कहानी नहीं थी, बल्कि दो जहरीले सांपों की लड़ाई थी, जो एक दूसरे को डसने के लिए बेकरार थे।
अध्याय 2: अतीत का साया
नैना ने अपने आपको संभाला। वह इतनी आसानी से हार मानने वाली लड़की नहीं थी। पिछले पांच सालों में उसने सिर्फ एक ही चीज सीखी थी - कैसे अपनी भावनाओं को छिपाया जाए।
"तो यह बात है," नैना ने ठंडे स्वर में कहा। "तुम्हें लगता है कि मैं वह पेन ड्राइव तुम्हें दे दूंगी?"
"देनी होगी," करण ने धीरे से कहा। "क्योंकि तुम्हारी मां अभी भी जीवित हैं, है न? और वह बहुत बीमार हैं। मैं उनकी दवाइयां बंद करवा सकता हूं। मैं उन्हें उस नर्सिंग होम से निकलवा सकता हूं जहां वह रहती हैं। तुम चाहोगी कि तुम्हारी मां सड़क पर आ जाएं?"
नैना की आँखों में गुस्से की चिंगारी भड़क उठी। "तुम बहुत नीच हो, करण!"
"हां, मैं नीच हूं। लेकिन तुम भी कम नहीं हो। तुमने मुझसे शादी की, मेरे साथ रही, मेरे स्पर्श को सहा, बस अपना बदला पूरा करने के लिए। तो चलो, एक दूसरे को नीचा दिखाने के बजाय, एक सौदा कर लेते हैं।"
"कैसा सौदा?"
"आज रात हमारी शुहागरात है। चलो इसे असली मौत का खेल बनाते हैं। मैं तुम्हें एक मौका दूंगा। अगर तुम मुझे मार सकी, तो पेन ड्राइव तुम्हारे पास रहेगी और तुम अपनी मां को लेकर कहीं भी जा सकती हो। लेकिन अगर तुम नाकाम रही, तो पेन ड्राइव मुझे देनी होगी, और तुम हमेशा के लिए मेरी गुलाम बनकर रहोगी।"
नैना को लगा कि वह किसी सपने में है। यह कोई शुहागरात नहीं, बल्कि एक जानलेवा खेल था। लेकिन उसके पास विकल्प क्या था? वह करण को मारना चाहती थी, और यह एक मौका था।
"मान लिया," नैना ने दृढ़ता से कहा।
करण ने मुस्कुराते हुए शैंपेन की बोतल खोली और दो गिलास भरे। "तो चलो, इस खेल की शुरुआत करते हैं। लेकिन याद रखना, नैना, यह खेल सिर्फ शारीरिक नहीं होगा। यह दिमागी भी होगा। और इसमें हारने वाले को जिंदा नहीं छोड़ा जाता।"
उसने एक गिलास नैना की तरफ बढ़ाया। नैना ने गिलास लेने से पहले झिझकते हुए पूछा, "इसमें जहर तो नहीं है?"
"अगर मैं जहर देना चाहता, तो तुम अब तक मर चुकी होती। नहीं, यह सिर्फ शैंपेन है। हम आज रात एक दूसरे को आमने-सामने हराएंगे, किसी बेईमानी से नहीं।"
नैना ने गिलास लिया और एक घूंट पी ली। उसके दिमाग में हजारों सवाल थे, लेकिन सबसे बड़ा सवाल था - वह करण को कैसे मारेगी? उसके पास कोई हथियार नहीं था, और करण शारीरिक रूप से उससे कहीं ज्यादा ताकतवर था।
"तो, पहला कदम?" नैना ने पूछा।
करण ने अपनी जैकेट उतारी और कुर्सी पर डाल दी। "पहला कदम यह है कि तुम मुझे समझो। मैं तुम्हें अपनी कमजोरियां बताता हूं। देखते हैं कि तुम उनका इस्तेमाल कर पाती हो या नहीं।"
वह धीरे-धीरे नैना के करीब आया। "मैं दिल का मरीज हूं। बचपन से ही। थोड़ा सा झटका, और मेरा दिल धड़कना बंद कर सकता है।"
नैना की आँखें चौड़ी हो गईं। यह जानकारी उसके पास नहीं थी। लेकिन क्या यह सच था? या करण उसे बहला रहा था?
"और दूसरी कमजोरी?" नैना ने पूछा।
"दूसरी कमजोरी यह कि मुझे अंधेरे से डर लगता है। रात में मैं बिना रोशनी के नहीं सो सकता।"
नैना को यह बात और भी अजीब लगी। एक क्रूर हत्यारा, जो बेरहमी से लोगों को मार सकता है, उसे अंधेरे से डर लगता है? या यह भी एक जाल था?
"तीसरी और सबसे बड़ी कमजोरी," करण ने फुसफुसाते हुए कहा, "मैं तुमसे प्यार करता हूं।"
यह सुनकर नैना को ऐसा लगा जैसे उसके सीने में तीर लगा हो। "यह बकवास है," उसने गुस्से में कहा। "तुम मुझसे प्यार नहीं कर सकते। तुमने मेरे भाई को मार डाला।"
"मैंने राजीव को इसलिए मारा क्योंकि वह मुझे बर्बाद करना चाहता था। वह मेरे राज जान गया था और उसने मुझे ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया था। लेकिन जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा, उसकी बहन को, तो मुझे एहसास हुआ कि मैंने क्या खो दिया है। तुम उसकी तस्वीर की तरह नहीं थी, तुम जिंदा थी, खूबसूरत थी, और तुममें वह आग थी जो मैंने किसी और में नहीं देखी।"
"यह सिर्फ तुम्हारा अपराधबोध है," नैना ने कहा।
"नहीं, यह प्यार है। और यही मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है। अब तुम जान गई हो कि मुझे कैसे मारना है। मेरे दिल पर वार करो, शाब्दिक या आलंकारिक रूप से।"
अध्याय 3: खेल शुरू
करण ने कमरे की लाइटें बंद कर दीं। केवल बालकनी से आती चांदनी की रोशनी थी, जो कमरे में फैल रही थी। अंधेरे में उसकी आकृति और भी खतरनाक लग रही थी।
"अब खेल शुरू होता है," उसने कहा। "अगले एक घंटे में, तुम मुझे मारने की कोशिश कर सकती हो। मैं भी तुम्हें मारने की कोशिश करूंगा। लेकिन याद रखना, कोई हथियार नहीं। सिर्फ हमारा दिमाग और हमारा शरीर।"
नैना ने चारों ओर देखा। कमरे में कई चीजें थीं जिनका इस्तेमाल हथियार के तौर पर किया जा सकता था - शैंपेन की बोतल, कांच के गिलास, भारी किताबें, लैंप। लेकिन करण भी यह सब जानता था।
वह धीरे-धीरे पीछे हटी, अपने और करण के बीच दूरी बनाते हुए। करण वहीं खड़ा रहा, उसकी आँखें अंधेरे में चमक रही थीं।
"डर लग रहा है?" करण ने मजाकिया अंदाज में पूछा।
"तुमसे नहीं," नैना ने जवाब दिया।
"अच्छा। तो आगे बढ़ो। पहला हमला करो।"
नैना ने झटके से बगल में रखा लैंप उठाया और करण की तरफ फेंक दिया। लेकिन करण ने चुस्ती से उसे डक किया और लैंप दीवार से टकराकर गिर गया।
"बहुत धीमे," करण ने कहा और तेजी से नैना की तरफ बढ़ा।
नैना ने भागने की कोशिश की, लेकिन करण ने उसकी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ लोहे की तरह मजबूत थी। उसने नैना को अपनी तरफ खींचा और उसके कान में फुसफुसाया, "पहला सबक - कभी भी पहला हमला जल्दबाजी में मत करो।"
उसने नैना को धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दिया। नैना ने तुरंत करवट ली, लेकिन करण उसके ऊपर झुक गया। उसके चेहरे पर एक भयानक मुस्कान थी।
"अब तुम मेरी मेहमान हो," उसने कहा।
नैना ने अपना पैर उठाया और करण के पेट में जोर से लात मारी। करण दर्द से कराहता हुआ पीछे हटा। नैना ने इस मौके का फायदा उठाया और बिस्तर से कूदकर बालकनी की तरफ भागी।
बालकनी का दरवाजा खुला था। वह बाहर निकली और ठंडी हवा ने उसके चेहरे को सहलाया। होटल बीसवीं मंजिल पर था। नीचे शहर की रोशनियाँ छोटे-छोटे बिंदुओं की तरह दिख रही थीं। वहां से कूदने का मतलब मौत थी।
करण धीरे-धीरे बालकनी की तरफ आ रहा था। "कहाँ भागोगी, नैना? यहां से कोई रास्ता नहीं है।"
नैना ने चारों ओर देखा। बालकनी में एक छोटी सी मेज थी, उस पर एक एशट्रे रखी थी। उसने झटके से एशट्रे उठाई और करण पर फेंक दी। लेकिन करण ने अपना हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ लिया।
"तुम सीखती क्यों नहीं?" उसने कहा। "हथियार फेंकना बेकार है। अगर मारना है, तो पास आकर मारो।"
वह बालकनी में आ गया, अब नैना और उसके बीच केवल एक कदम की दूरी थी। नैना की पीठ रेलिंग से लगी हुई थी। नीचे गहरी खाई।
"अब क्या करोगी?" करण ने पूछा।
नैना ने उसकी आँखों में देखा। उनमें कोई डर नहीं था, केवल एक अजीब सी चमक थी। उसने धीरे से कहा, "अब मैं तुम्हें गले लगाऊंगी।"
करण को कुछ समझ नहीं आया। लेकिन अगले ही पल नैना ने उसे दोनों हाथों से जोर से पकड़ लिया और अपनी तरफ खींच लिया। करण का संतुलन बिगड़ गया। उसने खुद को संभालने की कोशिश की, लेकिन नैना ने अपना पैर उसके पैरों में फंसा दिया। अगले ही पल, दोनों रेलिंग से टकराए।
करण की पीठ रेलिंग से लगी और नैना उसके ऊपर। नैना ने अपना एक हाथ छुड़ाया और करण के गले पर रख दिया, दबाने की मुद्रा में।
"अब मैं तुम्हें नीचे फेंक सकती हूं," उसने फुसफुसाते हुए कहा।
करण के चेहरे पर अब भी मुस्कान थी। "फेंक दो। लेकिन याद रखना, अगर मैं गिरा, तो तुम भी मेरे साथ गिरोगी। मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा।"
नैना ने नीचे देखा। करण सच कह रहा था। उसकी पकड़ उसकी कमर पर थी, इतनी मजबूत कि अगर वह गिरा, तो नैना को भी खींच ले जाएगा।
अध्याय 4: विश्वास का धोखा
दोनों कुछ पल उसी अवस्था में रहे। फिर करण ने धीरे से कहा, "चलो अंदर चलते हैं। हम दोनों में से कोई आज नहीं मरेगा। कम से कम इस तरह तो नहीं।"
नैना ने उसकी आँखों में झाँका। क्या वह सच कह रहा था? या यह एक और चाल थी?
"वादा करो," उसने कहा। "वादा करो कि तुम मुझे अंदर जाने दोगी।"
"मैं वादा करता हूं," करण ने कहा।
नैना ने धीरे-धीरे अपना हाथ उसके गले से हटाया। करण ने भी उसकी कमर से अपना हाथ हटा लिया, लेकिन सावधानी से। दोनों धीरे-धीरे बालकनी से अंदर आए।
अंदर आकर नैना ने राहत की सांस ली। उसके हाथ-पैर कांप रहे थे। वह दीवार से सटकर खड़ी हो गई।
करण ने लाइट जला दी। कमरा रोशन हो गया। उसने शैंपेन के दो नए गिलास भरे और एक नैना की तरफ बढ़ाया। "पी लो। इससे तुम्हें शांति मिलेगी।"
नैना ने गिलास लिया, लेकिन पीया नहीं। "मैं तुम पर भरोसा नहीं करती।"
"सही करती हो। लेकिन इस वक्त मैं तुम्हें धोखा नहीं देना चाहता।" उसने अपना गिलास उठाया और एक घूंट पिया। "देखा? मैंने भी पी लिया। अब तुम पी सकती हो।"
नैना ने एक छोटा घूंट लिया। शैंपेन ठंडी थी और उसके गले को तर कर गई। उसे थोड़ी शांति मिली।
"बैठो," करण ने कहा, और खुद भी सोफे पर बैठ गया।
नैना उससे कुछ दूरी पर बैठी। कुछ पल का सन्नाटा रहा। फिर करण ने बात शुरू की।
"मैं तुम्हें सच बताता हूं, नैना। तुम जो सोचती हो, वैसा मैं नहीं हूं।"
"तो फिर कैसे हो?" नैना ने कड़वाहट से पूछा।
"मैं एक शिकार हूं, ठीक उसी तरह जैसे तुम। मेरे पिता ने मुझे यह बिजनेस सौंपा था, लेकिन यह बिजनेस नहीं, एक जाल था। मेरे पार्टनर, जिनके बारे में राजीव को पता चल गया था, वे असली अपराधी हैं। उन्होंने ही राजीव को मारने का आदेश दिया था। मैं केवल एक कठपुतली था।"
"तो तुम निर्दोष हो?" नैना की आवाज में व्यंग्य था।
"नहीं, मैं निर्दोष नहीं हूं। मैंने भी गलतियां की हैं, बहुत सारी। लेकिन मैंने राजीव को नहीं मारा। वह आदमी, जिसने उसे मारा, वह मेरा ही आदमी था, लेकिन उसने मेरे कहने पर नहीं, बल्कि मेरे पार्टनर्स के कहने पर ऐसा किया। और जब मुझे पता चला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।"
नैना के दिमाग में कोलाहल मच गया। क्या वह सच कह रहा था? या यह एक और चाल थी?
"यह पेन ड्राइव," करण ने आगे कहा, "उसमें मेरे पार्टनर्स के खिलाफ सबूत हैं। राजीव उसे इकट्ठा कर रहा था। वह मुझे बचाना चाहता था, नैना। वह जानता था कि मैं फंस रहा हूं, और वह मुझे उस जाल से निकालना चाहता था। लेकिन इससे पहले कि वह कर पाता, उन्होंने उसे मार डाला।"
नैना की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे याद आया, राजीव अक्सर कहता था कि वह एक बड़ा काम कर रहा है, एक अंधेरे राज को उजागर करेगा। उसने कभी सोचा नहीं था कि वह राज इतना खतरनाक होगा।
"तो तुम चाहते हो कि मैं वह पेन ड्राइव तुम्हें दे दूं?" नैना ने रुंधे गले से पूछा।
"हां। लेकिन तुम्हारे लिए नहीं, मेरे लिए। मैं उन लोगों को सजा दिलाना चाहता हूं जिन्होंने राजीव को मारा। मैं यह उसके लिए करना चाहता हूं, और तुम्हारे लिए।"
नैना ने गहरी सांस ली। वह एक ऐसे मोड़ पर खड़ी थी जहां हर कदम गलत हो सकता था। उसे फैसला करना था।
"पेन ड्राइव मेरे पास नहीं है," उसने कहा।
करण के चेहरे पर निराशा छा गई। "क्या?"
"मेरे पास नहीं है। राजीव ने मुझे वह नहीं दी थी। उसने कहा था कि अगर उसे कुछ हो गया, तो मैं उसे ढूंढूं। लेकिन उसने कभी नहीं बताया कि कहां।"
करण ने अपना सिर पकड़ लिया। "तो हम कहीं नहीं पहुंचे। वे लोग जल्द ही मुझे मार देंगे, और शायद तुम्हें भी।"
"कौन लोग?" नैना ने पूछा।
उसके सवाल का जवाब दरवाजे पर हुई दस्तक ने दिया। दोनों चौंक गए। करण ने नैना की तरफ देखा और उंगली अपने होठों पर रख दी।
दरवाजे की दस्तक फिर हुई, इस बार जोर से। एक आवाज आई, "करण, पता है कि तुम अंदर हो। दरवाजा खोलो।"
करण का चेहरा सफेद पड़ गया। "यह वही है," उसने फुसफुसाते हुए कहा। "मेरे पार्टनर।"
अध्याय 5: मौत का सामना
नैना का दिल तेजी से धड़कने लगा। वह उठकर खिड़की की तरफ बढ़ी, लेकिन करण ने उसे रोक लिया।
"भागना मत," उसने फुसफुसाया। "यह बीसवीं मंजिल है।"
"तो क्या करें?"
करण ने चारों ओर देखा। उसकी आँखें कमरे में कुछ ढूंढ रही थीं। फिर उसने नैना की तरफ देखा। "मुझ पर भरोसा करो।"
नैना झिझकी। उस आदमी पर भरोसा करना जिसे वह मारने आई थी? लेकिन उसके पास कोई विकल्प नहीं था।
"ठीक है," उसने कहा।
करण ने उसे बाथरूम की तरफ इशारा किया। "वहां जाओ और दरवाजा बंद कर लो। चाहे कुछ भी हो जाए, बाहर मत आना।"
नैना बाथरूम में घुस गई और दरवाजा बंद कर दिया। वह दरवाजे से कान लगाकर सुनने लगी।
उसने सुना, करण ने दरवाजा खोला। कई लोग अंदर आए।
"करण, बहुत दिनों बाद मिले। और यह शुहागरात का मौका? कितना रोमांटिक!" एक भारी आवाज ने कहा।
"विक्रम, तुम यहां कैसे?" करण ने पूछा।
"हमें पता है कि तुमने शादी की है। और हमें यह भी पता है कि तुम्हारी दुल्हन राजीव की बहन है। तुम हमसे क्यों छिपा रहे थे, करण?"
"मैं नहीं छिपा रहा था। मैं बस..."
"बस क्या? हमें वह पेन ड्राइव चाहिए। राजीव ने वह तुम्हें दी थी, है न?"
"मेरे पास नहीं है।"
"झूठ मत बोल। हम जानते हैं कि वह तुम्हारे पास है। और अगर तुमने नहीं दी, तो हम तुम्हारी नई दुल्हन को ढूंढ लेंगे। वह भी इसी होटल में है, है न?"
नैना की सांसें थम गईं। उसने सुना, करण ने कहा, "वह यहां नहीं है। वह चली गई।"
"चली गई? शुहागरात की रात? कितना दिलचस्प। अच्छा, हम तुम पर विश्वास नहीं करते। हम इस कमरे को छान मारेंगे।"
नैना ने चारों ओर देखा। बाथरूम में छिपने की कोई जगह नहीं थी। वह पकड़ी जाएगी। उसने अपनी जेब में हाथ डाला और उंगलियाँ किसी धातु की चीज से टकराईं। वह चीज थी - एक छोटी सी चेन, जिसमें एक लॉकेट था। राजीव का लॉकेट। उसे याद आया, राजीव ने कहा था, "अगर मैं मर जाऊं, तो इस लॉकेट को खोलना।"
उसने जल्दी से लॉकेट खोला। उसमें एक छोटी सी पेन ड्राइव छिपी हुई थी। पूरे पांच साल, वह उसे अपने गले में लटकाए घूम रही थी, और उसे पता नहीं था।
बाहर, विक्रम के आदमी कमरे की तलाशी ले रहे थे। करण ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन विक्रम ने उसे धक्का दे दिया।
"बाथरूम," एक आदमी ने कहा।
नैना ने सुना, पैरों की आहट बाथरूम के दरवाजे की तरफ बढ़ रही थी। उसके पास समय नहीं था। उसने दरवाजा खोला और बाहर निकल आई।
"यह लो," उसने पेन ड्राइव उठाते हुए कहा। "यह वही है जो तुम ढूंढ रहे हो।"
सबकी नजरें नैना पर टिक गईं। विक्रम ने मुस्कुराते हुए पेन ड्राइव ले ली। "बहुत खूब। तो तुम यहां छिपी हुई थी। करण, तुमने तो कहा था कि वह चली गई?"
करण ने नैना की तरफ देखा, उसकी आँखों में हैरानी और डर दोनों थे।
विक्रम ने पेन ड्राइव अपनी जेब में रख ली। "अब, जब हमारा काम हो गया, तो हमें कोई गवाह नहीं चाहिए।"
उसने अपने आदमियों की तरफ इशारा किया। दो आदमी आगे बढ़े। करण ने झटके से नैना को अपनी तरफ खींचा और उसके सामने आ गया।
"उसे मत छुओ," उसने गरज कर कहा।
विक्रम हंसा। "करण, तुम इस लड़की के लिए मरने को तैयार हो? यह वही लड़की है जो तुम्हें मारने आई थी।"
"मुझे पता है। लेकिन मैं उससे प्यार करता हूं।"
नैना के दिल में एक झटका सा लगा। यह आदमी, जिसे वह मारना चाहती थी, अब उसकी जान बचाने के लिए अपनी जान देने को तैयार था।
"बहुत भावुक," विक्रम ने कहा। "ठीक है, पहले तुम, फिर यह।"
उसने बंदूक निकाली और करण पर तान दी। नैना ने चीखते हुए कहा, "नहीं!"
लेकिन अगले ही पल, कमरे की लाइटें अचानक बुझ गईं। अंधेरा छा गया। गोली चलने की आवाज आई, फिर चीखें, फिर कुछ गिरने की आवाज।
जब लाइटें फिर जलीं, तो नैना ने देखा कि करण उसके ऊपर गिरा हुआ था, उसके कंधे से खून बह रहा था। विक्रम जमीन पर पड़ा था, उसके सीने में गोली लगी थी। और दरवाजे पर पुलिस खड़ी थी।
अध्याय 6: अंत और शुरुआत
पुलिस ने पूरे मामले की जांच की। पेन ड्राइव में मौजूद सबूतों के आधार पर विक्रम और उसके साथियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। राजीव की हत्या का राज खुल गया। करण को भी कई मामलों में फंसाया गया था, लेकिन पुलिस ने सबूतों के अभाव में उसे छोड़ दिया।
करण को अस्पताल में भर्ती कराया गया। गोली उसके कंधे में लगी थी, जान बच गई। नैना रोज उससे मिलने जाती। पहले तो वह सिर्फ एहसान चुकाने जाती थी, लेकिन धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि उसके दिल में करण के लिए कुछ और भी है।
एक दिन, जब करण अस्पताल से घर आया, तो नैना उसे लेने आई। वह उसके अपार्टमेंट में ले गई, जहां उसने खाना बनाया था।
"यह सब?" करण ने मुस्कुराते हुए पूछा।
"तुमने मेरी जान बचाई। यह सबसे छोटा एहसान है जो मैं तुम्हें चुका सकती हूं," नैना ने कहा।
"तुम मुझ पर एहसान नहीं कर रही हो। तुम मेरे साथ हो, यही बहुत है।"
नैना ने उसकी आँखों में देखा। वह आदमी, जिससे वह नफरत करती थी, आज उसके लिए सब कुछ बन गया था। उसने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।
"करण, मैं... मैं माफी चाहती हूं। मैंने तुम्हें गलत समझा।"
"तुमने गलत नहीं समझा, नैना। मैं वही हूं जो तुमने सोचा था। एक हत्यारा, एक अपराधी। लेकिन मैं बदलना चाहता हूं। तुम्हारे लिए।"
"तो चलो, साथ में बदलते हैं," नैना ने कहा।
उस रात, जो उनकी शुहागरात होनी चाहिए थी, उस रात उन्होंने एक-दूसरे को सच में जाना। उस रात कोई खेल नहीं था, कोई धोखा नहीं था, कोई हत्या नहीं थी। केवल दो लोग थे, जिन्होंने अपने अतीत को दफनाकर एक नए भविष्य की शुरुआत की।
बाहर चांदनी थी, और हवा में फूलों की खुशबू थी। उनकी शुहागरात आखिरकार सच्चे मायनों में शुरू हुई थी - एक-दूसरे को समझने, स्वीकार करने और प्यार करने की रात।
लेकिन क्या सच में यह अंत था? क्या विक्रम के और भी साथी हो सकते थे? क्या पुलिस ने सच में सब कुछ साफ कर दिया था? और सबसे बड़ा सवाल - क्या करण सच में बदल गया था, या यह उसका सबसे बड़ा खेल था?
जवाब शायद कभी न मिलें। लेकिन उस रात, जब नैना करण के सीने पर सिर रखकर सोई, उसे एक बात का यकीन था - उसने सही फैसला किया था। चाहे जो भी हो आगे, वे उसका सामना साथ में करेंगे।
और इस तरह, वह खतरनाक शुहागरात, जो मौत के खेल के रूप में शुरू हुई थी, एक नई जिंदगी के वादे में बदल गई। एक ऐसी जिंदगी जो उतनी ही खतरनाक थी जितनी रोमांचक, उतनी ही अनिश्चित जितनी सुंदर।
परदा गिरता है, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असल में, यह तो सिर्फ शुरुआत थी।