परीक्षा कक्ष में सुई गिरने की आवाज़ भी सुनाई दे, इतनी शांति थी। लेकिन श्राव्या के दिमाग में तूफान चल रहा था।
उसके सामने प्रश्न पत्र के अक्षर उसे चिढ़ाते हुए लग रहे थे।
प्रश्न 3: मार्चियाफावा-बिग्नामी (Marchiafava-Bignami) बीमारी के लक्षण क्या हैं?
श्राव्या के हाथ कांप रहे थे। "यह असंभव है... ऐसा नहीं होना चाहिए," उसका वैज्ञानिक दिमाग चीख रहा था। "दुनिया में संयोग होते हैं, सच है। लेकिन ऐसा संयोग? यह गणितीय रूप से भी असंभव है!"
उसने आस-पास देखा। उसके सहपाठी अपना सिर खुजला रहे थे। कुछ पेन की नोक चबाते हुए, आसमान की तरफ देखते हुए जवाब के लिए संघर्ष कर रहे थे। यह न्यूरोलॉजी का सबसे कठिन प्रश्न पत्र था।
लेकिन श्राव्या?
उसने गहरी सांस ली। धीरे से अपना पेन उठाया।
जैसे ही पेन ने कागज को छुआ, एक अजीब घटना घटी। उसका हाथ अपने आप चलने लगा। उत्तर... वे पंक्तियाँ जो उसने सुबह 4 बजे पढ़ी थीं... उसके दिमाग में सहजता से बहने लगीं।
उसे सोचने की जरूरत ही नहीं पड़ी।
"Marchiafava-Bignami disease is a rare callosal demyelination seen in chronic alcoholics..."
उसका पेन कागज पर तेजी से दौड़ रहा था। लेकिन उसके अंदर एक बड़ा अस्तित्व का संकट (Existential Crisis) चल रहा था।
लिखने की जल्दी में, उसके हाथों ने उत्तर पुस्तिका के मार्जिन (Margin) में अनजाने में ही यह लिख दिया:
"आपको कैसे पता चला?"
"मुझसे आपको क्या चाहिए?"
अगले ही पल होश में आई श्राव्या ने घबराकर उन पंक्तियों को रबर से मिटा दिया। "श्राव्या, पागलों की तरह बर्ताव मत करो। पहले परीक्षा खत्म करो," उसने खुद को डांटा।
लेकिन उसके मन में उठ रहे वे सवाल नहीं मिटे।
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"बेल" बजते ही परीक्षा हॉल से बाहर निकले छात्रों के चेहरों पर खेल में हारे हुए खिलाड़ियों जैसी निराशा थी।
पूरे कॉरिडोर में शोर था। हर कोई उसी प्रश्न पत्र के बारे में बात कर रहा था।
"ये क्या था यार? जिसने भी यह पेपर सेट किया है वह पक्का पागल होगा!" एक छात्र भड़क रहा था।
"मैंने तो उस 'पी.एम.एल' (PML) के बारे में कभी सुना ही नहीं। बस कुछ भी कहानी लिखकर आ गया हूँ," दूसरा अपना सिर पीट रहा था।
श्राव्या भीड़ के बीच से धीरे-धीरे बाहर आई। उसका बैग उसके कंधे पर था, लेकिन उसके मन का बोझ कम नहीं हुआ था।
उसकी सहेली स्नेहा दौड़कर आई और उसका हाथ पकड़ लिया। स्नेहा की आँखें लाल थीं, शायद वह रोने ही वाली थी।
"श्राव्या! पेपर कितना टफ था ना? मैं तो पक्का फेल हूँ," स्नेहा ने रोती हुई आवाज़ में कहा। "वे दूसरे और तीसरे प्रश्न... क्या कोई उन्हें पढ़ता भी है? तुमने लिखा क्या?"
श्राव्या एक पल के लिए शांत हो गई।
उसके दिमाग में, उसके द्वारा लिखे गए वे सटीक उत्तर कौंध गए। उसने हर प्रश्न का उत्तर बिल्कुल पाठ्यपुस्तक जैसा ही लिखा था। शायद उसे विशिष्ट श्रेणी (Distinction) मिलना तय था।
लेकिन, अगर अब वह कहे "हाँ, मैंने पढ़ा था, मैंने बहुत अच्छा लिखा है" तो?
"कैसे पढ़ा? तुम्हें कैसे पता था?" अगर किसी ने पूछा तो क्या कहेगी?
"रात को एक सपने में दिखा" अगर ऐसा कहा, तो उसका पागलखाने जाना तय है।
श्राव्या ने गहरी सांस छोड़ी। उसके मुँह से मजबूरी में पहला झूठ निकल गया।
"हम्म... हाँ स्नेहा," श्राव्या ने नज़रें चुराते हुए और जमीन की तरफ देखते हुए कहा। "बहुत मुश्किल था। मैं भी उन सवालों को देखकर चौंक गई थी। जितना पता था उतना लिख दिया है। बस पास हो जाऊं वही काफी है..."
स्नेहा को थोड़ी तसल्ली हुई। "सही बात है, जब तुम जैसी क्लास टॉपर को इतनी मुश्किल हुई, तो हमारी क्या बिसात," उसने चैन की सांस ली।
श्राव्या वहाँ से तेजी से आगे बढ़ गई। उसके सीने में अपराधबोध (Guilt) हो रहा था। उसने अपनी सबसे अच्छी दोस्त से झूठ बोला था। लेकिन उससे भी ज्यादा, एक ऐसा सवाल उसे परेशान कर रहा था जिसका जवाब उसके तार्किक दिमाग के पास नहीं था:
"जब विज्ञान ने मेरा साथ छोड़ दिया, तो मुझे किसने बचाया? क्या वह आवाज़ थी? तो फिर वह आवाज़ किसकी है? दोस्त की या दुश्मन की?"
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श्राव्या तेजी से चलकर अपने हॉस्टल के कमरे में पहुँची। अंदर जाते ही उसने दरवाज़ा कसकर लॉक कर दिया।
अपने कंधे का बैग कोने में रखी कुर्सी पर फेंका और धम्म से बिस्तर पर गिर पड़ी। छत के पंखे को घूमते हुए देखते-देखते उसके चेहरे पर धीरे से एक मुस्कान आ गई।
पहले जो मुस्कान हल्की थी, वह कुछ ही पलों में जोर की हंसी में बदल गई। यह कोई पागलों वाली हंसी नहीं थी, बल्कि एक खेल जीतने वाले खिलाड़ी की राहत भरी हंसी थी।
"मैं पागल नहीं हूँ...!" श्राव्या ने जोर से चिल्लाकर कहा। "मेरा दिमाग बिल्कुल ठीक है। मैंने जो कुछ भी देखा और सुना, वह सब सच है!"
इतने दिनों से उसे सता रहे डरावने विचार कि 'शायद उसे सिज़ोफ्रेनिया है' या 'दिमाग में ट्यूमर है', अब गायब हो गए थे। यह सच्चाई कि वह मानसिक रूप से स्वस्थ है, उसे परीक्षा में पास होने से भी ज्यादा सुकून दे रही थी।
उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। परीक्षा हॉल में अपने पेन को चलाने वाली उस अदृश्य शक्ति को याद किया।
अब उस शक्ति से उसे डर नहीं लग रहा था। इसके बजाय, वह किसी मुसीबत में पड़े दोस्त की मदद करने वाले शुभचिंतक जैसी लग रही थी।
अंधेरे में, उसने किसी को सुनाने के लिए धीरे से फुसफुसाया:
"थैंक यू... सच में बहुत धन्यवाद।"
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उसी शाम।
श्राव्या अपने कमरे की टेबल के सामने बैठी थी। उसके सामने लैपटॉप खुला था। उसकी भावनाएं अब शांत थीं, और उसके अंदर की 'मेडिकल छात्रा' फिर से जाग गई थी। "साइंटिस्ट मोड" (Scientist Mode) ऑन हो गया था।
"मुझे इसे वैज्ञानिक नजरिए से समझना होगा," उसने तय किया।
गूगल सर्च बार में उसने टाइप किया: "Scientific discoveries made in dreams" (सपनों में हुई वैज्ञानिक खोजें)।
परिणामों ने उसे चौंका दिया। इतिहास में कई महान वैज्ञानिकों को ऐसे ही अनुभव हुए थे:
दिमित्री मेंडेलीव (Dmitri Mendeleev): उन्हें 'पीरियोडिक टेबल' (Periodic Table) की पूरी संरचना सपने में दिखाई दी थी।
अगस्त केकुले (August Kekulé): बेंजीन अणु का रिंग आकार (Benzene Ring) उन्हें सपने में ऐसा दिखा था जैसे कोई सांप अपनी ही पूंछ काट रहा हो।
एलियास होवे (Elias Howe): सिलाई मशीन की सुई का डिज़ाइन उन्हें सपने में ही सूझा था।
ये सब पढ़ते हुए श्राव्या की आँखें आश्चर्य से फटी रह गईं।
लेकिन, जिस बात ने उसे सबसे ज्यादा सोचने पर मजबूर किया, वह थी भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की कहानी। उनका कहना था कि उनके गणितीय सूत्र उन्हें सपने में नामक्कल देवी (Goddess Namagiri) से मिलते थे।
श्राव्या ने स्क्रीन की तरफ देखते हुए सोचा: "तो क्या, इन सभी को पागलपन का दौरा पड़ा था? नहीं। ये सभी दुनिया भर में माने जाने वाले प्रतिभाशाली लोग थे। इसका मतलब है, नींद या अर्धचेतन अवस्था में दिमाग के सीखने का तरीका कुछ और ही हो सकता है।"
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श्राव्या ने अपना शोध जारी रखा। अब उसने दिमाग के काम करने के तरीके के बारे में पढ़ना शुरू किया।
उसकी नज़र इन शब्दों पर पड़ी: "Hypnagogia" (हिप्नागोगिया - जागने और सोने के बीच की अवस्था) और "Theta Waves" (थीटा तरंगें)।
वैज्ञानिक लेखों के अनुसार, जब दिमाग इस अवस्था में होता है, जो न तो पूरी तरह से जागृत होता है और न ही सोया हुआ, तो उसकी रचनात्मकता और समस्या सुलझाने की क्षमता (Problem solving capacity) सौ गुना बढ़ जाती है।
श्राव्या ने चुटकी बजाई। "यही जवाब होना चाहिए!"
उसने अपनी गुप्त नोटबुक निकाली और मोटे अक्षरों में लिखा:
परिकल्पना: उन्नत सहज ज्ञान युक्त प्रसंस्करण (HYPOTHESIS: Enhanced Intuitive Processing)।
उसने राहत की सांस ली।
"मतलब, वे आवाज़ें न तो कोई भूत थीं, न ही भगवान। वे मेरा अपना ही अवचेतन मन (Unconscious Mind) हैं," उसने तार्किक रूप से खुद को समझाया। "भले ही मैंने प्रोफेसर की क्लास में ध्यान से नहीं सुना था, लेकिन मेरे अवचेतन मन ने उसे रिकॉर्ड कर लिया था। परीक्षा के दबाव के समय, मेरे दिमाग ने वह जानकारी मुझे 'आवाज़' या 'दृश्य' के रूप में दी। यह कोई जादू नहीं है, यह सिर्फ मेरे दिमाग की हाई-स्पीड डेटा प्रोसेसिंग है!"
उसे यह वैज्ञानिक व्याख्या बहुत पसंद आई। भूतों का डर गायब हो गया। उसे लगा कि विज्ञान की उसकी दुनिया फिर से सुरक्षित हो गई है।
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अब श्राव्या ने अपना खुद का वैज्ञानिक सिद्धांत बना लिया था।
श्राव्या ने अपने नए सिद्धांत "उन्नत सहज ज्ञान युक्त प्रसंस्करण" (Enhanced Intuitive Processing) का परीक्षण करने का निर्णय लिया। उसका तर्क था, "अगर यह मेरे ही दिमाग की शक्ति है, तो मैं स्विच की तरह इसे जब चाहूं इस्तेमाल कर सकूंगी।"
उसने कमरे की लाइटें बंद कर दीं और कुर्सी पर शांति से बैठ गई। एक गहरी सांस ली, अपनी आँखें बंद कीं और एक विशिष्ट चिकित्सा समस्या पर ध्यान केंद्रित किया। उसका उद्देश्य स्पष्ट था—अपने अवचेतन मन से उत्तर निकालना।
कुछ ही पलों में, ठीक वैसा ही हुआ जैसी उसे उम्मीद थी!
अंधेरे में वे जानी-पहचानी फुसफुसाहटें सुनाई दीं। उन्होंने उस समस्या का स्पष्ट समाधान दिया जिसके बारे में वह सोच रही थी। श्राव्या ने तुरंत अपनी आँखें खोलीं और जो कुछ सुना था उसे अपनी नोटबुक में लिख लिया।
उसके चेहरे पर जीत की मुस्कान आ गई।
"देखा? इसमें कोई भूत नहीं है, कोई चमत्कार नहीं है। यह सिर्फ एक 'तकनीक' है। जैसे साइकिल चलाना सीखना," उसने खुद से कहा और राहत महसूस की। उसने अपने सारे डर कूड़ेदान में फेंक दिए और यह मान लिया कि वह अभी भी विज्ञान की पकड़ में है।
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श्राव्या "यह मेरा ही दिमाग है" के अहंकार से फूल रही थी। जब वह अभी भी उस शांत अवस्था में थी, तभी अचानक माहौल बदल गया।
इतने दिनों से फुसफुसाने वाली वह आवाज़, अब पहले से कहीं अधिक स्पष्ट, तेज़ और अधिकारपूर्ण ढंग से उसके कानों में गूंजी:
"तुम हमें एक छोटे से दायरे में रखने की कोशिश कर रही हो..."
श्राव्या चौंक गई। उसके हाथ में पेन रुक गया। "क्या?" उसने कांपती हुई आवाज़ में पूछा।
उस आवाज़ ने आगे कहा:
"अपनी सुरक्षा के लिए, हमें एक छोटे से वैज्ञानिक ढांचे (Scientific Framework) में बांधने की कोशिश मत करो। हम तुम्हारा अवचेतन मन नहीं हैं (We are not your subconscious)।"
श्राव्या को फिर से कंपन होने लगा। उसका नया सिद्धांत पहले ही टूट चुका था।
"तो फिर... तो फिर तुम कौन हो? वैज्ञानिक रूप से इसका कोई मतलब नहीं है!" उसने घबराते हुए बहस की।
उस आवाज़ ने शांति से लेकिन उतनी ही गंभीरता से उत्तर दिया:
"विज्ञान सुंदर है श्राव्या, लेकिन यह सब कुछ समेटे हुए नहीं है।"
कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया। लेकिन श्राव्या के दिमाग की शांति गायब हो गई थी और पुरानी चिंता ने फिर से घर कर लिया था।
"हम तुम्हारा अवचेतन मन नहीं हैं" आवाज़ के इन शब्दों ने श्राव्या की वैज्ञानिक जिज्ञासा को जगा दिया था। जब उसे यकीन हो गया कि पारंपरिक चिकित्सा विज्ञान में इसका कोई उत्तर नहीं है, तो उसे अनिवार्य रूप से विज्ञान की सीमाओं से परे खोजना पड़ा।
उसने हार नहीं मानी और इंटरनेट पर और गहराई से छानबीन की। इस बार उसकी खोज का विषय था "पैरासाइकोलॉजी" (Parapsychology)।
उसके लैपटॉप स्क्रीन पर दिखाई देने वाले नामों और शोधों ने उसे हैरान कर दिया:
डीन रेडिन (Dean Radin): चेतना (Consciousness) और भौतिक दुनिया के बीच संबंध पर उनके द्वारा किए गए प्रयोग।
सीआईए (CIA) प्रयोग: अमेरिकी खुफिया एजेंसी द्वारा संचालित "रिमोट व्यूइंग" (Remote Viewing) यानी मन से दूर के दृश्यों को देखने वाला स्टारगेट प्रोजेक्ट (Project Stargate)। इस बात ने उसे सदमे में डाल दिया कि सरकार ने भी ऐसे मामलों पर करोड़ों डॉलर खर्च किए थे।
रूपर्ट शेलड्रेक (Rupert Sheldrake): जानवरों और इंसानों के बीच रहस्यमय संबंध या "मॉर्फिक रेजोनेंस" (Morphic Resonance) सिद्धांत।
यह सब पढ़ते हुए श्राव्या के दिल की धड़कन तेज़ हो गई थी। ये महज़ मनगढ़ंत कहानियाँ नहीं थीं, इनके पीछे डेटा (Data) और आँकड़ों (Statistics) का बल था।
लेकिन, उसी समय उसके अंदर एक डर भी शुरू हो गया।
"यह सब 'छद्म विज्ञान' (Fringe Science) है," उसने चिंता के साथ कुर्सी पर पीछे झुकते हुए कहा। "अगर पापा को पता चला कि मैं यह सब पढ़ रही हूँ तो? वे निश्चित रूप से इस सबको 'अंधविश्वास' या 'पागलपन' कहेंगे।"
श्राव्या अपने पिता के सख्त वैज्ञानिक आदर्शों और अब वह जिन नए रहस्यमयी सच्चाइयों की खोज कर रही थी, उनके बीच फँस गई थी।
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अगले दिन दोपहर।
कॉलेज का कैफेटेरिया छात्रों से खचाखच भरा था। श्राव्या और उसकी सहेली (स्नेहा) कॉफी पीते हुए बैठी थीं। परीक्षा की चिंता खत्म हो जाने के कारण माहौल थोड़ा हल्का था।
बातों-बातों में विषय अचानक 'सपनों' और 'अजीब अनुभवों' की ओर मुड़ गया। श्राव्या ने अपने मन की उलझन का परोक्ष रूप से जिक्र किया। "कभी-कभी ऐसी चीजें होती हैं जो विज्ञान की समझ में नहीं आतीं, है ना?" उसने पूछा।
इस पर स्नेहा ने कॉफी की चुस्की लेते हुए जवाब दिया: "हाँ यार, मुझे भी ऐसा ही लगता है। मेरी दादी हैं ना, उन्हें भी ऐसे ही अजीब सपने आते थे।"
श्राव्या के कान खड़े हो गए। "सच में? क्या होता था?" उसने उत्सुकता से पूछा।
"अगर गाँव में कोई बीमार होता था या कुछ बुरा होने वाला होता था, तो उन्हें पहले ही सपने में पता चल जाता था। वे घर वालों को बता भी देती थीं। लेकिन मेरे पापा, तुम्हें तो पता है, एकदम प्रैक्टिकल इंसान हैं। वे इसे 'महज़ इत्तेफाक' (Coincidence) कहकर टाल देते थे," स्नेहा ने समझाया।
कुछ देर चुप रहने के बाद, स्नेहा ने आगे कहा: "लेकिन श्राव्या, मजे की बात यह है कि... दादी की कही हुई कई बातें अजीब तरह से सच हो जाती थीं! शायद विज्ञान में इसका कोई नाम न हो, लेकिन यह झूठ तो बिल्कुल नहीं है।"
स्नेहा की यह बात श्राव्या के मन में गहराई तक उतर गई।
"शायद कुछ चीजें हमारे तर्क से परे होती हैं," सहेली की इस बात से उसे बड़ी सांत्वना मिली। यह सच्चाई कि वह अकेली नहीं है, दुनिया में ऐसे अनुभव वाले और भी लोग हैं, इससे उसे हिम्मत मिली।
श्राव्या खामोशी से कॉफी के कप को देखती रही। उसका वैज्ञानिक अहंकार पिघल रहा था, और उसकी जगह एक नई 'समझ' पैदा हो रही थी।
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आधी रात बीत चुकी थी। श्राव्या अपनी स्टडी टेबल के सामने चुपचाप बैठी थी। कमरे में गहरा सन्नाटा था। लैंप की हल्की रोशनी में सिर्फ उसका चेहरा दिख रहा था।
शून्य में घूरते हुए, उसने आखिरकार अपने मन में उठने वाला वह बुनियादी सवाल पूछ ही लिया:
"क्या तुम सच में हो?"
पल भर में जवाब आ गया। यह शांत था, लेकिन स्पष्ट था:
"हम हमेशा से रहे हैं।"
श्राव्या ने उत्सुकता और थोड़े डर के साथ फिर पूछा, "तुम कौन हो? मरे हुए लोगों की आत्माएँ? या फिर पुराणों में बताए गए देवता?"
उस आवाज़ ने उत्तर दिया:
"हम मार्गदर्शक (Guides) हैं। तुम्हारी भाषा सीमित है श्राव्या। जैसे जन्म से अंधे व्यक्ति को रंगों के बारे में समझाना, वैसे ही तुम्हें हमारे स्वरूप के बारे में समझाना मुश्किल है। लेकिन तुम्हें हमारे अस्तित्व का एहसास है, बस इतना ही काफी है।"
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उन आवाज़ों के साथ बातचीत खत्म होने के बाद, श्राव्या कुर्सी पर झुक कर बैठ गई। उसका दिमाग जैसे गर्म हो गया था। उसने अपने दोनों हाथों से सिर को कसकर पकड़ लिया।
"उफ्फ... ये क्या है? मार्गदर्शक? गाइड्स? क्या यह सब सच में संभव है?"
उसका मन एक बार में उन आवाज़ों की बात मानने को तैयार नहीं था। उसके खून में ही विज्ञान घुला था। उसने सिर उठाया और अपना लैपटॉप खोला।
मन की उलझन सुलझाने के लिए, उसने स्क्रीन पर दो कॉलम (Columns) बनाए:
1. पिता का वैज्ञानिक दृष्टिकोण (सुरक्षित):
यह सब भ्रम है।
नींद की कमी से दिमाग का बुना हुआ जाल है।
इसके लिए दवा की जरूरत है।
यह एक सुरक्षित रास्ता है।
2. इन आवाज़ों की व्याख्या (रहस्यमयी):
ये मार्गदर्शक हैं।
वे मेरी मदद कर रहे हैं (परीक्षा में साबित हो चुका है)।
विज्ञान के परे भी एक दुनिया है।
यह एक रहस्यमयी और खतरनाक रास्ता है।
श्राव्या देर तक दोनों सूचियों को देखती रही। बाईं ओर तर्क था, और दाईं ओर अनुभव।
अंत में निराश होकर उसने स्क्रीन को घूरते हुए यह निष्कर्ष निकाला:
"मैं... मैं किसी भी चीज़ पर विश्वास नहीं कर पा रही हूँ..."
वह एक अधर (Limbo) में फँस गई थी। पीछे मुड़ने पर विज्ञान रोक रहा था, और आगे बढ़ने से डर लग रहा था।
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जब श्राव्या अभी भी उस द्वंद्व में बैठी थी, टेबल पर रखे उसके फोन की घंटी बजी।
स्क्रीन पर 'पापा' का मैसेज था:
"परीक्षा कैसी रही बेटी? फ्री होने पर फोन करना।"
वह मैसेज देखते ही श्राव्या का दिल धक से रह गया। पिता के प्रति अपार सम्मान और प्यार एक तरफ था, और आज उसके द्वारा खोजी गई नई सच्चाई दूसरी तरफ।
"बहुत अच्छी रही पापा। पेपर थोड़ा मुश्किल था, लेकिन मैंने मैनेज कर लिया.."
'सेंड' बटन दबाया। वह मैसेज जाते ही उसकी पुरानी दुनिया और नई दुनिया के बीच एक पतली दीवार खड़ी हो गई।
फोन को किनारे रखकर, लाइट बंद कर दी और बिस्तर पर लेट गई। अंधेरे में, छत की तरफ देखकर, किसी को सुनाने के लिए धीरे से फुसफुसाई:
"मुझे अभी भी नहीं पता कि तुम कौन हो... लेकिन, धन्यवाद।"
उसकी बात के जवाब में कोई आवाज़ नहीं आई। इसके बजाय, उसके कमरे में एक सुखद, गर्मजोशी भरे एहसास ने उसे घेर लिया।
कई दिनों के बाद, पहली बार श्राव्या बिना किसी डर के गहरी नींद में सो गई।
To be continued...