Swayamvadhu - 64 in Hindi Fiction Stories by Sayant books and stories PDF | स्वयंवधू - 64

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स्वयंवधू - 64

64. हॉस्पिटल में एक नया कांड


उनका परफैक्ट घटना स्थल तैयार था। जो एक सामान्य भयावह हादसा लग रहा था— चिलचिलाती धूप में धूँ-धूँ कर जलती गाड़ियाँ— उनके तितर-बितर बिखरे पड़े जले काले धुएँ छोड़ते टायर, परखच्चे उड़े दरवाज़े, हमारे कवच और महाशक्ति के भविष्य टूटे जैसे शीशे, चकनाचूर बिखरी बंपर, टूटी हेडलाइट और अन्य अवशेष अपने जगह बनाकर इस भयावह हादसे कि गवाही दे रहे थे। उनके बगल पड़े टूटे-फूटे लोग, जो कभी भी लाशे बन सकती थी मदद का इंतज़ार कर रहे थे। पर मदद दूर-दूर तक दिखाई-सुनाई तो क्या, छठी इंद्रियों में भी उनका आभास नहीं हो रहा था। रास्ता, अमावस की रात में श्मशान घाट जैसा था, दर्दनाक सुनसान। पूरे क्षेत्र में बस इन जलती गाड़ियों के लपटों की गूँज ही सुनाई दे रही थी। सामान्य पक्षी भी वहाँ से उड़ना नहीं चाहते थे, सिवाय बाज‍‌‍‌‌ और कौवे के, जो लाशों के ताक में चक्कर काट रहे थे।‌‌‍‍


आधे, पौने घंटे बाद के ‌‍‌मौन सन्नाटे के बाद, अभी भी आग की धधकती लपटों की आवाज़ में अचानक दूर से दूसरी आवाज़ मिलने लगी। धीरे-धीरे वो आवाज़ पुलिस की गाड़ी और एम्बुलेंसों के सायरन में बदलने लगी। पुलिस और पैरामेडिकस एक साथ घटनास्थल पर आ धमके।

एक पुलिस ऑफिसर के साथ दो हवलदार और दो-दो कि टीम कर पैरामेडिक्स के दो एम्बुलेंस पहुँची थी।

निकलते साथ युवा ऑफिसर जिसकी उम्र तीस-पैंतीस की लग रही थी अपने बगल खड़े उम्रदराज़ हवलदार से कहा, " 'ऐक्शन लॉज से कुछ दूरी में एक महँगा सड़क हादसा हुआ है।' तो वो इस हादसे के बारे में कह रहा था?", उसके जल्दी ही ऑर्डर दिया, "एवरीबॉडी मूव फास्ट। अधीर और ज़ंज़ीर मिले है तो समीर बिजलानी भी यही होगा। सब अपनी जान लगा दो!",


सब अपने काम में लग गए।


जिस आदमी ने इन्हें ठोका था और इंजेक्शन पहुँचाई थी उसी ने गुमनाम नागरिक बन इस सड़क हादसे की टिप दी थी।


टिप के कहे अनुसार उन्हें इनकी बजाए अधीर, ज़ंजीर, दिशा और नीलम भाई सड़क के किनारे दुर्घटनाग्रस्त मिले‌‍‌‌‍‌‌‍‌‌‍। पहली बार में यह सामान्य ब्रेकफेल दुर्घटना लग रही थी। सभी घायल, बेहोश थे लेकिन यहाँ के मुकाबले काफी अच्छी हालत में... और गोटे थे। उन्हें तुरंत निकटतम अस्पताल ले जाया गया।


पर उनकी ज़िंदगी महँगी नहीं थी। नीलम के यह बेटे भी इतने खास नहीं थे। अधीर और ज़ंज़ीर को देख उससे साज़िश की बू आई तो उनकी पाँच लोगों की टीम दो हिस्से में बटी, पैरामेडिक्स के साथ अनहोनी की तलाश में आगे निकला।


"एक साथ दो ब्रेकफेल.... कुछ तो गड़बड़ है। सर को बताना पड़ेगा।", पुलिस वाला खुद में बड़बड़ाया और एक मैसेज अपने सीनियर को भेजा।


पुलिसवाले और पैरामेडिक्स भी इस दृश्य को देखकर सहम गए। चिथड़ों के बीच लोग मौत का इंतज़ार कर रहे थे।

"...सर यह पहले वाले से कहीं गुना ज़्यादा खतरनाक है। मुझे नहीं लगता कोई बचा ‌हो‌‌‍गा।", बूढ़े कांस्टेबल, जिसके रिटायरमेंट में दो साल बाकि थे, उसने कार के जले हुए दरवाज़े पर लात मारते हुए कहा,

"चुप रहो! लोग यहाँ मर रहे हैं।", पुलिस युवा अधिकारी जलते मलबे को अपने नंगे हाथ से हटा जीवित प्राणी की तलाश कर रहा था।

उसके सीने से लगा बैज, सीनियर इंस्पेक्टर धीरज त्रिपाठी बता रहा था। लंबी कद-काठी वाला और आँखों में अंजनी आग।

दो हवलदार, दो पैरामेडिक टीम के चार सदस्यों ने अपना तलाशी अभियान शुरू किया। जल्द ही उन्हें जीवित बचे लोग मिलने लगी।

हवलदार हर जगह की तस्वीरें लेती और खोज-बीन में जुटी।

"सर यहाँ एक महिला मिली है! वो-, उसके गले से काले रंग का कूछ निकल रहा है! और सर, इनकी साँस धीमी चल रही है!", एक पैरामेडिकस ने चिल्लाया,

पुलिस अधिकारी महाशक्ति की हालत देखने गया। वह उसकी हालत के बारे में जान ही रहा था कि दूसरे हवलदार उनसे उलट, दूसरे कोने से चिल्लाया, "सर, यहाँ वृषा बिजलानी मिला है! लगता है बहुत पीटा गया है इनको। ज़ख्म गहरे है।",

उसकी अनुमान के अनुसर।

"इन्हें जल्दी से हॉस्पिटल ले जाओ।", कह वो दूसरी तरफ भागा।

वहाँ वृषा की हालत वो जैसा चाहता था वैसा, सर से पैर, दाएं से बाएं हर जगह से खरोंचें, हल्के गहरे चोट, उनसे रिसते लहू, नीले पड़े निशान गहरे राज़ छिपाए हुए थे। वह वृषा बिजलानी की हालत देख ही रहा था कि दूसरे कोने से—


"सर! समीर बिजलानी सर मिले है! उनके होंठ काले पड़ने लगे है। उनकी बेहद नाज़ुक हालत में है!", दूसरे हवलदार ने चिल्लाया। चारों पैरामेडिकस सब कुछ छोड़ समीर के पास भा‍गे। ज़ख्मी मरती मीरा को भी। सब, पुलिस, पैरामेडिक्स, बिजलानी पर व्यस्त थे।

सब दोनों बिजलानियों को बचाने में लग गए।

एक महीला जिसे वहाँ साँस नहीं मिल रही थी, सर्च ऑपरेशन जारी था, पता नहीं और कितने लोग इस भयावह दुर्घटना का शिकार हुए और सब छोड़कर य‌‌ह लोग बिजलानियों पर लग गए थे...


पुलिस अधिकारी पसीने से तरबतर उनकी हरकतों को देख अपनी हाथों को मुट्ठी में भींच ली। पसीना उसके हाथ से गिरा। उसने अपनी मुठ्ठी ढीली कर छोड़ दिया। अपेक्षा से भारी आवाज़ में आदेश देते हुए समीर के शरीर के पास खड़े होकर बोला, "किसकी हालत ज़्यादा खराब है? उस महिला की या वृषा बिजलानी की?", सब उस युवा अधिकारी को देखते रह गए।

"दो पैरामेडिक्स समीर की मदद करे और बाकि उस मैम को ले जाइए।", अधिकारी ने अपने चिढ़ को पीकर कहा।

उस बूढ़े हवलदार, जिसकी आँखों ने उस पुलिस अधिकारी की उम्र से भी ज़्यादा दुनिया देखी थी, उसने खोई हुई आवाज़ में कहा, "हमारी पहली प्राथमिकता बिजलानी है। छोटी जिंदगी के बारे में मैं कौन पूछता है?"

तभी वहाँ सर्च टीम पहुँची।

गुस्से भरे स्वर में उन्होंने आदेश दिया, "वृषा बिजलानी के लिए बैकअप कॉल करें। पहले यह मैम और समीर को दो पैरामेडिक ले जाएँगे। जब तक बैकअप ना आ जाए वृषा बिजलानी को स्थिर रखे। आपकी समस्या हल हो गई है हवलदार साहब। बिजलानी के पास आवश्यक संसाधन हैं और अब आप इन कम महँगी मैम के साथ जाइए और बाकि अन्य लोंगो को ढूँढ़ेगे!", 


हवलदार चेहरे पर एक रहस्यमयी अभिव्यक्ति ले जाने लगा।

जाते-जाते उस बूढ़े हवलदार ने धमकी भरी अंदाज़ और थकान भरी आँखो से कहा, "पछताओगे बच्चे। हर काम जोश से नहीं, होश से होता है।", वह ऐम्बुलेंस में बैठा।

दोनों एम्बुलेंसें नज़दीकि अस्पताल की ओर चल पड़ीं।


लेकिन युवा पुलिस अधिकारी को इसकी परवाह नहीं थी। वह या तो लाश या जीवित बचे लोगों की तलाश कर रहा था। उसके आँखो में किसी अनकही विद्रोह की आग थी।


चिलचिलाती धूप, जलते हुए धातु के मलबों में सब जल्दी थकने लगे थे। दस मिनट की खोज के बाद भी उन्हें निराशा हाथ लगी। उस फोन करने वाले के अनुसार वहाँ कोई ड्राइवर होना चाहिए जिसे वे अभी तक ढूँढ नहीं पाए थे।

उसी दौरान बैकअप सर्च टीम और पैरामेडिक्स भी आई और कवच को ले गया।

उसे भेजने के बाद उनमें अलग स्फूर्ति आई। दो-तीन घंटे के ऊपर वो बिना रुके सर्च ऑपरेशन चालू रखे थे। सब जगह ढूँढ़खर उनके हाथ कुछ नहीं लगा।

सूरज बेरहम था।

सब तपती सड़क आस छोड़ रहे थे। कुछ लोग जंगल में स्थित ऑपरेशन जारी रखें थे।


निराश होकर उसने पेड़ों की ओर देखा, वहाँ उसे सड़क के किनारे में एक गड्ढा में कुछ हिलता दिखा। उसी गड्ढे को जिसे हर किसी ने नज़रअंदाज़ किया।

वह अधिकारी उस गड्ढे के पास गया। उसके उपर का मलबा हल्का सा हिला जो इस कड़क धूप में छलावा लग रही थी। उसने कार के छोटे-मोटे मलबे, पत्ती झाड़ियों को दूसरी तरफ फेंका।

नीचे उसे मिला जिसकी उसे तलाश थी। वह घायल था, बेहोश था लेकिन जीवित सांँस ले रहा था।

"स्ट्रेचर लेके आओ इधर। जल्दी!", उसने ज़ोर से चिल्लाकर सबकी बुलाया।

वह पर मौजूद हर कोई वहाँ पहुँचा।

जीवन जीवित था।

उसे जल्दी ही अस्पताल पहुँचाया गया।

सर्च ऑपरेशन वापस चालू हो गया।

उसी वक्त उसे उसके सीनियर का कॉल आया और समीर बिजलानी के हालात पर अपडेट माँगा।

उसे जवाब देने का मौका दिए बिना ही उसने फोन काट दिया।

"धीरज बस बिजलानी सड़क दुघर्टना की जाँच करो और जो भी इसके पीछे है उसे पकड़ो!",

उस युवा अधिकारी, धीरज ने कहा, "माधव जी, इस खोजी दल का नेतृत्व आप करे।", उसने दूसरे हवलदार से कहा जो पूरे समय शांत था।

हवलदार माधव जो अपनी उम्र के तीसवें दशक में था, पहली बार मिले अवसर से बहुत खुश था, "यह सर!",

अभी तक उसे चार पुरुष और एक महिला मिले है। सभी बुरी तरह घायल थे और उन्हें चिकित्सा की आवश्यकता थी। उन चार में से समीर की हालत जीवन-मरण की गंभीर स्थिति में थी।

वह दुर्घटना स्थल से अस्पताल के लिए रवाना हो गया।


सिटी हॉस्पिटल में—

वह के लोकल हॉस्पिटल में सबको स्थिर कर हेलीकॉप्टर और एंबुलेंस में शहर के सिटी हॉस्पिटल में ले जाया गया।


दुर्घटना के पाँच घंटे के बाद–

सबकी हालत नाज़ुक थी।

उस दिन चारों का इलाज चला। पूरा अस्पताल उनके पीछे व्यस्त था।

आधी रात को, करीब दो-तीन बजे तक समीर की आपातकाल और जटिल सर्जरी चली।

रीढ़ की हड्डी जोड़ी गई, पेल्विक क्षेत्र को जोड़ा गया, सर के हड्डियों को संभाला गया। नीचे की ओर पसलियाँ भी क्षतिग्रस्त हो गई थीं, सौभाग्य से उसके अंग सुरक्षित थे।

"उसके पैरों का क्या हुआ? जब हम उसे बचा रहे थे, तो वे बुरी तरह लटक रहे थे।", पुलिस अधिकारी धीरज ने उस सर्जन से पूछा, जिसने उस पर यह कष्टदायक सर्जरी की थी।

"सर बहुत भाग्यशाली हैं कि यह सिर्फ उनकी हड्डियां थीं, महत्वपूर्ण अंग नहीं।", उसने अपना पसीना पोंछते हुए कहा,

मेज़ में बाकी तीनों की रिपोर्ट थी।

अब धीरज के हाथ में समीर की रिपोर्ट भी थी।

रात लंबी थी।

समीर कोमा में था। हालत नाज़ुक थी। डॉक्टरों की पूरी टीम, बिजलानोलियों को बचाने में व्यस्त थे।

धीरज सर्जन की केबिन से आखिरी, समीर की रिपोर्ट लेकर निकल वृषा बिजलानी को देख रहे डॉक्टरों की टीम का नेतृत्व कर रहे डॉक्टर के पास आज की आखिरी राउंड लगाने गया।

"डॉक्टर मिराज अंकल, डॉक्टर सुधीर के किसी असिस्टेंट से मैं यह रिपोर्ट नहीं ले सकता?", पुलिस ऑफिसर धीरज ने अपनी इज्ज़त बगल रखकर पूछा,

सामने से डॉक्टर मिराज जिसे वो बचपन से जनता है बोला, "सुधीर अब बहुत बदल गया है धीरज। वो अब पहले कि तरह नहीं रहा। तुम्हारे घर से भागने के बाद उसने खुद के सुधारने की बहुत कोशिश की। उसे पछतावा है बेटे।",

धीरज कड़वी मुस्कान के साथ, "खूनी कितना भी पछतावा कर ले वो मरे को वापस नहीं का सकता। जाता हूँ अंकल, ध्यान दे कही इस दुर्घटना की आँच आप तक ना पहुँच जाए।",

कह वो दरवाज़ा पटककर डॉक्टर सुधीर जो वृषा का इलाज कर रहे थे, उनके पास उसके इच्छा के विरुद्ध गया और अधिक जानकारी के लिए।

धीरज उनके केबिन के दरवाज़े के सामने असहज होकर दो पल रुक फिर खटखटाने के लिए अपना हाथ उठाया थोड़ा हिचकिचाया फिर दो बार नॉक करने के बाद उत्तर का इंतज़ार किए बिना जवाब का इंतज़ार किए अंदर घुस आया।

उसे देख रिपोर्ट देखता थका हुआ बूढ़ा सुधीर त्रिपाठी खुशी से उछल पड़ा पर उसकी हिचकिचाहट देख वह रुक गया और व्यावसायिकता के साथ मुस्कुराया। उसका स्वागत करना चाहा पर कुछ कह ना सका। दूसरी ओर दरवाज़ा खुलते ही धीरज बिना डॉक्टर के कुछ कहने का इंतज़ार करे मृत अभिव्यक्ति के साथ, ‌"वृषा बिजलानी की हालत कैसी है?", पूछता घुस आया।

उससे ऐसे वर्दी में देख डॉ. सुधीर त्रिपाठी का सीना फूल आया।

गर्व से उन्होंने कहा, "वृषा बिजलानी की हालत ठीक है भी और नहीं भी बेट–", डॉ. सुधीर अपना मुँह बँद कर पंद्रह पन्नों की रिपोर्ट धीरज के सामने रखी और कहा, "इतना ज़हर एक इंसानी शरीर में मौजूद होना कोई आम बात नहीं है। ड्रग एडिक्ट्स में भी नहीं।",

धीरज को इस बात पर संदेह था। उसने सोचा कि यह पागल डॉक्टर राई का पहाड़ बना रहा था और उसके हिसाब से डॉक्टर सुधीर त्रिपाठी बिजलानियों की जगह भरोसे के लायक नहीं था।

डॉक्टर सुधीर त्रिपाठी हल्की मुस्कान ने साथ अपनी कुर्सी पर बैठा गहरी साँस ली और सिगार जलाकर अपने मुँह में डाला।

धीरज ने चिढ़कर रिपोर्ट पढ़नी शुरू की। जैसे-जैसे वो पेज पलटता गया, उसकी आँखें फटती चली गई। रिपोर्ट में धांधली नहीं दिख रही थी।

समय के साथ सिगार का धुआँ कमरे में भरने लगा। हवा में सिगार का धुआँ छोड़ते हुए डॉक्टर ने तंस भरी मुस्कान के साथ दूसरी रिपोर्ट सामने रखी।

"आँखों को छोटा कर लो दारोगा साहब, अभी तो पुतलियाँ भी बाहर गिरनी बाकि है।",

धीरज ने डॉक्टर के हाव-भाव का ध्यानपूर्वक देखा। उसके पीछे की मुस्कान और तंस के कारण समझने कि कोशिश की।


उसने सामने रखी रिपोर्ट पढ़नी शुरु की।

सुधीर, धीरज को स्नेह से देखकर खुश हो रहा था और पछता भी रहा था।

"सब एक कैसे? दो लोग एक जैसे...कैसे?", धीरज सोच में पड़ गया।

पिछली रिपोर्ट की ही तरह, इस रिपोर्ट की पृष्ठ भी उन्हीं अवैध और घातक दवाओं से भरे थे जिनका इस्तेमाल एकदम सही और सटीक उसी मात्रा में किया गया था जैसा पहले में किया गया था, सटीक प्रति। मानो कोई उनसे नयी आविष्कार कर रहा हो।

"ऐसा नहीं हो सकता...", धीरज ने अविश्वास से कहा,

"क्यों दिलचस्प है ना?", डॉक्टर ने सिगार का कश लेते हुए मज़ाकिया लहजे में कहा,

धीरज कुछ भी कहने में असमर्थ था।

जिस बात ने धीरज को धक्के में डाला था वो बात यह थी कि इससे नुकसान की अपेक्षा लाभ अधिक हो रहा था। रिपोर्ट उनके अंगों को किशोरावस्था की उम्र के बता रहे थे।

"आगे पढ़िए दारोगा साहब, सूची के साथ मैंने उनके अंगों की तस्वीरें भी डाली है और उनके सामने आयु के साथियों और किशोरों के अंगों के साथ संलग्न की है। अंतर देखिए? आश्चर्यजनक रह जायेंगे।", उसने बहुत आत्मसंतुष्ट होकर कहा,

धीरज ने अपने दिल और दिमाग को स्थिर कर आगे रिपोर्ट देखी।

दोनों के शरीर से उन्हें नानाप्रकार के ज़हर मिला। कुछ आम और कुछ खास तो कुछ प्राचीन।

"इतने खास कि यह ऐसे ही ब्लैक मार्केट में भी नहीं मिलती।", उसने खुद से कहा,

काला बाज़ारी में भी यह ज़हर ऐसे ही नहीं मिलती और कुछ के तो नाम उस डॉक्टर ने भी कभी नहीं देखा और उससे अपना नाम दे दिया।

"इसका क्या मतलब है? क्या यह कोई मज़ाक है?", उसने पूछा। उसकी आवाज़ काँप रही थी।

उन्होंने गहरे अफसोस के साथ कहा, "नहीं, यह कोई मज़ाक नहीं है। अब इस पत्र को पढ़ो और रिपोर्ट को भी आगे सब पता चल जाएगा।", 

उसने उसे एक काले रंग की फाइल थमा दी। उसपर लाल में लिखा था, 'टॉप बोट्स'।

उसके अंदर सैकड़ों लोगों की जानकारी थी, पुरुष और महिला दोनों। और उनके सामने लाल में 'फैल' का ठप्पा लगा हुआ था। और अंत में दो कामयाब, 'सक्सेस' लिखा था।

'वृषाली राय' - सक्सेस

'विषय नीर' - सक्सेस

"इसका क्या मतलब है डॉक्टर!?!", धीरज के हाथ उसके बंदूक पर थी,

थकी हुई मुस्कान के साथ डॉक्टर के होंठ खुले फिर रुके पर ध्यान से उसके मुँह से निकले, "मतलब यह है... जहाँ तक मुझे याद है, तुम अपनी माँ की मौत का बदला लेना चाहते हो और इसी कारण तेरह साल की उम्र में अपना घर छोड़कर भाग गए थे। है ना मिस्टर धीरज त्रिपाठी?",

डॉ. सुधीर का गला और आँख भर आया।

बंदूक पर उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।

"इतने सालों के बाद आप क्या चाहते हैं?", उसकी आँखें अनिच्छा से भरी थीं,

आँखों में आँसू लिए उसने कहा, "मैं बहुत लंबे समय से तुमसे माफी माँगना चाहता था।",

उस आदमी के आँसू देखकर धीरज की आँंखें कमज़ोर पड़ गई, "डैड?", उसके मुँह ने बिना उसकी इजाज़त के पुकारा। सुधीर ने भावनाओं में बहकर उसका हाथ पकड़ लिया।

वो शब्द बोलते ही उसे उसके बचपन की सारी दर्दनाक और अकेलापन और धोखा मक्कारी उसके दिमाग में घूमने लगीं।

उसने डॉक्टर सुधीर त्रिपाठी के हाथों से अपने हाथ झटका। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं और उसकी आँखों में आँसू और गुस्सा ने ली।

अब तक उसने जो संयम बनाए रखा था, वह टूट गया और फूट पड़ा।

"कौन सा पिता? कैसा पिता? हाँ?",

उसका हाथ सीधा डॉ. सुधीर के कॉलर पर गया और खुन्नस से पकड़कर उसे हर एक बात याद दिलाई, "कौन पिता? वो पिता जिसने अपने अजन्मे बच्चे को, उसके माँ के गर्भ में चौंथे महीने होते ही थोड़ा-थोड़ा कर ज़हर की लत लगवाने लगा उसके जन्म के बाद माँ की ममता की गर्माहट का अनुभव करने के बजाए ठंडे मेटल पैन में ज़हर के डोस से करवाया। हर दिन अपनी माँ से दूर अंजान लोगों के बीच तुम्हारे ज़हर से घिरा हुआ था।",

बोलते-बोलते उसने खुन्नस में उसे दीवार से दे मारा। उसके पकड़ डॉ. सुधीर की कॉलर में और कठोर होती गई।

सुधीर अपने पक्ष में कुछ कहने के लिए मुँह खोला पर दम साँस लेने में निकल जाती।

धीरज, डॉक्टर सुधीर का बेटा था जो बेटे से ज़्यादा सुधीर के लिए एक्सपेरिमेंट था जो फेल था।

"तुम्हें मॉडर्न विषकन्या बनाने का शौक था पर तुम्हारी बातकिस्मति की तुम्हें कभी ना कोई इजाज़त मिली ना कि कोई बच्ची और जो मिला वो भी बेकार निकला।", उसने खुद को दिखाते हुए कहा, "कितनी मिन्नते, कितने प्रयास के बावजूद ना तुम्हे विषकन्या या विषबालक मिला ना तो यह लाश तुम्हारे आगे के एक्सपेरिमेंट करने के लिए। और तो—",

धीरज के आँख के सामने उसकी माँ की तड़पती हुई छवि दिखने लगी जब इसी डॉक्टर ने उसका गला घोंटकर उसे उसके सामने मारा था।

धीरज ने चिल्लाते हुए सुधीर का गला दबाते हुए उसे डेस्क पर पटका। अगल-बगल रखी सारी फाइलें, रिपोर्ट और सबूत सब सुधीर के तड़पते हाथों ने खुद के बचाव में आगे-पीछे करते हुए नीचे गिर गए। पूरे कॉरिडोर में संघर्ष की आवाज़ गूँज रही थी। सब डॉ. सुधीर के केबिन के सामने से धीमी और छोटे कदमे लिए गुज़र रहे थे ताकि वे छोटी से छोटी बात ही सही कुछ तो गपशप के लिए सुन सके। सिर्फ पंचायत मदद नहीं।

इन आवाज़ों और कदमों के बीच 'ठाक-ठाक' कर काले जूतों उस दरवाज़े की ओर बढ़े।

कदम सीधे दरवाज़े के सामने खड़े हो गया। काले कोट पहने उसके हाथ दरवाज़ा खटखटाने के लिए उठे। दरवाज़े से हाथ छूने से पहले वो रुक गया और एक गंदी चालाक मुस्कान के साथ पीछे घूमा। लोग उसका चेहरा देखने के पहले दुम दबाकर भाग निकले। अभी तक जहाँ लोग मिठाई के ऊपर मंडरा रही मक्खियों जैसा मंडरा रहे थे, सब उसकी एक झलक से गायब हो गए। जैसे ज़मीन ने उन्हें निगल गया हो।

तभी अंदर से एक और ज़ोरदार धमक की आवाज़ आई। उसने खुद में शैतानी हँसी दी।

अंदर धीरज ने डॉ. सुधीर का गला ज़ोर से दबाकर एक सनक वाली मुस्कान के साथ पूछ रहा था, "कैसा लग रहा है पिताश्री? मज़ा आ रहा है ना? माँ को भी ऐसे मज़ा आया होगा ना?", उसकी मुस्कान डरावनी थी। उसकी तीखी तेज़ आँखों कि मुस्कान बहुत डरावनी और खौफनाक लग रही थी। धीरज पर खुन्नस और बदला नाच रही थी।

उसी खूनी मुस्कान के साथ उसने बड़े मीठी स्वर से उसका गला घोंटते हुए कहा, "ऐसे ही तुमने माँ को मारा था ना? ऐसे ही तड़पा-तड़पाकर?! आपने कहा था मम्मा को इसमें बहुत मज़ा आता था। आपको भी बहुत मज़ा आ रहा है ना पिताश्री? कहते है ना, पति पत्नी की आदतें एक जैसी होती है? तो चिंता मत करिए पूज्य पिताश्री, माँ की तरह मैं आपकी भी हर एक सुविधा का ध्यान रखूँगा। आपको प्यार से तड़पा-तड़पकर मरूँगा फिर, क्रियाकर्म कर आपको भी मुखाग्नि दे दूँगा आखिर इकलौता बेटा हूँ ना आपका पापा। बाप के ऋण चुकाने के लिए ही तो पैदा होता है ना? वो

 अपनी यह ज़िम्मेदारी दिल से निभाएगा!", कह धीरज ने सुधीर का गला इतनी ज़ोर से और खुन्नस से घोंटा कि, थककर और हार मानकर सुधीर का शरीर ढीला छूट गया। उसकी आँखें पलटने लगी, मुँह से झाग निकलने लगा। उसकी उंगलियों के नाखून अपने बचाव में धीरज के बाजों को कुरेद रही थी। सुधीर हवा में हाथपैर चलाकर, पटककर खुद को बचाने की जीतोड़ कोशिश कर रहा था।

सुधीर को अपनी माँ की तरह तड़प-तड़पकर मरता देख उसकी समझदारी धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी।

आँखों में न्याय लेकर, हाथों में बदला लेकर, उंगलियों में अपने माँ के खूनी को लेकर धीरज ने एक मनोरोगी की तरह सुधीर को मरता देख रोमांच के साथ भर गया, "अल-विदा मेरे तथाकथित पिता—",

जब वह सुधीर का गला घोंट अपना बदला लेने हो वाला था और सुधीर मरने ही वाला था, तभी उसने अपने दाहिने कंधे पर एक मज़बूत पकड़ महसूस की। इससे पहले कि वह कोई प्रतिक्रिया दे पाता, उस हाथ ने उसे ज़मीन पर पटका और दूर फेंक दिया।

जैसे ही पुलिस ऑफिसर का हाथ डॉक्टर के गले से हटा, वो साँस लेने के लिए मछली के जैसे तड़पा।

धीरज के लिए कमरा एक सेकंड में ऊपर-नीचे ही गया। इससे पहले कि वो कोई प्रतिक्रिया कर पाता, वह इस बड़े से केबिन के दूसरी तरफ किताबों की अलमारियों पर जा गिरा। जिससे उस पर रखी सारी भरी और मोटी-मोटी किताबें उस पर मोटी बारिश की तरह गिरने लगे।

कमरे का कोना धूल के बादल से भरा हुआ था।

जिस काले जूते वाले ने उसे नीचे फेंका, वो मदद करने के बजाए दोनों को पिटा देख रहा था।

धूल के बादल से अचानक एक हाथ तेज़ी से बाहर निकला और उस काले जूते वाले को गर्दन से पकड़ कर सीधे नीचे गिराकर उसके हाथ में हथकड़ी लगाकर उसे गिरफ़्तार कर लिया।

तेज़ साँस लेते हुए, उसने उस आदमी को पलट दिया। उसका चेहरा देख धीरज नीला पड़ गया। उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी।