सुधा की तबीयत अब पहले से काफी बेहतर हो चुकी थी। माँ को स्वस्थ देखकर राजू के चेहरे पर भी खुशी लौट आई थी। लेकिन खुशियों के साथ एक नई परेशानी भी सामने आ खड़ी हुई थी। माँ के इलाज, दवाइयों और अच्छे खाने-पीने में उनके सारे पैसे खर्च हो चुके थे।
अब घर में एक भी पैसा नहीं बचा था।
पिछले तीन महीने कैसे गुजर गए, इसका पता ही नहीं चला। इन तीन महीनों में राजू न तो फेरी लगाने गया था और न ही उसने अपनी माँ को काम पर जाने दिया था। वह चाहता था कि माँ पूरी तरह ठीक हो जाए। अच्छे खाने, महंगी दवाइयों और आराम की वजह से अब सुधा बिल्कुल स्वस्थ हो गई थी।
लेकिन अब पैसे खत्म हो चुके थे।
राजू ने अपनी चिंता माँ के सामने जाहिर नहीं की। उसे डर था कि अगर माँ को पैसों की परेशानी के बारे में पता चला, तो वह फिर से चिंता में पड़ जाएगी और कहीं फिर से बीमार न हो जाए। पर अंदर ही अंदर राजू बहुत परेशान था। उसे अब अपने और अपनी माँ के भविष्य के बारे में सोचना था।
राजू सिर्फ पेट भरने के लिए जीना नहीं चाहता था। वह अच्छे कपड़े पहनना चाहता था, अच्छा खाना चाहता था… और सबसे ज्यादा, वह पढ़ना चाहता था।
उसने मन ही मन तय कर लिया था कि वह जिन्न से सिर्फ पैसे मांगेगा। क्योंकि उसे लगता था कि पैसों से हर मुश्किल आसान हो जाती है। अगर जिन्न चाहे तो पल भर में सब कुछ बदल सकता है। राजू के कहने पर वह एक अच्छा घर दे सकता था। उसका टूटा-फूटा झोंपड़ा रातों-रात एक बड़े महल में बदल सकता था।
लेकिन राजू के मन में कहीं न कहीं यह भी था कि वह अपनी जिंदगी किसी जादू के सहारे नहीं जीना चाहता। वह एक सामान्य और सुखी जीवन चाहता था। वह पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता था और अपने हालात खुद बदलना चाहता था।
उस रात राजू फिर से उसी मैदान में जाकर बैठा था। आसमान में चांद चमक रहा था और चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था। मन में कई सवाल थे और दिल में भविष्य की चिंता।
सिर्फ बारह साल की उम्र में ही उसके कंधों पर जिम्मेदारियों का इतना बड़ा बोझ आ गया था।
उसकी बस्ती के ज्यादातर बच्चे स्कूल नहीं जाते थे। वे दिन भर कचरा बीनते थे या उसकी तरह फेरी लगाते थे। लेकिन राजू को अपने पिता की बातें हमेशा याद रहती थीं।
जब उसके पिता जिंदा थे, तो वे अक्सर उससे कहा करते थे—
“राजू, मैं तुझे इन बच्चों की तरह कचरा उठाते या फेरी लगाते नहीं देखना चाहता। मैं चाहता हूँ कि तू पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा हो और अपनी एक पहचान बनाए।
बेटा, मैं और तेरी माँ पढ़े-लिखे नहीं हैं। हमें जो जिंदगी मिली, हमने जैसे-तैसे काट ली। लेकिन तू दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाना… ताकि लोग तुझे कबाड़ी वाले के नाम से नहीं, बल्कि तेरे अपने नाम से पुकारें।”
पिता की ये बातें आज भी राजू के दिल में गूंजती रहती थीं।
और शायद यही वजह थी कि उस रात मैदान में बैठा राजू सिर्फ पैसों के बारे में नहीं, बल्कि अपने सपनों के बारे में भी सोच रहा था…
अचानक आसमान में तेज बिजली कड़की। मौसम एकदम बदल गया। चारों तरफ अंधेरा और सन्नाटा छा गया। तभी एक भयानक अट्टहास गूंजा… और उसी के साथ जिन्न प्रकट हो गया।
राजू उसे देखकर खुश तो हुआ, लेकिन उसके दिल में कहीं न कहीं डर भी था। आखिर वह एक जिन्न था—जिसके पास अपार शक्तियाँ थीं। अपनी आज़ादी पाने के लिए वह राजू को सब कुछ देने को तैयार था, लेकिन अगर वह नाराज़ हो जाता… तो कुछ भी कर सकता था।
जिन्न जोर से हँसते हुए बोला—
“तो बोलो छोटे… इस बार क्या चाहिए? तुम्हारी अब सिर्फ दो इच्छाएँ बाकी हैं। उन्हें पूरा करके मैं हमेशा के लिए आज़ाद हो जाऊँगा… और फिर अपनी मर्जी से जियूँगा। और जिन्होंने मुझे इस पत्थर में कैद किया था… सबसे पहले उन्हें ढूँढकर मारूँगा… और उनका खून पीऊँगा!”
जिन्न के चेहरे पर एक खतरनाक मुस्कान थी और उसकी हँसी पूरे मैदान में गूंज रही थी।
राजू ने थोड़ा साहस जुटाकर कहा—
“मुझे इस बार भी पैसे चाहिए। पहले जो पैसे तुमने दिए थे… वो सब मेरी माँ की बीमारी में खर्च हो गए। लेकिन अब मेरी माँ बिल्कुल ठीक है।”
जिन्न ने गंभीर होकर पूछा—
“और तुम्हारी तीसरी इच्छा क्या होगी?”
राजू ने तुरंत जवाब दिया—
“पहले मेरी ये इच्छा तो पूरी करो। मैं सब कुछ एक साथ कैसे सोच सकता हूँ? मुझे इतना पैसा चाहिए कि मैं कोई छोटा सा कारोबार शुरू कर सकूँ… पढ़ाई भी कर सकूँ… और अपने घर की मरम्मत भी करा सकूँ। बाकी की इच्छा मैं तुम्हें बाद में बता दूँगा।”
राजू के बदले हुए तेवर देखकर जिन्न की लाल आँखें चमक उठीं। वह धीरे-धीरे राजू के करीब आया और उसे घूरते हुए बोला—
“तुम बहुत चालाक हो… याद रखना, अगर मुझसे चालाकी करने की कोशिश की… तो अच्छा नहीं होगा।”
जिन्न का चेहरा राजू के बहुत करीब था। उसकी आँखों में गुस्सा था और उसके इरादे बेहद खतरनाक लग रहे थे। एक पल के लिए राजू सच में डर गया।
लेकिन ऊपर से वह पूरे आत्मविश्वास के साथ जिन्न की आँखों में देखता रहा।
कुछ पल की खामोशी के बाद जिन्न बोला—
“हूँ… ठीक है। अब घर जाओ। तुम्हारी इच्छा पूरी हो चुकी है।”
इतना कहकर जिन्न अचानक गायब हो गया।
राजू ने गहरी साँस ली, जैसे उसके सीने से कोई बड़ा बोझ उतर गया हो। फिर वह धीरे-धीरे अपने घर की ओर चल पड़ा।
लेकिन उसे अभी तक यह नहीं पता था… कि जिन्न की असली योजना कुछ और ही थी।
राजू तेज़ धड़कते दिल के साथ घर पहुँचा। झोंपड़ी के अंदर हल्की सी शांति थी। उसकी माँ, सुधा, खाना खाकर सो चुकी थी।
राजू धीरे से अपने बिस्तर के पास गया। उसका दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था जैसे सीने से बाहर आ जाएगा। उसने काँपते हाथों से बिस्तर का कोना उठाया…
और अगले ही पल उसकी आँखें चमक उठीं।
पहले की तरह वहाँ पैसों का ढेर पड़ा था। नोटों की चमक उसकी आँखों में झिलमिला रही थी।
कुछ पल के लिए राजू को अपनी आँखों पर यकीन ही नहीं हुआ। उसे समझ नहीं आ रहा था कि किस्मत उस पर इतनी मेहरबान कैसे हो गई थी। यह सब कुछ उसके साथ कैसे हो रहा था। उसे ऐसा लग रहा था मानो वह कोई सपना देख रहा हो।
पहली बार जब उसे जिन्न मिला था, तब वह बहुत दुखी था। उस समय वह उस पल की खुशी महसूस ही नहीं कर पाया था। लेकिन आज… आज उसके सामने इतना पैसा था कि वह जो चाहे कर सकता था।
फिर भी, उसके माता-पिता की दी हुई सीख ने उसे लालची नहीं बनने दिया।
उस रात राजू सो नहीं पाया। वह देर तक यही सोचता रहा कि ऐसा कौन सा काम शुरू करे जिससे उसकी माँ आसानी से कर सके। वह चाहता था कि जब वह स्कूल से लौटे, तो अपनी माँ की मदद भी कर सके।
बहुत देर तक सोचने के बाद आखिरकार राजू ने अपने मन में एक फैसला कर लिया।
उसके दिल को अब सुकून मिलने लगा था।
सोने से पहले उसने सावधानी से सारे पैसे छिपा दिए… और फिर पहली बार उसे गहरी नींद आ गई।
क्योंकि अब उसके मन में सिर्फ एक ही बात थी—
अपने और अपनी माँ के बेहतर भविष्य की शुरुआत।
उस रात राजू गहरी नींद में सो गया। कई दिनों बाद उसके चेहरे पर सुकून था। उसे लग रहा था कि अब उसकी जिंदगी बदलने वाली है।
लेकिन उसे यह नहीं पता था… कि कहीं दूर अंधेरे में कोई और भी जाग रहा था।
वही जिन्न।
जिन्न एक पुराने पेड़ की टहनी पर बैठा था। उसकी लाल आँखें अंधेरे में चमक रही थीं। वह धीमे-धीमे हँस रहा था।
“हाहाहा… यह लड़का खुद को बहुत समझदार समझता है,” जिन्न अपने आप से बोला।
“लेकिन इसे नहीं पता… इसकी तीसरी इच्छा ही मेरी आज़ादी की असली चाबी है।”
दरअसल, सदियों पहले जब उस जिन्न को पत्थर में कैद किया गया था, तब एक शर्त रखी गई थी—
जब तक कोई इंसान तीन इच्छाएँ पूरी नहीं करवाएगा… जिन्न पूरी तरह आज़ाद नहीं हो सकता।
और अगर तीसरी इच्छा पूरी हो जाती…
तो जिन्न को कोई भी फिर कभी कैद नहीं कर सकता था।
जिन्न की आँखों में खतरनाक चमक थी।
“बस एक इच्छा और…” वह धीरे से बोला।
“और फिर… मैं आज़ाद हो जाऊँगा।”
राजू ने बस्ती से थोड़ा दूर, एक अच्छे इलाके में किराए की जगह लेकर अपनी माँ सुधा के लिए एक छोटा सा खाने का ढाबा खुलवा दिया था। ढाबा धीरे-धीरे चल निकला। काम में मदद के लिए राजू ने दो लड़कों को भी रख लिया था।
सुधा अब ढाबे पर बैठकर सारा हिसाब-किताब संभालती थी। इतने सालों बाद उसके चेहरे पर सच्ची खुशी लौट आई थी।
उधर राजू ने भी फिर से स्कूल में दाखिला ले लिया था। वह पहले भी स्कूल जाया करता था, लेकिन पिता की मौत के बाद मजबूरी में उसे पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी।
अब दिन अच्छे गुजरने लगे थे।
राजू मन लगाकर पढ़ाई कर रहा था। घर की मरम्मत भी अच्छे से करवा दी गई थी। अपने लिए उसने एक छोटा सा अलग कमरा बनवा लिया था, जहाँ उसने अपनी पढ़ाई के हिसाब से सब कुछ सजा लिया था—किताबें, मेज, कुर्सी और पढ़ने की छोटी सी अलमारी।
पड़ोस के लोग सुधा के बदलते हालात देखकर हैरान रहते थे। उन्हें समझ नहीं आता था कि अचानक उनकी जिंदगी इतनी कैसे बदल गई।
सावित्री मासी कई बार इशारों-इशारों में पूछतीं—
“सुधा, इतना पैसा अचानक कहाँ से आ गया?”
सुधा बस मुस्कुरा कर कहती—
“सब ऊपर वाले की दया है।”
सुधा ने सावित्री मासी को भी अपने साथ ढाबे पर काम पर लगा लिया था, ताकि उनकी भी थोड़ी मदद हो सके।
जब से राजू स्कूल जाने लगा था, उसका रूप-रंग ही बदल गया था। साफ-सुथरे अच्छे कपड़े, कंधे पर महंगा स्कूल बैग और हाथ में नई किताबें।
बस्ती के बच्चे उसे देखकर कभी-कभी मजाक में कहते—
“अरे देखो, हमारे सेठ जी आ रहे हैं!”
वे हँसते भी थे, चिढ़ाते भी थे।
लेकिन राजू उनकी बातों पर सिर्फ मुस्कुरा देता था। क्योंकि वह जानता था कि वे पढ़ना नहीं चाहते… इसलिए उन्हें पढ़ाई की कीमत भी नहीं पता।
कुल मिलाकर अब राजू और सुधा की जिंदगी में सुकून ही नहीं…
बल्कि उम्मीद और खुशियों की नई शुरुआत हो चुकी थी।
सब कुछ ठीक चल रहा था… लेकिन जिन्न यह सब देख रहा था।
एक रात फिर आसमान में तेज़ बिजली चमकी… और वही भयानक अट्टहास गूंजा।
जिन्न फिर से राजू के सामने प्रकट हो गया।
“तो छोटे…” जिन्न मुस्कुराते हुए बोला,
“लगता है मेरी दी हुई दौलत से तुम्हारी जिंदगी बदल रही है।”
राजू ने शांत होकर कहा,
“हाँ… लेकिन मैं अपनी मेहनत से आगे बढ़ना चाहता हूँ।”
जिन्न की लाल आँखें चमक उठीं।
“अब तुम्हारी सिर्फ एक आखिरी इच्छा बची है,” वह बोला।
“जल्दी सोच लो… क्योंकि उसके बाद मैं आज़ाद हो जाऊँगा।”
राजू कुछ पल चुप रहा।
असल में वह पिछले कई दिनों से यही सोच रहा था। उसे महसूस हो गया था कि जिन्न आज़ाद होने के लिए बहुत बेचैन है।
और शायद… उसकी आज़ादी दुनिया के लिए खतरा भी बन सकती है।
राजू ने धीरे से कहा—
“ठीक है… मैं अपनी तीसरी इच्छा बताता हूँ।”
जिन्न के चेहरे पर खतरनाक मुस्कान फैल गई।
“जल्दी बोलो… मुझे आज़ाद होने का इंतजार है।”
राजू ने गहरी सांस ली और कहा—
“मेरी तीसरी इच्छा यह है कि…
तुम कभी भी किसी इंसान को नुकसान नहीं पहुँचाओगे… और अपनी सारी शक्तियाँ सिर्फ अच्छे कामों के लिए इस्तेमाल करोगे।”
कुछ पल के लिए पूरा मैदान शांत हो गया।
जिन्न का चेहरा अचानक बदल गया।
उसकी आँखों में गुस्सा भड़क उठा।
“तुमने… मुझे धोखा दिया!” वह गरजा।
लेकिन जादू के नियमों के अनुसार…
तीसरी इच्छा को पूरा करना जिन्न के लिए जरूरी था।
अचानक तेज़ रोशनी फैली। हवा जोर-जोर से चलने लगी।
जिन्न दर्द से चिल्लाया…
और फिर उसकी शक्तियाँ बदलने लगीं।
अब वह आज़ाद तो था…
लेकिन किसी को नुकसान नहीं पहुँचा सकता था।
राजू शांत खड़ा था।
जिन्न ने पहली बार उसे ध्यान से देखा और धीमी आवाज़ में बोला—
“तुम छोटे हो… लेकिन बहुत बुद्धिमान हो।”
राजू मुस्कुराया।
“मेरे पिता कहते थे… असली ताकत जादू में नहीं, अक्ल और मेहनत में होती है।”
जिन्न कुछ पल तक उसे देखता रहा…
और फिर बिना कुछ कहे आसमान में गायब हो गया।
उस दिन के बाद राजू ने अपनी पढ़ाई जारी रखी, अपनी माँ की मदद की… और धीरे-धीरे अपनी मेहनत से एक सफल इंसान बन गया।
और लोग सच में उसे अब
कबाड़ी वाले के बेटे के नाम से नहीं… बल्कि उसके अपने नाम—राजू—से पहचानने लगे।