लेखक -एसटीडी मौर्य
कटनी मध्य प्रदेश
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यह कहानी पूर्ण रूप से सत्य है। इसमें कोई काल्पनिक बातें नहीं हैं, बल्कि इसे सच्चाई के रंगों से सजाया गया है। यह घटना आज से लगभग दो साल पहले, 9 मई 2024 को मेरे बड़े पापा के घर घटी थी।
मई का महीना था, गाँव हरियाली से भरा था, किंतु हमारे घर में अचानक अंधकार छा गया। उस सुबह मम्मी ने केवल एक समय का खाना बनाया था, यह सोचकर कि शाम को अच्छा भोजन बनाकर सब साथ खाएंगे। हम सबने सुबह का खाना खा लिया था, और जो थोड़ा बचा था वह दोपहर में मेरे भाई ने खा लिया। शाम होते-होते मुझे बहुत तेज भूख लगी। मैं मम्मी को परेशान करने लगा कि खाना कब बनेगा? मम्मी ने कहा, "बेटा, बस एक-दो घंटे रुक जाओ, फिर बनाती हूँ।" मैं मान गया।
तभी शाम को अचानक तेज तूफान और बारिश शुरू हो गई। बारिश तो जल्दी थम गई, पर तूफान करीब दो घंटे तक चला। हमारा घर उस समय कच्चा था और निर्माण कार्य चल रहा था, इसलिए तूफान के बाद हम आँगन में मिट्टी डालने के काम में जुट गए।
काम खत्म होने के बाद मम्मी खाना बनाने लगीं। तूफान से गिरे हुए आमों का मम्मी अचार बना रही थीं। मैं वहीं बगल में बैठकर कटोरी में अचार का स्वाद ले रहा था। मम्मी आटा गूँथ ही रही थीं कि अचानक एक बेहद बुरी खबर आई।
बड़े पापा के घर में उस समय कोई बड़ा सदस्य नहीं था, केवल उनकी बहू और उनके बच्चे थे। अचानक उनका बड़ा बेटा दौड़ते हुए हमारे घर आया। उसकी आँखों में आँसू थे और वह रोते हुए बोला, "चाचा, मम्मी ने फांसी लगा ली है, जल्दी चलो!"
यह सुनते ही जैसे हम सबकी आवाज़ बंद हो गई। मेरा मँझला भाई जो पढ़ाई कर रहा था, उसने तुरंत किताब छोड़ दी। मम्मी ने गैस बंद कर दी। हम सबका दिमाग काम करना बंद कर चुका था। अभी कुछ घंटे पहले ही तो उन्हें बातें करते देखा था।
मैंने तुरंत आसपास के लोगों को फोन किया। कई लोग तो खाना बनाने में व्यस्त होने के कारण तुरंत नहीं आए, लेकिन गाँव के एक व्यक्ति, जिन्हें हम 'ललन बड़े पापा' कहते हैं, उन्हें फोन किया तो वे तुरंत दौड़ते हुए आए। उनके पैर में चोट थी और उन्होंने सुबह से कुछ खाया भी नहीं था, फिर भी वे हमारी मदद के लिए पहुँचे।
उनसे पहले मैं और मेरा भाई उस बच्चे के साथ मौके पर पहुँच चुके थे। मेरा भाई वहाँ का दृश्य देखकर घबरा गया, उसकी सांसें फूलने लगीं। वहाँ उनकी बहू के पति का वीडियो कॉल चल रहा था और बच्चे अंदर रो रहे थे। गाँव वालों के आने से पहले ही मैंने पुलिस को सूचना दे दी थी।
पुलिस रात करीब 9:30 बजे आई। पुलिस ने बच्चों से पूछताछ की। बच्चों ने बताया कि मम्मी ने उन्हें मोबाइल पर कहानी लगाकर दूसरे कमरे में भेज दिया था और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया था। जब बहुत देर तक मम्मी बाहर नहीं आईं, तो उन्होंने खोजा और देखा कि वे कमरे के कोने में फंदे से लटकी थीं।
पुलिस ने कागजी कार्रवाई पूरी की और शव को पोस्टमार्टम के लिए ले जाने को कहा। उस अंधेरी रात में ट्रैक्टर-ट्रॉली का इंतजाम करना मुश्किल हो रहा था। अंत में ललन बड़े पापा अपने ट्रैक्टर के साथ तैयार हुए, लेकिन ट्रॉली जोड़ने के लिए उन्हें किसी की मदद चाहिए थी। रात के सन्नाटे में, मैं बिना टॉर्च के आधा किलोमीटर तक दौड़ते हुए गया ताकि ट्रॉली जुड़वा सकूं।
अंततः पुलिस शव को लेकर थाने गई। हमने बच्चों को अपने घर में सुला दिया, लेकिन मैं, मेरा भाई और मम्मी रात भर सो नहीं सके। हम बस यही सोच रहे थे कि जो इंसान दिन में हँसकर बातें कर रहा था, उसने अचानक ऐसा कदम क्यों उठा लिया?
अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद शाम करीब 3 बजे शव घर लाया गया। बड़े पापा का लड़का और अन्य रिश्तेदार भी रात तक पहुँच गए। जब बच्चों को उनकी मम्मी का चेहरा दिखाया गया, तो उनका रोना देख सबका दिल दहल गया। मैंने उन बच्चों से कहा कि "तुम्हारी मम्मी अब नहीं आएंगी।" वह बड़ा बच्चा अंदर ही अंदर टूट चुका था।
तीसरे दिन अंतिम संस्कार की तैयारी होने लगी...
(भाग 2 जारी...)
सीख: इस कहानी को साझा करने का मेरा उद्देश्य यही है कि कोई भी आत्मघाती कदम उठाने से पहले अपने मासूम बच्चों का चेहरा जरूर देखें। आपके चले जाने के बाद उन पर क्या बीतेगी, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।