Gold Digger Love to Hate in Hindi Love Stories by ziya books and stories PDF | गोल्ड डिगर नफरत से मोहब्बत

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गोल्ड डिगर नफरत से मोहब्बत

गोल्ड डिगर: नफरत से मोहब्बत तक

एक मार्मिक प्रेम कहानी

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भाग 1

मुंबई की चकाचौंध भरी दुनिया...

सुबह के 8 बज रहे थे। अंधेरी की एक ऊंची इमारत की 24वीं मंजिल पर बैठा आरव मल्होत्रा खिड़की से बाहर देख रहा था। उसके हाथ में कॉफी का कप था, लेकिन उसका ध्यान कॉफी पर नहीं था। उसकी आंखों के सामने पूरा मुंबई शहर पसरा हुआ था, लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

आरव मल्होत्रा। नाम सुनते ही लोगों की धड़कनें बढ़ जातीं। मल्होत्रा इंडस्ट्रीज का सीईओ। 32 साल की उम्र में अरबों का मालिक। लेकिन इस सफलता की कहानी में एक गहरा ज़ख्म छिपा था।

पांच साल पहले की बात है। आरव को पहली बार प्यार हुआ था। नेहा। एक खूबसूरत लड़की, जिसने उसे दिल से चाहा था। कम से कम आरव को ऐसा लगता था। छह महीने की मोहब्बत के बाद शादी की बात चली। आरव ने उसे हर खुशी दी। डायमंड की अंगूठी, लग्जरी कार, पेरिस की ट्रिप। सबकुछ। और फिर एक दिन नेहा ने उसे बताया कि वो उसके पैसों के लिए उसके साथ थी। उसका असली बॉयफ्रेंड था, और वो दोनों मिलकर आरव से पैसे ऐंठना चाहते थे। बैंक स्टेटमेंट देखकर आरव को यकीन हो गया। लाखों रुपये निकल चुके थे।

उसके बाद से आरव ने कसम खा ली थी। अब कोई भी उसे धोखा नहीं दे सकता। और हां, लड़कियां? वो सिर्फ पैसों के लिए आती हैं। उसकी जिंदगी में अब सिर्फ बिजनेस था।

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उधर, धारावी की एक झुग्गी में...

"काव्या! जल्दी कर, नहीं तो ऑफिस लेट हो जाएगा!"

काव्या ने आखिरी बार आईने में देखा। सस्ती साड़ी, लेकिन साफ-सुथरी। चेहरे पर कोई मेकअप नहीं। बड़ी-बड़ी आंखों में थकान थी, लेकिन हौसला अभी भी बाकी था।

"आ रही हूं मां!"

उसने मां को देखा। बीमार, बिस्तर पर पड़ी। तीन साल से कैंसर से जूझ रही हैं। पिता नहीं हैं। छोटा भाई, सोनू, 10 साल का, स्कूल जाने को तैयार खड़ा था।

"दीदी, मुझे नए जूते चाहिए। स्कूल में सब मजाक उड़ाते हैं।"

काव्या की आंखें नम हो गईं। उसने भाई के सिर पर हाथ रखा।

"थोड़ा और सब्र कर सोनू। अगले महीने मैं तुझे सबसे अच्छे जूते दिलाऊंगी। वादा करती हूं।"

वह मुस्कुराई, लेकिन अंदर ही अंदर वो टूट रही थी। उसकी नौकरी में सिर्फ 15 हजार रुपये मिलते थे। मां की दवाइयों में ही 10 हजार लग जाते। बचे 5 हजार में किराया, खाना और सोनू की फीस। हर महीने कंगाली। उधार। कर्ज। और अब अस्पताल वालों ने अगले हफ्ते तक पैसे जमा करने को कहा था, वरना मां का इलाज बंद।

काव्या ने ठान लिया था। अब वो कुछ भी कर सकती थी। कुछ भी।

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उसी दिन, शाम को...

काव्या ऑफिस से लौट रही थी। रास्ते में एक विज्ञापन ने उसका ध्यान खींचा। 'मल्होत्रा इंडस्ट्रीज में पर्सनल असिस्टेंट की आवश्यकता। सैलरी 1 लाख रुपये प्रतिमाह।'

1 लाख! उसकी आंखें चौड़ी हो गईं। उसके पास जरूरी योग्यता थी। एमबीए किया था, लेकिन पिता की मौत और मां की बीमारी के चलते अच्छी नौकरी नहीं मिल पाई थी। उसने तुरंत आवेदन कर दिया।

इंटरव्यू का दिन आया। मल्होत्रा इंडस्ट्रीज की 24वीं मंजिल पर आरव का ऑफिस। कांच की दीवारें, लग्जरी फर्नीचर, और सबसे आगे एक मेज पर बैठा खूबसूरत लेकिन सख्त चेहरे वाला आदमी। आरव मल्होत्रा।

काव्या ने अंदर कदम रखा। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।

"बैठिए।" आरव ने बिना सिर उठाए कहा।

काव्या बैठ गई। आरव ने सिर उठाया। उसकी नजरें काव्या पर पड़ीं। एक पल को वो ठिठका। ये लड़की... बहुत खूबसूरत थी। लेकिन उसने तुरंत अपने मन को काबू किया। सुंदर लड़कियां और भी खतरनाक होती हैं।

"आपका नाम?" आरव ने बिना किसी भावना के पूछा।

"काव्या शर्मा।"

"पिछली नौकरी?"

"अभी तक नहीं मिली। मैंने हाल ही में एमबीए किया है।"

"तो सीधे पर्सनल असिस्टेंट बनना चाहती हैं? अनुभव के बिना?"

"मैं सीख सकती हूं सर। जल्दी सीखती हूं।"

आरव ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। सस्ती साड़ी। हाथ में कोई गहना नहीं। चेहरे पर कोई मेकअप नहीं। लेकिन आंखों में एक चमक थी।

"आपको क्यों लगता है कि मैं आपको नौकरी दूं?"

"क्योंकि मुझे इस नौकरी की बहुत जरूरत है सर।"

"ये तो सभी कहते हैं।"

"मैं वादा करती हूं, मैं 100% दूंगी। दिन-रात मेहनत करूंगी। आपको मायूस नहीं करूंगी।"

आरव मुस्कुराया, लेकिन उस मुस्कान में मज़ाक था। "देखिए मिस शर्मा। मैं लोगों की बातों से प्रभावित नहीं होता। मुझे सिर्फ काम चाहिए। और एक बात और। मुझे लड़कियों से परेशानी है। उम्मीद है आप सिर्फ काम तक सीमित रहेंगी।"

काव्या को समझ नहीं आया कि वो क्या कहना चाहता है। उसने सिर हिलाया।

"ठीक है। कल से ज्वाइन कर लीजिए। प्रोबेशन 3 महीने। अगर काम पसंद आया तो पक्का कर देंगे।"

काव्या खुशी से उछल पड़ी, लेकिन उसने अपने आपको संभाला।

"थैंक यू सर! थैंक यू सो मच!"

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उस रात काव्या सो नहीं पाई। 1 लाख रुपये! मां का इलाज होगा। सोनू को नए जूते मिलेंगे। उधार चुक जाएगा। उसने सोचा भगवान ने उसकी सुन ली।

लेकिन काव्या नहीं जानती थी कि यह नौकरी उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान होने वाली है।

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भाग 2

पहला दिन। काव्या ने सुबह 7 बजे ही ऑफिस पहुंचकर अपनी डेस्क सजा ली। उसने ठान लिया था कि वो आरव को गलत साबित करके दिखाएगी।

आरव 9 बजे आए। उन्होंने देखा, उनकी चाय की प्याली साफ रखी है, अखबार फोल्ड करके रखा है, और कैलेंडर पर उनकी सारी मीटिंग्स हाइलाइट कर दी गई हैं।

उन्होंने काव्या को देखा। वो कंप्यूटर पर कुछ टाइप कर रही थी।

"गुड मॉर्निंग सर।"

"हां। चाय ले आओ।"

काव्या उठी और उनके लिए चाय ले आई।

पहले हफ्ते में काव्या ने अपनी काबिलियत का लोहा मनवा दिया। आरव को यकीन नहीं हो रहा था कि बिना अनुभव के कोई इतनी जल्दी सबकुछ सीख सकता है। वो हर छोटी-बड़ी चीज का ध्यान रखती। उसकी मेहनत देखते ही बनती थी।

लेकिन आरव को शक था। उसने सोचा, ये बहुत परफेक्ट है। कोई इतना परफेक्ट नहीं हो सकता। जरूर कोई और मंसूबा है।

एक दिन आरव ने अपने दोस्त और बिजनेस पार्टनर करण से बात की।

"करण, मुझे मेरी नई पीए पर शक है।"

"क्यों? कुछ गड़बड़ है?"

"नहीं। वो बहुत परफेक्ट है। बहुत ज्यादा परफेक्ट।"

करण हंसा। "अरे यार आरव, तुझे हर लड़की पर शक होता है। नेहा के बाद से तू पागल हो गया है।"

"तू नहीं जानता। ये लड़कियां एक दम नहीं बदलतीं। सब पैसे के पीछे भागती हैं।"

"तो इस लड़की ने तुझसे पैसे मांगे?"

"नहीं। अभी तक नहीं। लेकिन मांगेगी जरूर। मुझे पता है।"

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एक महीना बीता। काव्या की मां की तबीयत और खराब हो गई। अस्पताल वालों ने 2 लाख रुपये और मांग लिए। काव्या के पास पैसे नहीं थे। उसने ऑफिस में एडवांस मांगा, लेकिन मना कर दिया गया। वो बिल्कुल टूट गई।

उसी दिन शाम को, जब आरव ऑफिस से जा रहे थे, उन्होंने देखा काव्या अपनी डेस्क पर सिर छुपाए रो रही है।

आरव ठिठके। उसका दिल कर रहा था कि पूछे क्या हुआ, लेकिन उसने सोचा, मुझे क्या। मैं उसका बॉस हूं, भावनाओं का डॉक्टर नहीं।

वो आगे बढ़ गए।

लेकिन अगले दिन, जब वो ऑफिस आए, तो काव्या ने मुस्कुराकर उनका स्वागत किया। जैसे कुछ हुआ ही न हो।

आरव हैरान रह गया। इसमें इतनी ताकत कहां से आती है? वो रो रही थी, और आज फिर से मुस्कुरा रही है।

उस दिन के बाद से आरव अनजाने में ही काव्या को ज्यादा देखने लगा। उसकी मेहनत। उसका समर्पण। उसकी मुस्कान। उसे कुछ अजीब सा महसूस होता।

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एक दिन, रात के 11 बज रहे थे। आरव ऑफिस में काम कर रहे थे। तभी अचानक उनके सीने में तेज दर्द हुआ। वो वहीं गिर पड़े।

काव्या अभी तक ऑफिस में थी। उसने आवाज सुनी और भागी अंदर। आरव बेहोश पड़े थे।

उसने तुरंत एंबुलेंस बुलाई। और आरव को अस्पताल पहुंचाया। डॉक्टर ने बताया, हार्ट अटैक आया था। समय पर इलाज मिल गया, वरना...

अगले तीन दिन काव्या अस्पताल में ही रही। आरव के परिवार में कोई नहीं था। उसकी मां उसके बचपन में ही गुजर गई थी, और पिता का देहांत 5 साल पहले हो गया था। काव्या ने उसकी देखभाल की। उसे दवा दी। खाना खिलाया। उससे बातें की।

तीसरे दिन आरव की आंख खुली। उसने देखा, काव्या उसके बगल वाली कुर्सी पर सो रही है। उसके चेहरे पर थकान थी।

आरव का दिल पसीज गया। पहली बार किसी ने बिना किसी स्वार्थ के उसकी इतनी देखभाल की थी।

"काव्या," उसने धीरे से कहा।

काव्या उछलकर उठी। "सर! आप होश में आ गए! भगवान का शुक्र है!"

"तू यहां कब से है?"

"3 दिन से सर। डॉक्टर ने कहा था आप ठीक हो जाएंगे, मैंने सोचा मैं यहीं रहूं। कौन है आपका? अकेले में क्या करते?"

आरव की आंखें नम हो गईं। उसने हाथ बढ़ाकर काव्या का हाथ पकड़ लिया।

"थैंक यू, काव्या। थैंक यू।"

वो दो शब्द थे, लेकिन काव्या के लिए उन शब्दों में पूरी दुनिया का सुकून था।

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भाग 3

आरव के अस्पताल से लौटने के बाद, उसने काव्या को बोनस के तौर पर 2 लाख रुपये दिए।

काव्या ने मना कर दिया। "सर, मैंने अपना काम किया। इसके लिए पैसे नहीं ले सकती।"

"ले ले। तूने मेरी जान बचाई है। ये बोनस है, एहसान नहीं।"

काव्या ने सोचा, मां का इलाज हो जाएगा। उसने पैसे ले लिए।

लेकिन आरव के मन में अब एक नया सवाल था। ये लड़की इतनी निस्वार्थ कैसे हो सकती है? क्या सच में दुनिया में ऐसे भी इंसान होते हैं?

एक दिन, उसने काव्या से पूछ ही लिया।

"काव्या, तू इतनी मेहनत क्यों करती है?"

"सर, जरूरत है। मेरी मां बीमार है। छोटा भाई है। मुझे उन्हें संभालना है।"

"और तेरे पिता?"

"गुजर गए सर। 5 साल पहले।"

आरव को एक झटका सा लगा। उसके पिता भी 5 साल पहले ही गुजरे थे। एक अजीब सा कनेक्शन महसूस हुआ।

"और तू शादीशुदा है?"

"नहीं सर।"

"बॉयफ्रेंड?"

"नहीं सर। पढ़ाई और मां की बीमारी में कहां वक्त मिला इन सबका।"

आरव को उस पर तरस आया। इतनी कम उम्र में इतनी जिम्मेदारियां। वो सोचने लगा, उसकी जिंदगी में कभी किसी ने उसे इतना संघर्ष नहीं करने दिया। हर सुख-सुविधा मिली। फिर भी वो दुखी रहता है। और ये लड़की... इतनी मुस्कुराती है।

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धीरे-धीरे दोनों में दोस्ती बढ़ने लगी। आरव ने काव्या को उसकी जिंदगी के बारे में बताया। नेहा के बारे में बताया। कैसे उसने उसे धोखा दिया।

काव्या ने कहा, "सर, हर लड़की एक जैसी नहीं होती। कुछ सच में प्यार करती हैं।"

"कैसे पता चलेगा कौन सच्चा है?"

"वक्त लगता है सर। और भरोसा। भरोसा करना पड़ता है।"

आरव उसकी बातों में खो जाता। उसकी आवाज में एक मिठास थी, जो उसे सुकून देती थी।

एक रात, आरव ने काव्या को डिनर पर बुलाया। एक पांच सितारा होटल में।

काव्या ने मना किया। "सर, ये ठीक नहीं है। लोग क्या कहेंगे?"

"लोग तो कहते ही रहेंगे। तू बता, तू आएगी?"

काव्या ने सोचा, ये तो बॉस है। मना नहीं कर सकती। "ठीक है सर।"

उस रात, काव्या ने अपनी इकलौती अच्छी साड़ी पहनी। होटल पहुंची तो आरव उसका इंतजार कर रहा था। उसने काव्या को देखा तो उसकी सांसें थम सी गईं। वो बेहद खूबसूरत लग रही थी।

डिनर के दौरान बहुत बातें हुईं। आरव ने पूछा, "काव्या, अगर तुझे कभी मौका मिले, तू क्या बनना चाहेगी?"

"मैं... मैं एक दिन अपना बिजनेस खोलना चाहती हूं सर। फैशन डिजाइनिंग का। मुझे ये बहुत पसंद है।"

"तो फैशन डिजाइनिंग में करियर क्यों नहीं बनाया?"

"पैसे नहीं थे सर। एमबीए सस्ता था। और उसमें नौकरी भी जल्दी मिल जाती।"

आरव हैरान रह गया। इतने सपने। और इतनी मजबूरियां।

उस रात के बाद, आरव और काव्या की दोस्ती और गहरी हो गई। लेकिन आरव अभी भी शक से बाहर नहीं निकल पाया था।

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भाग 4

कुछ हफ्तों बाद, आरव को एक अहम बिजनेस मीटिंग के लिए दुबई जाना था। उसने काव्या से भी चलने को कहा। जरूरी काम था।

दुबई में, एक शाम आरव ने काव्या को बुलाया। "चल, कहीं घूमने चलते हैं।"

वो दोनों बुर्ज खलीफा गए। दुनिया की सबसे ऊंची इमारत। ऊपर से देखने पर पूरा दुबई रोशनी से जगमगा रहा था।

"खूबसूरत है न?" आरव ने कहा।

"बहुत सर। कभी सोचा नहीं था मैं यहां आऊंगी।"

"तू हकदार है काव्या। तू बहुत हकदार है।"

अचानक, आरव ने उसका हाथ थाम लिया। काव्या की धड़कनें बढ़ गईं।

"काव्या, मैं..."

लेकिन इससे पहले वो कुछ कहता, उसका फोन बज उठा। विक्रम सिंहानिया का फोन था।

"आरव, मैं दुबई में हूं। कल मिलना होगा। जरूरी बात है।"

विक्रम सिंहानिया, आरव का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी। दोनों के बीच कड़ी टक्कर थी।

अगले दिन, विक्रम ने आरव को बताया, "मैं तेरी कंपनी का बड़ा हिस्सा खरीदना चाहता हूं। बेच दे। अच्छा पैसा दूंगा।"

"सपने मत देख विक्रम। मैं नहीं बेचूंगा।"

"सोच लेना। बाद में पछताना मत।"

विक्रम की नजर काव्या पर पड़ी। उसने देखा आरव उसके साथ है। उसके मन में एक शैतानी पैदा हुई।

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विक्रम ने अपने आदमियों से काव्या की पूरी जानकारी जुटाई। उसकी मां की बीमारी। उसकी मजबूरी। उसकी तंगहाली। उसने एक प्लान बनाया।

विक्रम ने काव्या से संपर्क किया। "मिस शर्मा, मैं आपकी मदद करना चाहता हूं।"

"कौन हैं आप?"

"विक्रम सिंहानिया। मैं आरव का दोस्त हूं।"

"दोस्त? मैंने तो सुना है आप उनके प्रतिद्वंद्वी हैं।"

"वो तो बिजनेस में है। दिल से तो दोस्त हैं हम। देखो, मुझे पता चला है तुम्हारी मां बहुत बीमार है। मैं तुम्हारी मदद करना चाहता हूं।"

"कैसी मदद?"

"मैं तुम्हें 10 लाख रुपये दे सकता हूं। बिना किसी शर्त के।"

काव्या को यकीन नहीं हुआ। "क्यों? आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?"

"क्योंकि आरव मेरा दोस्त है। और तुम उसकी केयर करती हो। मैं तुम्हारी हेल्प करना चाहता हूं। बस।"

काव्या ने पैसे लेने से मना कर दिया। विक्रम हैरान रह गया। उसने सोचा था ये लड़की आसानी से फंस जाएगी। लेकिन उसने मना कर दिया।

विक्रम ने दूसरा प्लान बनाया। उसने आरव को एक फोटो भेजी। जिसमें वो काव्या के साथ बात कर रहा था। और साथ में लिखा, "तेरी प्यारी पीए मुझसे मिल रही है। पैसों के लिए क्या कुछ नहीं करती ये लड़कियां।"

आरव ने फोटो देखी। उसके होश उड़ गए। उसे लगा, उसका शक सही था। काव्या भी उन्हीं में से एक है। उसने दिल पर पत्थर रख लिया।

अगले दिन, जैसे ही काव्या ऑफिस आई, आरव ने चीखते हुए कहा, "निकल जा यहां से! तुझे निकाला जाता है!"

काव्या स्तब्ध रह गई। "सर, क्या हुआ? मैंने क्या किया?"

"ढोंगी! मुझे सब पता है। विक्रम से मिली थी न? पैसों के लिए?"

"सर, मैंने उनसे पैसे नहीं लिए! वो खुद मिले थे मुझसे!"

"झूठ मत बोल! मेरे पास फोटो है!"

आरव ने फोटो दिखाई। काव्या ने सब समझाया। "सर, उन्होंने मुझे बुलाया था। मैंने पैसे लेने से मना कर दिया। आप पूछ सकते हैं उनसे।"

"जा! मैं कुछ नहीं सुनना चाहता। बस निकल जा।"

काव्या की आंखों में आंसू थे। उसने कहा, "सर, मैंने आपको कभी धोखा नहीं दिया। आपको यकीन नहीं है तो मैं चली जाती हूं। लेकिन एक दिन आपको सच पता चलेगा।"

वो वहां से चली गई।

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भाग 5

काव्या के जाने के बाद आरव का ऑफिस सूना सा लगने लगा। वो काम पर ध्यान नहीं दे पा रहा था। हर जगह उसे काव्या दिखती। उसकी हंसी। उसकी बातें। उसकी देखभाल।

करण ने उसे समझाया, "आरव, एक बार तो पूछ ले सच। शायद तू गलत है।"

"मेरे पास सबूत है करण। फोटो है।"

"फोटो झूठी भी हो सकती है। विक्रम ऐसा कर सकता है। तू जानता है वो कितना गिरा हुआ है।"

आरव को करण की बात ठीक लगी। उसने विक्रम को फोन किया।

"विक्रम, वो फोटो क्या थी?"

"वो? ओह, वो तेरी पीए है न? बहुत प्यारी है। मैंने उसे ऑफर किया था पैसे। लेकिन उसने मना कर दिया। बड़ी ईमानदार लड़की है।"

"तूने मुझे फोटो क्यों भेजी?"

"क्योंकि मैं तुझे परेशान देखना चाहता हूं। और देख लिया। तूने उसे निकाल दिया न? शाबाश। बेवकूफ बना दिया तुझे।"

आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे एहसास हुआ उसने कितनी बड़ी गलती कर दी है। उसने काव्या को बिना सुने ही दोषी मान लिया।

वो तुरंत काव्या के घर पहुंचा। धारावी की झुग्गियों में जाकर उसने काव्या को ढूंढा। वो एक छोटे से कमरे में रहती थी। दरवाजा खटखटाया।

काव्या ने दरवाजा खोला। उसकी आंखें सूजी हुई थीं। वो रोई थी।

"काव्या..."

"सर? आप यहां?"

"मुझे माफ कर दे काव्या। मुझे सब पता चल गया। मैं बेवकूफ था। मैंने तुझ पर यकीन नहीं किया।"

काव्या की आंखों से आंसू बह निकले। "मैंने कहा था न सर, एक दिन सच पता चलेगा।"

"मुझे माफ कर दे। प्लीज।"

"सर, मुझे गुस्सा नहीं है आप पर। मुझे पता है आपको किसी ने धोखा दिया था। इसलिए आपको यकीन नहीं होता। लेकिन मैं वैसी नहीं हूं।"

आरव ने उसे गले से लगा लिया। "मुझे पता है काव्या। अब मुझे पता है।"

तभी अंदर से काव्या की मां की आवाज आई। "काव्या, कौन है बेटा?"

"मां, मेरे बॉस हैं।"

आरव ने कहा, "मैं अंदर आ सकता हूं?"

काव्या ने सिर हिलाया। अंदर एक छोटा सा कमरा था। एक पलंग पर काव्या की मां लेटी थीं। चारों तरफ दवाइयां बिखरी थीं।

आरव ने प्रणाम किया। "नमस्ते आंटी।"

"बैठो बेटा। काव्या तुम्हारे बारे में बहुत बताती है। कहती है तुम बहुत अच्छे हो।"

आरव की आंखें नम हो गईं। उसने देखा ये लोग कितनी गरीबी में रहते हैं। और फिर भी इतनी खुश हैं।

उसने तुरंत फैसला किया। "आंटी, आपको अच्छे अस्पताल में एडमिट होना चाहिए। मैं इंतजाम करता हूं।"

काव्या ने कहा, "सर, नहीं, ये..."

"चुप। अब मुझे कुछ मत बोल। ये मेरी जिम्मेदारी है।"

आरव ने तुरंत अपनी गाड़ी बुलाई और काव्या की मां को सबसे अच्छे अस्पताल में एडमिट कराया। सारे खर्चे उसने उठाए। डॉक्टरों की टीम लगा दी।

काव्या देखती रह गई। ये वही आरव था, जो कल तक उस पर शक कर रहा था? या ये कोई और था?

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भाग 6

काव्या की मां का इलाज चल रहा था। आरव रोज अस्पताल जाता। काव्या से मिलता। दोनों की बातें होतीं। धीरे-धीरे आरव को एहसास हुआ कि वो काव्या के बिना नहीं रह सकता।

एक दिन, जब काव्या अस्पताल के कैंटीन में बैठी थी, आरव वहां आया।

"काव्या, तुझसे बात करनी है।"

"बोलिए सर।"

"पहली बात, मुझे 'सर' मत बुलाया कर। आरव बुला।"

काव्या मुस्कुराई। "ठीक है आरव।"

"दूसरी बात, मैं तुझसे कुछ कहना चाहता हूं। मैं... मैं तुझसे प्यार करता हूं काव्या। सच में।"

काव्या चौंक गई। "आरव, ये आप क्या कह रहे हैं?"

"मैं सच कह रहा हूं। मैंने नेहा के बाद से कभी किसी पर यकीन नहीं किया। लेकिन तूने मुझे सिखाया कि प्यार क्या होता है। तेरी मेहनत, तेरा समर्पण, तेरी ईमानदारी ने मुझे बदल दिया। मैं तुझसे प्यार करता हूं काव्या।"

काव्या की आंखों में आंसू थे। "आरव, मैं... मैं भी तुमसे प्यार करती हूं। लेकिन मैं गोल्ड डिगर नहीं हूं। मैं तुम्हारे पैसों के लिए नहीं, तुम्हारे दिल के लिए तुमसे प्यार करती हूं।"

"मुझे पता है काव्या। अब मुझे पता है।"

आरव ने अपनी जेब से एक डिब्बा निकाला। उसमें हीरे की अंगूठी थी।

"काव्या शर्मा, क्या तुम मुझसे शादी करोगी?"

काव्या की आंखों से खुशी के आंसू बह रहे थे। "हां आरव। हां।"

उसने अंगूठी पहन ली। कैंटीन में बैठे सब लोग तालियां बजाने लगे।

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लेकिन खुशियां ज्यादा दिन नहीं टिकतीं। अगले ही दिन, काव्या की मां की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई। डॉक्टर ने बताया, अब बहुत कम समय बचा है।

काव्या टूट गई। आरव ने उसे संभाला।

आखिरी दिन, काव्या की मां ने दोनों को बुलाया। "बेटा आरव, मेरी काव्या को संभालना। वो बहुत मासूम है। बहुत सीधी है।"

"आंटी, मैं वादा करता हूं, मैं उसे कभी दुखी नहीं होने दूंगा।"

"और काव्या, बेटा, इसने तुझे सच्चा प्यार किया है। इसका ख्याल रखना। कभी इसके मन में शक मत आने देना। प्यार में भरोसा सबसे जरूरी है।"

"हां मां।"

काव्या की मां ने आखिरी सांस ली। काव्या रोती रही। आरव ने उसे अपने सीने से लगाए रखा।

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भाग 7

मां की मौत के बाद काव्या बहुत टूट गई थी। आरव ने उसे कभी अकेला नहीं छोड़ा। वो उसे लेकर विदेश घुमाने गया। उसे नई जिंदगी जीने का हौसला दिया।

धीरे-धीरे काव्या संभली। उसने आरव के साथ मिलकर काम करना शुरू किया। अब वो सिर्फ पीए नहीं थी, बल्कि बिजनेस पार्टनर भी थी।

एक दिन आरव ने उसे बताया, "काव्या, मैं तेरा सपना पूरा करना चाहता हूं।"

"कौन सा सपना?"

"फैशन डिजाइनिंग। मैं तेरे लिए एक ब्रांड लॉन्च कर रहा हूं। 'काव्या' नाम से।"

"आरव, ये... ये बहुत बड़ा है। मैं... मैं नहीं कर सकती।"

"तू सब कुछ कर सकती है। मुझे तुझ पर यकीन है।"

काव्या ने वो ब्रांड लॉन्च किया। और कुछ ही महीनों में वो सफलता की बुलंदियों पर पहुंच गई। उसके डिजाइन सबको पसंद आ रहे थे।

शादी का दिन आया। बहुत बड़ी शादी थी। मुंबई के सबसे बड़े होटल में। सारे बड़े लोग आए थे।

फेरे के समय, पंडित जी ने कहा, "वर और वधू एक दूसरे को वचन दें।"

आरव ने कहा, "मैं, आरव मल्होत्रा, तुम्हें काव्या, अपनी पत्नी स्वीकार करता हूं। मैं वादा करता हूं, मैं तुम पर कभी शक नहीं करूंगा। तुमने मुझे सिखाया कि प्यार क्या होता है। तुमने मुझे सिखाया कि भरोसा क्या होता है। मैं हमेशा तुम्हारा साथ दूंगा।"

काव्या ने कहा, "मैं, काव्या शर्मा, तुम्हें आरव, अपना पति स्वीकार करती हूं। मैं वादा करती हूं, मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगी। मैं गोल्ड डिगर नहीं हूं, लेकिन हां, तुम्हारे दिल की सबसे कीमती चीज जरूर हूं।"

सब हंस पड़े। आरव ने उसे प्यार से देखा।

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समापन

शादी के बाद दोनों की जिंदगी खुशहाल चल रही थी। काव्या का ब्रांड और भी सफल हो गया। आरव ने उसके नाम से एक चैरिटी भी शुरू की, जो गरीब लड़कियों की पढ़ाई में मदद करती थी।

सोनू, काव्या का भाई, अब बड़ा हो गया था। वो पढ़ाई में बहुत अच्छा था। आरव ने उसे विदेश भेजा।

एक दिन, दोनों छत पर बैठे थे। रात का समय था। आसमान में तारे चमक रहे थे।

आरव ने काव्या का हाथ थामा। "काव्या, मुझे एक बात बताएगी?"

"हां।"

"जब तू पहली बार मुझसे मिली थी, तो मैं तुझे बहुत बुरा लगा था न?"

"हां, बहुत। मुझे लगा, ये आदमी कितना अजीब है। इतना सख्त। इतना बेरहम।"

"और अब?"

"अब लगता है, भगवान ने मुझे सबसे अच्छा इंसान दिया है।"

आरव मुस्कुराया। "तूने मेरी जिंदगी बदल दी काव्या। तूने मुझे सिखाया कि प्यार सिर्फ एहसास का नाम नहीं, बल्कि भरोसे का भी है।"

"और तूने मुझे सिखाया कि पैसे से ज्यादा कीमती दिल होता है। मैं गोल्ड डिगर थी, लेकिन तूने मुझे सोना बना दिया।"

"तू सोना नहीं है। तू हीरा है। सबसे कीमती।"

दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराए। उनकी आंखों में प्यार था। भरोसा था। और एक वादा था - हमेशा साथ रहने का।

कहानी यहां खत्म नहीं होती। असल में, यहां से शुरू होती है। प्यार की नई कहानी। भरोसे की नई इबारत। एक गोल्ड डिगर की, जिसने नफरत से मोहब्बत तक का सफर तय किया।

और आरव? वो आज भी काव्या को देखकर सोचता है - काश नेहा ने धोखा न दिया होता। तो शायद वो कभी नहीं जान पाता कि सच्चा प्यार क्या होता है। कभी नहीं जान पाता कि काव्या जैसा हीरा उसकी जिंदगी में आ सकता है।

तो ये थी कहानी 'गोल्ड डिगर: नफरत से मोहब्बत तक' की। एक कहानी जो हमें सिखाती है कि प्यार में भरोसा सबसे जरूरी है। और हां, हर गोल्ड डिगर सिर्फ पैसे की शौकीन नहीं होती। कभी-कभी मजबूरियां भी इंसान को वो रास्ता दिखाती हैं, जो वो कभी नहीं चुनना चाहता।

लेकिन अगर सच्चा प्यार मिल जाए, तो वो गोल्ड डिगर भी हीरा बन सकता है। बिल्कुल काव्या की तरह।

समाप्त