ruho ka soda - 12 in Hindi Fiction Stories by mamta books and stories PDF | रूहों का सौदा - 12

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रूहों का सौदा - 12

​ रुद्र की याद

 यह आगामी मुकाबला केवल जीतने के लिए नहीं है। हमारे आर्यावर्त की सीमाओं पर एक ऐसा अंधेरा बढ़ रहा है जो शास्त्रों और मर्यादाओं को निगल जाएगा। उस अंधेरे को रोकने के लिए एक ऐसी रोशनी चाहिए जो खुद आग में तपकर बनी हो।

जिस दिन तुम उस शिखर-मुकाबले को जीत लोगे, उस दिन तुम्हें न केवल अपने अतीत का सच पता चलेगा, बल्कि तुम्हें वह मार्ग भी दिखेगा जो तुम्हें तुम्हारे अपनों तक ले जा सकता है। लेकिन उस मार्ग पर केवल वही चल सकता है जिसने अपने आंसुओं को अपनी शक्ति बना लिया हो।

शंखनाद – शिखर मुकाबले का आगाज़

​महीनों की उस कठोर तपस्या और महागुरु के मार्गदर्शन के बाद, अंततः वह दिन आ ही गया जिसका पूरे आर्यावर्त को इंतज़ार था। 'विशाल गुरुकुल' के मुख्य प्रांगण को आज एक विशाल रणक्षेत्र में बदल दिया गया था। चारों ओर ऊँची मशालें जल रही थीं और दर्शक दीर्घा में केवल गुरुकुल के आचार्य ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के राज्यों से आए विशिष्ट अतिथि भी उपस्थित थे।

​रणक्षेत्र का वातावरण

​हवा में एक अजीब सा तनाव और उत्साह घुला हुआ था। नगाड़ों की थाप दिल की धड़कन बढ़ा रही थी। आज का यह 'शिखर मुकाबला' साधारण शस्त्र-कला का प्रदर्शन नहीं था; यह साहस, बुद्धि और धैर्य की अंतिम परीक्षा थी। मैदान के बीचों-बीच रेत बिछाई गई थी और किनारे पर रखे शस्त्रों की चमक सूरज की पहली किरण के साथ मिलकर आँखों को चौंधिया रही थी।

​रुद्र का प्रवेश

​जैसे ही शंखनाद हुआ, मैदान के एक छोर से रुद्र ने प्रवेश किया। वह अब वह किशोर नहीं लग रहा था जो कुछ दिन पहले अकेला बैठकर रो रहा था। उसके शरीर पर कसे हुए चमड़े के रक्षक (armor), माथे पर लगा रक्त-चन्दन का तिलक और उसकी आँखों में छाई वह गहरी स्थिरता—सब कुछ यह बता रहा था कि उसने अपनी भावनाओं को अपनी शक्ति बना लिया है।

​उसके हाथ में वही पुरानी लकड़ी की तलवार नहीं थी, बल्कि महागुरु द्वारा दी गई एक विशेष धातु की तलवार थी, जिसकी मूठ पर एक सिंह की आकृति बनी थी।

​प्रतिद्वंद्वी का आगमन

​तभी, मैदान के दूसरे छोर से एक भारी कद-काठी वाला योद्धा निकला। उसका नाम 'विक्रांत' था, जो उत्तर परिसर का सबसे शक्तिशाली और क्रूर छात्र माना जाता था। विक्रांत की ताकत के किस्से पूरे गुरुकुल में मशहूर थे, और उसकी आँखों में रुद्र के प्रति एक स्पष्ट द्वेष (jealousy) था।

​महागुरु ने अपने ऊँचे आसन से हाथ उठाकर संकेत दिया। सभा में सन्नाटा छा गया।

​"यह मुकाबला केवल बल का नहीं, बल्कि मर्यादा और संकल्प का है। जो अंतिम समय तक खड़ा रहेगा और जिसका शस्त्र अपने लक्ष्य से नहीं भटकेगा, वही इस 'शिखर' का विजेता कहलाएगा," महागुरु की आवाज़ पूरे मैदान में गूँजी।

​युद्ध का प्रारंभ

​विक्रांत ने एक भयानक गर्जना की और अपनी भारी गदा लेकर रुद्र की ओर बढ़ा। धूल का गुबार उठा और पहले ही प्रहार में ज़मीन दरक गई। रुद्र ने बिजली की फुर्ती से खुद को बचाया और उसकी तलवार की एक हल्की सी काट ने विक्रांत के कवच पर एक लकीर खींच दी।

​खेल शुरू हो चुका था। जहाँ विक्रांत की शक्ति पहाड़ जैसी थी, वहीं रुद्र की गति किसी बहती हुई नदी की तरह अजेय थी।