Bis Minit - So Mil - Ek Shart - 1 in Hindi Drama by Varun books and stories PDF | बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 1: ऊँचाई

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बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 1: ऊँचाई

ट्रैक साँस रोके हुए था।

सुपरकार वर्ल्ड चैंपियनशिप की आख़िरी रेस—जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं। एरीना में मौजूद हज़ारों लोग और अपनी टीवी स्क्रीनों से चिपके करोड़ों दर्शक मन ही मन एक काउंटडाउन कर रहे थे।

पिट क्रू दस्ताने कस रहे थे।

विज्ञापनों से सजी, चमचमाती, बड़े पहियों वाली रेसकार गाड़ियाँ—जिनके शक्तिशाली इंजन घरघराहट के साथ आग उगलने को तैयार थे।

स्टार्ट लाइट्स जल चुकी थीं, पर हरी होने से पहले का वह एक सेकंड—फ्लैग पोस्ट लिए लड़के, चीयर गर्ल्स, दर्शक—सब शांत।

सबकी साँसें थम-सी गई थीं।

टीम इनसैनिटी के चैंपियन रेसर नील वरदराजन ने हेलमेट के भीतर आँखें बंद कीं।

इंजन गरज रहा था, पर उसके लिए आवाज़ नहीं थी—सिर्फ़ धड़कन थी। हाथ स्टीयरिंग पर ऐसे टिके थे जैसे वे किसी और शरीर के हों। थ्रॉटल पर पैर हल्का, तैयार। सामने की सीधी लाइन एक सुरंग की तरह लग रही थी, जिसके दूसरे सिरे पर या तो नाम लिखा जाएगा—या बहाना।

दर्शकों की भीड़ से अलग, फैमिली बॉक्स में खड़ी थी नील की मंगेतर दामिनी सोलंकी।

सफ़ेद टर्टलनेक शर्ट और डेनिम जीन्स की चुस्त पोशाक में दामिनी बैठी नहीं थी—खड़ी ट्रैक को एकटक देख रही थी। उसके कंधे सख़्त थे, जैसे वह खुद कार को थामे हुए हो।

यह नील की पहली बड़ी रेस नहीं थी—पर हर बार डर नया लगता था।

दामिनी के ठीक पास इंद्राणी वरदराजन खड़ी थी—नील की सौतेली बहन। फोन नीचे, कैमरों से दूर। वह ट्रैक को वैसे देख रही थी जैसे शतरंज की बिसात—चालें समझते हुए।

“आज तो मेरा भी दिल काँप रहा है,” उसने कहा। “This is big.”

दामिनी ने कुछ नहीं कहा।

लाल बत्तियाँ बुझीं।

हरी जली।

नील ने क्लच छोड़ा—और कार झटके से आगे बढ़ी। हवा फट गई।

सारी गाड़ियाँ रॉकेट की तरह छूट पड़ीं।

पहली गियर में ही नील ने जगह बना ली, दूसरी में लाइन खींच दी।

वह मोड़ नहीं काट रहा था—वह मोड़ को पढ़ रहा था। टायर हल्का-सा कोने को छूता और कार ज़ूम से निकल जाती। वह हर मोड़, हर माइलस्टोन तेज़ी से पार करता जा रहा था—जहाँ एक आम ड्राइवर सिर्फ़ ब्रेक करता, वह आधा सेकंड और रुका।

रेडियो पर आवाज़ आई—“टायर टेम्प नॉर्मल, नील। पुश।”

नील ने पुश किया।

हर लैप में समय उतरता गया। भीड़ का शोर ऊपर उठता गया, पर ट्रैक के भीतर एक अजीब-सी शांति थी। स्पीडोमीटर ऊपर चढ़ रहा था, और कार ज़मीन से लड़ने के बजाय उसके साथ बह रही थी।

पिट वॉल पर दामिनी ने साँस रोकी।

इंद्राणी ने तालियाँ बजाईं।

अंतिम लैप में सब कुछ खुल गया।

नील ने कार को सीमा पर रखा—ना एक इंच ज़्यादा, ना कम। हवा और धातु के बीच का संतुलन किसी पतली रस्सी जैसा था, और वह उसी पर चल रहा था।

फिनिश लाइन आई।

और निकल गई।

एक पल के लिए टाइमिंग स्क्रीन काली रही।

फिर अंक उभरे।

रिकॉर्ड।

एरीना का रेडियो चीख पड़ा—“इंडिया का सबसे युवा—रिकॉर्ड ब्रेक!”

भीड़ उन्माद में उमड़ पड़ी।

कॉमेंटेटर बिना साँस लिए बोलता चला जा रहा था।

नील ने हेलमेट के भीतर सिर झुकाया। उसके मन में अजीब-सी शांति छा गई। उँगलियाँ स्टीयरिंग पर कस गईं। साँस बाहर निकली—धीमी, स्थिर। यह जश्न का पल नहीं था। यह ठहराव का पल था। उसे स्क्रीन देखने की ज़रूरत नहीं थी यह जानने के लिए कि वह एक बड़े रेसर का रिकॉर्ड तोड़ चुका था।

कार रुकी। कैमरे दौड़े। फ्लैश चमके।

नील ने हेलमेट उतारा और सामने देखा—दामिनी वहीं थी। उनकी नज़रें मिलीं। एक हल्की-सी मुस्कराहट। कोई शब्द नहीं। बस एक छोटा-सा इशारा—हम जीत चुके हैं।

इंद्राणी भी आगे बढ़ी।

“तूने कर दिखाया, नील,” उसने उसके कंधे पर हाथ रखा। आवाज़ में गर्व था—और कैमरों के लिए सही संतुलन। “Well done, bro.”

“‘हमने’ कर दिखाया,” नील ने कहा, और दामिनी को देखा।

इंद्राणी मुस्कराई—सहज, अपनापन ओढ़े हुए।

थोड़ी देर में मंच सजा। नील अपनी टीम की काली-हरी लेदर वर्दी में खड़ा था, पीछे विज्ञापनों से भरी एक बड़ी स्क्रीन। पास ही डीप-नेक शर्ट में खूबसूरत एंकर अपने बाल सँभाल रही थी।

पत्रकारों के सवाल बरसने लगे।

“इतनी कम उम्र में यह रिकॉर्ड—काफी प्रेशर रहा होगा आप पर?”

“प्रेशर वही था,” नील ने कहा। “लेकिन मेरी टीम का सपोर्ट पूरा था, और पिट क्रू ने ज़बरदस्त काम किया।”

दामिनी पीछे बैठी रही, मुस्कुराती हुई—जैसे कई टन का बोझ उतर गया हो। इंद्राणी बीच-बीच में बोलती रही—स्पॉन्सर, भविष्य, परिवार।

रेस की फिनिश लाइन पर शोर उठ ही रहा था—और उसी पल, शहर के दूसरे सिरे पर, एक अलग कमरा शांत था।

महँगा सोफ़ा।

चमचमाती दीवारें, जिन पर टंगी महंगी पेंटिंग्स।

सामने छह बड़े मॉनिटर्स—कहीं एशियन मार्केट्स के चार्ट दौड़ रहे थे, कहीं करेंसी पेयर्स, कहीं ब्लूमबर्ग की हेडलाइंस।

पूरा प्रोफेशनल ट्रेडिंग का सेटअप।

उनमें से एक स्क्रीन पर, बिना आवाज़ के, वही रेस चल रही थी।

प्रतुल मोतवाणी पीठ टिकाए बैठा था। पीली पोलो टी-शर्ट और खाकी पतलून, बाल हल्के काले, हल्के सफ़ेद।

हाथ में क्रिस्टल ग्लास—जिसमें बर्फ़ धीरे-धीरे पिघल रही थी।

आँखें स्क्रीन पर थीं, पर चेहरे पर कोई भाव नहीं।

टाइमर रुका।

“रिकॉर्ड।”

प्रतुल ने आँखें झपकाईं।

बस इतना।

मेज़ पर रखा आई-फोन भिनभिनाया।

उसने बिना देखे स्पीकर पर डाल दिया।

“जय श्री कृष्णा, प्रतुल भाई,” उधर से आवाज़ आई—हल्की गुजराती-हिंदी मिली हुई।

“जय श्री कृष्णा,” प्रतुल ने कहा। “कहिए, जिग्नेश भाई।”

“अरे, ये तो नील वरदराजन रेस जीत गया,” जिग्नेश बोला। “कल का लड़का। इसके ऑड्स तो काफ़ी कम थे। अपना तो तीस पेटी दूसरे रेसर पे लगा था।”

प्रतुल ने दाँत भींचे। स्क्रीन पर उसके पोर्टफोलियो में एक लाल लाइन और नीचे खिसक गई।

“होता रहता है, जिग्नेश भाई,” उसने कहा—आवाज़ सपाट।

“आपके कितने गए?”

“ज़्यादा नहीं,” प्रतुल ने गिनती ऐसे की जैसे किराना लिस्ट पढ़ रहा हो। “एक करोड़ सोलह लाख, तैंतीस हज़ार, तीन सौ पच्चीस।”

उधर एक पल की चुप्पी।

फिर जिग्नेश हँसा। “अरे बाप रे।”

प्रतुल ने ग्लास मेज़ पर रखा।

“कोई नहीं,” उसने कहा। “अमेरिका का स्टॉक मार्केट खुलने वाला है। दो घंटे में रिकवर कर लूँगा।” कॉल काट दी।

टीवी पर भीड़ उन्माद में थी।

नील हेलमेट उतार रहा था।

प्रतुल ने स्क्रीन की तरफ़ देखा, और धीमे से बुदबुदाया—“इस लड़के ने तो लंका लगा दी।”

बर्फ़ पूरी तरह पिघल चुकी थी।

शाम ढली, और रेस के बाद की पार्टी शुरू हुई।

नील जिस होटल में रुका था, वहाँ के कॉरिडोर में बधाइयों की कतार लग चुकी थी।

होटल के पचासवें माले पर माहौल बदल गया था।

यह कोई बंद लाउंज नहीं था—यह वही रूफ़टॉप था जहाँ शहर की बड़ी तस्वीरें ली जाती थीं। खुला, चमकता हुआ, और शानदार दिखने वाला। कैमरे हर तरफ़ थे। शैंपेन के ग्लास हवा में उठ रहे थे। नील की जीत अब निजी नहीं थी—यह प्रदर्शन थी।

इंद्राणी नील और दामिनी के आगे-आगे चल रही थी, जैसे यह सब उसी का स्वाभाविक विस्तार हो।

“आज रात बस मस्ती,” उसने पीछे मुड़कर कहा। “कुछ हल्का-फुल्का हो जाए?”

दामिनी ने नील की तरफ़ देखा।

नील ने कंधे उचका दिए। “हो जाए मस्ती।”

रूफ़टॉप के बीचोंबीच, रोशनी के ठीक नीचे, एक गोल मेज़ सजी थी।

नई गद्दी। भारी पत्ते। चारों ओर वही चेहरे, जिन्हें लोग पहचानते हैं—पर नाम ज़्यादा नहीं लेते।

किसी ने धीमे से ताश के उस खेल का नाम पुकारा—डेथ ब्रिज।

नाम ऐसे उछला, जैसे सब पहले से जानते हों।

“हाई स्टेक्स गेम?” किसी ने पूछा।

इंद्राणी मुस्कराई।

“नहीं यार, मेरा भाई हाई स्टेक्स गेम जीत के आया है, ये तो बस ऐसे ही छोटा-सा खेल है।”

सामने बैठा रूसी खिलाड़ी, एंटोन स्टैंकोव, कुर्सी से थोड़ा पीछे झुका।

उसने शैंपेन का घूँट लिया और नील को ऊपर से नीचे तक देखा।

“Beginner,” उसने हँसते हुए कहा।

नील ने फीकी हँसी के साथ पत्ते उठाए।

हाथ स्थिर थे।

वही शांति—जो ट्रैक पर थी।

लोग रुक गए।

सिर्फ़ देखने के लिए।

कुछ मिनटों में हवा बदल गई।

हँसी धीमी हुई।

आवाज़ें पास खिसक आईं।

एंटोन ने अपने पत्तों को पैनी नज़र से देखा।

फिर नील ने मेज़ पर अपने पत्ते बिखेर दिए।

एक सेकंड की चुप्पी।

एंटोन अपने पत्ते फेंक कर उठ खड़ा हुआ। एक पल सब शांत हो गए।

फिर एंटोन ने मुस्कुराकर हाथ बढ़ाया।

नील ने हैंडशेक किया।

गेम का डीलर बोला—“नील जीते, दस लाख आपके हुए।”

हल्की तालियाँ बजीं, और थोड़ी हूटिंग।

यह जीत रेस जैसी नहीं थी—यह तेज़ नहीं थी, बस एक हल्की-फुल्की से खुश कर देने वाली जीत।

शैंपेन खुली।

ग्लास टकराए।

कैमरे झुके।

इंद्राणी ने दूर से देखा। ताली बजाई।

थोड़ी देर बाद, भीड़ छँट चुकी थी।

एंटोन इंद्राणी के पास खड़ा था, उसका हाथ उसकी कमर पर। चेहरा हँसी से ज़्यादा कसा हुआ।

“इंदु, मैं इस गेम का बेस्ट प्लेयर हूँ,” उसने धीमे कहा। “मैं तुम्हारे भाई को हरा सकता था।”

इंद्राणी ने उसकी तरफ़ देखा, मुस्कान हल्की।

“ओह, एंटोन, जाने दो, भाई है मेरा।”

एंटोन ने भौंह उठाई। “सौतेला है न।”

उसकी टूटी-फूटी हिंदी में शब्द थोड़े चुभे।

इंद्राणी की आँखें सख़्त हुईं। “सगे से भी बढ़कर है,” उसने कहा—आवाज़ में एक पल की धार।

फिर इंद्राणी पिघल गई। मुस्कान लौट आई, जैसे कुछ हुआ ही न हो। अपनी कमीज़ के दो बटन धीरे-धीरे खोले और कॉलर ढीला किया।

एंटोन की तीखी नज़रें उसके कपड़ों के अंदर मानो घुस जाना चाहती थीं।

“चलो,” इंद्राणी ने उसका हाथ खींचा। “मेरे कमरे में चलते हैं। वहाँ तुम मेरे साथ जो चाहे गेम्स खेल सकते हो।” धीरे से उसके कान में फुसफुसाई—“और वहाँ मैं तुम्हें जीतने से भी नहीं रोकूँगी।”

एंटोन हँसा। “I don’t understand you women.”

इंद्राणी भी हँसी, पर इस बार दाँत पीसते हुए।

रात गहरी हो चुकी थी। नील बैठकर एक बड़े टीवी स्क्रीन पर चैनल बदल रहा था और व्हिस्की के घूँट ले रहा था।

रेस से पहले के कुछ दिन काफी भारी गुज़रते थे—सख़्त ट्रेनिंग, नियमित भोजन और फैंस की उम्मीदों का वज़न। आज की रात थी आराम की।

दामिनी अंदर आई, बाथरोब में लिपटी, गीले बाल, चेहरे पर बड़ा नकली चश्मा। “बस मिस्टर, अब पढ़ाई का टाइम शुरू।”

नील ने मुस्कुराकर माथा पीट लिया। “अरे, सेक्सी टीचर रोल-प्ले, आज?”

दामिनी ने आँखें घुमाईं। “रेस भी जीत ली, ताश का गेम भी।”

अपने रोब की पट्टी खोली और उतार दिया।

निर्वस्त्र थी।

“बहुत शरारती हो गए हो मिस्टर नील, आज सज़ा मिलेगी।”

“बंदा सज़ा के लिए तैयार है।” नील उसकी देह से टकराती टीवी की रोशनी को निहारते हुए उठा और उससे लिपट गया।