Behind the scenes - 3 in Hindi Moral Stories by ARTI MEENA books and stories PDF | पर्दे के पीछे - 3

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पर्दे के पीछे - 3

सब औरतों की हँसी-मज़ाक चल रही थी।
किसी के नए सूट की बात…
किसी के मायके जाने की तैयारी…
किसी के भजन मंडली की चर्चा…
सब कुछ सामान्य था।
हल्का… आसान… बेफिक्र।
लेकिन शायद उनमें से किसी ने भी कभी सच में महसूस नहीं किया —
वो अहसास…
जो इस देश में बरसों से एक दूसरे समाज के लोग हर दिन महसूस करते आए हैं।
हर रोज़।
हर जगह।
जहाँ वे काम करते हैं…
जिनके लिए काम करते हैं…
वहीं कहीं न कहीं “ऊँच-नीच” का एक शब्द…
एक इशारा…
एक नजर…
अनजाने में ही सही…
फिसल ही जाता है।
कई बार भेदभाव चीखता नहीं…
बस धीरे से बोलता है।
और सुनने वाला…
चुप रह जाता है।हम सबको लगता है कि समय के साथ सारी ऊँच-नीच खत्म हो गई है।
हम कहते हैं — “अब जमाना बदल गया है।”
हम कानून गिनाते हैं…
उदाहरण देते हैं…
और खुद को समझा लेते हैं कि सब ठीक हो चुका है।
लेकिन सच शायद इतना सीधा नहीं है।
कहीं न कहीं…
हमारे भीतर अब भी वही गांठें बंधी हैं…
जो पाँच सौ साल पहले थीं।
नाम बदल गए हैं…
तरीके बदल गए हैं…
बोलने का ढंग बदल गया है…
पर सोच की कुछ दीवारें अब भी वैसी ही खड़ी हैं।
पहले भेदभाव खुले शब्दों में होता था…
अब कई बार मुस्कुराहट के पीछे छिप जाता है।
समय आगे बढ़ गया है…
पर क्या मन भी उतना ही आगे बढ़ पाया है?औरतों की बातों में अक्सर ये विषय नहीं आते।
न बराबरी की चर्चा…
न समाज बदलने की चिंता…
तो कभी मन में सवाल उठता है —
क्या समाज बदलने का ठेका सिर्फ पुरुषों ने ले रखा है?
या औरतें खुद ये बदलाव नहीं चाहतीं?
या फिर…
उन्हें इन बातों से फर्क ही नहीं पड़ता?
या शायद वजह कुछ और है।
शायद सदियों से उन्हें चार दीवारों के भीतर ही सीमित कर दिया गया…
जहाँ उनकी दुनिया रसोई, बच्चे, रिश्ते और रोज़मर्रा की जिम्मेदारियों तक सिमट गई।
जहाँ बड़े सवाल पूछने की आदत ही विकसित नहीं होने दी गई।
या फिर…
हो सकता है कि वे सब समझती हों —
लेकिन बोलना नहीं चुनतीं।
क्योंकि बोलना…
कई बार सबसे बड़ा संघर्ष बन जाता है।
शायद सच ये नहीं कि उन्हें फर्क नहीं पड़ता…
बल्कि ये है कि
फर्क पड़ने की इजाज़त हमेशा नहीं दी गई।औरतों को सजने-संवरने का काम दे दिया गया है…
या शायद उन्होंने ही उसे अपनी पहचान बना लिया है।
वे अपने पति का खयाल रखती हैं,
बच्चों का पालन-पोषण करती हैं,
सास-ससुर की सेवा करती हैं।
घर की धुरी बनकर घूमती रहती हैं।
लेकिन क्या यही उनकी पूरी दुनिया है?
क्या समाज बदलने में उनकी कोई भागीदारी नहीं?
क्या बदलाव की जिम्मेदारी सिर्फ बाहर खड़े लोगों की है?
या फिर…
उन्हें कभी ये बताया ही नहीं गया कि उनकी आवाज़ भी मायने रखती है।
शायद सदियों से वे दूसरों की उम्मीदों के मुताबिक जीती आई हैं —
किसी की बेटी बनकर…
किसी की पत्नी बनकर…
किसी की बहू बनकर…
पर क्या कभी उन्होंने खुद से पूछा —
“मैं कौन हूँ?”
क्या कभी उन्हें मौका मिला ये समझने का
कि वे अपनी ज़िंदगी जी रही हैं…
या किसी और के बनाए ढांचे को निभा रही हैं?
समाज को बदलने के लिए सिर्फ कानून नहीं,
सोच चाहिए।
और सोच तब बदलेगी
जब घर के भीतर बैठी औरत भी खुद को सिर्फ जिम्मेदारी नहीं,
बल्कि बदलाव की ताकत समझेगी।शाम हो चुकी थी।
सूरज ढलने लगा था और गलियों में बच्चों के स्कूल से लौटने की आहट सुनाई देने लगी थी।
मोहल्ले की औरतों की बैठकी भी अब खत्म होने लगी।
बातों का सिलसिला धीरे-धीरे थम गया।
किसी ने दुपट्टा सँवारा,
किसी ने चप्पल ठीक की,
किसी ने जल्दी से याद किया कि रसोई में दाल चढ़ानी है।
और फिर सब अपनी-अपनी बातों को आधा छोड़कर,
अपने-अपने घरों की ओर लौट चलीं।
कुछ देर पहले तक जो आँगन हँसी से भरा था,
अब वहाँ सन्नाटा उतरने लगा।
लेकिन जैसे हर दिन होता है —
बातें खत्म हो जाती हैं,
सोचें नहीं।
हर औरत अपने घर में लौट गई,
पर दिन भर की बातें,
और अनकहे सवाल,
कहीं न कहीं मन में साथ ही चले गए।कभी-कभी हम हँसी-मज़ाक में अपने दोस्तों से कह देते हैं —
“अरे, औरतें करती ही क्या हैं?
पूरा दिन घर में आराम से रहती हैं।”
लेकिन क्या हमने कभी सच में बैठकर सोचा है?
वो माँ…
जो अपना घर छोड़कर आई थी।
आज उसे इस घर में आए चालीस साल हो गए।
जब कभी वह अपने मायके जाने की बात करती है,
तो हम कह देते हैं —
“अभी नहीं माँ… कुछ दिन बाद चली जाना।”
क्या उन्हें अपने माँ-बाप की याद नहीं आती होगी?
क्या उन्हें अपने भाई-बहनों की कमी महसूस नहीं होती होगी?
क्या उन्हें अपना बचपन याद नहीं आता होगा?
क्या उन्होंने भी कभी खेल खेले होंगे?
क्या वे भी कभी खुलकर हँसी होंगी?
क्या वे भी कभी अपने बीते दिनों में लौट जाना चाहती होंगी…
जैसे हम लौट जाना चाहते हैं?
चालीस साल से एक ही घर में…
रोज़ सुबह चार बजे उठना…
रोज़ वही काम… वही रसोई… वही जिम्मेदारियाँ…
क्या वे कभी थकी नहीं होंगी?
क्या उन्होंने कभी कहा होगा —
“आज मुझे छुट्टी चाहिए…”
“आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है…”
“आज मैं काम नहीं करूँगी…”
या फिर…
उन्होंने खुद को ही चुप करा दिया होगा।
एक औरत अक्सर अपनी पूरी ज़िंदगी
दूसरों के जीवन को संवारने में लगा देती है।
और धीरे-धीरे…
खुद की इच्छाएँ पीछे छूट जाती हैं।
कभी-कभी मैं सोचती हूँ —
काश मेरी माँ भी वैसे जी पातीं
जैसे आज मैं जी पा रही हूँ।
जैसे आज उन्होंने मुझे खुला छोड़ रखा है…
शायद इसलिए
क्योंकि वे चाहती हैं
कि जो जीवन उन्होंने चूल्हे-चौके में गुज़ार दिया,
वही जीवन उनकी बेटी न दोहराए।
अगर हम कभी जीवन में सफल हों…
तो माँ के उस मौन समर्पण को भूलें नहीं।
उन्हें भी अपने साथ लेकर चलें।
कभी उन्हें भी घुमाएँ।
कभी उन्हें भी वो सब दें
जो उनके मन में था…
लेकिन जो वे कभी कह न पाईं।शायद इसी वजह से औरतों ने खुद को समाज से अलग कर लिया है।
जब वे अपने ही हक़ के लिए आवाज़ नहीं उठा पाईं, तो किसी और के लिए कैसे उठातीं?
सदियों से उन्होंने समझौते सीखे, सवाल नहीं।
उन्हें बताया गया कि मर्यादा चुप रहने में है, त्याग करने में है, सहने में है।
पर क्या सच में यही उनका धर्म था?
क्या ऊँच-नीच की दीवारें सिर्फ पुरुषों ने खड़ी की थीं, या औरतों ने भी चुप रहकर उन्हें मजबूत किया?
अगर वे खुद अपनी सीमाओं को नहीं तोड़ेंगी, तो भेदभाव की जंजीरें कौन तोड़ेगा?
शायद बदलाव बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होता है।
और जिस दिन औरत अपने अस्तित्व को पहचान लेगी,
उसी दिन समाज की तस्वीर भी बदलने लगेगी।मिश्राइन घर पहुँची तो बच्चियाँ भी स्कूल से लौट चुकी थीं।
आँगन में उनके बस्ते एक कोने में रखे थे और दोनों जल्दी-जल्दी कपड़े बदल रही थीं।
दिनभर की थकान उनके चेहरों पर थी, पर आँखों में अब भी मासूम चमक बाकी थी।
उन्होंने हाथ-मुँह धोना शुरू किया और आपस में स्कूल की बातें करने लगीं —
किसने क्या कहा, किसकी कॉपी टीचर ने सराही, किसे डाँट पड़ी।
मिश्राइन बिना कुछ बोले रसोई में चली गई।
चूल्हा जलाया, आटा निकाला, सब्ज़ी काटने बैठ गई।
शाम का खाना बनाना जैसे उसके दिन का अनिवार्य अध्याय था —
जिसे बिना सवाल, बिना शिकायत हर रोज़ पूरा करना ही था।
रसोई की आँच में उसका चेहरा चमक रहा था,
पर मन में दिन की अधूरी बातों की राख अब भी दबी हुई थी।दोनों बच्चियाँ टीवी देखने लगीं और माँ रसोई में खड़ी चुपचाप खाना बना रही थी।
घर में टीवी की आवाज़ गूँज रही थी, बर्तनों की खनखनाहट उसके साथ मिलकर एक अजीब-सी लय बना रही थी।
दिन ढल रहा था —
जैसे सुबह से शाम तक सूरज ने भी बहुत काम कर लिया हो।
अब वह और देर तक आकाश में ठहर नहीं सकता था।
थककर, धीरे-धीरे, उसे भी लौट जाना था।
आसमान का रंग हल्का सुनहरा होकर धुंधलाने लगा था,
और उसी तरह मिश्राइन की आँखों की चमक भी दिनभर की थकान में धुँधली पड़ती जा रही थी।
सूरज रोज़ ढलता है,
पर क्या हर दिन कुछ सपने भी उसके साथ ढल जाते हैं?