1: मुलाकात और शुरुआत (प्रेम नगर की वो धूल भरी शाम)
लखनऊ की गर्मियों में हवा भी पसीना बहाती है। प्रेम नगर का वो पुराना पुस्तकालय — लकड़ी की सीढ़ियाँ चरमराती थीं, पंखे की आवाज़ में धूल उड़ती थी, और किताबों की महक पुरानी यादों जैसी लगती थी। मैं वहाँ रोज़ आता था। नहीं इसलिए कि पढ़ाई करनी थी, बल्कि इसलिए कि घर में माँ-बाप की लड़ाई से बचना था।
मेरा नाम आरव शर्मा। 26 साल। सॉफ्टवेयर कंपनी में जूनियर डेवलपर। सैलरी 38 हज़ार। किराए का एक कमरा हजरतगंज के पास। माँ गाँव में रहती हैं, पापा शहर में मजदूरी करते थे पर अब बीमार हैं। मैं अकेला कमाता हूँ, अकेला जीता हूँ।
उस दिन मैंने एक पुरानी किताब उठाई — “गुनाहों का देवता”। पन्ने पीले पड़ चुके थे। मैंने पढ़ना शुरू किया। तभी एक आवाज़ आई —
“ये किताब में आखिरी पेज गायब है।”
मैंने ऊपर देखा। वो खड़ी थी। हल्के गुलाबी कुर्ते में। बाल खुले, आँखें बड़ी-बड़ी। चेहरा ऐसा जैसे किसी पुरानी फिल्म की हीरोइन हो।
मैंने मुस्कुराकर कहा, “तो क्या हुआ? आखिरी पेज तो जिंदगी में भी कोई नहीं देख पाता।”
वो हँसी। हल्की, शर्मीली हँसी। “शायद इसलिए जिंदगी अधूरी लगती है।”
उसका नाम नैना था। नैना सिंह। 24 साल। उसके पापा रिटायर्ड मेजर थे। घर बड़ा था, गोमती नगर में। वो MA फाइनल की स्टूडेंट थी। हिंदी लिटरेचर।
हमारी बात शुरू हुई किताबों से। फिर चाय पर। फिर रोज़ मिलना।
पहली बार गोमती किनारे गए थे हम। शाम ढल रही थी। वो बोली,
“आरव, तुम्हें पता है बारिश क्यों अच्छी लगती है?”
“क्यों?”
“क्योंकि वो सब कुछ धो देती है। ग़म भी, यादें भी।”
मैंने कहा, “पर कुछ यादें धुलती नहीं।”
वो चुप हो गई। फिर बोली, “शायद वो यादें धुलनी नहीं चाहिए।”
उस दिन मैंने पहली बार उसका हाथ पकड़ा। वो नहीं छुड़ाया।
### भाग 2: प्यार का वो साल (जो कभी खत्म नहीं होना चाहिए था)
हम रोज़ मिलते। कभी चारबाग की टपरी पर अदरक वाली चाय। कभी हजरतगंज के पुराने बाज़ार में। वो मुझे पुरानी फिल्में दिखाती। “प्यासा”, “कागज़ के फूल”, “साहिब बीवी और गुलाम”।
एक रात हम उसके घर के पास वाली गली में खड़े थे। वो बोली,
“आरव, मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ। लेकिन डर भी लगता है।”
“किस बात का?”
“पापा बहुत सख्त हैं। वो कहते हैं कि शादी में पैसा, स्टेटस, जाति सब देखना पड़ता है।”
मैंने कहा, “मैं तुम्हें खुश रखूँगा। बस इतना वादा है।”
वो रो पड़ी। “तुम्हें पता है मैं कितनी कमज़ोर हूँ?”
मैंने उसे गले लगाया। पहली बार। उसकी साँसें मेरे कंधे पर गर्म थीं।
हमने बहुत सारे वादे किए।
- मैं उसे हर रविवार गोमती किनारे ले जाऊँगा।
- वो मुझे हर महीने एक नया गाना सुनाएगी।
- हम कभी अलग नहीं होंगे।
एक दिन उसने मुझे एक डायरी दी।
“ये मेरी है। इसमें सब लिखा है। तुम्हारे बारे में। पढ़ना मत अभी। जब मैं दूर हो जाऊँगी, तब पढ़ना।”
मैंने हँसकर कहा, “दूर कब हो रही हो?”
वो चुप रही।
### भाग 3: टूटने की शुरुआत (जब घरवालों को पता चला)
एक शाम नैना का फोन आया। आवाज़ काँप रही थी।
“आरव… पापा को पता चल गया।”
मेरा दिल धड़कना भूल गया। “कैसे?”
“मेरी फ्रेंड ने बता दिया। अब घर में हंगामा है।”
मैंने कहा, “मैं आता हूँ।”
“नहीं! मत आना। पापा बंदूक निकालकर बैठे हैं।”
मैं रुक गया। रात भर नींद नहीं आई।
अगले दिन मैं गया। उनके घर के बाहर खड़ा रहा। नैना बाहर आई। आँखें सूजी हुईं।
“आरव, पापा कह रहे हैं कि अगर मैं तुमसे मिली तो घर से निकाल देंगे।”
मैंने कहा, “मैं तुम्हारे पापा से बात कर लूँगा।”
वो रो पड़ी। “वे नहीं मानेंगे।”
फिर भी मैं गया। शाम को। घुटनों पर।
“अंकल, मैं नैना से शादी करना चाहता हूँ।”
मेजर सिंह ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा।
“तुम्हारी फैमिली क्या करती है?”
“पापा मजदूर थे। अब बीमार हैं। माँ गाँव में।”
“तुम्हारी सैलरी?”
“38 हजार।”
उन्होंने ठंडी हँसी हँसी। “मेरी बेटी को राजकुमारी की तरह रखना है। तुम क्या दोगे? किराए का कमरा?”
मैं चुप रहा।
“जा बेटा। ये घर तुम्हारे लिए नहीं है।”
मैं बाहर आया। नैना गेट के पास खड़ी थी। रो रही थी।
“आरव… मैं क्या करूँ?”
मैंने कहा, “तुम बस मुझ पर भरोसा रखो। मैं कुछ कर लूँगा।”
पर मैं कुछ नहीं कर पाया।
### भाग 4: बीमारी का राज़ (जो वो छुपाए रही)
शादी की बात चलने लगी। नैना कम मिलने लगी। फोन पर भी कम बात।
एक दिन वो आई। बहुत पतली हो गई थी। चेहरा पीला।
“आरव… मुझे कुछ बताना है।”
मैं घबरा गया। “क्या हुआ?”
वो रोने लगी। “मुझे… ल्यूकेमिया है।”
दुनिया रुक गई।
“कब से?”
“7 महीने से। कीमो चल रही है। डॉक्टर कहते हैं… 1 से 1.5 साल।”
मैं रो पड़ा। “तुमने बताया क्यों नहीं?”
“क्योंकि तुम टूट जाते। और मैं नहीं चाहती थी कि तुम मेरे लिए अपनी जिंदगी बर्बाद करो।”
मैंने उसे गले लगाया। “मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। हर कीमो सेशन में। हर दर्द में।”
वो बोली, “नहीं। मैं चाहती हूँ कि तुम जियो। मेरे लिए जियो।”
उसके बाद मैं रोज़ अस्पताल जाता। छुप-छुपकर। वो मुझे देखकर मुस्कुराती। पर आँखों में दर्द होता।
एक दिन कीमो के बाद वो बहुत कमज़ोर थी। मैंने उसका हाथ पकड़ा।
“नैना… शादी मत करना। मेरे साथ रहो।”
वो बोली, “पापा को लगा कि शादी के बाद मैं ठीक हो जाऊँगी। वो लड़का… वो अच्छा है। अमीर है। वो मेरा इलाज करवा सकता है।”
मैं चुप हो गया।
### भाग 5: वो आखिरी मुलाकात (बारिश वाली रात)
शादी से 10 दिन पहले।
नैना ने मैसेज किया —
“कल आखिरी बार। गोमती किनारे। रात 10 बजे।”
बारिश हो रही थी। तेज़। मैं भीगा हुआ पहुँचा। वो पहले से खड़ी थी। काले सूट में। बाल भीगे।
वो बोली, “आरव… मैं शादी कर रही हूँ।”
मैंने कहा, “मुझे पता है।”
“मैं तुम्हें भूलना चाहती थी। पर नहीं भूल पाई।”
मैंने उसे गले लगाया। बारिश में। वो रो रही थी। मैं भी।
फिर उसने एक लिफाफा दिया।
“ये पढ़ना। मेरी मौत के बाद।”
मैंने कहा, “तुम नहीं मरोगी।”
वो मुस्कुराई। “सब मरते हैं आरव। बस वक्त अलग है।”
हम घंटों खड़े रहे। बारिश रुकी नहीं। वो मेरे सीने पर सिर रखकर रोती रही।
“आरव… मुझे माफ करना। मैं तुम्हें दुख दे रही हूँ।”
मैंने कहा, “तुमने मुझे जिंदगी दी है। दुख क्या है?”
### भाग 6: शादी और अंतिम दिन
शादी हुई। मैं नहीं गया। घर में बैठा रहा। दीवार से सिर पटकता रहा।
2 महीने बाद फोन आया।
“आरव… नैना… ICU में।”
मैं भागा। अस्पताल। वो बिस्तर पर। ट्यूब्स। आँखें बंद।
मैंने हाथ पकड़ा। वो आँख खोली।
“तुम आ गए…”
मैं रोया। “हमेशा आऊँगा।”
उसने धीरे कहा, “लेटर पढ़ लिया?”
“नहीं।”
“अब पढ़ लो।”
मैंने पढ़ा।
**आरव,**
**अगर तुम ये पढ़ रहे हो तो मैं जा चुकी हूँ।**
**मैंने तुमसे बहुत प्यार किया। इतना कि कभी किसी और से नहीं कर सकती थी। वो शादी… वो सिर्फ पापा की खुशी के लिए थी। मेरे दिल में सिर्फ तुम थे।**
**मुझे माफ करना कि मैंने बीमारी छुपाई। मैं नहीं चाहती थी कि तुम मेरी मौत देखकर खुद को मार डालो।**
**अब जाओ। जिंदगी जियो। किसी से प्यार करना। हँसना। बारिश में भीगना। और जब उदास हो, मुझे याद करना। पर रोना मत। क्योंकि मैं जहाँ हूँ, वहाँ से देख रही हूँ। और मुस्कुराना चाहती हूँ।**
**तुम्हारा हमेशा,**
**नैना**
उस रात 4:17 पर वो चली गई।
अंतिम संस्कार हुआ। मैं दूर से देखता रहा। उसके पापा रो रहे थे। शायद उन्हें अब समझ आया कि बेटी ने क्या खोया।
### भाग 7: आज (3 साल बाद)
आज भी मैं गोमती किनारे जाता हूँ। बारिश होती है तो भीगता हूँ।
कभी-कभी लगता है वो पास है। हवा में। बूँदों में। उस पुराने पुस्तकालय की किताबों में।
मैं उससे बात करता हूँ।
“नैना… मैं जी रहा हूँ। तुम्हारे लिए।”
पर दिल अभी भी अधूरा है।
क्योंकि प्यार कभी पूरा नहीं होता। वो हमेशा अधूरा रहता है। और शायद यही उसकी सच्ची खूबसूरती है।
**समाप्त**
कैसी लगी? ❤️🩹