कितनी भी व्यस्तता हो, चाहे सांस लेने की फूरसत भी न मिले, मगर थोड़ी सी मानसिक फुरसत मिलने पर भला किसका मन एकबारगी अपने बचपन को याद करने में नहीं जाता होगा। और तब जब बचपन को कोई साथी मिल जाए।
अचानक से जब हरला का ध्यान ओम पर गया तो, हरला के मन-मस्तिष्क में खुशी का संचार हुआ और जिसकी पुष्टि उसकी चमकती हुयी आँखों ने की। ऐसा बिल्कूल नहीं था कि दोनों एक साथ खेले-कुदे थे, और एक साथ ही रहे थे। दोनों में जान-पहचान इतनी ही थी कि दोनों एक अगल-बगल गाँव के ही थे, एक था भोगनिया गाँव का और एक था जोगनिया गाँच का।
हरला ओम को देखकर अपने बचपन की यादों में ऐसा खोया कि दो ग्राहकों ने मीठायी का दाम पुछा और बिना जवाब सुने ही वहाँ से चल दिए।
एक ग्राहक ने हरला को झकझोर कर कहा ’’ अरे भाई, तुम्हार ध्यान कहाँ है, कब से दाम पुछ रहे हैं, दो आदमी तो पुछ-पुछ कर थक गया और यहाँ से चला गया।
हरला ने अपने मालिक को इशारे से कहा ’’ अभी आया। ’’ तो मालिक ने इशारे में सिर हिलाकर हामी भरी। हरला भला जाता कहाँ, ओम का हाथ पकड़ा और होटल की बिठा लिया। ओम आश्चर्य से हरला की तरफ देख रहा था। हरला ने दो मीठायी और समोसा का का आर्डर देकर ओम से पुछा ’’ अँखिया फाड़-फाड़ कर का देख रहे हो, पहचाना नहीं का, अरे हम हरला हैं, जोगनिया गाँव का। ’’
आश्चर्य बरसाती ओम की आँखें अब समान्य हुयी तो हरला की खुशी और बढ़ी।
ओम ने कहा ’’ भाई इ सब खिलान-पीलान करने की का जरूरत थी। मालिक तुम्हारे तन्ख्वाह में से काटेगा। ’’
हरला ने एक जोरदार ठहाका लगाया और कहा ’’ ये सब चिन्ता मत करो, बचपन का यार मिला है, तुमको ऐसे ही जाने देता?’’
दोनों दोस्तों में खुब गप्प हुयी। गप्प का सिलसिला ऐसा चला जो आजकल से से लेकर बिते हुए कल तक गयी। ढे़रों यादें ताजा हुयी, कुछ सुख के पल और कुछ उदासी के पल, दोनों एक-दुसरे से बात तो हंस कर कर रहे थे मगर अब दोनों के मन में एक-एक करके यह प्रश्न उठने लगा कि इसको कैसे मालूम और मालूम भी है तो उतना पुराना बात याद कैसे है इसको।
अँगूली में लगे रसगुल्ले के रस को चाटते हुए ओम ने कहा ’’ बचपन में जो तुमने मेरे गाँव केे जोखना को मारा था और सिर फोड़ दिया था, उस बात को अब तक भी भूला नहीं मैं। ’’
हरला मन ही मन सोचने लगा कि कितनी कड़वाहट भरी हुयी है इसके मन में जो अभी मीठायी खाने के बाद भी कम नहीं हुई।
ओम तो खाकर जा चुका है मगर हरला अभी भी वहीं बैठा कभी जुठा प्लेट की तरफ तो कभी मीठायी के दाम पर ध्यान ले जा रहा था।
पीछे पीठ दिखा कर खड़े आदमी को पहचानना हरला को काफी भारी पड़ा था। बचपन की यादों की हंसी-मस्ती अब कड़वाहट में तब्दिल हो उठी। हरला को एहसास हो उठा कि उसकी मीठायी सी मुस्कान सिर्फ मीठायी खाने के वास्ते ही थी। मैं अपने बगल के गाँव की सोचकर ही खुश हो गया और वो शहर में अपने गाँव वाला से मिलकर भी खुश नहीं हुआ।
मालिक ने आवाज़ लगायी ’’ मेहमाननबाजी खत्म हो गयी हो तो काम पर लौट आओ। ’’
हरला ने महसूस किया कि मालिक का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ है।
समाप्त