भाग 1
बारिश की हल्की बूंदें खिड़की पर गिर रही थीं, और कमरे में फैली ठंडी हवा के साथ सना के दिल में भी एक अजीब-सी ठंडक उतरती जा रही थी। हाथ में पकड़ा हुआ पुराना खत, जिसकी स्याही अब हल्की पड़ चुकी थी, फिर भी उसके दिल के जख्म ताज़ा कर देता था।
वो खत रेहान का था।
सना ने धीरे से आंखें बंद कर लीं। यादों के दरवाज़े फिर खुल गए…
दो साल पहले…
दिल्ली यूनिवर्सिटी का पहला दिन। नए चेहरे, नई दोस्तियाँ, नई उम्मीदें। सना अपनी किताबें सीने से लगाए कॉलेज के गेट से अंदर जा रही थी कि अचानक किसी से टकरा गई।
उसके हाथ से किताबें गिर पड़ीं।
“सॉरी! मैंने देखा नहीं,” सामने खड़ा लड़का झुककर किताबें उठाने लगा।
सना ने ऊपर देखा। लंबा कद, हल्की दाढ़ी, और आंखों में एक अजीब-सी शरारत।
“कोई बात नहीं,” उसने धीमे से कहा।
लड़के ने मुस्कुराकर किताबें देते हुए कहा, “पहला दिन है ना? टेंशन मत लो। सब ठीक हो जाएगा।”
“तुम्हें कैसे पता?” सना ने पूछा।
“क्योंकि सबके चेहरे पर वही डर दिखता है जो अभी तुम्हारे चेहरे पर है,” उसने हंसते हुए जवाब दिया।
“वैसे, मैं रेहान।”
“सना।”
बस, इतनी-सी मुलाकात थी। दोनों अपने रास्ते चले गए। पर किसे पता था कि यही मुलाकात उनकी ज़िंदगी बदल देगी।
कुछ दिनों बाद, लाइब्रेरी में सना नोट्स बना रही थी कि सामने वही चेहरा दिखा।
“फिर मिल गए,” रेहान ने कुर्सी खींचते हुए कहा।
धीरे-धीरे लाइब्रेरी की मुलाकातें कैंटीन की चाय तक पहुंचीं, और चाय से लंबी बातचीत तक।
रेहान बेहद अलग था। वह मज़ाकिया था, बेफिक्र था, और सबसे बड़ी बात — वह सना को समझता था।
सना एक साधारण परिवार की लड़की थी। उसके लिए पढ़ाई और घर की जिम्मेदारियाँ ही सब कुछ थीं। दोस्त कम थे, और वह अपने दिल की बातें किसी से जल्दी नहीं कहती थी।
पर रेहान के सामने जाने क्यों वह खुद को छुपा नहीं पाती थी।
एक शाम, दोनों कॉलेज की छत पर बैठे थे।
“तुम हमेशा इतनी चुप क्यों रहती हो?” रेहान ने पूछा।
सना ने आसमान की ओर देखते हुए कहा, “क्योंकि हर किसी के पास सुनने का वक्त नहीं होता।”
रेहान मुस्कुराया, “मेरे पास है।”
उस दिन पहली बार सना ने अपने सपनों के बारे में बताया। अपने डर, अपने घर की परेशानियाँ, अपनी जिम्मेदारियाँ।
रेहान बस सुनता रहा।
और उस दिन के बाद, सना को महसूस हुआ — उसे कोई मिल गया है जो सच में उसे समझता है।
समय गुजरता गया। दोस्ती गहरी होती गई।
रेहान हमेशा सना का ख्याल रखता। बारिश में भीगने से बचाता, परीक्षा के समय नोट्स बनवाता, उदास होने पर हंसाने की कोशिश करता।
एक दिन सना बीमार पड़ गई।
अगले दिन हॉस्टल के बाहर कोई उसका नाम पुकार रहा था।
वह बाहर आई तो देखा, रेहान खड़ा था। हाथ में सूप और दवाइयाँ।
“तुम यहाँ?” सना हैरान थी।
“दो दिन से कॉलेज नहीं आई। लगा देखने आ जाऊं।”
सना का दिल पहली बार तेज़ धड़कने लगा।
उस रात वह सो नहीं सकी।
उसे एहसास हो चुका था — वह रेहान से प्यार करने लगी है।
लेकिन सना ने कभी अपने दिल की बात नहीं कही।
उसे डर था। अगर दोस्ती भी खो गई तो?
दूसरी तरफ, रेहान भी कुछ बदलने लगा था। अब वह अक्सर सना को चुपचाप देखता रहता।
एक दिन उसने अचानक पूछा, “अगर कोई तुमसे प्यार करे तो?”
सना चौंक गई। “तो?”
“तो क्या करोगी?”
सना ने दिल थामकर कहा, “अगर वो सच्चा हो… तो शायद हाँ कह दूं।”
रेहान कुछ पल उसे देखता रहा, फिर मुस्कुराकर बोला, “अच्छा है।”
सना पूरे रास्ते सोचती रही — क्या रेहान भी उससे…?
लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था।
कुछ दिनों बाद कॉलेज में खबर फैल गई कि रेहान विदेश जा रहा है। उसे अपने पिता का बिज़नेस संभालने के लिए लंदन जाना था।
सना को यह बात दूसरों से पता चली।
उसका दिल टूट गया।
उसने रेहान को ढूंढा।
“तुम जा रहे हो?” उसने कांपती आवाज़ में पूछा।
रेहान ने नजरें झुका लीं। “हाँ… अचानक फैसला हुआ।”
“मुझे बताया भी नहीं?”
“बताता… तो मुश्किल हो जाता।”
“किसके लिए?” सना की आंखों में आंसू थे।
रेहान ने बस इतना कहा, “सबके लिए।”
सना चाहती थी कि वह उसे रोक ले। कह दे कि वह उससे प्यार करती है।
पर शब्द उसके होंठों तक आकर रुक गए।
रेहान के जाने का दिन आ गया।
एयरपोर्ट पर भीड़ थी। सना दूर खड़ी उसे देख रही थी।
रेहान उसकी तरफ आया।
“अपना ख्याल रखना,” उसने कहा।
सना बस उसे देखती रह गई।
कुछ पल बाद रेहान ने जेब से एक लिफाफा निकालकर उसके हाथ में रख दिया।
“जब मैं चला जाऊं… तब पढ़ना।”
और वह चला गया।
सना की दुनिया वहीं ठहर गई।
कमरे में लौटकर सना ने वह खत खोला।
उसमें लिखा था —
"सना,
मैं नहीं जानता कि तुम मेरे बारे में क्या सोचती हो। लेकिन मैं तुम्हें दोस्त से ज्यादा मानने लगा था। अगर रुक जाता, तो शायद कभी जा नहीं पाता।
मुझे जाना जरूरी है। शायद कभी लौटूं… शायद नहीं।
अगर किस्मत ने चाहा, तो हम फिर मिलेंगे।
— रेहान”
खत पढ़ते-पढ़ते सना की आंखें भीग गईं।
उसने भी अपने दिल की बात कभी नहीं कही।
और उनकी मोहब्बत… अधूरी रह गई।
वर्तमान में…
बारिश रुक चुकी थी।
सना ने खत मोड़ा और अलमारी में रख दिया।
उसे लगा था कि वह सब भूल चुकी है।
लेकिन तभी उसका फोन बजा।
अनजान नंबर।
उसने कॉल उठाई।
“हेलो?”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर एक आवाज़ आई —
“सना… मैं रेहान बोल रहा हूँ। मैं वापस आ गया हूँ।”
सना का दिल जोर से धड़क उठा।
दो साल बाद…
और कहानी अब शुरू होने वाली थी।
भाग 1 समाप्त