भाग 1
शाम ढल रही थी। आसमान में हल्की सुनहरी रोशनी फैली हुई थी, जैसे दिन रात को विदा करते हुए मुस्कुरा रहा हो। शहर की भीड़भाड़ के बीच एक लड़की तेज़ कदमों से बस स्टॉप की ओर बढ़ रही थी। उसके हाथ में किताबें थीं, बाल हल्की हवा में उड़ रहे थे, और चेहरे पर थकान के बावजूद एक सुकून भरी मुस्कान थी।
उसका नाम था चांदनी।
नाम जैसा ही उसका स्वभाव भी शांत और कोमल था। साधारण परिवार की, साधारण सी लड़की, लेकिन उसके सपने बिल्कुल साधारण नहीं थे। वह पढ़-लिखकर अपने परिवार की हालत बदलना चाहती थी।
उसके पिता की छोटी सी किताबों की दुकान थी। आमदनी कम थी, मगर इमानदारी और मेहनत बहुत थी। चांदनी अपनी पढ़ाई के साथ दुकान पर भी मदद करती थी।
उधर शहर के दूसरी तरफ, एक बड़ी कार ट्रैफिक में धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। अंदर बैठा था आरव मल्होत्रा — शहर के बड़े उद्योगपति का बेटा।
महंगी कार, महंगे कपड़े, लेकिन चेहरे पर कोई खुशी नहीं। जैसे सब कुछ होने के बावजूद कुछ कमी हो।
उसकी माँ की मौत के बाद घर में केवल सन्नाटा रह गया था। पिता बिजनेस में व्यस्त, और आरव अपने ही अकेलेपन में खो गया था।
उस शाम, किस्मत ने दोनों की दुनिया टकराने का फैसला कर लिया।
बस स्टॉप पर भीड़ थी। अचानक धक्का लगा और चांदनी के हाथ से किताबें गिर गईं। कागज़ और नोट्स सड़क पर बिखर गए।
वह झुककर उन्हें समेटने लगी, तभी एक कार उसके बिल्कुल पास आकर रुकी। ब्रेक की तेज आवाज़ ने उसे डरा दिया।
ड्राइवर गुस्से में उतरने ही वाला था कि पीछे बैठे आरव ने उसे रोक दिया।
आरव खुद कार से उतरा। उसकी नजर ज़मीन पर गिरी किताबों पर गई, और फिर चांदनी पर टिक गई।
एक पल के लिए समय जैसे रुक गया।
लड़की के चेहरे पर घबराहट थी, पर आँखों में अजीब सी मासूमियत।
आरव बिना कुछ बोले झुक गया और किताबें उठाने लगा।
चांदनी चौंक गई।
"मैं कर लूँगी…," उसने धीरे से कहा।
आरव ने हल्की मुस्कान दी, "सड़क के बीच खड़े होकर किताबें उठाओगी तो फिर से गिरेंगी।"
दोनों की उंगलियाँ एक ही किताब उठाते हुए टकराईं।
चांदनी ने झट से हाथ पीछे खींच लिया।
दिल की धड़कन तेज हो गई।
किताबें देकर आरव कार में बैठ गया। कार आगे बढ़ गई, लेकिन उसकी नज़र रियर व्यू मिरर में उसी लड़की को ढूंढती रही।
उधर चांदनी भी कुछ पल तक वहीं खड़ी रही।
जाने क्यों, उस अजनबी की मुस्कान उसके मन में रह गई।
अगले दिन, चांदनी दुकान पर बैठी थी। दुकान शांत थी। वह अपने नोट्स बना रही थी।
तभी दरवाज़े पर घंटी बजी।
उसने सिर उठाया।
दरवाज़े पर वही लड़का खड़ा था।
वही शांत मुस्कान।
वही आँखें।
चांदनी के हाथ से पेन गिर गया।
"आप…?" उसके मुंह से निकल गया।
आरव हल्का सा मुस्कुराया, "किताब खरीदने आया हूँ। या यहाँ आने के लिए किसी खास वजह की जरूरत है?"
चांदनी कुछ बोल नहीं पाई।
वह अंदर आया, किताबें देखने लगा।
"कौन सी किताब चाहिए?" उसने खुद को संभालते हुए पूछा।
आरव ने इधर-उधर देखा, फिर बोला, "कोई ऐसी किताब… जो अकेलेपन को थोड़ा कम कर दे।"
चांदनी ने पहली बार उसकी आँखों में गौर से देखा।
वहाँ सचमुच अकेलापन था।
उसने एक उपन्यास उठाया और उसकी ओर बढ़ाया।
"ये पढ़िए… कहानी है, लेकिन दिल को छू जाती है।"
आरव ने किताब ली।
"धन्यवाद… चांदनी।"
वह चौंक गई। "आपको मेरा नाम कैसे पता?"
आरव ने मुस्कुराकर काउंटर पर रखे नेम कार्ड की ओर इशारा किया।
दोनों हल्का सा हँस पड़े।
वह पैसे देकर जाने लगा, फिर रुका।
"कल कॉफी?"
चांदनी एकदम चुप हो गई।
उसने पहले कभी किसी लड़के के साथ बाहर जाने के बारे में सोचा भी नहीं था।
"मैं… नहीं जा सकती।"
आरव ने सिर हिलाया। "ठीक है। फिर कभी।"
और वह चला गया।
लेकिन जाने क्यों, उसके जाने के बाद दुकान खाली लगने लगी।
उस रात चांदनी देर तक सो नहीं पाई।
बार-बार वही मुस्कान, वही आँखें याद आ रही थीं।
उधर आरव भी अपनी बालकनी में बैठा शहर की लाइट्स देख रहा था।
उसके चेहरे पर महीनों बाद सुकून था।
जैसे जिंदगी ने अचानक कोई नई वजह दे दी हो।
लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनकी कहानी इतनी आसान नहीं होगी।
क्योंकि आरव के पिता ने उसके लिए पहले से एक बिजनेस पार्टनर की बेटी के साथ शादी तय कर रखी थी।
और चांदनी की जिंदगी में भी एक ऐसा राज छिपा था जो सब कुछ बदल सकता था।
दो अलग दुनिया।
दो अलग लोग।
लेकिन किस्मत उन्हें एक ही रास्ते पर ला रही थी।
और ये तो बस शुरुआत थी।
क्योंकि असली कहानी अब शुरू होने वाली थी…
(भाग 1 समाप्त — आगे की कहानी में मुलाकातें, रिश्तों की उलझनें और वो राज सामने आएंगे जो दोनों की जिंदगी बदल देंगे।)