22 –
डिनर ख़त्म हुआ तब तक नौ बज गए थे | जल्दी से टेबल साफ़ करके रामी घर जाने लगी |
“रामी बहन ! ज़रा सबके लिए कॉफ़ी और बना दो, ज़रा जल्दी--शीनोदा ! यू विल हैव ?”
“ओह ! श्योर---”वह तपाक से बोला |
“नहीं शीनोदा को सोडा या कोक पीना चाहिए ---” अनामिका ने कहा |
“व्हाय ? मी कोक ----?”उसे अजीब लगना स्वाभाविक था, सब कॉफ़ी और उसके लिए कोक –वैसे उसे कोक पसंद था लेकिन सब कॉफ़ी पी रहे थे और वह कोक, ऐसा क्यों भला –ओ.के—आई विल हैव बोथ ---- ?”यानि कॉफ़ी भी और कोक भी !
“नहीं --- ”राजेन्द्र ज़ोर से बोला फिर बच्चों की ओर घूम गया –“ बच्चों ! तुम लोग चलो शीनोदा अंकल के साथ –वहीं पी लेना, कुछ सोडा-वोडा – ”
“वी वील गिव कंपनी टू शीनोदा अंकल ----” बच्चों को मज़ा आ गया था |
“घर में नहीं है न सोडा या कोक ?” राजेन्द्र ने अनामिका की ओर एक नज़र डाली फिर बिना प्रतीक्षा किए बोला ;
“ बच्चों तुम लोग निकलो शीनोदा अंकल के साथ !रामी बहन आप कॉफ़ी बनाओ, देर हो जाएगी --तुम लोग बस-स्टैंड की ओर चलो शीनोदा बच्चों के साथ, हम आते हैं ऑटो से -- ”
शीनोदा के चेहरे से अस्वस्थता झाँकने लगी थी और वह अभी भी खाने-पीने के लिए तैयार था |आना को घबराहट हो रही थी | विवेक भी घर में नहीं थे, कुछ हो—हुआ गया तो बस, यही हो जाएगा यहाँ डिनर किया था |
बच्चों को शीनोदा को पैदल भेजने का यह भी कारण था कि वह थोड़ा पैदल चले तो उसके पेट महाशय थोड़ा हिलेंगे, डुलेंगे तो उसके लिए अच्छा रहेगा | दोनों बच्चे तो तैयार ही बैठे थे जैसे ---वह बिना कुछ कहे चलने के लिए तैयार हो गया, दोनों बच्चे भी उसके दोनों ओर चल दिए |
रामी ने फटाफट कॉफ़ी बनाई, सबने गर्मागर्म कॉफ़ी लंबी लंबी घूँट में ख़त्म की और राजेन्द्र ने कॉफ़ी के मग समेटती रामी को रुपए पकड़ाए |
“अरे ! नईं भाई –तमे तो घर नाजछो -----”रामी अपनी आदत के अनुसार न-नुकर करना न भूलती और कभी गलती से कोई कुछ देकर न जाता तो उसकी पीठ पर कैसे-कैसे वार होते, यह तो अनामिका ही जानती थी |
“ले ले न रामी ---अभी राजेन्द्र भाई जा रहे हैं न तो पता नहीं कब मिलेंगे ?बाहर के ही समझ ले ----”अनामिका ने हँसकर कहा |
“थेंक यू भाई ---जल्दी आवजो-” रुपयों को मुट्ठी में भींचते हुए रामी ने अपना लाड़ दिखाया |
“हाँ—हाँ –जल्दी आऊँगा, तब भी बढ़िया खाने को मिलेगा न ?” ग्रुप के सभी लोग रामी के नख़रों से खूब परिचित थे, जानते थे कि इस घर में इसके व इसके परिवार के कैसे नख़रे उठाए जाते हैं वरना ये तो अभी तक सत्तर बार यहाँ से चली गई होती |
“रामी बहन, आपने इतना अच्छा खाना खिलाया न –और खूब मिर्च –मसाले वाला तला हुआ इतना मज़ेदार कि कॉफ़ी के बिना हज़म न होता, इसीलिए परेशान किया –चलो, आवजो –”
“अरे ! भाई आमा परेसानी नी सू वात छे –आवजो जल्दी ----”रामी ने भी अपना पूरा स्नेह उंडेल दिया |
“अब जल्दी चलो –न जाने उस बंदे का क्या हाल होगा ?”—फिर वह रामी की ओर मुड़कर बोली –
“रामी, साहेब आने वाले हैं, मुझे देर हो जाए तो साहब गंगू भाई से चाबी ले लेंगे |”
अशोक के चेहरे को मुस्कान ने घेर लिया | मज़ेदार बात थी, जब इस आफ़त-पार्टी ने दीदियों के घर पर अटैक करना शुरू ही किया था, उन्हीं दिनों एक दिन अनामिका के घर जब सब इक्क्ठे हुए थे, उस दिन की बात है |दरअसल, विबेक के आमंत्रण पर पहुँची थी यह शैतान-पार्टी उस दिन ! विवेक अधिकतर शहर से बाहर रहते इसलिए किसीसे मिल न पाते| उस दिन विबेक ने ही पत्नी से कहकर सबको घर बुलवा लिया था | तभी अनामिका के पास किसी काम से गंगू आया, वह बाहर खड़ा था |
“अशोक ! ज़रा, गंगू भाई से कहना, अभी आती हूँ ----”
अशोक कमरे के बाहर गया और दो मिनट में दाँत फाड़ते हुए वापिस आया ;
“क्या दीदी ! आप भी कमाल करते हो !मैंने सोचा गंगूबाई और ----वहाँ तो एक लंबा –चौड़ा गौंगा खड़ा है ---”अशोक ने और उसका नाम ही बदल दिया था|
“हाँ, रामी का पति ही तो है गंगूराम ---मैंने गंगू भाई ही तो कहा ---”हँसते हुए आना ने अशोक को बताया था |
अच्छा-ख़ासा नाम बेचारे का गंगाराम सोलंकी ---लेकिन जैसे सब जगह होता है, नाम को काटकर छुटकू सा करके बोल दिया जाता है | उसे खुद बचपन से सब आना ही कहते थे, कभी अपनी किशोरावस्था में वह सोचती भी थी कि आख़िर जब सब उसे आना कहकर ही बुलाते हैं तो उसका इतना बड़ा नाम रखने की आख़िर ज़रूरत ही क्या थी –अनामिका ---आना कितना प्यारा लगता है ! छोटा सा !क्यूट सा! लेकिन-- यह परिवारों का एक बड़ा नेचरल सा प्रोसेस है, बड़े नाम को छोटा कर ही दिया जाता है ---इसीके तहत गंगूराम जी को सब गंगू कहकर पुकारते | गुजरात में लड़के या पुरुष के नाम के आगे अक्सर भाई और स्त्री के आगे बेन कहकर बुलाया जाता है | गंगूराम भी इसी प्रचलन का शिकार था, उसे सब गंगू भाई कहकर पुकारते | जल्दी में बोलने से कभी-कभी गड़बड़ भी हो जाती, वो गंगूबाई बन जाता |
रामी का घर पास ही था, उसका पति गंगूराम सोसाइटी का चौकीदार था इसलिए सेफ़्टी रहती थी | रामी सब कुछ साफ़-सुथरा करके चली जाती, चाबी अपने पति को दे जाती |यदि विवेक कहीं आसपास गए होते और उन्हें अनामिका की अनुपस्थिति में आना होता तो उसके घर में न होने से उन्हें कोई परेशानी न होती | चाबी गंगूराम से ले लेते रामी का घर पास होने से वह घर आकर उनके लिए चाय-नाश्ता या खाना-पीना बना देती |
“अरे ! नहीं नहीं भाई आमा परेसानी की कई वात छे –जल्दी आवजो आने ध्यान राखजो” रामी की बंद मुट्ठी में नोट कड़कड़ा रहे थे |
राजेन्द्र को हॉस्टल से अपना बँधा रखा बोरिया-बिस्तरा उठाना था इसलिए वह अशोक के साथ एक ऑटोरिक्शा में और दूसरी में अनामिका मयंक के साथ घर से यह कहकर निकले कि सब वहीं बस-स्टॉप पर मिलते हैं |
राजेन्द्र की बस का समय होने लगा था, बहुत दूर नहीं था बस-स्टैंड !---सब ऑटोरिक्शा में जल्दी पहुँच गए | विद्यापीठ के सामने क्रॉस में बड़ा सा कमर्शियल सेंटर था जिसमें लगभग सभी बड़े ब्रांड्स के बड़े-बड़े स्टोर्स थे उनके सामने ही बस-स्टैंड्स बने हुए थे | सड़क पर दूर से बस आती दिखाई दे जाती |
अनामिका व मयंक की ऑटोरिक्षा रेमंड्स के बड़े से शो-रूम के आगे जाकर रुक गई जिसके दो बड़े गेट्स थे और रात काफ़ी हो जाने के कारण उन्हें बंद किया जा रहा था |रेमंड्स के उस बड़े से शो-रूम से सटा हुआ एक बड़ा सा ‘पान व चॉकलेट्स पार्लर’ था जिस पर कोल्ड ड्रिंक्स व आइसक्रीम भी मिलते थे | यह पार्लर काँच के परिधान से सुशोभित था और उसके भीतर बड़े से स्थान पर काँच की ही साफ़-सुथरी ऊँची गोल मेज़ें लगी रहतीं जिन पर रखकर ग्राहक वहीं खड़े-खड़े आइसक्रीम खाते, कोल्ड-ड्रिंक्स का आनंद लेते | बच्चों को कह दिया गया था कि वे अंदर न रहें, अपने कोल्ड-ड्रिंक्स लेकर पार्लर से बाहर आ जाएँ जिससे देरी न हो |
बड़े स्टोर्स व अन्य बड़ी दुकानों पर नियोनसाइन के बड़े-बड़े बोर्ड्स लगे हुए थे जिन्हें बच्चे बड़े चाव से देखकर आनंदित हो रहे थे |शीनोदा वहीं खड़ा बच्चों से बातें कर रहा था | यानि इन सबका कोल्ड ड्रिंक पीने का कार्यक्रम पूरा हो चुका था |
अनामिका को देखते ही बच्चे भागकर उसके पास आ गए, शीनोदा से उसने इशारों में ही तबियत के बारे में पूछा, उसने भी ‘ठीक है’ के अंदाज़ में अपना अँगूठा दिखा दिया | बस की रोशनी दूर से दिखाई देने लगी थी और अनामिका घूम-घूमकर पीछे देख रही थी जिधर से राजेन्द्र को आना था |
लगभग पाँचेक मिनट में बस स्टैंड पर पहुँच गई और उसमें से यात्री उतरने लगे, जाने वाले यात्री एक पंक्ति में खड़े थे कि अचानक दो-चार लोग भागते हुए आए और उन्होंने बस में चढ़ने वाले यात्रियों की पंक्ति में घुसपैठ कर दी |पहले से खड़े लोगों में शोर बरपा हो गया| बेचारा कंडक्टर बस के पीछे वाले दरवाज़े पर खड़े होकर सीटी बजाता हुआ सबको लाइन में आने की प्रार्थना कर रहा था लेकिन अब तक पूरी लाइन टूटकर छितर चुकी थी | लोगों ने तहज़ीब को उठाकर एक ओर फेंक दिया था और पूरी ताक़त लगाकर बस में घुसने की होड़ में लग चुके थे |आना बार-बार कभी बस की भीड़ को तो कभी पीछे की ओर घूमकर देखे जा रही थी |
“कहाँ रह गए ये लोग ? राजेन्द्र को सुबह कॉलेज ‘जॉयन’ भी करना है ---” वह बुदबुदाई |
“ आ गए दीदी ।चिंता मत करिए ---” ऑटोरिक्षा बस के पीछे आकर रुका था और अशोक उसमें से सामान उतार रहा था |
“ओह ! पहुँच गए तुम लोग ---“उसने एक संतुष्टि की साँस ली |अब तक बस में लगभग सभी यात्री घुस चुके थे| बस के अंदर नज़र मारने से पता चला, लगभग सभी को सीटें मिल चुकी थीं यानि बेकार ही धक्का-मुक्की की जा रही थी |
शायद हम लोगों की ऐसे घुसपैठ करने की आदत पड़ चुकी है, जो चीज़ हम आसानी से प्राप्त कर सकते हैं उसके लिए भी हम लड़ने के लिए तैयार बैठे रहते हैं –अनामिका के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान पसर गई | उसने देखा कंडक्टर ने सीटी बजाई, ड्राइवर ने बस चला दी| अशोक ने जल्दी से पहले राजेन्द्र का सामान बस में ठेल दिया था फिर राजेन्द्र को | जैसे ही वह बस के अंदर गया, बस चल दी |
“प्रणाम दीदी, चरण-स्पर्श ” राजेन्द्र बस के अन्दर से हाथ जोड़कर चरण-स्पर्श का इशारा कर रहा था | लहराते हाथों को अनदेखा कर बस द्रुत गति से आगे बढ़ गई | बस के जाने से उठी मिट्ठी ने वातावरण को धूमिल सा कर दिया, रात थी लेकिन बाज़ार की झपझप करती रोशनी इतनी अधिक थी कि बस के टायरों से उड़ती धूल और उसके पीछे के पाइप से निकलता धूँआ वातावरण में कुछेक क्षण के लिए गर्द सी भर गए | अब उसके पीछे की लाइट्स टिमटिमाती हुई दिखाई दे रहीं थीं | सब खड़े उधर की ओर टकटकी लगाए देखते रह गए जिधर से बस गई थी |
अचानक दृष्टांत ने पीछे मुड़कर चारों ओर देखा, उसकी आँखें शीनोदा को तलाश रही थीं | अभी तो सबके साथ यहीं खड़ा था ;
“शीनोदा अंकल ----”
“अभी तो यहीं था---”मयंक ने कहा और फिर उन सबकी आँखें शीनोदा को तलाशने लगीं |
कहाँ जा सकता था ? इतना बड़ा बाज़ार था, सटे हुए दो कमर्शियल सेंटर थे, रात का समय होने के कारण भीड़ भी अधिक नहीं थी फिर भी वो लंबा लड़का दिखाई नहीं दे रहा था |
“वो ---देखिए –वो रहे शीनोदा अंकल ---" दृष्टि ने कमर्शियल सेंटर की ओर आने वाली सड़क के कोने पर शीनोदा को बैठे देखकर चिल्लाकर कहा |
सब लोग उस ओर लगभग दौड़कर आए जहाँ शीनोदा उकड़ूँ बैठा था |
"व्हाट हैपंड---" अनामिका तो चीख ही पड़ी |वह पहले ही डर रही थी कि कहीं उसकी तबीयत बिगड़ न जाए ! जिस हिसाब से उसने चटपटे खाने और अचार का भोग लगाया था, उससे तो वह पहले से ही परेशान थी | हो गई न उसकी तबीयत खराब --शीनोदा अपने पेट में घुटने धँसाकर उकड़ूँ बैठा था, उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं, चेहरा पीला पड़ गया था और आँखों में से पीड़ा के आँसू झाँक रहे थे जिनको उसने बमुश्किल गिरने से रोका हुआ था|
"शीनोदा ---आर यू ओ.के ----?" अनामिका ने स्नेह से उसकी पीठ सहलाई |
"नो ---इट्स पेनिंग---माय स्ट्मक इज़ पेनिंग -----" उसके शब्दों से भी जैसे कराहट टपक रही थी |
"अरे ! इसको तो भई डॉक्टर को दिखाना पड़ेगा ---" अशोक ने अपनी चिर-परिचित भाषा में चिंता व्यक्त की और दृष्टांत का हाथ पकड़कर उन नियोनसाइन वाले बड़े स्टोर्स के पीछे की ओर जाने लगा |
"चल बेटा, देखकर आते हैं, शायद डॉक्टर साहब मिल जाएँ ---"
कुछेक मिनट में ही दृष्टांत भागता हुआ आया ;
"चलिए अंकल --मम्मा ! डॉक्टर मेहता निकल ही रहे थे, अशोक मामा ने उन्हें रोक लिया |"
शीनोदा को चलने में बड़ी तकलीफ़ हो रही थी लेकिन उस समय डॉक्टर का मिलना ही एक बहुत बड़ा आशीर्वाद सा मिल गया था | उसे पकड़कर सब धीरे-धीरे डॉक्टर मेहता के क्लिनिक की ओर चल पड़े| डॉक्टर साहब का बैग उनका कंपाउंडर गाड़ी में रख चुका था, क्लिनिक का अटेंडेंट लाइट्स बंद करके शटर गिरा ही रहा था कि दुबारा से उन्हें क्लिनिक का शटर खुलवाना पड़ा |
"शू खादा छे जापानी भाई ---" डॉक्टर मेहता बड़े हँसोड़ प्रकृति के थे, सबसे परिचित थे | विद्यापीठ पास होने के कारण वहाँ के हॉस्टल में रहने वाले ज़रूरत पड़ने पर लगभग सभी छात्र/छात्राएँ इलाज़ के लिए डॉ.मेहता के पास ही आते थे |
डॉ. मेहता के पेट दबाने से शीनोदा की चीख़ निकल जाती ;
“शू खादा छे ----”उनके माथे पर सलवटें पड़ीं थीं |
अनामिका ने डॉक्टर साहब को सारी बातें बताईं तो वो ज़ोर से हँस पड़े ;
“आई एम गिविंग यू इंजेक्शन, नाऊ एट लीस्ट ए वीक यू हैव टु टेक ओन्ली लाइट फूड ---”
“मीन्स ----?”शीनोदा ने कराहते हुए पूछा | उसे तो सब कुछ लाइट ही लगता था |
“युअर फ़्रेंड्स विल एक्सप्लेन यू—”इंजेक्शन देकर डॉक्टर ने उसकी पीठ थपथपाई और अपना बैग बंद करके उठ खड़े हुए |
“म्हारे घरे बूमबूम थई जशे –माय फ़ैमिली इज़ वेटिंग फॉर डिनर”डॉक्टर बहुत जल्दी में थे |
“रात को ज़रूरत पड़ी तो ----?”अनामिका ने डॉक्टर साहब से पूछा | परेशानी उसके चेहरे पर दिखाई दे रही थी |
“चिंता मत करो, ठीक थई जशे –एसिडिटी थई गई छे |”बेचारा विदेशी पेट अब तक तो सादा, फीका खाना पचाता रहा था, अचानक ही भीतर इतना तेल व मिर्ची वाला खाना अन्दर जाते ही उपद्रव करने लगा |
इंजेक्शन के बाद उन्होंने दवाइयाँ भी दे दीं | कंपाउंडर थोड़ी देर के लिए रुक गया था, कोई आधा घंटे बाद शीनोदा काफ़ी ठीक लगा| सबकी जान में जान आई | अब तक पौने ग्यारह बज चुके थे |सड़कों पर वाहनों की चहल-पहल कम हो गई थी | मेहता रेस्टोरेंट, पान -पार्लर के अलावा अधिकांश सभी दुकानें अँधेरे की चादर में सिमट चुकी थीं जैसे बड़े ब्रांड्स के शो-रूम्स नियोनसाइन के लपझप करते बल्बों के बीच कुछ बेचारे से अँधेरे में गुम छोटी-मोटी दुकानों के बस साए ही लग रहे थे लेकिन वो भरी पूरी दुकानें थीं और सुबह की रोशनी में उनकी साज-सज्जा देखते ही बनती थी| इस समय उन्हें जैसे अंधकार का दुशाला ओढ़ा दिया गया था |
बच्चे नींद में आ चुके थे |मयंक व अशोक ने उसके लिए एक ऑटोरिक्शा कर दी और शीनोदा को हॉस्टल छोड़ने चले गए |
रात में ही विवेक आ गए थे, शीनोदा के बारे में बताने पर उन्हें भी चिंता होने लगी और उन्होंने हॉस्टल-इंचार्ज से उसकी तबीयत के बारे में पूछा | पता चला वह गहरी नींद सोया है | अशोक व मयंक ने उसके पास रहने की ज़िद की किन्तु कमरे में अधिक लोगों के सोने की ठीक व्यवस्था न होने के कारण शीनोदा ने उन्हें वहाँ रुकने नहीं दिया | वो दोनों हॉस्टल-इंचार्ज से उसकी तबीयत के बारे में बताकर और उसका ध्यान रखने का कहकर चले गए |
“हाँ, डॉक्टर साहब बता तो रहे थे कि इंजेक्शन में नींद का असर है |अच्छा है, ठीक से सोएगा तो अभी कुछ नहीं खाएगा वर्ना तो रात में ही नूडल्स बनाकर खाने लगेगा ---”अनामिका ने हँसते हुए कहा | अब वह रिलेक्स थी, उसके चेहरे पर मुस्कान खिल आई थी |दरअसल, रिलेक्स तो वह विवेक को देखकर ही हो गई थी | विवेक की उपस्थिति उसके पास से हर किस्म की परेशानी को छिटका देती थी |