Prem n Haat Bikaay - 20 in Hindi Love Stories by DrPranava Bharti books and stories PDF | प्रेम न हाट बिकाय - भाग 20

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 20

20 – 

     राजेन्द्र के जाने का दिन आ गया, उसी दिन अनामिका ने अपने घर पर उसकी ‘फ़ेयरवैल’ रखी | एक छोटा सा डिनर !जिसमें महिला दोस्तों में से कोई भी सम्मिलित नहीं हो सका, केवल इन शैतानों के ! बासु दी को अपने पति के साथ किसी विशेष समारोह में शामिल होना ज़रूरी था, कुंजबाला दी अपने काम के सिलसिले में शहर से बाहर थीं, रेखा बहन का तो वैसे ही बच्चों को छोड़कर आना कठिन होता था | 

        अवसर की बात थी कि उन दिनों विवेक भी शहर में नहीं थे | राजेन्द्र जा रहा था इसलिए उसको फ़ेयरवैल तो देनी थी |पहले कार्यक्रम बना रेस्टोरेंट में पार्टी कर दी जाए लेकिन सबका मन हुआ कि घर का माहौल हंगामे के लिए ठीक रहेगा | इससे पहले कभी शीनोदा भी घर पर नहीं आ सका था, बेशक वह उसके पूरे परिवार के सदस्यों से विद्यापीठ में मिल चुका था |आना ने बच्चों के साथ मिलकर घर पर ही पार्टी रखना तय कर लिया | बाहर से जो भी खाने-पीने का  सामान मँगवाना था बेटे के साथ जाकर अशोक ले आया, घर में उसको सहायता करने के लिए रामी  थी ही |उसका घर के पास रहना अनामिका के परिवार के लिए बहुत सुविधाजनक था, किसी भी समय आकर कोई भी काम सँभाल लेती| 

     खाने-पीने का इंतज़ाम ठीक ठाक हो गया था, रामी उसके पास शुरुआती दिनों से थी और परिवार के सदस्य सी ही हो गई थी | अब  वह उस घर के सभी क्रिया-कलापों से, खाने-पीने के तरीके से ---सबसे खूब परिचित हो चुकी थी | उस घर के अनुसार काम करने में वह अब तक इतनी होशियार हो चुकी थी कि ज़रूरत पड़ने पर अनामिका अपने पूरे घर को उस पर छोड़कर जा सकती थी| शुरू में तो वह हर खाने की चीज़ में मीठा डाल देती थी फिर वह चाहे दाल हो या सब्ज़ी ! और तेल तो इतना कि सब्ज़ी के ऊपर तैरता रहता लेकिन अब वही रामी उससे भी बढ़िया खाना बनाने लगी थी | गीता जैसे कई लोगों ने रामी पर डोरे डालने की बहुत कोशिश की, किसी तरह उसे इस घर से छुड़वाकर अपने पास रख लें लेकिन रामी खूब पक्की हो चुकी थी और सबके व्यवहार को भी अच्छी तरह समझने लगी थी | वो किसी की बातों में न आती इस बात से चिढ़कर इस परिवार के प्रति गीता और उसके चमचे अधिक उपद्रव करने की साज़िशों में व्यस्त रहने लगे थे |

      राजेन्द्र के लिए दी गई फ़ेयरवैल की छोटी सी पार्टी के लिए सबने तय कर लिया था कि आना दीदी के घर कुछ समय पहले ही पहुँच जाना है जिससे कुछ गप्पें-शप्पें मारी जाएँ | वैसे भी काफ़ी दिनों से राजेन्द्र अपनी तैयारी में व्यस्त था, गप्पों व शरारतों के लिए तो अब समय ही नहीं मिलता था |साथ में खाना-पीना, ठहाके लगाना, सब बंद हो चुका था |

“वो देकना, गिलहरियाँ भी सेड --ऊदास दिकाई देने लगीं हैं ---उसको बी मालूम है न राजेन्द्र बाई हम सबको छोड़कर जाते हैंई  ---”शीनोदा  ने एक दिन सीढ़ियों पर बैठकर चाय पीते हुए गिलहरियों को देखते हुए कहा और सब खिलखिलाकर हँस पड़े |

      तय किया गया कि कम से कम जाने वाले दिन तो आना दीदी के घर बैठक जमे| उधमबाज़ी के लिए बस किसी छोटे से  बहाने की ज़रूरत होती है, फिर ये बहाना तो अच्छा-ख़ासा था | आख़िर राजेन्द्र अहमदाबाद  छोड़कर जा  रहा था | उसी दिन  राजेन्द्र को डिनर के बाद स्वराष्ट्र के लिए रात की बस भी पकड़नी थी|

     सब लोग डिनर से काफ़ी पहले अनामिका के घर पहुँच गए थे  | पता नहीं रामी को किसी विदेशी को  देखकर क्या मज़ा आता था ! जब भी कभी कोई विदेशी अनामिका के घर आता वह ऐसी निहाल सी हो जाती जैसे न जाने उसे क्या मिल रहा हो|ऐसी फुदक-फुदककर काम करती नज़र आती कि आना सोचती रोज़ ही कोई विदेशी मेहमान आए तो रामी कभी बहाने बनाएगी ही नहीं| उसे हर गोरा–चिट्टा बंदा अमरीका से आया हुआ लगता और वो उसे ‘गोरा’कहती | एक दो बार उसने रामी को इनमें अन्तर समझाने की चेष्टा की भी थी  लेकिन बाद में  लगा ‘भैंस के आगे बीन बजाना है|’ उसके लिए सब अमरीका जाते थे और उसके लिए  विदेश बस एक ‘अमरीका’ ही था | 

      आना की बेटी दृष्टि मृणालिनी साराभाई के ‘दर्पण’ एकेडमी  में भारतनाट्यम नृत्य सीख रही थी | घर के पास ही एकेडमी होने से अनामिका उसे पैदल ही लेकर चली जाती | इससे उसकी शाम की सैर भी हो जाती और वह अपने कत्थक के दिनों को भी जी लेती | उसकी बचपन की नृत्य व संगीत की कक्षाएँ उसे उन दिनों में खींचकर ले जातीं | बहुत मज़ा आता था उसे अपनी बिटिया को नृत्य करते देखकर|उसके पैर बरबस ही थिरकने को व्याकुल हो उठते| एक बार उसकी यह हरकत देखकर अम्मा यानि ‘मृणालिनी साराभाई’ की नृत्यांगना सुपुत्री मल्लिका‘ ने उसे कुछ उकसा भी दिया था | 

“व्हाय डोंट यू स्टार्ट युअर डांस अगेन ---?” और सच ही उसका मन एक बार तो धड़कने लगा था ---सच्ची ! मज़ा आ जाएगा | जब वह इतने लंबे वर्षों बाद पढ़ाई शुरू कर सकती है तो नृत्य क्यों नहीं ?स्त्री के मन में कितना कुछ उद्वेलित होता रहता है ! 

      लेकिन इतना कुछ हो नहीं पाया | गृहस्थी को देखो, बच्चों पर ध्यान दो, खुद के शोध-कार्य पर ध्यान दो, नृत्य करो ---लेखन के भूत ने तो बचपन से ही शिराओं में उधम मचा रखा था --अकेले हाथ ही सब कुछ करना था |विवेक की ओर से छूट  ही तो थी, इससे आगे तो उसे ही संभालना था |बच्चों की उम्र भी नाज़ुक थी सो---कठिन ही था उसके लिए --!    

       दर्पण एकेडमी में  कुछ ‘एन.आरआइज़’ के बच्चे भी छुट्टियों में भारत आते और कभी-कभी माह, दो माह के लिए  भारतीय नृत्य-संगीत, नाटक की कक्षाओं में भी प्रवेश ले लेते|उन दिनों दामिनी मेहता अपने एक मित्र के साथ वहाँ नाटक की कक्षाएँ लेती थीं |नाटक सीखने भी बहुत लोग आते | महीने में एक बार नाटक का मंचन भी होता था | दर्पण एकेडमी की सभी कला-विधाओं की कक्षाएँ भरी रहतीं|    

      अनामिका जब से अहमदाबाद रहने आई थी तब से ही उसने देखा था कि गुजरात मूल के लोगों के अधिकांश परिवारों में अमरीका जाने का बहुत ‘क्रेज़’था|उसकी सोसाइटी में शायद ही कोई परिवार होगा जिसमें से लोग परदेस, अधिकतर अमरीका में न हों | उन दिनों अमरीका जाने वालों को बहुत बड़ा माना जाता, एक अहं भाव से लोग अपने परिवार के सदस्यों के बारे में बताते कि उनका फलां –फलां अमरीका में है और अब फलां –फलां की फ़ाइल रखी गई है |वह मुस्कुराकर उनकी बातें सुनती और कहती, ”बहुत अच्छा है यह तो !” उन बेचारों को यह तक  पता न होता कि उनका बेटा, पति या कोई और रिश्तेदार वहाँ काम क्या करता है ? किसी स्टोर में झाड़ू लगाता है, वहाँ के खिड़कियों, दरवाज़ों के काँच साफ़ करता है अथवा किसी के ‘कॉर्नर स्टोर’ पर ग्राहकों को दूध के केन्स, चॉकलेट्स, या और कुछ छीटी-मोटी चीज़ें बेचता है| भारत आकर जब लोग डॉलर या पौंड्स को रुपयों में  खर्च करते देखते तब उनकी वाहवाही ऐसे होती जैसे कोई राजा हो और अपनी प्रजा में गिफ़्ट्स नहीं ख़ैरात बाँट रहा हो |अपने रिश्तेदारों में लारियों पर से खरीदी हुई मालाएँ, बालों में लगाने के क्लिप्स, पर्स, कभी कमीज़ेंअधिकतर टी-शर्ट्स, टॉप्स –पैंट्स !बेशक उन्होंने ‘सन-डे’मार्केट्स या फिर सेकेंड्स की दुकानों से खरीदे होते |इन छोटे-मोटे गिफ़्ट्स का वितरण उन्हें महान बना देता ---ख़ैर–यह भी बात सच होती कि बाहर से आने वाले से अपेक्षाएँ भी अधिक ही की जाती थीं–वो बेचारा भी क्या करता, इसी प्रकार सबमें गिफ़्ट्स वितरित करके अपना रौब गाँठता|विवेक के भी एक भाई इसी कैटेगरी में आते थे---!   

        जिन दिनों अनामिका की बिटिया दृष्टि  दर्पण में नृत्य के लिए जा रही थी, एक बच्ची इंग्लैंड से आई जिसके दादा जी का परिवार यहाँ अहमदाबाद में था | उनका व्यवसाय यहाँ खूब फला-फूला था लेकिन उनके बेटे को उस व्यापार में कोई रुचि न थी और वह जैसे-तैसे इंग्लैंड पहुँच गया था जहाँ उसने वहीं बसने  के उद्देश्य से एक अंग्रेज़ लड़की को अपना जीवन-साथी बना लिया था |उसी अंग्रेज़ माँ की बच्ची का नाम रीनी था और वह ‘दर्पण’में  (मृणालिनी साराभाई  का नृत्य-कला संस्थान ) कुछ समय के लिए भारतीय नृत्य सीखने आने लगी थी| वह दो-चार दिनों में ही  दृष्टि की अच्छी दोस्त बन गई थी | 

        एक दिन रीनी  के दादा जी उसे लेकर एकेडमी आए, रीनी ने अपनी दोस्त दृष्टि से उनका परिचय करवाया और फिर दोनों बच्चों की ज़िद से रीनी के दादा जी उसे अनामिका के घर छोड़ गए | उन्होंने अपने ड्राइवर को घर दिखा दिया था कि दो-चार घंटों में वह आकर बच्ची को ले जाएगा | उस समय दृष्टि लगभग दसेक वर्ष  की होगी और अनामिका का बड़ा बेटा दृष्टांत उससे लगभग  डेढ़ वर्ष बड़ा| 

       रीनी दृष्टि से लगभग दो वर्ष छोटी होगी, दृष्टांत अपने शैतान स्वभाव के कारण अपनी बहन के साथ ही रीनी को भी चिढ़ाने लगा | रीनी को इस सबकी आदत नहीं थी, डाइनिंग टेबल पर सब बच्चों को बैठाकर रामी उन्हें नाश्ता करवा रही थी |रामी कभी रीनी की बिल्ली की सी आँखें देखती और कभी उसके सुनहरे रेशम से बाल !उसे वह बच्ची एक गुड़िया सी लग रही थी, घेरदार, फ्रिल वाले फ्रॉक में रीनी का परिचय अपने आप ही मुखर हो गया था | 

“आ छोकरी तो अमरीका नी लागे ---नईं आना दीदी ?”रामी ने  खुश होकर पूछा | 

“रामी ! इसकी मम्मी अंग्रेज़ हैं न ----इसीलिए ---” 

“हा ---दीदी –मने तो पेले ही पता चल गया आ छोकरी यहाँ की नईं है | 

       अनामिका खूब अच्छी तरह जानती थी कि रामी को जो समझना है, वह वही समझेगी  बेकार ही उसे अमरीका और इंग्लैंड के बीच की स्पष्टता करके अपना ही सिर दीवार से मारने वाली बात है | वह चुपचाप बैठी मुस्कुराती रही |   

       तीनों बच्चे  खूब मस्ती कर रहे थे | न जाने दृष्टांत को क्या सूझा अपनी बहन के साथ वह रीनी के भी गुलगुली  करने लगा | रीनी एकदम घबरा गई और जूते पहने हुए ही डाइनिंग-टेबल पर चढ़ गई |  

“पोलीस ---पोलीस ---” वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी थी | 

     दृष्टांत अपनी उम्र के अनुसार शैतान था लेकिन बदतमीज़  नहीं था, रीनी को ‘पोलीस-पोलीस’ चिल्लाते देखकर वह सहम गया, उसकी समझ में ही नहीं आया कि वह ऐसे क्यों चिल्लाने लगी थी ? रामी भी घबरा गई | अनामिका के घर किसी की  बच्ची आई थी, उसे इस तरह चिल्लाते देख वह भी अनमनी हो उठी ---

“दृष्टांत ! मत करो ---” उसने रीनी को मेज़ से उतारकर उसे चुप कराने की चेष्टा की|  

“प्लीज डोंट डू –आई विल कॉल द पोलीस ---” वह बच्ची फिर चिल्लाई |उसे ये कहाँ पता था कि यहाँ तो पुलिस किसी बड़ी दुर्घटना पर भी तभी पहुँचती है जब उसे पहुँचना होता है ! 

 “क्या किया मैंने ? पुलिस को क्यों बुला रही है ---?” दृष्टांत बेचारा घबरा गया, उसके लिए तो बहन  के साथ  इस प्रकार की शैतानी करना रोज़ाना की बात थी | 

“कोई बात नहीं, मैं अभी इसे समझाती हूँ लेकिन तुम्हें समझना चाहिए, तुम अपने घर आए बच्चे से इस तरह की शरारत क्यों कर रहे हो ?”आना ने बेटे को डाँटा | बेचारा और भी सकपका गया, वैसे ही पुलिस की तस्वीर उसकी आँखों के आगे नाच रही थी| उसके लिए यह कोई बड़ी बात तो थी नहीं, वह तो मौका मिलते  ही अपनी बहन को परेशान करता रहता था | 

     उस दिन बड़ी असहज  रही अनामिका जब तक रीनी के दादा जी उसे लेने आ न गए | 

“वैसे, मैं ड्राइवर को ही भेजने वाला था लेकिन मैंने सोचा कि आपकी आँटी को भी आपसे मिलवा दिया जाए ---” वे अपने साथ अपनी पत्नी को भी लेकर आए थे |

“ आपको ज़्यादा परेशान तो नहीं किया इसने –”रीनी की दादी शिक्षित और सभ्य थीं | 

“जी नहीं, बच्चे आराम से खेल, खा-पी रहे थे –बस, बीच में ----”आना ने बेटे से उन्हें मिलवाते हुए सारी बात बताई | 

“सॉरी –बेटा, मुझे डर ही था, इसका स्वभाव बिलकुल टिपिकल है | हर साल आती है लेकिन अभी तक यहाँ पूरी तरह घुल-मिल नहीं पाई है ---” रीनी की दादी ने उसकी ओर से दृष्टांत से सॉरी बोला जो अभी तक गुमसुम हुआ बैठा था | 

     दरअसल, दोनों बच्चों में से किसी की भी गलती नहीं थी | दोनों अलग वातावरण में पले- बढ़े थे, वातावरण अलग था, स्वभाव अलग थे, जीने का तरीका अलग था| 

     रीनी की दादी ने अलग अलग तरह की चॉकलेट्स  के कई पैकेट्स बच्चों को दिए| चाय-नाश्ता करके वे सब लोग जाने ही वाले थे कि विवेक घर आ गए इसलिए रीनी के दादा-दादी कुछ देर और बैठ गए | शरीफ़, सौम्य लोग थे | उनसे मिलकर अनामिका व विवेक को भी अच्छा लगा लेकिन सबसे अच्छा रामी को लगा था जिसे अनामिका ने एक चौकलेट्स का पूरा पैकेट  दे दिया था |   

      मेहमान उसे पैसे या कोई गिफ़्ट्स या चॉकलेट्स देकर जाते, वह फूली न समाती | उसे लगता, यहाँ के लोग तो बस यूँ ही खाली-पीली मेहनत करवाते हैं और आना दीदी के यहाँ खाने-पीने से लेकर पैसे भी खूब मिलते हैं, दूसरी चीज़ें जैसे कपड़े, डबल-बैड की चादरें, पुराना हो गया फर्नीचर तो मिलता ही रहता है | उसे काम करने में मज़ा आता था, जितना खाओ कोई कंट्रोल नहीं | जो सब खाते, वही उसको भी मिलता बल्कि उसके बच्चों और ड्राइवर पति को तो इस घर के खाने का चटकारा लग गया था| मेहमान भी खूब आते रहते और जितना भी खाना बचता आना उसे ले जाने को कह देती | दरसल, वह परिवार की सदस्य ही हो गई थी | टेबल लगाने से लेकर, सलाद को अलग-अलग तरह से सजाने में उसे बड़ा मज़ा आता | 

    उस दिन सब आ चुके थे, शीनोदा न जाने कहाँ रह गया था, उसका इंतज़ार हो रहा था | बच्चे नीचे खेल रहे थे, बाकी सब लोग सिटिंग–रूम में गप्पें मार रहे थे लेकिन रामी मेज़ सजाकर, सब काम करके लौबी में ही लटकी इंतज़ार कर रही थी | उसके अनुसार तो अमरीका वाला भाई आने वाला था न !