Prem n Haat Bikaay - 17 in Hindi Love Stories by DrPranava Bharti books and stories PDF | प्रेम न हाट बिकाय - भाग 17

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 17

17 ---      

          विद्यापीठ का अनुशासन बहुत कठोर था, वैसे तो छिपकर सभी सब कुछ करते रहते किन्तु खादी पहनने से लेकर, सुबह प्रार्थना सभा में ठीक ग्यारह बजे उपस्थिति लगाना, प्रार्थना करना, उसके बाद किसी न किसी का व्याख्यान सुनते हुए चरखा कातना | इनमें से किसी भी चीज़ में अनुपस्थित होने की कोई गुंजाइश नहीं होती थी | 

      सब अपने-अपने चरखे व बैठने के लिए आसन लेकर जाते और आधा घंटे की प्रार्थना व भाषण के बाद आधा घंटे कताई करते, कभी-कभी व्याख्यान लंबा भी होता पर कताई अपने समय से शुरू हो जाती, भाषण सुनते हुए सब कताई करते रहते  | जो पहले विद्यापीठ से जुड़ चुके थे, वे तो कताई आसानी से  करने लगे थे किन्तु अनामिका  जैसे अनाड़ी अभी तक ठीक तरह से  नहीं कर पाते थे, उनकी डोरी बीच में टूट ही जाती और फिर उसे जोड़ने के प्रयत्न में जूझते हुए पूरे  समय में  केवल कुछ गिने-चुने धागे ही कत पाते | एक्सपर्ट लोग क्या फटाफट सूत कातते ----! 

"आज गाँधी जी होते तो वे भी कुछ छूट देते, उन्होंने तो विदेशी चीज़ों का बहिष्कार किया था न ! अब जब अपने देश में चीज़ें बन रही हैं, अपने लोगों को काम मिल रहा है, अपने  भारतीय कारखाने खुल रहे  हैं तब भी इस पर इतना ज़ोर ---मुझे तो ये क्रेज़ी लगते हैं | भाई, अपने देश की बनी चीज़ों में भी तो हमारे लोगों की मेहनत जुड़ी होती है, अपने कारखानों में अपने मज़दूर वर्ग को काम मिलता है  |" जब विद्यापीठ के कड़े नियमों पर बहस छिड़ जाती अनामिका के मुख से निकल ही जाता  |  

     शीनोदा को भी ये सब कसरतें करनी ज़रूरी थीं, उसे भी कोई छूट नहीं थी सो बेचारे ने आसन व चरखा खरीदा और अनु से सिखाने के लिए रिक्वेस्ट की | अब अनु को आता तब वह सिखाती न ! 

"अरे ! शीनोदा  भाई किससे सीखना चाहते हो ----?" मयंक ने दाँत फाड़ते हुए कहा और अनामिका के साथ हुई एक घटना सुनाने लगा | 

      विद्यापीठ में कताई  की परीक्षा भी और परीक्षाओं जैसी होती | यदि डेढ़ सौ अथवा दो सौ तारों यानि धागों की ‘आंटी’ नहीं बन पाती तो विद्यार्थी का रिज़ल्ट 'विद हैल्ड' कर लिया जाता |अब लटके रहो उसी कक्षा में, दूसरी में बिना कताई की परीक्षा पास किए प्रवेश मिलना नामुमकिन ! 

      अनु से कताई होती ही नहीं थी, बेचारी ने पहले वर्ष में बहुत कोशिश की कि वह कताई में सफ़लता प्राप्त कर सके, उसने नानी को घर में कताई करते हुए देखा बल्कि जब नानी ने उसे हॉल का बड़ा सा दरा अपने हाथ से काते हुए सूत से उसकी शादी में दिया था, उसने  अपनी आँखें चौड़ी करके नानी को देखा था, इतना सूत कात लिया नानी ने ! 

     पूरे परिवार पर गाँधी जी और विनोबा भावे का प्रभाव इस कदर तारी था कि उस समय के अधिकांश हर शिक्षित व चैतन्य  परिवार में  अपने बचपन में  स्त्रियों को कताई करते देखा था आना ने!कई बार उसके मन में यह विचार भी आता था कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ ही अधिक कताई क्यों करती हैं ?कभी-कभी नानी के हाथ से चरखा लेकर दो-चार बार घुमाया भी था उसने लेकिन आधा तार भी नहीं कात पाती थी और खीजकर एकदम चरखा एक ओर कर देती जबकि अनुज कई तार कात लेता |    

      अब बताओ, इस उम्र में चरखा कातना पड़ा था उसे जो उससे कता ही नहीं | कोशिश करती कि ईमानदारी से कातकर परीक्षा में उत्तीर्ण हो किन्तु उसकी तो चार-पाँच तारों के बाद ही हालत पस्त  हो जाती, तार जोड़ने में ही उसका सारा समय नष्ट हो जाता तब आंटी कैसे बन पाती ? 

      खादी पहनना लाज़मी था और उन दिनों खूब मोटी खादी मिलती जिसकी साड़ी शरीर पर लादकर उसे घसीटने में हालत पतली हो जाती, खासकर अनामिका  जैसे लोगों की तो और भी | ऊपर वाला उसके शरीर पर माँस चढ़ाने में कुछ अधिक ही मेहरबान था  | वैसे भी बासु दी के अलावा तीनों महिलाओं का शरीर अच्छा-ख़ासा था, उस पर मोटी खादी की साड़ी !

      बासु दी खादी-सिल्क की साड़ियाँ पहनतीं जो काफ़ी कीमती होतीं , वैसे भी उन्हें कोई रोज़ तो आना नहीं होता था | उन्हें कहाँ स्कॉलरशिप लेनी थी ! और अनामिका के लिए रोज़ाना सिल्क की साड़ी पहनना मुमकिन न था |ख़ैर, उसे सलाह दी गई कि वह अपनी मोटी खादी की साड़ी के साइड की चुन्नटों में बाहर से आंटी छिपाकर ले जाए और मौका देखकर चुपके से अपनी कती हुई आंटी की जगह बाहर से लाई हुई आंटी रख दे | 

    आना  का मन बहुत विचलित हुआ, गाँधी जी के संस्थान में चोरी ! काफ़ी कोशिश करने पर भी जब वह अपेक्षित धागे न कात पाई तब उसने दोस्तों की सलाह स्वीकार कर ली | इस कताई की परीक्षा को तीन बार दिया जा सकता था, उसके बाद अगले वर्ष! जब दो बार में वह असफ़ल रही तब तीसरी बार उसने यह क़दम उठा ही लिया | 

"बत--- दिस इज़ थेफ़्ट ----"कुछ विचारते हुए शीनोदा के मुख से तुरंत ही निकला | 

"दिस इज़ नॉट गुद  -----" वह इस बात को सुनकर हँस नहीं सका था जबकि और सब दाँत फाड़ रहे थे | न जाने कितनी बार यह बात मज़ाक में दोहराई जा चुकी थी और एक अजेय पराक्रमी की भाँति वह ख़ुद भी सबके साथ मिलकर उस घटना को एंजॉय करती रही थी | पर शीनोदा का चेहरा देखकर और उसके मुख से ये बात सुनकर सबके चेहरे फक्क पड़  गए | एक ऐसे विदेशी बंदे के सामने उसकी इज्ज़त का जुलूस निकल गया था जो गाँधी जी के संस्थान में चरित्र की परिभाषा गढ़ने आया था |लगा, ग़लत हो गया है, उसे क्या और कैसे बताते कि यह न करते तो उसके जैसे लोग तो पड़े रहते बिना परिणाम के एक ही कक्षा में जाने कितने साल ! 

         वह कहाँ समझ सकता था उसकी परेशानी को कि एक गृहिणी व माँ के लिए कितना मुश्किल होता है सब कुछ सँभालते  हुए इस प्रकार से शिक्षा ग्रहण करना ! जूझना पड़ रहा था उसे अपने इस प्रौढ़ावस्था के  शिक्षण की मुहब्बत से ! 

      अभी तो वह जापानी नया-नया रंगरूट था, भारत के लोगों को कहाँ समझता ?वह  अपने भीतर सरलता, सादगी, सत्यता का एक जुनून भरकर आया था | गाँधी जी के विचारों से प्रभावित वह गांधियन दर्शन को स्टडी करना चाहता था, यहाँ की भाषा सीखना चाहता था| भारत के लोगों से रूबरू होना चाहता था --'ये उसके सामने क्या बात कर दी?' आना  ने आँखें तरेरीं पर तीर तो कमान से निकल चुका था |     

       अच्छा यह हुआ कि उसी समय उसके गाईड ने  उसे बुलाने के लिए चपरासी को भेजा और वह अपना मुखड़ा छिपाकर वहाँ से ---"एक्सक्यूज़ मी ----" कहकर भाग खड़ी हुई  | प्रश्न हवा में लटकता रह गया और उस दिन की मीटिंग डिस्पर्स हो गई |     

      पता चला, उस जापानी लड़के ने एक सप्ताह के भीतर ही हिंदी व गुजराती की कक्षाओं में प्रवेश ले लिया और वह बड़े ज़ोर-शोर से पढ़ाई में मशगूल होने लगा | गुजरात विद्यापीठ की सादी, सरल जीवन-शैली के प्रति वह बेहद आकर्षित था और उसमें अपने आपको ढालने की चेष्टा कर रहा था |कुछ चीज़ें तो वह समझ ही न पाता, कोई दूसरा उसे जैसा चित्र दिखा दे, वह उस पर आँख मूँदकर विश्वास कर लेता |वह कभी सोच ही नहीं सकता था कि यहाँ पर ‘मुँह में राम, बगल में छुरी ‘भी संभव हो सकता है !   

      हॉस्टल के लड़कों से उसने चरखा चलाना  सीख लिया था और अब वह धीरे-धीरे उसे  चलाने की प्रैक्टिस भी कर रहा था |वह कई जगहों पर 'डबल स्टैंडर्ड' देखकर विचलित होता और उन टॉपिक्स पर चर्चा करने की चेष्टा करता | किन्तु उसे कोई भी संतुष्ट उत्तर नहीं दे पाता था| उसके सीधे-सपाट परोसे गए प्रश्नों के उत्तर सब टेढ़ी-मेढ़ी गलियों में से होकर ही निकलते थे | 

       हाँ, वह सबसे हर रोज़ मिलता था, साथ में चाय भी पीता किन्तु उसने उस घटना के बारे में दुबारा कोई ज़िक्र नहीं किया था और अब वह बहुत सी बातों को छेड़ता भी नहीं था | सो सब रिलैक्स्ड से हो गए थे |वैसे, वह तेज़ मस्तिष्क का था और एक-एक बात पर दृष्टि गड़ाकर रखता था |धीरे-धीरे वातावरण में पसरी वास्तविकता को वह समझने की कोशिश करने लगा, चुप रहने में ही शायद उसे समझदारी लगी |               

      पता ही नहीं चला छह माह कहाँ बीत गए, अब तक शीनोदा  कुछ-कुछ हिंदी और गुजराती के टूटे-फूटे वाक्यों में अपनी बात बताने की शुरुआत कर चुका था | राजेंद्र  के नौकरी पर जाने के दिन नज़दीक आ रहे थे |सब व्यस्त थे किन्तु शरारतों के लिए समय निकाल ही लेते थे,  उनकी दोस्त गिलहरियाँ भी जैसे अपने दोस्तों के आने की प्रतीक्षा करती  रहतीं |