Prem n Haat Bikaay - 11 in Hindi Love Stories by Pranava Bharti books and stories PDF | प्रेम न हाट बिकाय - भाग 11

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 11

11 --

 

     हाँ, बात उस गुजराती लड़के की थी लेकिन यह कथा याद आ गई | इस दुनिया में न जाने कितने रंग के लोग मिलते रहते हैं जिनसे बचकर चलना पड़ता है | उसका नाम तो शायद केतन पटेल या ऐसा ही कुछ था किन्तु भगवान ने उसे कुछ अलग ही सा बनाकर भेजा था | दुबला, पतला, श्यामवर्णी ! जबड़े में दूरी-दूरी पर जैसे जबरन दाँत घुसा दिए गए हों, ऎसी मुख से बाहर दर्शन देती हुई दंतमुक्तावली ! इसकी भी कोई बात नहीं, अब हर बंदा ही कामदेव हो ज़रूरी तो नहीं  लेकिन जो कुछ वह कर सकता  था जब उसमें कोताही करता तो अनु के भीतर आग लग जाती | 

     जब भी वह पास आता, उसके मुख से दुर्गंध के भभके फूट पड़ते थे |जाने उसके दाँतों में पायरिया(एक प्रकार की दाँतों की बीमारी जिससे मुख में दुर्गंध आने लगती है ) था या वह ठीक से मुँह साफ़ नहीं करता था या और कुछ लेकिन उसके मुख की दुर्गंध से सब दूर भागते | न जाने क्यों वह अनामिका दीदी से कुछ अधिक ही मुहब्बत करने लगा था | 

" दीदी ! जरा एटलु समझावशो ?"(ज़रा, यह समझा देंगी ? )कहकर वह उसके पास खिसक आता और अनामिका  की हालत उल्टी  करने जैसी हो जाती | 

भारती उसकी इस दशा पर खूब हँसती थी ;

"दीदी! समझाओ न ! "भारती उसे चिढ़ाते हुए  कहती | उसने इस बेचारे से बंदे का नाम 'बाँगड़ू' रख दिया था | 

"मुझे नहीं आता, भारती से समझ लो ---" वह पीछा छुड़ाने की कोशिश करती | 

"पण फर्स्ट तो तमे छो ---"(पर, फ़र्स्ट तो आप आती हो न ?) वह ढीठ बनकर कहता |  

"हाँ, फ़र्स्ट तो ये ही आती हैं न !तो --समझा दो न बच्चे को --"वह दाँत फाड़ती हुई कहती और आना की दृष्टि केतन के पीले पड़े, छितरे दाँतों पर पड़ती ---दूरी से ही  केतन या बाँगड़ू के मुख से निकली दुर्गंध  जैसे उसके पास आने लगती और वह अजीब सी हो उठती | 

"मुझे घर भागना है, बच्चे अकेले हैं ---वह वहाँ से खिसकती | 

     एक-दो बार ऐसा भी हुआ कि वह बैंक गई, काउंटर से पीछे घूमकर जैसे ही पीछे मुड़ी केतन को खड़ा पाया | 

"तो हूँ तमारे घरे आऊँ ---त्यां --समझावशो?" (मैं आपके घर आ जाऊँ, वहाँ पढ़ा देंगी?"

अनु का मन होता थप्पड़ खींचकर दे मारे --

"नहीं, जाकर गुरु जी से पढ़ो न ---" उस दिन तो उसके मुख की दुर्गंध आना के सिर पर  ऎसी चढ़ी कि उसे बामुश्किल मुँह पर हाथ रखकर भागकर बैंक के दरवाज़े के बाहर रखे डस्टबिन तक पहुँचना ज़रूरी हो गया | 

     उसने पहले अपने कंधे पर लटके खादी के  झोले से पानी की बॉटल  निकालकर साइड में कुल्ला किया, चेहरे व आँखों पर छींटे मारे फिर  किनारे की पान की दुकान से एक खुशबू वाला पान लेकर मुह में दबाया और वहीं खड़े ऑटो में बैठकर भाग खड़ी हुई |बांगड़ू बैंक के सिंह द्वार पर खड़ा आँखें पटपटाते हुए उसे देखता रह गया था |अगले दिन उसने अपने चौकीदार से सामने वाले बँगले में खड़े विशाल कड़वे नीम के पेड़ पर से काफ़ी सारी डंडियाँ तुड़वाईं, उन्हें एक डोरी से बाँधकर ‘बाँगड़ू’के डेस्क पर रख दीं |पता नहीं उसे कुछ समझ नहीं आया क्या ? वह  मूर्खों  की तरह आँखें पटपटाता कभी उन नीम की डंडियों को, कभी आना के चेहरे को घूरता रहा |     

       कक्षा में सबके चेहरों पर मुस्कान नाच उठी लेकिन वह ---!! शेष सब  तो ठीक-ठाक ही था, लेकिन तीन लोगों से अनामिका को बड़ी घबराहट होने लगी थी | गुरु जी(डॉ.त्यागी), बाँगड़ू और भारती | इनकी तिगड़ी कुछ न कुछ ऐसे करतब करती रहती कि बस, एंटरटेनमेंट तो रहता लेकिन  वातावरण असहज  हो जाता | 

"तुम्हें पता है अपने गुरु जी ---स्टूडेंट्स को जो छात्रवृत्ति मिलती है उसमें से कुछ न कुछ डिमांड करते हैं ?" भारती ने एक दिन जैसे राज़ की बात खोलते हुए उससे पूछा | 

"मुझे कैसे पता ?" 

"हाँ, तुम्हें तो कैसे पता होगा ?" वह चुप्पी साध गई | 

      कन्नड़भाषी होने के कारण उसे न जाने कौनसी छात्रवृत्ति मिलती थी जिसके बारे में अनु को कोई ज्ञान न था, न ही कभी  उसने उससे  पूछा था| उन दिनों विद्यापीठ में न  जाने कितनी भिन्न-भिन्न छात्रवृत्तियाँ अलग-अलग वर्गों में दी जाती थीं |  

    वैसे भी अनामिका इन बेकार की बातों के लपेटे में आना नहीं चाहती थी | बड़े आराम से बात एक-दूसरे के सिर पर से गुज़रती हुई मीलों लंबी यात्रा कर लेती !अब वह कोई सोलह साल की तो थी नहीं जो किसी बकवासबाज़ी में पड़ती |  

       भारती 'लेडीज़ हॉस्टल' में रहती थी | कैम्पस में ही प्रोफ़ेसर्स क्वाटर्स भी थे, गुरु जी की पत्नी से पहचान होना स्वाभाविक ही था | रास्ते तो वही होते हैं, उधर से ही सब लोग आते-जाते | 

"सुनो अनामिका !कल तो मैं बुरी फँस गई --" भारती एक सोमवार को अनु से बोली | 

"क्यों, क्या हुआ ?"

"अरे !कल गुरुआनी जी ने अपने बेटे को मुझे बुलवाने भेजा था| "

"तब तो कल का दिन बहुत अच्छा बीता होगा --?"आना ने सहज रूप से पूछा|

    गुरु जी की पत्नी बड़ी स्नेहिल थीं, वे कभी ज़बरदस्ती चाय पिलाने आना को भी अपने साथ ले जाती थीं | स्वयं भी शिक्षिका थीं और अक्सर अपने स्कूल से लौटते समय उससे मिलने लायब्रेरी में पहुँच जाती थीं | भारती को भी वे बहुधा चाय-नाश्ता करने खींच ले जातीं |  

"अरे भैया, कल मुझे पिक्चर दिखाने ले गए हमारे गुरु जी --" 

"देखा, कितने अच्छे हैं, जानते हैं न अकेली रहती हो, इसलिए --"

"हाँ, भई पिक्चर तो देखी पर कम से कम दस बार सुनना पड़ा ;

"देखिए, भारती बहन ! हम आपको फ़्री में पिक्चर दिखाने  लाए हैं -"

     आना यह सब सुनकर चुप ही बनी रही, कहीं से फ़्री के पास मिल गए होंगे और उनके पास एक पास एक्स्ट्रा होगा !जानती तो थी ही स्वभाव !मज़े की बात यह कि उसके एक भी शब्द न बोलने पर भी बात न जाने कहाँ लीक हो गई थी | न जाने भारती ने हॉस्टल में किस-किससे बात साझा कर ली थी जिसका बतंगड़ बनकर गुरु जी के पास पहुँच गया था और भारती की आई बनी थी | 

   अनामिका को इन सब बेकार की बातों में उलझने का कोई शौक नहीं था, न ही अपनी गृहस्थी से फ़ुरसत ! वह चुपचाप उस जगह से हट जाती जहाँ ऎसी मसालेदार चर्चाओं का बाज़ार गर्म होता |  

      अनामिका इस बात से संतुष्ट थी व संवेदनशीलता से भर उठती थी कि विवेक उसके लिए बहुत खुश हैं  , एक कोमल संतुष्टि की आभा उनके चे

 

 

3 हरे पर पसरी रहती जबकि उसने अपने समाज में अधिकतर ऐसे पतियों को देखा था जो पत्नियों से बहुत कुछ अपेक्षा करते पर उनका साथ देने के लिए किसी भी प्रकार से तत्पर न होते, विवेक आना  को अपने साथ सदा खड़े मिले |      

     आख़िर अनामिका ने टॉप करके विश्वविद्यालय में एक विशिष्ठ स्थान प्राप्त कर ही लिया | अनामिका विवेक के मित्रों, सहयोगियों व संबंधियों में अब प्रेरणा-स्त्रोत के रूप में पहचानी जाने लगी थी | 

    अब उसके साथ विवेक की भी इच्छा बलवती हो चली थी  कि अनामिका को पीएच.डी कर लेना चाहिए| डॉ.त्यागी के सामने बात आई ;

"बहन, हमारे विचार में तो आपको पहले एम.फ़िल करना चाहिए | आपको पूरी तरह ख्याल आ जाएगा कि पीएच. डी में 'टेबल-वर्क' कैसे करना है --?"आदत थी गुरु जी की, सीधे रास्ते तो चलना ही नहीं, बीच में गड्ढ़े, खाइयाँ तो होनी ही चाहिएँ ---| 

"सर--वो तो पहले वर्ष में ख्याल आ ही जाएगा ---तो --"उसने थोड़ा सा समझाने की चेष्टा की, मनाने की चेष्टा की लेकिन वो तो गुरु जी थे, उन्हें समझाना आसान तो था नहीं|