Checkpost: Chanakya - 4 in Hindi Comedy stories by Ashish jain books and stories PDF | चेकपोस्ट:चाणक्य - 4

Featured Books
Categories
Share

चेकपोस्ट:चाणक्य - 4


एक. आशीष भाई का' ऑफिस- एग्जिट' और आजादी का सपना
आशीष जैन के लिए उनकी सफेद एक्टिवा कोई साधारण मशीन नहीं, बल्कि एक' टाइम मशीन' है. जैसे ही वह ऑफिस की कांच वाली बिल्डिंग से बाहर कदम रखते हैं, उनके दिमाग में एक ही धुन बजती है—" आजादी! वह अपनी उंगलियों से एक्टिवा की चाबी को वैसे ही नचाते हैं जैसे कोई जासूस अपनी गन लोड कर रहा हो. उनके लिए ऑफिस की वह आठ घंटे की कैद, फाइलों का वह पहाड और बॉस की वह' डेडलाइन' वाली धमकियां, सब कुछ पीछे छूटने ही वाली होती हैं.

वह हेलमेट पहनते समय शीशे में अपना चेहरा देखते हैं और खुद को किसी' मिशन इम्पॉसिबल' के हीरो से कम नहीं समझते. उन्हें लगता है कि बस अब एक्सीलरेटर मरोडना है और हवा से बातें करते हुए घर की रसोई से आने वाली तडके की खुशबू में खो जाना है. लेकिन वह भूल जाते हैं कि इस' स्वतंत्रता संग्राम' के बीच में एक बहुत बडा रोडा है—चाणक्य. गली का वह कुत्ता जो खुद को उस सडक का अघोषित' चीफ जस्टिस' समझता है.

दो. चाणक्य: गली का' मोसाद' एजेंट
चाणक्य के बैठने का अंदाज ही उसकी शख्सियत बयां कर देता है. वह किसी आम कुत्ते की तरह अपनी पूंछ नहीं हिलाता, वह अपनी एक आँख खोलकर आशीष भाई के चेहरे के हाव- भाव पढता है. उसे पता है कि आशीष भाई की दाईं जेब में बिस्किट का पैकेट है और बाईं जेब में ऑफिस की झुंझलाहट. चाणक्य की नाक की शक्ति' इसरो' के सेंसर से भी तेज है. उसे पता चल जाता है कि आज बिस्किट' ग्लूकोज' वाला है या' मल्टीग्रेन'

वह अपनी पलटन को दूर से ही एक' सिग्नल' देता है. उसकी पलटन—जिसमें शेरू जैसा आलसी और कालू जैसा लपका कुत्ता शामिल है—सिर्फ जमीन पर गिरने वाले चूरे के इंतजार में रहती है. लेकिन चाणक्य का लक्ष्य बडा है. वह' रिटेल' में नहीं, होलसेल' में यकीन रखता है. वह जानता है कि अगर उसने जमीन पर बिस्किट खाया, तो वह सिर्फ एक कुत्ता कहलाएगा, लेकिन अगर उसने एक्टिवा पर कब्जा कर लिया, तो वह' महाराजा' कहलाएगा.

तीन. धब' की आवाज और एक्टिवा का सरेंडर
आशीष भाई ने जैसे ही अपनी' एस्केप गन' (एक्टिवा) का इंजन स्टार्ट किया और घर की ओर पहला कदम बढाया, वैसे ही एक ऐसी घटना हुई जिसने भौतिक विज्ञान के सारे नियम तोड दिए. अचानक, बिना किसी चेतावनी के, साठ किलो का एक रोएंदार, मांसल और बेहद जिद्दी शरीर एक्टिवा के फ्लोरबोर्ड पर ऐसे लैंड हुआ जैसे कोई उल्कापिंड सीधे पृथ्वी से टकराया हो.

धब! एक्टिवा के अगले टायरों ने दम तोड दिया और सस्पेंशन' चीं- चीं' करके रोने लगा. आशीष भाई के पैर जो अभी तक आराम से फ्लोरबोर्ड पर टिके थे, अब हवा में लटक रहे थे. चाणक्य ने वहां अपनी' रियासत' स्थापित कर ली थी. उसने अपने पिछले पंजों को एक्टिवा की बॉडी के दोनों तरफ ऐसे फैलाया जैसे वह कोई हार्ले डेविडसन चला रहा हो. उसकी पूंछ आशीष भाई के घुटनों को ऐसे सहला रही थी, जैसे कोई टैक्स वसूलने वाला अधिकारी अपने शिकार को दिलासा दे रहा हो कि—" घबराओ मत, बस टैक्स (बिस्किट) चुका दो और आजाद हो जाओ।

चार. पुश्तैनी पालकी" बनाम मिडिल क्लास एक्टिवा
आशीष भाई हक्के- बक्के रह गए. अरे ओ चाणक्य के अवतार! ये क्या बदतमीजी है भाई? पूरा पैकेट तेरे पेट के हवाले कर दिया, अब क्या मेरी एक्टिवा का' नामकरण' अपने नाम करवाएगा? उतर नीचे, मुझे घर जाना है, बीवी इंतजार कर रही है!

लेकिन चाणक्य के चेहरे पर जो शांति थी, वह किसी बौद्ध भिक्षु जैसी थी. उसने आशीष भाई की बातों को ऐसे अनसुना किया जैसे कोई नेता चुनाव के बाद अपनी जनता की शिकायतों को करता है. उसने अपनी ठुड्डी आशीष भाई के जूतों पर ऐसे टिका दी जैसे वह उसका पुश्तैनी तकिया हो. उसके शरीर की गर्मी आशीष भाई के पैरों को यह एहसास करा रही थी कि यह कब्जा अल्पकालिक नहीं, बल्कि' लॉन्ग- टर्म' है.

पाँच. अन्ना हजारे का' मौन सत्याग्रह' मोड
चाणक्य ने अब अपना सबसे खतरनाक हथियार निकाला—' मौन सत्याग्रह' उसने अपनी आँखें आधी बंद कर लीं. वह न भौंक रहा था, न गुर्रा रहा था. वह बस' था' उसकी मौजूदगी ही आशीष भाई के लिए एक चुनौती बन गई थी. जब आशीष भाई ने एक्टिवा को थोडा झटका देकर उसे उतारने की कोशिश की, तो चाणक्य ने एक ऐसी गहरी और ठंडी सांस छोडी जो सीधे आशीष भाई के कलेजे को चीर गई.

उस सांस का मतलब साफ था—" आशीष भाई, ये ओछी हरकतें मत करो. मैं वो कुत्ता नहीं हूँ जो डंडा दिखाने से भाग जाए. मैं वो हूँ जिसने' चाणक्य नीति' खुद लिखी है. अब ये गाडी तभी हिलेगी जब मेरा मन करेगा. या तो तुम मुझे घुमाने ले चलो, या फिर वो दूसरा पैकेट खोलो जो तुमने अपनी डिक्की के गुप्त कोने में छिपाकर रखा है। आशीष भाई को पहली बार लगा कि वह अपनी ही गाडी में' किराएदार' बन गए हैं और चाणक्य' मकान मालिक' की तरह किराया (बिस्किट) वसूलने पर अडा है.

छह. कूटनीतिक शिकंजा और' बॉडीगार्ड' की मजबूरी
आशीष भाई के दिमाग में अब अजीब- अजीब ख्याल आने लगे. वह सोचने लगे कि अगर वह चाणक्य को लेकर सडक पर निकले, तो लोग क्या कहेंगे? देखो भाई, जैन साहब का नया ड्राइवर कितना रोएंदार है! या फिर अगर अगली गली के कुत्तों ने चाणक्य को देख लिया, तो वे इसे' विदेशी घुसपैठिया' मानकर हमला कर देंगे. और उस हमले में, उन्हें खुद चाणक्य को बचाना पडेगा.

यहाँ चाणक्य की कूटनीति की सबसे बडी जीत थी—उसने आशीष भाई को अपना' बॉडीगार्ड' बना लिया था. आशीष भाई को अपनी एक्टिवा से ज्यादा इस' बूढे डॉन' की सुरक्षा की फिक्र होने लगी थी. चाणक्य ने बडी चतुराई से सत्ता का केंद्र बदल दिया था. अब वह सवारी नहीं था, वह' सवारी का मालिक' था. आशीष भाई केवल एक' वैतनिक ड्राइवर' बनकर रह गए थे, जो अपनी ही एक्टिवा का एक्सीलरेटर घुमाने के लिए चाणक्य की' लिखित अनुमति' का इंतजार कर रहे थे.

अगले भाग (भाग दो) में हम देखेंगे कि कैसे आशीष भाई की पत्नी इस दृश्य को' लाइव' एन्जॉय करती हैं और कैसे' एग्जिट टैक्स' के रूप में अंतिम बिस्किट की वसूली होती है.