Checkpost: Chanakya - 3 in Hindi Comedy stories by Ashish jain books and stories PDF | चेकपोस्ट:चाणक्य - 3

Featured Books
Categories
Share

चेकपोस्ट:चाणक्य - 3

​द 'घोस्ट' एंट्री: सन्नाटा, एक्टिवा और अचानक प्रकट हुई 'बारात'

​संसार की सबसे शांत जगह क्या है? हिमालय की गुफा? नहीं। रात के ३ बजे का पुस्तकालय? बिल्कुल नहीं। संसार की सबसे शांत जगह वह सड़क होती है जहाँ आशीष जैन की एक्टिवा रुकने वाली होती है। चाणक्य की शातिरपंथी का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वह 'भीड़ की मनोविज्ञान' (Crowd Psychology) का ऐसा मास्टर है, जिसके सामने हार्वर्ड के प्रोफेसर भी ट्यूशन पढ़ने आएँ।​चाणक्य जानता है कि 'अकेले' संघर्ष करने में वो मज़ा नहीं है जो 'यूनियन' बनाकर लूटने में है। वह अच्छी तरह समझता है कि अगर वह अकेला खड़ा होकर पूंछ हिलाएगा, तो आशीष भाई उसे एक-दो बिस्किट "ले बेटा, मौज कर" कहकर टरका देंगे। लेकिन अगर सड़क पर एक पूरी 'बिस्किट-बरात' खड़ी हो जाए, तो आशीष भाई को 'नैतिक दबाव' (Moral Pressure) और जैन धर्म के 'करुणा' भाव के चलते पूरा पैकेट ही समर्पित करना पड़ेगा।​जैसे ही आशीष की एक्टिवा का स्टैंड नीचे गिरता है और उनके हाथ की सुगबुगाहट बिस्किट के पैकेट की ओर होती है, एक अलौकिक चमत्कार होता है। अभी एक सेकंड पहले सड़क ऐसी खाली थी मानो वहाँ कोई प्रलय आई हो और इंसानी बस्ती उजड़ गई हो। लेकिन जैसे ही बिस्किट के पैकेट की वह 'कड़कड़ाहट'—जिसे चाणक्य अपनी डिक्शनरी में 'स्वर्ग का संगीत' कहता है—गूंजती है, दृश्य बदल जाता है।​अचानक, दीवारों की दरारों से, खड़ी कारों के 'डिफरेंशियल' के नीचे से, बिजली के खंभों की ओट से और बंद दुकानों के शटर के नीचे वाले गैप से चार-पांच 'चेले-चपाटे' ऐसे प्रकट होते हैं जैसे फिल्म 'टर्मिनेटर' में टी-1000 रोबोट पिघलकर ज़मीन से निकलता है। आशीष भाई अपनी आँखें मलते रह जाते हैं— "अबे! अभी तो कोई नहीं था, ये अचानक पूरी 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' कहाँ से आ गई? क्या ये सब ज़मीन फाड़कर निकले हैं या पैकेट की आवाज़ सीधे इनके सैटेलाइट रिसीवर में गई है?"​चाणक्य: द अनडिस्प्यूटेड 'गॉडफादर'

​इस पूरी पलटन का बॉस, चीफ कमांडर और स्वयंभू गॉडफादर हमारा 'चेकपोस्ट चाणक्य' ही है। यहाँ एक गजब का अनुशासन देखने को मिलता है। चाणक्य बीच में ऐसे खड़ा होता है जैसे बाहुबली युद्ध के मैदान में खड़ा हो। बाकी चार-पाँच कुत्ते उसके पीछे एक 'अर्ध-चंद्राकार' (Semi-circle) आकृति में खड़े हो जाते हैं। यह कोई संयोग नहीं है; यह एक सोची-समझी 'ब्लैकमेलिंग फॉर्मेशन' है।​चाणक्य एक बार अपनी गर्दन घुमाकर पीछे मुड़ता है और सबको ऐसी 'तिरुची लुका' (तिरछी नज़र) देता है कि सारे के सारे 'चेले' अपनी जगह पर पत्थर की मूर्ति (स्टेचू) बन जाते हैं। उसकी आँखों का संदेश बिल्कुल क्रिस्टल क्लियर होता है— "लाइन में रहो लड़कों! प्रोटोकॉल मत तोड़ना। पहले 'सीएम' (चाणक्य महाराज) का ट्रांजेक्शन होगा, उसके बाद तुम सबको चिल्लर मिलेगी। जिसने बीच में टांग अड़ाई, उसे मोहल्ले के डस्टबिन में डिपोर्ट कर दिया जाएगा!"​आशीष भाई बेचारे धर्म संकट में पड़ जाते हैं। एक तरफ उनका प्रेम 'चाणक्य' के लिए है, और दूसरी तरफ ये पूरी 'बीपीएल' (बिस्किट पालिसी लाभार्थी) गैंग खड़ी है। जैन संस्कारों के अनुसार, "सबको साथ लेकर चलना" उनकी रगों में है, और चाणक्य इसी बात का फायदा उठाता है।​५जी स्पीड और बिस्कुटी जीएसटी रेड

​जैसे ही आशीष भाई पहला बिस्किट हवा में उछालते हैं, चाणक्य की फुर्ती देखने लायक होती है। वह कुत्ता, जो पाँच मिनट पहले अपनी टांग पर मक्खी बैठने पर भी उसे हटाने का आलस कर रहा था, अचानक 'उसैन बोल्ट' की आत्मा धारण कर लेता है। ५जी की स्पीड तो इसके सामने बैलगाड़ी लगे! वह हवा में ही बिस्किट को ऐसे लपकता है जैसे कोई एंटी-मिसाइल सिस्टम दुश्मन की मिसाइल को आसमान में ही ढेर कर देता है।​बिस्किट की नियति भी बड़ी दुखद है—उसे पैकेट से निकलने के बाद यह सोचने का मौका भी नहीं मिलता कि वह पार्ले-जी है या मैरी गोल्ड; वह सीधे चाणक्य के जठराग्नि (पेट की आग) में विलीन हो जाता है।​अपना हिस्सा सुरक्षित करते ही, चाणक्य का अगला अवतार शुरू होता है— 'विजिलेंस ऑफिसर कम इनकम टैक्स रेडर'। वह खुद का बिस्किट निगलने के बाद ज़मीन पर अपनी नाक ऐसे रगड़ने लगता है जैसे कोई जासूसी कुत्ता बम ढूंढ रहा हो। वह बाकी कुत्तों के पास जाकर उनके मुँह की गंध सूँघता है कि कहीं आशीष भाई ने किसी को 'प्रीमियम' टुकड़ा तो नहीं दे दिया। उसकी नज़रें आशीष भाई के हाथों पर ऐसी टिकी होती हैं जैसे कोई जीएसटी ऑफिसर किसी व्यापारी के कच्चे बिलों के खातों पर रेड मार रहा हो।​द 'प्लेट-स्वैपिंग' स्कैम: चाणक्य की शुद्ध दबंगई

​चाणक्य की असली कॉमेडी तब शुरू होती है जब वह देखता है कि 'मंगू' (उसका सबसे भोला चेला) बिस्किट चबाने में थोड़ी सुस्ती दिखा रहा है। मंगू ठैरा थोड़ा दार्शनिक कुत्ता; वह बिस्किट को पहले सूंघता है, फिर सोचता है कि इसका 'स्वाद' कैसा होगा।​यही उसकी सबसे बड़ी भूल है। जैसे ही मंगू बिस्किट का आनंद लेने के लिए अपनी आँखें बंद करता है, चाणक्य एक ऐसी ज़ोरदार और डरावनी 'गुर्राहट' मारता है जो सीधे मंगू के दिल के वॉल्व हिला देती है। बेचारा मंगू डर के मारे तीन फीट ऊपर हवा में उछल जाता है। जब तक वह ज़मीन पर लैंड करता है और अपनी चेतना वापस पाता है, तब तक उसकी 'प्लेट' (ज़मीन का वह कोना जहाँ बिस्किट गिरा था) बिल्कुल साफ हो चुकी होती है। चाणक्य वहाँ खड़े होकर अपनी मूंछें चाट रहा होता है।​आशीष भाई यह सब देखकर अपना सिर पकड़ लेते हैं— "अरे ओ चाणक्य! तूने तो अभी-अभी अपना कोटा पूरा किया है। अब इस गरीब के मुँह का निवाला क्यों छीन रहा है? थोड़ी तो शर्म कर, कम से कम यहाँ तो जैन धर्म के 'अपरिग्रह' सिद्धांत का पालन कर!"​पर चाणक्य के चेहरे पर वही 'अक्षय खन्ना' वाली शातिर मुस्कान होती है, जो कह रही होती है— "आशीष भाई, ज्ञान मत दीजिए। यह 'मैनेजमेंट टैक्स' है। इतनी बड़ी फौज को मैनेज करने के लिए एक्स्ट्रा कैलोरी लगती है। लीडर होने का खर्चा बहुत है भाई!"​टेरिटरी का खौफ: 'द वन मैन शो'

​पूरी पलटन में किसी की मजाल नहीं कि चाणक्य के खिलाफ 'लोकपाल' में शिकायत कर दे। उन्हें पता है कि इस सड़क का एकमात्र 'डिस्ट्रीब्यूटर' चाणक्य ही है। अगर चाणक्य ने अपनी कूटनीति से आशीष जैन को यह समझा दिया कि "बाकी सब कुत्ते फालतू हैं", तो कल से इनका बिस्किट कोटा पूरी तरह बंद हो जाएगा।​चाणक्य ने पूरे मोहल्ले के कुत्तों के बीच यह अफवाह फैला रखी है कि आशीष भाई और उसका रिश्ता पिछला जन्मों का है। उसने चेलों को बता रखा है कि आशीष भाई सिर्फ उसके 'पर्सनल इन्वेस्टर' हैं और बाकी सब तो बस 'बैकग्राउंड डांसर' की तरह भीड़ बढ़ाने के लिए बुलाए गए हैं।​क्लाइमैक्स: डकार और 'वसूली भाई' का विश्राम

​जैसे ही पैकेट का अंतिम कोना झाड़कर आशीष भाई यह घोषणा करते हैं कि "खत्म हो गया भाई, अब कल आना", चाणक्य का व्यवहार तुरंत बदल जाता है। जैसे किसी फिल्म की शूटिंग खत्म होते ही बड़ा हीरो अपने वैनिटी वैन में भाग जाता है, वैसे ही चाणक्य एक लंबी, तृप्त डकार (जो सिर्फ आशीष भाई के दिल को सुनाई देती है) लेता है।​वह धीरे से चलकर आशीष भाई की एक्टिवा के पिछले टायर के पास जाकर ऐसे लेट जाता है जैसे वह उस टायर का 'गार्ड' हो। बाकी पलटन, जो अब तक पूछ हिला रही थी, चाणक्य की एक चेतावनी भरी नज़र देखते ही समझ जाती है कि "शो ओवर, गो होम"। वे सब दुम दबाकर पतली गलियों में ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे वे कभी थे ही नहीं।​आशीष भाई अपनी खाली जेब और बिस्किट के उस खाली प्लास्टिक के पैकेट को देखते हैं जो अब केवल हवा से भरा है। वे मुस्कुराते हुए एक्टिवा स्टार्ट करते हैं और मन ही मन सोचते हैं— "लोग कहते हैं दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन खतरनाक माफिया हैं, उन्हें एक बार मेरे 'चेकपोस्ट चाणक्य' से मिलना चाहिए। यह कुत्ता तो बिना गोली चलाए, सिर्फ कूटनीति और 'इमोशनल अत्याचार' से पूरा पैकेट डकार गया!"