A relationship tied in the rain in Hindi Love Stories by ziya books and stories PDF | बारिश में बंधा रिश्ता

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बारिश में बंधा रिश्ता

भाग 1


बारिश उस रात कुछ ज़्यादा ही बेरहम थी।
आसमान से गिरती हर बूँद जैसे किसी गुनाह की

गवाही दे रही हो। हवेली के पुराने फाटक के बाहर खड़ी मीरा की साड़ी पूरी तरह भीग चुकी थी, बाल उसके चेहरे से चिपके थे, और आँखों में सिर्फ़ एक


सवाल—
“क्या यही मेरी ज़िंदगी का फ़ैसला है?”
उसके सामने खड़ा था आरव सिंह राठौर।

लंबा, चौड़े कंधे, तीखी आँखें—और चेहरा ऐसा, जैसे पत्थर पर उकेरा गया हो। बारिश उसके काले कोट से फिसल रही थी, लेकिन उसकी आँखों में ज़रा भी नमी नहीं थी।
“मैंने कहा था… देर मत करना,”
उसकी आवाज़ भारी थी। सख़्त।

हुक्म जैसी।
मीरा ने होंठ भींच लिए।
“ये शादी मेरी मर्ज़ी से नहीं हो रही, आरव,”
उसकी आवाज़ काँप गई

आरव एक क़दम आगे बढ़ा। अब उनके बीच सिर्फ़ साँसों की दूरी थी।
“और मेरी ज़िंदगी भी मेरी मर्ज़ी से नहीं चली, मीरा।”
उसने अचानक मीरा की कलाई पकड़ी। पकड़ में ग़ुस्सा नहीं था… कुछ और था—दबा हुआ, खतरनाक।
“अंदर चलो,”
बस इतना कहा।
तीन दिन पहल
मीरा की दुनिया बहुत छोटी थी।
एक स्कूल, एक माँ, एक छोटा-सा घर और ढेर सारे सपने 
उसके पिता की मौत के बाद ज़िंदगी जैसे थम गई थी, लेकिन मीरा ने हार नहीं मानी। वो पढ़ती थी, बच्चों को ट्यूशन देती थी और माँ के इलाज के लिए पैसे जोड़ती थी।
उसी दिन जब सब कुछ टूटा—
मीरा स्कूल से लौट रही थी।

एक काली SUV उसके सामने रुकी।
“मीरा वर्मा?”
ड्राइवर ने पूछा।

“हाँ…?”
“आपको हमारे साथ चलना होगा।”
“क्यों?”

पीछे का दरवाज़ा खुला… और पहली बार उसने आरव को देखा।
उसकी आँखें
मीरा को लगा जैसे किसी ने उसकी पूरी ज़िंदगी पढ़ ली हो।
“क्यों?”
मीरा ने फिर पूछा।

आरव ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
“क्योंकि तुमने वो गलती कर दी है, जिसकी क़ीमत अब तुम्हें चुकानी होगी।”

राठौर हवेली
हवेली पुरानी थी, लेकिन डरावनी नहीं—
डरावना था वहाँ पसरा सन्नाटा।

मीरा को एक बड़े हॉल में खड़ा कर दिया गया। सामने एक औरत बैठी थी
सख़्त चेहरा, भारी ज़ेवर, ठंडी नज़र।
“ये वही है?”

औरत ने आरव से पूछा।
“हाँ, बुआ,”

आरव की आवाज़ सपाट थी।
मीरा ने काँपती आवाज़ में कहा,
“मुझे यहाँ क्यों लाया गया है?”

औरत उठी, मीरा के सामने आई।
“क्योंकि तुम्हारे पिता ने एक वक़्त पर हमारे परिवार से उधार लिया था।”
मीरा चौंकी।
“मेरे पापा…?”
“और वो कर्ज़ आज भी बाकी है।”
मीरा ने सिर हिलाया।
“मेरे पापा की मौत हो चुकी है। मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता।”
आरव ने पहली बार सीधे उसकी आँखों में देखा।
“कर्ज़ खून से भी उतरता है, मीरा।”
सच जो ज़हर बन गया
मीरा को पता चला—

उसके पिता ने आरव के पिता से बहुत बड़ा कर्ज़ लिया था।

और मरते-मरते वो कर्ज़ मीरा के नाम छोड़ गए।
“मैं पैसे लौटा दूँगी,”

मीरा ने कहा।
“काम करूँगी… लेकिन शादी—”
“नामुमकिन,
आरव ने बीच में काट दिया।
“राठौर परिवार का कर्ज़ दो तरह से चुकता होता है—
या तो पैसे से…

या रिश्ते से।”
मीरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“नहीं…
उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।
“ये ज़बरदस्ती है।”
आरव ने धीरे से कहा,

“ज़िंदगी भी अक्सर ज़बरदस्ती ही होती है, मीरा।”
शादी की रात
मंत्र पढ़े जा रहे थे।

मीरा का दुपट्टा भारी लग रहा था—जैसे फंदा।
आरव उसके सामने बैठा था।
नज़रें झुकी हुईं।
जब सात फेरे पूरे हुए,

मीरा की दुनिया टूट चुकी थी।
वो अब मीरा राठौर थी।
वापस उस रात… बारिश में

आरव उसे कमरे तक ले आया।
दरवाज़ा बंद हुआ।
कमरे में सन्नाटा था।
बस बारिश की आवाज़।

मीरा ने धीरे से कहा,
“मैं तुमसे नफ़रत करती हूँ।”
आरव कुछ सेकंड चुप रहा।

फिर बोला,
“अच्छा है।”
मीरा ने चौंककर देखा।

“क्योंकि जिस रिश्ते की शुरुआत नफ़रत से हो…
वो या तो तबाह कर देता है…
या फिर पूरी ज़िंदगी बाँध लेता है।”
आरव ने उसकी ठुड्डी उठाई।

पहली बार उसकी आँखों में कुछ और था—
दर्द… और क़ब्ज़ा।
“और तुम,”
वो फुसफुसाया,

“अब मेरी ज़िम्मेदारी हो।”
मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।
बाहर बारिश तेज़ हो गई।

और अंदर…
एक मजबूर रिश्ता जन्म ले चुका था।

भाग 1 समाप्त