रात बहुत शांत थी…
इतनी शांत कि सांसों की आवाज़ भी शोर लग रही थी।
हवेली की तीसरी मंज़िल पर एक कमरा था—
जहाँ दीवारों का रंग नीला नहीं, बल्कि डर था।
आईने के सामने खड़ी लड़की की आँखें…
नीली नहीं थीं…
वे ऐसी थीं जैसे किसी की आत्मा को चीर कर देख सकती हों।
उसके होंठों पर खून लगा था।
ताज़ा।
गरम।
उसने अपनी उँगलियों से होंठ छुए…
और आँखें बंद कर लीं।
“आज फिर प्यास पूरी नहीं हुई…”
1
अनाया मल्होत्रा—
लोग उसे एक आम लड़की समझते थे।
शांत, पढ़ी-लिखी, सभ्य।
लेकिन किसी को नहीं पता था…
कि अनाया की नसों में खून की पुकार बहती थी।
बचपन से।
जब वह सात साल की थी,
उस रात उसने अपनी माँ को ज़मीन पर पड़ा देखा था।
चारों तरफ खून।
और उसके पिता…
हाथ में चाकू।
पुलिस ने कहा—
“घरेलू झगड़ा था।”
लेकिन अनाया जानती थी—
उस रात कुछ और हुआ था।
उस रात उसकी मासूमियत मरी थी।
और उसी रात खून की गंध उसकी आत्मा में बस गई थी।
2
अनाया अब एक फॉरेंसिक साइकोलॉजिस्ट थी।
वह अपराधियों का दिमाग पढ़ती थी।
हत्यारों की सोच समझती थी।
विडंबना देखो—
वह दूसरों के अंदर के राक्षस पकड़ती थी…
जबकि उसका अपना राक्षस हर रात जागता था।
हर हत्या की फाइल पढ़ते समय
उसकी धड़कन तेज़ हो जाती।
“कैसा महसूस किया होगा?”
“खून गिरते समय कैसा लगता है?”
ये सवाल उसे डराते नहीं थे।
ये उसे जगाते थे।
3
शहर में एक के बाद एक हत्याएँ हो रही थीं।
हर शव से खून पूरी तरह निकाल लिया गया था।
मीडिया ने नाम दे दिया—
“ब्लड हंटर”
पुलिस परेशान थी।
कोई सुराग नहीं।
और केस अनाया को सौंपा गया।
जब उसने पहली तस्वीर देखी—
उसके होंठ काँप गए।
नहीं डर से…
पहचान से।
हत्या का तरीका…
बहुत परफेक्ट था।
“ये काम कोई शौकिया नहीं कर सकता…”
“ये कोई है जिसे खून से प्यार है।”
उसने फाइल बंद की।
और शीशे में खुद को देखा।
“क्या मैं खुद को पकड़ पाऊँगी…
अगर मैं ही वो हूँ?”
4
रात को अनाया को नींद नहीं आई।
उसने अपनी कलाई देखी—
वहाँ पुराने कट के निशान थे।
जब भी प्यास बढ़ती…
वह खुद को काट लेती।
लेकिन अब…
वो काफी नहीं था।
उसने खिड़की खोली।
बाहर अँधेरा था।
और अँधेरे में कोई था।
आरव कपूर।
शहर का मशहूर पत्रकार।
वही जो इन हत्याओं पर लिख रहा था।
उनकी पहली मुलाकात…
एक कैफे में हुई थी।
आरव की आँखों में डर नहीं था।
सवाल थे।
“आप इन हत्याओं से कुछ छुपा रही हैं, अनाया।”
उस पल अनाया ने सोचा था—
“अगर मैं चाहूँ…
तो अभी उसका खून…”
उसने खुद को रोका।
5
आरव अनाया के करीब आने लगा।
बहुत करीब।
वह उससे बात करता।
उसे समझता।
और अनाया…
उसे चाहने लगी।
लेकिन प्यार…
उसके लिए सबसे खतरनाक चीज़ थी।
क्योंकि प्यार में वह खुद को भूल जाती।
और भूलना…
मतलब राक्षस को खुली छूट।
एक रात—
आरव उसके घर आया।
बारिश हो रही थी।
मोमबत्ती की रोशनी में उनका चेहरा डरावना लग रहा था।
आरव ने उसका हाथ पकड़ा।
“तुम टूट चुकी हो, अनाया…
लेकिन मैं तुम्हें छोड़ूँगा नहीं।”
अनाया की आँखों में आँसू आ गए।
और उन्हीं आँसुओं में…
खून की प्यास भी।
6
उस रात…
अनाया ने खुद को कमरे में बंद कर लिया।
शीशे के सामने खड़ी होकर चिल्लाई—
“मैं राक्षस हूँ!”
और फिर…
उसने अपनी कलाई काट ली।
खून टपकता रहा।
फर्श लाल हो गया।
लेकिन प्यास…
अब भी बाकी थी।
तभी दरवाज़ा खुला।
आरव।
उसने अनाया को गोद में उठा लिया।
“मैं तुम्हें मरने नहीं दूँगा!”
अनाया की आँखों में कुछ टूट गया।
“अगर तुम जान जाओ कि मैं क्या हूँ…
तो भाग जाओगे।”
आरव ने कहा—
“तो जानना चाहता हूँ।”
7
अगली सुबह…
एक और लाश मिली।
और इस बार…
पुलिस को सबूत मिला।
अनाया का।
वह समझ गई—
राक्षस ने गलती कर दी थी।
अब उसका पर्दाफाश तय था।
उसने आरव को फोन किया—
“अगर मुझसे प्यार करते हो…
तो आज रात मत आना।”
आरव आया।
8
हवेली में आखिरी टकराव हुआ।
अनाया सच बताने लगी।
हर हत्या।
हर प्यास।
हर खून।
आरव चुप रहा।
फिर बोला—
“तुम बीमार हो…
राक्षस नहीं।”
अनाया हँसी।
पागल हँसी।
“तो ये खून किसका है?”
उसने हाथ बढ़ाया।
होंठों पर खून।
आरव ने उसकी कलाई पकड़ ली।
“अब नहीं।”
9
पुलिस की सायरन गूँजने लगी।
अनाया ने आखिरी बार आरव को देखा।
“काश…
तुम मुझे पहले मिले होते।”
और फिर…
उसने खुद को आग लगा ली।
10
हवेली जल गई।
केस बंद हो गया।
मीडिया ने लिखा—
ब्लड हंटर मर चुकी है।
लेकिन…
शहर के किसी कोने में
आज भी कोई लड़की
होंठों पर खून लिए
आईने में खुद को देखती है…
और फुसफुसाती है—
“प्यास अभी बाकी है…” 😈🩸