a marriage story in Gujarati Moral Stories by Shivani Jatinkumar Pandya books and stories PDF | एक वैवाहिक कथा

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एक वैवाहिक कथा

यह कहानी सिर्फ़ प्यार की नहीं, उस जंग की है जहाँ नशा एक आदत नहीं बल्कि इंसान को अंदर से तोड़ देने वाली सच्चाई बनकर सामने आता है।
ड्रग्स के अँधेरे से निकलने के लिए सिर्फ़ दवाइयाँ नहीं, रिश्तों का साथ, परिवार की पकड़ और खुद से की गई ईमानदार लड़ाई ज़रूरी होती है।
जब कोई साथ छोड़ने के बजाय थाम ले, तब टूटता इंसान भी धीरे-धीरे खुद को फिर से चुनना सीख जाता है


अहमदाबाद।
सुबह का समय।
शहर अभी पूरी तरह जागा नहीं था, लेकिन व्यास निवास में दिन की शुरुआत हो चुकी थी। बालकनी में लगे पीतल के छोटे घंटे हवा के साथ हल्के-हल्के बज रहे थे। तुलसी के पौधे पर पानी डालते हुए मीरा व्यास के होंठों पर मंत्र थे और आँखों में सुकून।
घर के अंदर से चाय की खुशबू आ रही थी।
कनिषा व्यास अपने कमरे में आईने के सामने खड़ी थी।
हल्के आसमानी रंग का सूती कुर्ता, सफ़ेद दुपट्टा, खुले बाल—
न कोई बनावटीपन, न दिखावा।
उसकी आँखों में एक अजीब-सी गंभीरता थी।
वही गंभीरता जो उसके नाम के अर्थ में भी थी।
कनिषा —
जिसका अर्थ है कांति, तेज, आंतरिक उजाला।
जो शोर नहीं करती, लेकिन अंधेरे में रास्ता बनाती है।
“कनिषा!”
बाहर से पिता की आवाज़ आई।
ड्रॉइंग रूम में रमेशचंद्र व्यास अख़बार मोड़कर बैठे थे।
साफ़ कपड़े, सादा व्यक्तित्व, आँखों पर पतला चश्मा।
अहमदाबाद के सम्मानित चार्टर्ड अकाउंटेंट।
जिनकी सबसे बड़ी पूँजी — ईमानदारी।
मीरा जी ने कनिषा को सामने बिठाया।
“बेटा,”
उन्होंने धीरे से कहा,
“एक रिश्ता आया है।”
कमरे में एक पल का सन्नाटा।
कनिषा ने सिर उठाकर माँ को देखा।
फिर पिता को।
“लड़का सूरत में रहता है,”
रमेशचंद्र बोले,
“नाम है निशित मेहता। टेक्सटाइल बिज़नेस फैमिली। इकलौता बेटा।”
कनिषा चुप रही।
मीरा जी ने उसका हाथ थामा।
“हम दबाव नहीं डाल रहे। बस… देख लो।”
रात।
कमरे में लाइट बंद थी।
मोबाइल की स्क्रीन चमक रही थी।
कनिषा अपनी सबसे अच्छी दोस्त पायल के साथ बिस्तर पर बैठी थी।
“ओके मैडम,”
पायल ने हँसते हुए कहा,
“अब शुरू करते हैं सीआईडी इन्वेस्टिगेशन।”
इंस्टाग्राम खुला।
Nishit Mehta
सूरत | बिज़नेस | फिटनेस
“हैंडसम तो है,”
पायल ने इशारा किया!
कनिषा मुस्कुरा दी।
“दिखावे से शादी नहीं होती।”
फेसबुक, रील्स, फैमिली फोटो।
एक तस्वीर पर कनिषा रुक गई—
निशित अपनी बहन के साथ हँस रहा था।
“ये अच्छा लग रहा है,”
उसने धीरे से कहा।
उसी रात—
सूरत।
मेहता निवास।
डाइनिंग टेबल पर प्रवीण मेहता बैठे थे—
शहर के बड़े टेक्सटाइल व्यापारी।
कड़क व्यक्तित्व, लेकिन दिल के साफ़।
उनकी पत्नी शैलजा मेहता पूजा की थाली समेट रही थीं।
आरती मेहता, निशित की बड़ी बहन, मोबाइल हाथ में लिए बोली,
“भैया, देखो… लड़की।”
उसके पति मिहिर मेहता ने रील चलाई।
निशित ने स्क्रीन देखी।
एक सादगी भरी मुस्कान।
बिना दिखावे की खूबसूरती।
उसका हाथ हल्का-सा काँपा।
उसने जेब में डाल लिया।
“मैं मिलना चाहता हूँ,”
उसने कहा।
कुछ दिनों बाद—
अहमदाबाद।
घर में हलचल थी।
परदे बदले जा रहे थे।
मीरा जी बार-बार आईना देख रही थीं।
कनिषा कमरे में टहल रही थी।
साँसें गिन रही थी।
डोरबेल।
निशित अंदर आया।
ब्लू शर्ट, डार्क जींस।
मजबूत कंधे, सधा हुआ व्यक्तित्व।
नज़रें मिलीं।
बस एक पल।
कनिषा को लगा जैसे दिल ने एक बीट छोड़ दी।
बैठक हुई।
चाय।
सवाल-जवाब।
“आप क्या करती हैं?”
निशित ने पूछा।
“फ़्रीलांस कंटेंट राइटिंग,”
कनिषा बोली।
निशित मुस्कुराया।
“अच्छा है… अपने पैरों पर खड़ा होना।”
उसका हाथ फिर काँपा।
कनिषा ने देखा।
मन में सोचा—
शायद नर्वस है… मैं भी हूँ।
शाम।
मेहमान चले गए।
मीरा जी ने पूछा,
“क्या सोचती हो?”
कनिषा ने आँखें बंद कीं।
फिर बोली—
“हाँ।”

अहमदाबाद का वही घर…
लेकिन आज व्यास निवास में रौनक कुछ अलग थी।
ड्रॉइंग रूम में सफ़ेद चादरें बिछी थीं, फूलों की टोकरियाँ आई पड़ी थीं। मीरा व्यास हर पाँच मिनट में घड़ी देख रही थीं। रसोई में रिश्तेदारों के लिए मिठाइयाँ सजाई जा रही थीं।
आज सगाई थी।
कनिषा अपने कमरे में खड़ी थी।
उसने हल्का पेस्टल पिंक रंग का सूट पहना था, बाल आधे खुले, आधे पीछे पिन किए हुए। कानों में छोटे-छोटे झुमके, जो चलते ही हल्के से हिलते।
पायल उसके सामने खड़ी थी।
“सुन,” पायल ने मुस्कुराते हुए कहा,
“आज से तू ऑफ़िशियली होने वाली है… मेहता साहब की।”
कनिषा ने तकिये से उसे मारा।
“चुप रह।”
लेकिन उसकी आँखों में डर से ज़्यादा उत्सुकता थी।
उधर सूरत से मेहता परिवार निकल चुका था।
प्रवीण मेहता सफ़ेद कुर्ते-पायजामे में, शाल ओढ़े हुए।
शैलजा मेहता हाथ में पूजा की थाली संभाले।
आरती और मिहिर रास्ते भर बातें करते हुए।
और बीच में…
निशित मेहता।
नेवी ब्लू कुर्ता, सधा हुआ शरीर, हल्की-सी दाढ़ी।
आज वह ज़्यादा चुप था।
“नर्वस है?”
आरती ने छेड़ा।
निशित ने हल्की मुस्कान दी।
“थोड़ा।”
अहमदाबाद पहुँचते-पहुँचते शाम ढल चुकी थी।
दरवाज़ा खुला।
दोनों परिवार आमने-सामने।
शंखनाद, फूल, मुस्कानें।
कनिषा को बाहर बुलाया गया।
जैसे ही वह आई—
निशित की नज़रें अपने-आप उसी पर टिक गईं।
उसे लगा जैसे वही लड़की है, जिसे वह पहचानता तो नहीं…
लेकिन खोना नहीं चाहता।
अंगूठियाँ बदली गईं।
फोटो।
हँसी।
तालियाँ।
कनिषा और निशित पहली बार थोड़ी देर के लिए अकेले बैठे।
“सब बहुत जल्दी हो रहा है,”
कनिषा ने कहा।
निशित ने उसकी ओर देखा।
“लेकिन… सही लग रहा है।”
उसका हाथ फिर हल्का-सा काँपा।
कनिषा ने नोटिस किया, पर कुछ कहा नहीं।
उस रात—
पहली बार लंबी फोन कॉल हुई।
“आपको क्या पसंद है?”
कनिषा ने पूछा।
“शांत जगहें,”
निशित बोला,
“और… ऐसे लोग जो बिना शोर किए साथ निभाएँ।”
कनिषा मुस्कुरा दी।
दिन बीतने लगे।
अब बातें सिर्फ़ औपचारिक नहीं थीं।
सुबह का गुड मॉर्निंग
रात का ध्यान रखना
वीडियो कॉल पर एक-दूसरे के घर दिखाना।
“ये मेरी माँ की पूजा की जगह,”
कनिषा कैमरा घुमाती।
“और ये मेरी बहन की बनाई कॉफ़ी,”
निशित हँसते हुए कप दिखाता।
एक दिन निशित अहमदाबाद आया।
इस बार अकेले।
पहली डेट।
शहर का एक शांत कैफ़े।
खिड़की के पास वाली टेबल।
कनिषा हल्के फ़िरोज़ी कुर्ते में थी।
निशित ग्रे शर्ट में।
कॉफ़ी आई।
“आप हमेशा इतना सोचते क्यों हैं?”
कनिषा ने पूछा।
निशित ने हँसने की कोशिश की।
“आदत है।”
उसने कॉफ़ी का कप कसकर पकड़ लिया।
हाथ काँप गया।
कनिषा ने पहली बार सच में महसूस किया।
“निशित…?”
उसने धीरे से कहा।
“कुछ नहीं,”
वह तुरंत बोला,
“बस काम का स्ट्रेस।”
कनिषा ने बात आगे नहीं बढ़ाई।
शादी की तारीख़ तय हो गई।
अब दोनों घरों में शॉपिंग शुरू हुई।
कनिषा के लिए साड़ियाँ, लहंगे, ज्वेलरी।
आईने के सामने खड़ी होकर वह खुद को नए रूप में देखती।
मीरा जी कहतीं,
“हर लड़की दुल्हन बनती है,
पर हर दुल्हन घर नहीं बनाती।”
उधर निशित के लिए शेरवानी, कुर्ते।
आरती उसे छेड़ती,
“शादी के बाद जिम मत भूलना।”
निशित हँसता…
लेकिन उसकी रातें बेचैन थीं।
शादी से एक रात पहले—
वीडियो कॉल।
कनिषा दुपट्टा ठीक करते हुए बोली,
“डर लग रहा है।”
निशित ने पहली बार सच कहा,
“मुझे भी।”
लेकिन किस बात का डर…
वह नहीं बोला।


सूरत।
शाम ढलते ही पूरा इलाका रोशनी में नहा गया था।
मेहता फार्महाउस के बाहर लंबी लड़ियाँ जगमगा रही थीं। ढोल की थाप, शहनाई की आवाज़ और लोगों की चहल-पहल से माहौल किसी त्योहार से कम नहीं था।
आज निशित मेहता की शादी थी।
निशित अपने कमरे में खड़ा था।
आईने में खुद को देखता हुआ।
रॉयल ब्लू शेरवानी, सुनहरी कढ़ाई, कंधों पर सटीक फिट।
मजबूत शरीर, चौड़ी छाती, लेकिन आँखों में एक अनकही बेचैनी।
उसकी बहन आरती मेहता ने पीछे से पगड़ी ठीक की।
“दूल्हा लग रहा है मेरा भाई,”
वह मुस्कुराई।
निशित ने हल्की हँसी हँसी।
“लग रहा हूँ… या हूँ?”
आरती ने उसे गौर से देखा,
“डर लग रहा है?”
निशित ने नज़रें फेर लीं।
“थोड़ा।”
उधर—
अहमदाबाद में व्यास निवास का माहौल भावनाओं से भरा था।
कनिषा दुल्हन के कमरे में बैठी थी।
हल्का पिंक लहंगा, बारीक कढ़ाई,
दुपट्टा सिर पर हल्के से रखा हुआ।
कान में बड़े झुमके,
गले में सादगी भरा हार,
खुले बालों में हल्की वेव्स—
जैसे कोई कोमल चित्र।
मीरा व्यास ने उसकी नज़र उतारी।
“बेटा,”
उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
“आज से हर रिश्ता नया होगा… पर अपने सच को मत खोना।”
रमेशचंद्र व्यास ने उसके सिर पर हाथ रखा।
उनकी आँखें नम थीं, पर आवाज़ स्थिर।
“कनिषा,”
उन्होंने कहा,
“कभी खुद को कमज़ोर मत समझना।”
बारात निकल पड़ी।
घोड़े पर सवार निशित,
आस-पास दोस्त,
ढोल की तेज़ थाप।
सूरत की सड़कें गूँज रही थीं।
मंडप में कनिषा बैठी थी।
दिल तेज़ धड़क रहा था।
जैसे ही निशित सामने आया—
दोनों की नज़रें मिलीं।
बस एक पल।
लेकिन उस पल में
भविष्य भी था… और अनजाना डर भी।
फेरे शुरू हुए।
पंडित मंत्र पढ़ रहे थे।
आग की लपटें उठ रही थीं।
“सुख में साथ निभाओगे?”
“हाँ।”
“दुख में?”
“हाँ।”
कनिषा ने महसूस किया—
निशित का हाथ थामते समय हल्का-सा काँप रहा था।
उसने कसकर पकड़ लिया।
विदाई।
मीरा व्यास की गोद में सिर रखकर कनिषा रो पड़ी।
“माँ…”
बस इतना ही कह पाई।
मीरा जी ने उसके बाल सहलाए,
“घर बदलता है बेटा… संस्कार नहीं।”
ससुराल।
मेहता निवास के बाहर आरती और शैलजा मेहता थाली लेकर खड़ी थीं।

शैलजा जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
कनिषा ने चावल भरे लोटे को पैर से गिराया।
घर में प्रवेश किया।
तालियाँ।
आशीर्वाद।
कमरा।
पहली रात।
कमरे में हल्की गुलाबी रोशनी थी।
फूलों से सजा बिस्तर।
परदों से छनती हवा।
कनिषा बाथरूम से बाहर आई।
अब उसने सॉफ्ट पिंक साड़ी पहनी थी।
झुमके वही,
बाल खुले,
कलाई में हल्की चूड़ियाँ।
वह आईने में खुद को देख रही थी—
नए रिश्ते, नई ज़िंदगी के डर के साथ।
दरवाज़ा खुला।
निशित अंदर आया।
डीप ब्लू कुर्ता,
मजबूत कद-काठी,
लेकिन आँखों में थकान।
उसकी नज़र कनिषा पर ठहर गई।
“तुम…”
वह कुछ पल चुप रहा,
“बहुत सुंदर लग रही हो।”
कनिषा हल्के से मुस्कुराई।
“आप भी।”
दोनों पास आए।
सन्नाटा।
फिर—
निशित के हाथ काँपने लगे।
साँसें तेज़।
कनिषा ने इस बार साफ़ देखा।
“निशित?”
उसकी आवाज़ में चिंता थी।
निशित पीछे हट गया।
पसीना।
उसने आँखें बंद कीं।
“मुझे… माफ़ करना,”
उसकी आवाज़ टूट गई।
कनिषा समझ नहीं पाई।
“क्या हुआ?”
कुछ सेकंड।
फिर—
सच।
ड्रग्स।
शब्द कमरे में नहीं गूँजे…
गिरे।
कनिषा की दुनिया जैसे रुक गई।
वह बिस्तर के किनारे बैठ गई।
आँखें सूनी।
“कब से?”
उसने बहुत धीमे पूछा।
“सालों से…”
निशित रो पड़ा।
रात यूँ ही बीत गई।
सुबह—
कनिषा ने बैग खोला।
यहीं से कहानी बदलती है।


सुबह की पहली किरण मेहता निवास के उस कमरे में दाख़िल हुई,
जहाँ रात भर कोई सोया नहीं था।
कनिषा चुपचाप सूटकेस में कपड़े रख रही थी।
हर तह के साथ उसका दिल भारी होता जा रहा था।
दरवाज़े के पास निशित खड़ा था।
बाल बिखरे हुए, आँखें लाल।
“कनिषा…”
उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।
“मत जाओ।”
कनिषा ने बिना देखे कहा,
“मुझे सोचने के लिए वक़्त चाहिए।”
“अगर तुम गईं…”
निशित की आवाज़ काँप गई,
“तो मैं सच में हार जाऊँगा।”
कनिषा रुकी।
उसके कानों में पिता की आवाज़ गूँजी—
‘कभी कमज़ोरी को नज़रअंदाज़ मत करना… लेकिन अगर किसी को बचा सकती हो, तो डरना भी मत।’
वह धीरे-धीरे पलटी।
“मैं रुक सकती हूँ,”
उसने साफ़ कहा,
“लेकिन आँख बंद करके नहीं।”
निशित ने उसकी ओर उम्मीद से देखा।
“तीन रास्ते होंगे,”
कनिषा ने कहा,
“और तुम तीनों से गुज़रोगे।”
पहला तरीका — मेडिकल और प्रोफेशनल (शहर: सूरत)
अगले दिन।
सूरत का एक रिहैब सेंटर।
सफ़ेद दीवारें, हल्की दवाइयों की गंध।
डॉक्टर ने फ़ाइल बंद करते हुए कहा,
“डिटॉक्स आसान नहीं होगा। गुस्सा, चिड़चिड़ापन, शरीर में दर्द—सब होगा।”
निशित ने कुर्सी की पकड़ कस ली।
पहले हफ्ते—
निशित रात भर करवटें बदलता।
पसीने से भीगा हुआ।
“बस एक बार…”
वह तड़पता।
कनिषा पास बैठी रहती।
न कुछ कहती, न जाती।
एक रात निशित चिल्लाया,
“तुम मेरी ज़िंदगी कंट्रोल मत करो!”
कनिषा पहली बार टूट पड़ी।
“मैं कंट्रोल नहीं कर रही,”
उसकी आँखें भर आईं,
“मैं तुम्हें खोने से डर रही हूँ।”
डॉक्टर ने साफ़ कहा—
“इलाज तभी चलेगा, जब घर साथ देगा।”
दूसरा तरीका — वातावरण बदलना (इलाका: अहमदाबाद के पास छोटा तीर्थ स्थल)
कुछ हफ्तों बाद।
कनिषा निशित को अहमदाबाद के पास एक शांत तीर्थ स्थल ले आई।
भीड़ नहीं, शोर नहीं—बस पेड़, मंदिर की घंटियाँ और सुबह की हवा।
“यहाँ क्यों लाईं?”
निशित ने पूछा।
“क्योंकि हर लत का एक ट्रिगर होता है,”
कनिषा बोली,
“और हर इंसान को कभी–कभी खुद से मिलने की जगह चाहिए।”
सुबह-सुबह मंदिर के बाहर बैठना।
चाय पीना।
लंबी खामोशियाँ।
एक दिन निशित बोला,
“यहाँ मन कम करता है।”
कनिषा ने पहली बार राहत की साँस ली।
लेकिन—
एक शाम वह फिसल गया।
पुराने दोस्त का फ़ोन।
निशित लौटा… आँखें झुकी हुई।
“मैं हार गया,”
उसने कहा।
कनिषा चुप रही।
बस इतना बोली,
“यह आख़िरी मौका था।”
उस रात निशित सच में डर गया।
तीसरा तरीका — आत्मअनुशासन और साथ (घर + परिवार)
इस बार कोई डॉक्टर नहीं।
कोई जगह बदलना नहीं।
सिर्फ़ नियम।
सुबह की सैर।
व्यायाम।
घर का खाना।
परिवार के साथ समय।
आरती रोज़ भाई के साथ वॉक पर जाती।
मिहिर उसे बिज़नेस में छोटा काम सौंपते।
शैलजा मेहता हर रात उसके माथे पर हाथ रखतीं।
“मज़बूत बनो बेटा।”
कनिषा—
हर दिन वही सवाल पूछती,
“आज कैसा लग रहा है?”
एक दिन निशित बोला,
“आज इच्छा हुई… लेकिन मैंने रोक लिया।”
कनिषा ने उसकी ओर देखा।
उस दिन उसने पहली बार मुस्कुराकर कहा,
“आज तुम जीते हो।”
महीने बीते।
एक साल।
निशित साफ़ था।
एक शाम वही कमरा—
जहाँ सब शुरू हुआ था।
निशित ने कनिषा का हाथ थामा।
“तुमने मुझे छोड़ा नहीं,”
वह बोला,
“इसलिए मैं खुद को छोड़ नहीं पाया।”
कनिषा की आँखों में सुकून था।
“रिश्ते इलाज नहीं होते,”
उसने कहा,
“रिश्ते साथ से बचते हैं।”