Incomplete love is another crime - 6 in Hindi Moral Stories by archana books and stories PDF | अधूरा इश्क़ एक और गुनाह - 6

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अधूरा इश्क़ एक और गुनाह - 6

निधि हमेशा सोच-समझकर काम करती थी। घर में सबका ख्याल रखना उसका स्वभाव था। लेकिन कुछ लोग—खासकर उसकी सास—उसकी हर छोटी खुशी में भी रुकावट डालते।
एक दिन सासू मां ने निधि से कहा,
“यह सूट मत पहनो। रंग उड़ गया है, खराब हो गया है। मैं तुम्हारे लिए नया दिलाऊंगी।”
निधि ने मुस्कुराते हुए सूट को साइड में रख दिया। उसने सोचा, “अगर सासू मां को यह पसंद नहीं है, तो मैं इसे क्यों पहनूँ?”
सुधांशु चुपचाप देख रहा था, समझ नहीं पा रहा था कि निधि इतनी संयमित और शांत कैसे रह सकती है। लेकिन उसके कानों में अब सास की आवाज गूंज रही थी:
“बेटा, देखा? पैसों की बिल्कुल बिल्कुल फिक्र नहीं। घर कैसे चलेगा ऐसे? नए-नए कपड़े बिगड़ेंगे, कोई हिसाब नहीं रखती। इस तरह से घर कैसे चलेगा?”
सुधांशु गुस्से और चिंता में था, लेकिन निधि ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सुधांशु गुस्से में पूछता है दीदी तुमने साड़ियां अपने मायके दे दी ह
 अपनी भाभी को दे दी है,सासू मां ने सोचा कि निधि अब परेशान हो जाएगी, लेकिन उसे पता नहीं था कि निधि अपनी समझदारी और संयम से हर स्थिति का सामना कर सकती है।
इसके बाद, निधि ने सासू मां की हर चाल का सामना चुपचाप करना शुरू किया। एक ही दिन सूट पहन कर दूसरी साइड रख देना, कभी-कभी साड़ियां मायके की दी हुई बताना, ज्वेलरी न देना—सभी तरीके सासू मां अपनाती रही ताकि निधि की छवि घर में खराब हो।

निधि हमेशा घर के काम में जुटी रहती थी। झाड़ू लगा रही हो या बर्तन धो रही हो—हर काम में वह पूरी ईमानदारी से लगी रहती। लेकिन सासू मां के लिए यह कभी पर्याप्त नहीं था।
जैसे ही निधि झाड़ू लगाने लगती, सासू मां तुरंत आ जाती,
“अरे, मैं झाड़ू लगाऊंगी, बर्तन धो लूंगी। तू यहाँ क्या कर रही है?”
निधि केवल चुपचाप अपने काम में लगी रहती। कभी-कभी सासू मां गुस्से से जोर देकर कहती,
“मैं खुद कर लूंगी, हट जा!”

बेचारी निधि डरकर या मजबूरी में पीछे हट जाती। लेकिन जैसे ही कोई बाहर से आता, सासू मां तुरंत कह देती,

अगर कोई बाहर से आता और निधि काम करती देखता, तो सासू मां चिल्लाती,
“देखो, यह काम ही नहीं करना चाहती, आलसी है, लेटी हुई है। ऐसे बैठकर बहाने बना रही है।”
और फिर वही सासू मां उन मायके की साड़ियों और कपड़ों का खेल शुरू कर देती। छोटी-छोटी बातें भी निधि की छवि खराब करने के लिए बड़ी बनाई जातीं।
बेचारी निधि, अपनी मासूमियत और सादगी के कारण, सासू मां के हर षड्यंत्र को समझ नहीं पाती। हर बार वह सोचती, “मैं तो बस सबको खुश करना चाहती थी, लेकिन यहाँ हर चीज़ मेरे खिलाफ क्यों लगती है?”
इस तरह, निधि धीरे-धीरे घर के हर काम में पूरी ईमानदारी दिखाती है, लेकिन सासू मां के जाल में फंसती रहती है। उसकी मासूमियत और संयम ही उसे सुरक्षित रखता है, भले ही घर के लोग उसे गलत समझते हों।


हर दिन घर में एक ही नाटक चलता। जैसे ही निधि घर के काम में लगी होती—झाड़ू, बर्तन, कपड़े—सासू मां तुरंत वहां पहुंच जाती,
“अरे, मैं कर लूंगी, तू यहाँ क्यों व्यर्थ में लगी है?”
लेकिन निधि ने अब सीख लिया था। जैसे ही सुधांशु छुट्टी से घर आता, निधि अचानक खुद ही काम करने लगती, हर चीज़ दिखाते हुए कि वह कितनी मेहनती है।
सुधांशु मुस्कुराते हुए कहता,
“तू आराम कर, सब मैं देख लूंगा, तू बैठकर आराम कर।”
निधि भी मुस्कुराती, और धीरे-धीरे काम करना शुरू कर देती। सुधांशु सोचता, “माँ कितनी अच्छी हैं, मेरी पत्नी को आराम करने देती हैं। प्यार सिर्फ मेरी पत्नी के लिए है।”
लेकिन सासू मां का उद्देश्य अलग था। वह चाहती थी कि निधि हमेशा दबदबे में रहे, उसकी छवि खराब लगे, ताकि घर पर उसका नियंत्रण बना रहे।
निधि चुपचाप सब देखती, समझती कि सासू मां का दबदबा और षड्यंत्र उसके ऊपर छाया हुआ है, लेकिन उसने इसे छुपा कर रख दिया। वह जानती थी कि सुधांशु के प्यार और समर्थन के सामने कोई षड्यंत्र टिक नहीं सकता।
इस तरह, निधि की मासूम चालाकी और सुधांशु का प्यार मिलकर सासू मां की हर चाल को नाकाम कर देते हैं, और घर में असली सच्चाई धीरे-धीरे सामने आने लगती है।