अनुराग की आँखें सुबह की हल्की, सुनहरी धूप में चमक रही थीं। आज का दिन किसी भी आम दिन से बिल्कुल अलग महसूस हो रहा था, जैसे हवा में कोई अनकही भविष्यवाणी घुली हो। वह अपने शहर के उस पुराने पार्क में बैठा था, जहाँ हर पेड़ की शाखा हवा के साथ एक पुरानी धुन में हिलती थी। यह पार्क अनुराग के लिए केवल पेड़-पौधों की जगह नहीं, बल्कि उसकी कविताओं का उद्गम स्थल था। वह अपनी डायरी में कुछ पंक्तियाँ उकेरने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसका ध्यान बार-बार सामने बैठी एक युवती पर जा रहा था।
उसने पहली बार स्नेहा को देखा। वह एक चित्रकार थी। उसके सामने एक कैनवास रखा था और उसके हाथों में ब्रश ऐसे चल रहा था जैसे हवा में संगीत बह रहा हो। उसकी आँखों में रंगों का जादू था—गहरा नीला, चमकदार पीला, और जीवन से भरा लाल। अनुराग को लगा कि जीवन ने अचानक उसकी दिशा बदल दी है। वह अपनी जगह से उठा और अनजाने ही उसकी ओर खिंचा चला गया।
“नमस्ते,” उसने हल्की हिचकिचाहट के साथ कहा। उसकी आवाज़ में एक कवि की विनम्रता थी।
स्नेहा ने ब्रश रोका और सिर उठाकर मुस्कुराते हुए जवाब दिया। उस मुस्कान में मिठास थी, और थोड़ी खटास भी—जैसे नींबू की हल्की चुस्की में छिपी मिठास, जो स्वाद को और भी गहरा बना देती है।
“क्या मैं देख सकता हूँ?” अनुराग ने कैनवास की ओर इशारा किया।
“ज़रूर,” स्नेहा ने कहा। कैनवास पर एक अधूरा लैंडस्केप था—एक ऐसा जंगल जहाँ रोशनी और अंधेरा दोनों साथ-साथ खेल रहे थे।
उस दिन दोनों ने पार्क में घंटों लंबी बातचीत की। अनुराग ने अपनी डायरी खोली और अपनी कुछ मुक्त छंद कविताएं सुनाईं, जिनमें शब्दों की जगह भावनाओं का प्रवाह था। स्नेहा ने बड़े चाव से सुना और फिर अपने चित्रों के पीछे की कहानियाँ बताईं।
“तुम्हें पता है अनुराग,” स्नेहा ने अपनी तूलिका (brush) को पानी में धोते हुए कहा, “कभी-कभी रंग भी हमें वो सब कह देते हैं जो शब्द नहीं कह पाते। एक पेंसिल से बनायी हुई आकृति, कभी-कभी किसी लंबी कविता से ज्यादा सच लगती है।”
अनुराग ने धीरे से सिर हिलाया, “और कभी-कभी शब्द उन जज्बातों को छू लेते हैं जिनके लिए दुनिया में कोई रंग नहीं बना।”
उस दिन के बाद मुलाकातों का सिलसिला चल पड़ा। कुछ दिनों बाद, अनुराग ने स्नेहा को अपनी पसंदीदा किताबों का एक सेट दिया। उसे याद था कि स्नेहा ने एक बार कहा था कि उसे कविता की किताबों में हमेशा रुकावट महसूस होती है—शब्दों की खुरदुराहट उसे कभी-कभी भारी लगती थी। अनुराग ने सोचा कि शायद शब्द और भाव का सही मेल उसके नजरिए को बदल दे।
लेकिन जीवन हमेशा एक सीधी रेखा में नहीं चलता। एक दिन स्नेहा बहुत उदास थी। उसके चेहरे की वो चिर-परिचित चमक बुझी हुई थी। शायद उसकी कोई पेंटिंग वैसी नहीं बनी थी जैसी वह चाहती थी, या शायद जीवन की कोई पुरानी खटास उभर आई थी। अनुराग समझ नहीं पाया कि कैसे उसे हँसाया जाए। उसने उसे हँसाने की कोशिश की, कविताएं सुनाईं, लेकिन उस पल खट्टापन मिठास पर भारी पड़ गया। स्नेहा ने खीझकर कहा, “हर चीज़ को शब्दों में नहीं पिरोया जा सकता, अनुराग। कुछ दर्द सिर्फ महसूस किए जाते हैं।”
उस दिन अनुराग ने महसूस किया कि प्यार सिर्फ मीठा नहीं होता; कभी-कभी खटास के बिना मिठास की अहमियत ही नहीं समझ आती। उसने उसे अकेला छोड़ दिया, लेकिन साथ नहीं छोड़ा। वह वहीं पास की बेंच पर बैठा रहा, बस मौन समर्थन देते हुए।
समय के साथ, दोनों ने छोटे-छोटे खुशियों के क्षण साझा किए। बारिश में बिना छाते के भीगना, पुरानी किताबों की खुशबू में खो जाना, और पार्क में चाय की चुस्कियों के साथ लंबी खामोशी—हर पल ने उनके रिश्ते को मजबूत किया। अनुराग ने समझा कि स्नेहा का हर खट्टा अनुभव, उसके व्यक्तित्व का हिस्सा था। उसका गुस्सा, उसकी मायूसी, और उसकी हंसी—सब मिलकर उसे वह 'स्नेहा' बनाते थे जिससे अनुराग प्रेम करता था।
एक शाम, जब सूरज ढल रहा था और आकाश नारंगी और बैंगनी रंगों से भर गया था, अनुराग ने अपनी डायरी निकाली। उसने अपनी आखिरी और सबसे खास कविता स्नेहा को सुनाई:
“जीवन खट्टा है, जीवन मीठा है,
हर पल की छाया में, हँसी और आँसू साथ हैं।
तुम्हारे कैनवास के रंगों में,
मैंने अपनी खामोश कविताओं का घर पाया है।
मेरे शब्द आधे हैं, तुम्हारे रंग आधे हैं,
शायद इसीलिए, हम साथ में पूरे हैं।”
स्नेहा की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन होंठों पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। उसने अनुराग का हाथ थामा। वह जान गई थी कि खट्टा और मीठा केवल अनुभव हैं, और जब दोनों मिलते हैं, तब जीवन की असली सुंदरता सामने आती है—बिल्कुल उसकी पेंटिंग की तरह, जहाँ रोशनी की कीमत अंधेरे की वजह से होती है।
उस दिन, ठंडी हवा के झोंकों के बीच, अनुराग ने महसूस किया कि प्रेम केवल खुशी का नाम नहीं है। प्रेम समझ है, धैर्य है, और उन खट्टे-मीठे पलों को गले लगाना है जो हमें इंसान बनाते हैं। जीवन ने दोनों को सिखाया कि जैसे दिन और रात का मिलन संध्या में सबसे सुंदर होता है, वैसे ही सुख और दुख का मिलन ही जीवन को एक कलाकृति बनाता है।