घर के सबसे ज्यादा खालीपन अगर कहीं था, तो वह मेरे ताऊजी की आँखों में था। पिताजी के जाने के बाद, मैंने सोचा था कि ताऊजी के रूप में मुझे एक दूआंगन के बीचों-बीच लगी वह पुरानी तुलसी अब सूखने लगी थी। उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे उस घर के रिश्तों में बची-खुची नमी भी उसी के साथ भाप बनकर उड़ गई हो।
मेरे पिताजी की मृत्यु को अभी मुश्किल से तीन महीने ही हुए थे। घर का हर कोना उनकी यादों से भरा था, लेकिन
सरी छत मिल जाएगी। आखिर खून तो एक ही था। हम दोनों ही तो अकेले रह गए थे। लेकिन हुआ ठीक उसका उल्टा।
६५ साल के ताऊजी, जो कभी बचपन में मुझे अपने कंधों पर बिठाकर पूरा गाँव घुमाया करते थे, अब मेरी परछाई से भी कतराने लगे थे। उनकी चुप्पी, जो पहले शोक जैसी लगती थी, अब नफरत में बदलती जा रही थी।
मुझे याद है वह मंगलवार की शाम। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। ताऊजी ओसारे में बैठे अपनी पुरानी खांस रहे थे। उनका शरीर कमजोर हो गया था, और दवा की शीशी खत्म हो चुकी थी। मैं भीगता हुआ बाजार गया और उनकी दवा लेकर आया। जब मैंने दवा और पानी का गिलास उनकी तरफ बढ़ाया, तो उन्होंने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया हो।
उन्होंने हाथ के एक झटके से गिलास को परे हटा दिया। पानी फर्श पर बिखर गया।
"किसने कहा था लाने को?" उनकी आवाज में एक ऐसी ठंडक थी जिसने मेरी हड्डियों को भी जमा दिया।
मैं हक्का-बक्का रह गया। "ताऊजी, आप बीमार हैं..."
"बीमारी मेरी है, तो चिंता भी मुझे करनी चाहिए," उन्होंने मुझे बीच में ही काट दिया। "मुफ्त की सेवा करके महान बनने की कोशिश मत करो अनिकेत। अपने पैरों पर खड़े होना सीखो। कल को मैं मर गया तो क्या पड़ोसियों से पानी मांगोगे? या अपनी लाचारी का ढिंढोरा पीटोगे?"
मेरी आँखों में आंसू तैर गए। वो शब्द नहीं थे, पत्थर थे जो सीधे मेरे दिल पर लग रहे थे। मैंने सोचा था कि वे मुझे गले लगाएंगे, मेरे सिर पर हाथ रखेंगे, लेकिन वे तो मुझे अपने जीवन से ऐसे काट रहे थे जैसे मैं कोई सड़ा हुआ अंग हूँ।
उस रात मैं बहुत रोया। मुझे लगा कि ताऊजी का बुढ़ापा उन्हें सनकी बना रहा है, या शायद पिताजी के जाने के बाद वे मुझे बोझ समझने लगे हैं। उस दिन के बाद से मैंने भी तय कर लिया। मैंने उनसे बात करना बंद कर दिया। मैंने अपने काम खुद करने शुरू कर दिए। खेत की जिम्मेदारी, जो अब तक वे देखते थे, मैंने अपने कंधों पर ले ली। मैं सुबह चार बजे उठता, बैलों को चारा डालता और खेत में पसीना बहाता।
मैं उन्हें दिखाना चाहता था कि मुझे उनकी जरूरत नहीं है। और मजे की बात यह थी कि जितना मैं उनसे दूर होता गया, जितना मैं कठोर बनता गया, उनके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून आता गया।
लेकिन मैं वह नहीं देख पाया जो उस बंद कमरे के अंधेरे में हो रहा था।
मैं नहीं देख पाया कि जब मैं खेत से थककर लौटता और सो जाता, तो ताऊजी देर रात तक जागकर मेरे गंदे कपड़ों को देखते थे। मैं नहीं देख पाया कि जिस दवा को उन्होंने मेरे सामने फेंक दिया था, उसे मेरे जाने के बाद उन्होंने जमीन से उठाकर अपनी छाती से लगा लिया था।
हकीकत यह नहीं थी कि वे मुझसे नफरत करते थे। हकीकत यह थी कि डॉक्टर ने उन्हें जवाब दे दिया था। उनके फेफड़े जवाब दे रहे थे और वे जानते थे कि उनके पास अब गिनती के दिन बचे हैं।
वे डरते थे। उन्हें डर था कि जिस तरह मैं पिताजी के जाने पर टूट गया था, कहीं उनके जाने पर मैं पूरी तरह बिखर न जाऊं। वे जानते थे कि अगर उन्होंने मुझे अपना 'सहारा' बना लिया, तो उनकी मृत्यु मुझे अपाहिज कर देगी।
वे मुझे 'प्रेम' की बैसाखी नहीं देना चाहते थे। वे मुझे 'नफरत' की ताकत देना चाहते थे। वे चाहते थे कि मैं उनसे इतनी नफरत करूँ कि जब उनकी अर्थी उठे, तो मेरी आँखों में आंसू न आएं, बल्कि एक जिम्मेदारी का भाव हो। वे मुझे पत्थर बना रहे थे, क्योंकि यह दुनिया शीशे जैसे नाजुक लोगों के लिए नहीं है।
यह एक क्रूर खेल था। एक ऐसा नाटक जहाँ खलनायक बनने वाला ही असली हीरो था। ताऊजी अपने ही खून को खुद से दूर कर रहे थे, ताकि वह अकेले चलना सीख सके।
आज जब मैं यह लिख रहा हूँ, ताऊजी नहीं हैं। लेकिन उनकी वह 'क्रूरता' आज मेरी सबसे बड़ी ताकत है। लोग कहते हैं कि ताऊजी कठोर थे, लेकिन मैं जानता हूँ कि वह कठोरता उनका सबसे पवित्र प्रेम था। उन्होंने मुझे मेरे लिए ही मुझसे दूर किया था।
माफ करना ताऊजी, मैं आपकी नफरत को समझ नहीं पाया, लेकिन आपके उस 'पत्थर के प्रेम' ने मुझे फौलाद बना दिया है।