आईना जो सच नहीं दिखाता
शक्ति की चीख किले की दीवारों से टकराकर लौट आई…
लेकिन उसकी आवाज़ उसे खुद सुनाई नहीं दी।
सब कुछ अचानक शांत हो गया।
कोई लाश नहीं।
कोई चीख नहीं।
कोई खून नहीं।
वो ज़मीन पर पड़ा हाँफ रहा था।
“मैं… ज़िंदा हूँ…?”
उसने खुद से फुसफुसाकर पूछा।
धीरे-धीरे उसने आँखें खोलीं।
वो किले में नहीं था।
बल्कि…
अपने ही कमरे में।
वही पुराना पलंग।
वही अलमारी।
वही टूटी घड़ी— जो पाँच साल से बंद थी।
घड़ी की सुइयाँ अचानक चलने लगीं।
टिक… टिक… टिक…
शक्ति घबरा गया।
“ये सपना था… हाँ… सब सपना था…”
तभी आईने में उसकी नज़र पड़ी।
वो जड़ हो गया।
आईने में उसका प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था।
जबकि उसके चेहरे पर डर था।
आईने वाला शक्ति बोला—
“अब भी यही सोच रहे हो कि तुम ज़िंदा हो?”
शक्ति पीछे हट गया।
“तू… तू कौन है…?”
आईने ने दरार की तरह हँसते हुए कहा—
“मैं वही हूँ… जो उस रात किले में मर गया था।”
शक्ति का सिर घूमने लगा।
“नहीं… मैं तो कभी किले गया ही नहीं…”
आईना काला पड़ गया।
उसमें एक दृश्य उभरा—
पाँच साल पहले की रात।
शक्ति किले के अंदर खड़ा था।
उसके हाथ में वही लॉकेट था।
और सामने—
इच्छा।
रोती हुई।
काँपती हुई।
“मत जाओ…”
इच्छा गिड़गिड़ा रही थी।
दृश्य बदल गया।
शक्ति गुस्से में था।
उसने लॉकेट ज़मीन पर फेंक दिया।
इच्छा पीछे हट गई—
और फिसलकर नीचे गहरी खाई में गिर गई।
चीख… फिर सन्नाटा।
शक्ति चीख पड़ा—
“ये झूठ है… मैंने ऐसा कुछ नहीं किया!”
पीछे से आवाज़ आई—
“तुमने किया था।”
वो मुड़ा।
रति खड़ी थी।
लेकिन इस बार उसका चेहरा सड़ा हुआ था।
आँखों से काले कीड़े रेंग रहे थे।
“हम सब मरे तुम्हारी वजह से, शक्ति।”
तभी दीवारें पिघलने लगीं।
कमरा फिर से किले में बदल गया।
चारों तरफ आत्माएँ खड़ी थीं—
सबका चेहरा एक जैसा।
शक्ति का।
हज़ारों शक्तियाँ।
सब एक साथ बोले—
“तुम बाहर से नहीं आए थे…
तुम कभी गए ही नहीं थे।”
उस अजनबी आदमी की आवाज़ गूँजी—
“क्योंकि पाँच साल पहले…
तुम्हारी आत्मा यहीं किले में फँस गई थी।”
शक्ति घुटनों पर गिर पड़ा।
“तो फिर… जो मैं हूँ…”
आवाज़ आई—
“एक सज़ा।”
अचानक उसके सीने में तेज़ जलन हुई।
उसने नीचे देखा—
उसके सीने पर खून से लिखा था—
‘बलि अधूरी है’
और तभी…
किले की घंटी फिर बजी।
इस बार…
उसके अंदर से।
किले की रानी : वशीकारिणी
किले की घंटी अब बाहर नहीं बज रही थी।
उसकी गूंज शक्ति की नसों में दौड़ रही थी।
धम्म… धम्म… धम्म…
हर धड़कन के साथ दीवारों पर उकेरी गई आकृतियाँ हिलने लगीं।
और तभी—
हवा में इत्र जैसी गंध फैल गई।
मीठी… लेकिन सड़ांध से भरी।
शक्ति की आँखें अपने आप बंद होने लगीं।
“मत देखो उसकी आँखों में…”
किसी ने उसके कान में फुसफुसाया।
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।
किले के सिंहासन पर कोई बैठी थी।
लाल साड़ी।
खुले बाल… जो ज़मीन तक रेंग रहे थे।
माथे पर काला तिलक,
और आँखें—
पूरी तरह काली।
ना पुतली, ना सफ़ेदी।
वो मुस्कुराई।
और उसी पल शक्ति के घुटने अपने आप मुड़ गए।
“स्वागत है…”
उसकी आवाज़ एक नहीं थी—
दर्जनों औरतों की चीखों का मेल।
“मेरे किले में… मेरे अपराधी।”
शक्ति चाहकर भी नज़र नहीं हटा पा रहा था।
उसका शरीर अब उसका नहीं था।
“तू… कौन है…?”
वो बमुश्किल बोल पाया।
रानी सिंहासन से उठी।
हर क़दम पर ज़मीन काली पड़ती गई।
“मैं वो हूँ…
जो टूटी औरतों से जन्मी…
धोखे से पली…
और बलि से अमर बनी।”
वो उसके सामने आकर रुकी।
“मैं हूँ—
वशीकारिणी।”
शक्ति का सिर घूमने लगा।
उसे याद आने लगा—
इच्छा की आँखें।
रति का गायब होना।
प्रिया का बदल जाना।
“इच्छा…”
उसके मुँह से निकला।
वशीकारिणी हँसी।
उसकी हँसी से दीवारों से खून टपकने लगा।
“वो मेरी सबसे प्यारी बलि थी।”
शक्ति की चीख गले में ही दब गई।
“लेकिन अधूरी…”
रानी ने उसकी ठोड़ी उठाई।
“क्योंकि बलि तभी पूरी होती है…
जब अपराधी खुद स्वीकार करे।”
चारों तरफ़ आत्माएँ उभर आईं।
सब औरतें।
सबकी आँखें जली हुई।
सब एक साथ बोलीं—
“क़ुबूल कर…”
शक्ति की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैंने उसे नहीं मारा…
मैं सिर्फ़… चला गया था…”
वशीकारिणी की आँखें चमकीं।
“छोड़ देना भी हत्या होती है, शक्ति।”
तभी उसकी हथेली पर जलता हुआ निशान उभर आया—
वही निशान…
जो इच्छा के हाथ पर था।
“अब तुम मेरे हो।”
वो उसके कान में बोली।
शक्ति के दिमाग़ में एक आवाज़ गूँजी—
“उसे मत मानो… अभी भी रास्ता है…”
आवाज़ प्रिया की थी।
दूर अंधेरे में—
जंजीरों में जकड़ी प्रिया खड़ी थी।
उसकी आँखों में अभी इंसान बाकी था।
वशीकारिणी पलटी।
पहली बार उसके चेहरे पर गुस्सा था।
“चुनो…”
उसने कहा।
“या तो मेरी दासता…
या आख़िरी बलि।”
किले की ज़मीन फटने लगी।
नीचे वही खाई खुल रही थी—
जहाँ इच्छा गिरी थी।
शक्ति को एहसास हो गया—
अब अगला क़दम
या तो मुक्ति होगा…
या हमेशा की कैद।