First Love: Unspoken Feelings - Part 2 in Hindi Love Stories by Himanshu Shukla books and stories PDF | पहला प्यार : अनकहा एहसास - भाग 2

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पहला प्यार : अनकहा एहसास - भाग 2

भाग - 2 : टूटे सपनों की आवाज़ 

लंच ब्रेक की वो भीड़ मानो थम सी गई थी। समीक्षा अभी भी सीढ़ियों पर गिरी हुई थी, उसके घुटने में हल्की खरोंच आ गई थी, लेकिन उससे ज्यादा चोट उसके आत्मसम्मान को लगी थी।

​सृजन, जिसने उसे गिरते हुए देखा था, अपनी जेब में हाथ डाले, बिना किसी भाव के वहाँ से ऐसे गुजर गया जैसे कुछ हुआ ही न हो। उसकी आँखों में न हमदर्दी थी, न कोई पछतावा। बस एक अजीब सा सूनापन और अकड़।

​"अरे, तुम ठीक तो हो?" समीक्षा की सहेली, रिया, दौड़ते हुए आई और उसे सहारा देकर उठाया।

समीक्षा ने अपने कपड़ों से धूल झाड़ी, लेकिन उसकी नज़रें सृजन की पीठ पर टिकी थीं जो अब कॉरिडोर के मोड़ पर ओझल हो रहा था।

बाकी का दिन समीक्षा के लिए भारी रहा। क्लास में लेक्चर चल रहा था, लेकिन उसका ध्यान बार-बार उस घटना पर जा रहा था। इत्तेफाक से, सृजन उसी क्लास में सबसे पीछे वाली बेंच पर बैठा था। खिड़की से बाहर देखते हुए, दुनिया से बिल्कुल बेखबर। समीक्षा ने एक-दो बार उसे घूर कर देखा, यह सोचकर कि शायद उसे अपनी गलती का एहसास हो, लेकिन सृजन ने एक बार भी उसकी तरफ नहीं देखा।

स्कूल की घंटी बजी और शोरगुल के साथ सभी छात्र अपने-अपने घरों की ओर दौड़ पड़े। लेकिन समीक्षा के कदम आज भारी थे। सीढ़ियों पर गिरने की वजह से उसके पैर में काफी चोट थी, जिससे साइकिल के पैडल मारना नामुमकिन सा हो गया था।

​वह बेचारी अपनी साइकिल को हैंडल से पकड़कर, लंगड़ाते हुए पैदल ही सड़क पर चल रही थी। आज पहली बार उसके मन में सृजन के लिए गुस्सा खौल रहा था। उसकी आँखों से चुपचाप आंसू बहकर गालों को छू रहे थे। वह बस यही सोच रही थी कि कोई इतना पत्थर दिल कैसे हो सकता है।

​तभी पीछे से किसी के आने की आहट हुई। यह सृजन था।

​सृजन अपनी रेंजर साइकिल पर उसके बराबर में आया और पहली बार... हाँ, पहली बार उसने खुद समीक्षा से बात की। लेकिन उसके शब्दों में हमदर्दी नहीं, बल्कि वही पुराना मज़ाक था।

​वह हँसते हुए बोला, "पैदल क्यों चल रही हो समीक्षा? साइकिल चलाने की चीज़ है, हाथ से धकेलने की नहीं।" और वह ज़ोर से हँस पड़ा।

​एक पल के लिए समीक्षा का दिल ज़ोर से धड़का। उसे खुशी हुई कि सृजन ने पहल की, लेकिन अगले ही पल उसके मज़ाक ने उस खुशी को गुस्से में बदल दिया। उसकी आँखें और भी ज्यादा नम हो गईं। उसने वहीं रुककर, सृजन की आँखों में देखते हुए रुंधे गले से कहा, "सृजन, इतना निर्दयी भी नहीं होना चाहिए किसी के लिए। तुम्हें मज़ाक लग रहा है, पर मुझे दर्द हो रहा है।"

​समीक्षा की आँखों में नमी और उसकी लड़खड़ाती आवाज़ सुनकर सृजन की हँसी अचानक रुक गई। उसे पहली बार एक अजीब सा झटका लगा। उसने गौर से देखा कि समीक्षा को वाकई चलने में दिक्कत हो रही है।

​सृजन, जो भले ही नासमझ और थोड़ा अक्खड़ था, मगर दिल का बुरा नहीं था। उसने तुरंत पीछे आ रहे अपने दोस्तों को हाथ के इशारे से आगे निकल जाने को कहा।

​फिर उसने वो किया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। सृजन अपनी रेंजर साइकिल से नीचे उतरा और पैदल समीक्षा के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने लगा। थोड़ी हिचकिचाहट के साथ, उसने धीमी आवाज़ में कहा, "Sorry... स्कूल में जो हुआ, उसके लिए। और अभी के लिए भी।"

​यह पहली बार था जब सृजन ने किसी लड़की को 'Sorry' बोला था।

​सड़क के दूसरी तरफ खड़ी समीक्षा की सहेलियाँ साक्षी और रिया यह नज़ारा देखकर भौचक्की रह गईं। उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं कि क्या यह वही घमंडी सृजन है?

​सृजन के वो दो शब्द और उसका साथ पाकर समीक्षा का सारा गुस्सा मोम की तरह पिघल गया। उस पल उसे अपने पैर की चोट का दर्द महसूस ही नहीं हुआ। मानो सारा दर्द हवा हो गया हो। वह सातवें आसमान पर थी। उसे यकीन हो गया कि सृजन बाहर से चाहे जैसा भी हो, अंदर से वो एक अच्छा इंसान है।

​शायद... आज का दिन उसकी लाइफ का बेस्ट दिन था।सृजन और समीक्षा, दोनों पैदल चलते रहे। रास्ते भर दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई, सिर्फ साइकिल के टायरों की आवाज़ और कदमों की आहट थी। लेकिन उस खामोशी में भी एक अजीब सा सुकून था।

​जब समीक्षा के घर का मोड़ आया, तो सृजन रुका। उसने समीक्षा की तरफ देखा और धीमे स्वर में बस इतना कहा, "चलो, कल मिलते हैं।"

​यह सुनकर समीक्षा के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसके लिए ये तीन शब्द किसी जादू से कम नहीं थे। वह खुशी से झूमती हुई घर के अंदर दाखिल हुई।

​घर पहुँचते ही नानी की नज़र उसके घुटने पर पड़ी।

"हाय राम! ये क्या हुआ? खून निकल रहा है!" नानी घबराते हुए दौड़कर आईं और तुरंत हल्दी और तेल का लेप लगाने लगीं।

​नानी फिक्रमंद होकर पूछ रही थीं, "बहुत दर्द हो रहा होगा न?"

लेकिन समीक्षा के चेहरे पर दर्द की लकीरें नहीं, बल्कि एक मंद-मंद मुस्कान थी। उसे चोट का दर्द महसूस ही नहीं हो रहा था, क्योंकि उसके दिमाग में तो बस सृजन का साथ और उसकी बातें गूंज रही थीं। नानी बड़बड़ाती रहीं और समीक्षा ख्यालों में खोई रही।

​रात हुई, पर समीक्षा की आँखों से नींद गायब थी। वह करवटें बदलती रही, बार-बार वही मंज़र याद करती रही छत के पंखे को देखते-देखते कब सुबह हो गई, उसे पता ही नहीं चला।

​अगले दिन समीक्षा अलार्म बजने से पहले ही उठ गई। आज उसका उत्साह सातवें आसमान पर था। उसने बड़े चाव से तैयार होकर शीशे में खुद को देखा और बालों को संवारा।

​आज उसने टिफिन में कुछ खास रखा था गरमा-गरम डोसा और नारियल की चटनी। उसने मन ही मन एक योजना बनाई थी, "सृजन वैसे तो किसी का टिफिन लेता नहीं है, बहुत ईगो (Ego) है उसमें। लेकिन मैं कहूँगी कि ये कल मेरी मदद करने के लिए 'Thank You' गिफ्ट है। तब वो मना नहीं कर पाएगा।"

​वह साइकिल लेकर घर से निकली। पैर में हल्की टीस थी, लेकिन दिल की खुशी ने उस दर्द को दबा दिया था। गाना गुनगुनाते हुए, वह आज हवा से बातें कर रही थी।

​साइकिल के पैडल मारते हुए वह रोज़ से कहीं ज़्यादा तेज़ी से और वक्त से पहले ही स्कूल पहुँच गई। उसकी नज़रें पार्किंग स्टैंड पर सिर्फ एक ही चीज़ खोज रही थीं "सृजन की रेंजर साइकिल" ।

सृजन क्लास में दाखिल हुआ। उसने हमेशा की तरह अपना बैग आखिरी बेंच पर पटका और बैठ गया। लेकिन आज क्लास का माहौल समीक्षा के लिए बदला हुआ था। जैसे ही उसने सृजन को देखा, उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक आ गई।

​टीचर ब्लैकबोर्ड पर पढ़ा रहे थे, लेकिन समीक्षा का ध्यान पढ़ाई में रत्ती भर भी नहीं था। वह अपनी किताब के पीछे से छुप-छुपकर बस सृजन को ही देख रही थी। सृजन कभी खिड़की से बाहर देखता, तो कभी कॉपी में कुछ लिखता, और समीक्षा बस उसकी हर अदा को अपनी आँखों में कैद करती जा रही थी।

​घड़ी की सुइयाँ मानो रेंग रही थीं। समीक्षा को लंच ब्रेक का इतना बेसब्री से इंतज़ार पहले कभी नहीं हुआ था। उसकी नज़रें बार-बार घड़ी पर जा रही थीं।

​जैसे ही 'टन-टन-टन' करके लंच की घंटी बजी, समीक्षा के अंदर मानो बिजली दौड़ गई। इससे पहले कि सृजन क्लास से बाहर जाता, समीक्षा अपना टिफिन लेकर फौरन उसकी डेस्क के पास पहुँच गई।

​सृजन अभी अपना बैग बंद ही कर रहा था कि अचानक समीक्षा को सामने देख थोड़ा हकबकाया।

"तुम... यहाँ?" उसने अपनी भौहें सिकोड़ते हुए पूछा।

​समीक्षा ने बिना देर किए टिफिन उसकी तरफ बढ़ाया और एक सांस में बोल गई, "देखो, मना मत करना। कल तुमने मेरी मदद की थी, मेरे साथ पैदल चले थे... यह डोसा बस उसी के लिए एक छोटा सा 'Thank You' है। प्लीज, रख लो।"

​सृजन ने पहले टिफिन को देखा, फिर समीक्षा के मासूम चेहरे को। उसके पास मना करने का कोई ठोस कारण नहीं बचा था। उसने कंधे उचकाए और टिफिन ले लिया।

"ठीक है, सिर्फ इसलिए ले रहा हूँ क्योंकि मुझे भूख लगी है," उसने अपनी अकड़ बरकरार रखते हुए कहा।

​सृजन ने जैसे ही डोसा का एक निवाला खाया, उसके चेहरे के भाव बदल गए। डोसा वाकई बहुत स्वादिष्ट था। न चाहते हुए भी उसके मुंह से तारीफ निकल ही गई। खाते-खाते उसने मज़ाक में कहा,

"वाह! यह तो बहुत अच्छा है। अगर ऐसा खाना मिले, तो रोज़ लंच लाया करो मेरे लिए।"

​समीक्षा को तो जैसे इसी लाइन का इंतज़ार था। उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। सृजन ने तो बस मज़ाक में कहा था, लेकिन समीक्षा ने इसे एक वादे की तरह ले लिया।

​वह खिलखिलाकर मुस्कुराई और झट से बोली, "हाँ-हाँ, क्यों नहीं! मिलेगा न... रोज़ मिलेगा!"

​सृजन कुछ समझा पाता या आगे कुछ पूछता, उससे पहले ही समीक्षा "Bye!" बोलकर हवा के झोंके की तरह वहाँ से निकल गई। सृजन हाथ में टिफिन लिए, उसे जाते हुए देखता रह गया। उसके होंठों पर एक हल्की सी, न समझ आने वाली मुस्कान तैर गई।

​क्लास के बाहर आकर समीक्षा ने राहत की सांस ली। उसका प्लान काम कर गया था। अब उसके पास सृजन के करीब जाने का एक पक्का बहाना था 'लंच'।

​उस एक डोसे ने जैसे एक नई रीत शुरू कर दी थी। उस दिन के बाद से समीक्षा का बस एक ही नियम बन गया था रोज़ सुबह जल्दी उठना और सृजन के लिए लंच पैक करना।

​समीक्षा अब सृजन की परछाई बन गई थी। अगर कोई गलती से भी सृजन की बुराई कर देता, तो समीक्षा शेरनी की तरह उस पर टूट पड़ती। वह सबके सामने सृजन की तारीफों के पुल बांध देती। क्लास में वह हमेशा उसके आस-पास ही मंडराती रहती। सृजन भी अब उससे थोड़ी बहुत बात कर लिया करता था, कभी नोट्स के बहाने तो कभी लंच के बहाने। समीक्षा के लिए यही दो पल की बातें पूरी दुनिया की खुशियों से बढ़कर थीं।

​यह सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा। समीक्षा की सहेलियाँ खासकर 'साक्षी' यह सब बहुत गौर से देख रही थी।

​एक दिन लंच ब्रेक में साक्षी ने समीक्षा को कोहनी मारते हुए छेड़ा, "देख रही हूँ मैडम, आजकल कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो रही हो। और जिस तरह वो तुम्हारा टिफिन खाता है और बातें करता है... मुझे तो लगता है सृजन को भी तू पसंद है।"

​यह सुनकर समीक्षा का दिल ज़ोर से धड़क उठा। अंदर ही अंदर उसके लड्डू फूट रहे थे, लेकिन ऊपर से उसने झिड़कते हुए कहा, "कुछ भी! ऐसा कुछ नहीं है साक्षी, चुप कर।"

​साक्षी अपनी ज़िद पर अड़ गई। "तुझे यकीन नहीं है न? रुक, आज मैं खुद पूछती हूँ उससे कि तुझे कैसी लगती है।"

​"नहीं साक्षी! पागल मत बन, मत जा!" समीक्षा ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, उसका हाथ भी पकड़ा, लेकिन साक्षी तो साक्षी थी। वह हाथ छुड़ाकर सीधे सृजन की तरफ बढ़ गई।

​समीक्षा डर के मारे थोड़ी दूर, एक खंभे के पीछे छुप गई। उसका दिल हलक में आ गया था।

​साक्षी ने सृजन को पुकारा, "सृजन, इधर आना ज़रा!"

सृजन अपनी धुन में आया। साक्षी ने बिना घुमाए-फिराए सीधे पूछ लिया, "सृजन, एक सच बात बताना... क्या तुम्हें समीक्षा पसंद है?"

​यह सवाल सुनते ही समीक्षा ने अपनी सांसें रोक लीं। उसे लगा अब वो वो सुनेगी जो वो हमेशा से सुनना चाहती थी।

​लेकिन तभी... सृजन ज़ोर से हँसा। एक ऐसी हँसी जिसमें मज़ाक और तिरस्कार था।

उसने हँसते हुए लापरवाही से कहा, "क्या? समीक्षा? अरे कुछ भी यार! वो बिल्कुल भी मेरे टाइप की नहीं है। हर वक़्त मेरे आगे-पीछे मंडराती रहती है, 'चिपकू' कहीं की। और क्लास में देखो तो एकदम गूंगी बनी रहती है। मुझे ऐसे लोग बिल्कुल पसंद नहीं हैं जिनमें अपना कोई स्वाभिमान न हो।"

​खंभे के पीछे खड़ी समीक्षा के कानों में ये शब्द पिघले हुए शीशे की तरह उतरे।

​उस पल उसे लगा जैसे किसी ने उसके सीने में खंजर उतार दिया हो। उसकी आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली, जिसे रोकना अब उसके बस में नहीं था। उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। जिन सपनों को वह पिछले कई दिनों से बुन रही थी, वो सृजन के एक वाक्य से ताश के पत्तों की तरह बिखर गए।

​उसे महसूस हुआ कि इतने दिनों से जो प्यार उसके दिल में पल रहा था, आज वो इन आंसुओं के साथ बह गया। वह वहाँ एक पल भी और रुक नहीं पाई और रोते हुए स्कूल के बाथरूम की तरफ दौड़ पड़ी।

​सृजन अपनी बातों में मस्त था, उसे खबर भी नहीं थी कि उसने अनजाने में किसी का दिल कितनी बुरी तरह तोड़ दिया था।


जारी है........