भाग - 1 : वो पहली चोट
कहानी शुरू होती है दादरा गाँव से, एक ऐसा प्यारा सा गाँव, जहाँ सुबह की हवा में मिट्टी की खुशबू और शाम को सपनों की आहट होती है।दादरा... यह सिर्फ़ एक गाँव का नाम नहीं था, बल्कि एक अलग ही दुनिया थी जो अपनी धीमी और सुकून भरी रफ़्तार से चलती थी। यहाँ की सुबह अलार्म घड़ियों से नहीं, बल्कि मंदिर की घंटियों से होती थी।अभी सूरज पूरी तरह निकला भी नहीं था कि पूरब दिशा में आसमान सिंदूरी होने लगा था। खेतों में खड़ी फसलों पर ओस की बूंदें ऐसे चमक रही थीं, मानो रात ने जाते-जाते मोतियों की चादर बिछा दी हो। हवा में एक हल्की ठंडक थी, और साथ ही थी गीली मिट्टी और जलते हुए चूल्हों से उठते धुएं की मिली-जुली सोंधी महक।गाँव की पगडंडियों पर हलचल शुरू हो चुकी थी। कहीं कोई किसान अपने कंधे पर हल रखे खेतों की ओर बढ़ रहा था, तो कहीं कुएं पर पानी भरती औरतों की खिलखिलाहट सन्नाटे को तोड़ रही थी। नीम और पीपल के पुराने पेड़ अपनी जगह अडिग खड़े थे, जैसे वे इस गाँव के सदियों पुराने पहरेदार हों इसी दादरा गाँव के एक छोर पर 'दिवाकर शुक्ल' का पक्का मकान था , जिसकी ऊंची दीवारें और बड़ा सा लोहे का गेट उनकी रसूख की गवाही देता था। यह सृजन का घर था।घर के आंगन में ट्रैक्टर और जीप खड़ी रहती थी। सृजन के पिता, दिवाकर जी, इलाके के जाने-माने रसूखदार व्यक्ति थे। उनकी आवाज में वो भारीपन था कि जब वे बोलते, तो सामने वाला अपने आप चुप हो जाता। लेकिन वही दिवाकर जी अपने छोटे बेटे सृजन के सामने मोम की तरह पिघल जाते थे।सृजन की माँ, कौशल्या देवी, के लिए तो उनका बेटा ही उनकी दुनिया था।सुबह के 8 बज रहे होते, सूरज सिर पर चढ़ आता, लेकिन सृजन अपने कमरे में रजाई में दुबका रहता।"अरे लल्ला, उठ जा अब! स्कूल का टेम (time) हो गया है," कौशल्या देवी हाथ में दूध लिए उसे पुचकारतीं।"उह्ह माँ... 5 मिनट और," सृजन नींद में ही झल्लाता।बड़ा भाई विक्रांत, जो सुबह 5 बजे उठकर खेत और कारोबार संभालने निकल जाता था, यह सब देखकर बस सिर हिला देता। बड़ी बहन रिया, जो अभी मायके आई हुई थी, वो भी सृजन की ढाल बन जाती। इस घर में नियम सबके लिए थे, सिवाय सृजन के। उसे बचपन से यही सिखाया गया था कि उसे कुछ भी मांगने की जरूरत नहीं, बस उंगली उठाने की देर है और चीज़ हाज़िर।वहीं, गाँव के दूसरे छोर पर, नीम के पेड़ के पास एक छोटा लेकिन बेहद साफ़-सुथरा पक्का मकान था। यहाँ की सुबह शोर-शराबे से नहीं, बल्कि तुलसी चौरा पर जलते दिये और अगरबत्ती की महक से होती थी। यह घर था रिटायर्ड स्कूल मास्टर पं. रामकिशोर का यानी समीक्षा के नाना जी का।यहाँ दिन उगने से पहले ही समीक्षा की आँख खुल जाती थी। अलार्म बजने से पहले उठना उसकी आदत नहीं, मजबूरी और संस्कार दोनों थे। वह अपने मामा सुरेश और मामी के साथ ननिहाल में रहती थी। वैसे तो नाना-नानी और मामा उसे बहुत प्यार करते थे, लेकिन 'पराये घर' में रहने का एक अनकहा बोझ उसके बाल-मन पर हमेशा रहता था।उसके माता-पिता आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे, इसलिए अच्छी पढ़ाई के वास्ते उसे यहाँ भेजा गया था। उसे हर पल यह अहसास रहता कि उसे पढ़ना है, कुछ बनना है, और किसी को शिकायत का मौका नहीं देना है।सृजन के घर में जहां "हक" और "ज़िद" की भाषा चलती थी, वहीं समीक्षा की दुनिया "त्याग" और "समझौते" पर टिकी थी।दादरा गाँव की इन्हीं दो अलग-अलग छतों के नीचे, दो अलग-अलग तरह के इंसान तैयार हो रहे थे।घड़ी में 9:30 बज चुके थे। दादरा गाँव की मुख्य सड़क पर अब छात्रों की भीड़ बढ़ गई थी।समीक्षा अपनी 'लेडीबर्ड' साइकिल पर सधे हुए हाथों से पैडल मार रही थी। उसकी साइकिल की गति न बहुत तेज थी, न बहुत धीमी। वह सड़क के बिल्कुल बाईं ओर नियम से चल रही थी। उसके कंधे पर लटका स्कूल बैग भारी था, लेकिन उसके चेहरे पर सुबह की ताजगी थी। उसकी साइकिल की टोकरी (Basket) में टिफिन और पानी की बोतल करीने से रखी थी। वह ख्यालों में गुम, हवा से बातें करती हुई जा रही थी।तभी पीछे से एक शोर सुनाई दिया।"अबे हटा... साइड दे, साइड दे!"जोर-जोर से बजती साइकिल की घंटी और लड़कों का शोर।समीक्षा का दिल जोर से धड़का। वह बिना पीछे देखे ही समझ गई कि यह कौन है। यह सृजन था।सृजन अपनी 'रेंजर' साइकिल पर, हवा से बातें कर रहा था। उसकी शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले थे और टाई ढीली लटकी थी। वह अपने दो-तीन दोस्तों के झुंड के सबसे आगे था। वह पैडल ऐसे मार रहा था जैसे कोई रेस जीतनी हो। सड़क पर पड़े गड्ढों की उसे कोई परवाह नहीं थी, उसकी साइकिल हर ऊबड़-खाबड़ रास्ते को चीरती हुई निकल रही थी।समीक्षा ने अपनी साइकिल थोड़ी और किनारे कर ली, ताकि सृजन को रास्ता मिल सके।जैसे ही सृजन उसकी बगल से गुजरा, हवा का एक तेज झोंका समीक्षा के चेहरे से टकराया।सृजन ने जोर से घंटी बजाई—ट्रिंग! ट्रिंग! किसी को नमस्ते करने के लिए नहीं, बल्कि यह जताने के लिए कि "रास्ते से हट जाओ, राजा आ रहा है।"उसने समीक्षा की तरफ देखा तक नहीं। उसकी नज़रें तो सीधी सड़क पर थीं और दिमाग दोस्तों की मस्ती में। वह धूल उड़ाता हुआ, ज़ूम करके आगे निकल गया।समीक्षा की साइकिल की रफ़्तार अपने आप धीमी हो गई। वह उड़ती हुई धूल के बीच सृजन की पीठ को तब तक देखती रही जब तक वह भीड़ में ओझल नहीं हो गया। उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई।उसने मन ही मन सोचा, "इतनी भी क्या जल्दी है? गिर गए तो चोट लग जाएगी..."लेकिन सृजन तो सृजन था। उसे गिरने का डर कहाँ था?वह आगे-आगे बेपरवाह उड़ रहा था, और पीछे-पीछे समीक्षा, उसकी उड़ान को अपनी दुनिया मानकर धीरे-धीरे चल रही थी।सड़क के अंत में लोहे का विशाल गेट शान से खड़ा था, जिसके ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था "डी. पी. एकेडमी, दादरा"।पीले और क्रीम रंग से पुती हुई स्कूल की तीन मंजिला इमारत सुबह की धूप में चमक रही थी। स्कूल का मैदान काफी बड़ा था, जिसके एक कोने में पुराना बरगद का पेड़ था और दूसरी तरफ बास्केटबॉल का कोर्ट, जहाँ की जालियाँ अब थोड़ी पुरानी हो चुकी थीं। घंटी बजी टन! टन! टन!यह प्रार्थना (Prayer) का समय था।पूरे मैदान में खाकी पतलून और सफ़ेद शर्ट पहने लड़के, और सफ़ेद सलवार-कुर्ता पहनी लड़कियों की कतारें लगनी शुरू हो गईं। 12वीं कक्षा के छात्र सबसे आखिर में खड़े थे, क्योंकि वे स्कूल के 'सीनियर' थे।लड़कों की लाइन अलग थी और लड़कियों की लाइन अलग, लेकिन दोनों कतारें एक-दूसरे के समानांतर (Parallel) थीं। बीच में बस 10 फ़ीट का फासला था, लेकिन यह फासला किसी सरहद से कम नहीं था। प्रार्थना शुरू हुई:"दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना..."ज्यादातर बच्चों की आंखें बंद थीं और हाथ जुड़े हुए थे। लेकिन उस भीड़ में एक जोड़ी आंखें खुली थीं "समीक्षा की"।वह लड़कियों की लाइन में खड़ी थी, बिल्कुल सीधी और शांत। उसके होंठ प्रार्थना के बोल गुनगुना रहे थे, लेकिन उसकी नजरें तिरछी होकर लड़कों की लाइन के सबसे आखिरी छोर को तलाश रही थीं।वहाँ, सबसे पीछे, सृजन खड़ा था।सृजन का ध्यान प्रार्थना में बिल्कुल नहीं था। वह अपने आगे खड़े दोस्त के कान में कुछ फुसफुसा रहा था। शायद कल के क्रिकेट मैच की बात हो रही थी। अचानक पी.टी. सर (P.T. Sir) की भारी आवाज गूंजी"ओए! पीछे... बातें बंद!"सृजन तुरंत सीधा हो गया, जैसे उसने कुछ किया ही न हो। उसने अपने माथे पर गिरे बालों को हाथ से पीछे किया और एक शरारती मुस्कान दबा ली।समीक्षा ने यह सब देखा। सृजन की उस हड़बड़ाहट और बालों को संवारने की अदा को देखकर, प्रार्थना के बीच में ही समीक्षा के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसे लगा जैसे पी.टी. सर की डांट भी सृजन पर बेअसर है।तभी उसकी बगल में खड़ी साक्षी ने उसे कोहनी मारी और धीरे से फुसफुसाते हुए कहा, "भगवान से विद्या मांग ले, लड़कों की कतार बाद में देख लेना "समीक्षा झेंप गई। उसने तुरंत अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं और जोर-जोर से प्रार्थना गाने लगी, जैसे वह अपनी चोरी छिपाने की कोशिश कर रही हो। प्रार्थना समाप्त हुई।"सावधान! ... विश्राम! ... कतार से चलिए!"ढोल की ताल पर कतारें क्लासरूम की ओर बढ़ने लगीं। समीक्षा की नजरें जाते-जाते भी सृजन की पीठ को देख रही थीं, जो अपनी मस्ती में चलता हुआ सीढ़ियाँ चढ़ रहा था।12वीं की क्लास सबसे ऊपर वाली मंजिल पर थी।कमरे के अंदर घुसते ही जैसे तूफ़ान आ गया। लकड़ी की बेंचों के खिसकने की चर्र-मर्र आवाज़ें, बैग पटकने की धम्म और दोस्तों की ऊंची आवाज़ में बातें पूरा क्लासरूम किसी मछली बाज़ार से कम नहीं लग रहा था।सृजन ने अपना बैग अपनी सीट पर ऐसे फेंका जैसे कोई बॉलर विकेट पर गेंद मार रहा हो। वह अपनी गैंग रोहित, अमित और विक्की के साथ आखिरी बेंच पर जा जमा।तभी बाहर कॉरिडोर में भारी कदमों की आहट सुनाई दी।दरवाज़े पर एक परछाई उभरी और क्लास का शोर ऐसे बंद हुआ जैसे किसी ने टीवी का 'म्यूट' बटन दबा दिया हो।यह तिवारी सर थे फिजिक्स के टीचर। आँखों पर मोटे फ्रेम का चश्मा,हाथ में रजिस्टर और चेहरे पर हमेशा रहने वाली वह गम्भीरता। Good Morning Sirrrrr...." पूरी क्लास एक सुर में, लय बनाकर चिल्लाई।"बैठ जाओ, बैठ जाओ! आवाज़ नहीं..." तिवारी सर ने रजिस्टर मेज़ पर पटकते हुए कहा। उन्होंने चश्मा नाक पर थोड़ा नीचे खिसकाया और पूरी क्लास पर एक तीखी नज़र डाली। उनकी नज़र सीधे आखिरी बेंच पर गई जहाँ सृजन अभी भी कुछ खुसुर-पुसुर कर रहा था।तिवारी सर ने घूरकर देखा, तो सृजन तुरंत सीधा होकर बैठ गया, जैसे वह दुनिया का सबसे शरीफ बच्चा हो। हाज़िरी (Attendance) शुरू हुई:"रोल नंबर 1?""प्रेजेंट सर!""रोल नंबर 2..."समीक्षा का रोल नंबर 18 था। जैसे ही उसका नाम पुकारा गया, वह अपनी जगह पर खड़ी हुई।प्रेजेंट सर," उसकी आवाज़ कोमल लेकिन साफ़ थी। उसने बैठते हुए एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा। अब सृजन की बारी आने वाली थी।"रोल नंबर 21... सृजन शुक्ल!" तिवारी सर ने पुकारा। सृजन ने हाथ उठाकर उपस्थित दर्ज कराई।हाजिरी पूरी हुई, तिवारी सर ब्लैक बोर्ड मे चॉक से किरचाफ का नियम पढ़ाना चालू किया। साक्षी, जो पढ़ाई में हमेशा से ही होशियार थी, उसका पूरा ध्यान ब्लैकबोर्ड पर था। उसका हाथ तेज़ी से चल रहा था और वह सर के बताए हर एक पॉइंट को अपनी नोटबुक में नोट कर रही थी। उसे पता था कि यह टॉपिक बोर्ड एग्ज़ाम के लिए ज़रूरी है। उसकी एकाग्रता (Focus) अर्जुन के तीर जैसी थी।वहीं दूसरी ओर, आखिरी बेंच पर बैठा सृजन सर को ऐसे देख रहा था जैसे वे फिजिक्स नहीं, बल्कि किसी दूसरी दुनिया की भाषा बोल रहे हों।सृजन पढ़ाई में एक औसत (Medium) छात्र था। उसे पास होने की चिंता तो रहती थी, लेकिन टॉप करने का कोई शौक नहीं था। जब पूरी क्लास डेरिवेशन समझने में लगी थी, सृजन ने अपनी पेन को उंगलियों पर नचाना शुरू कर दिया। कभी वह पेन घुमाता, कभी अपने आगे बैठे लड़के की पीठ पर पेन की निब चुभाता।सृजन की इस मासूम बेवकूफी और बोरियत भरे चेहरे को देखकर, तीसरी लाइन में बैठी समीक्षा के होंठों पर मुस्कान आ गई।यह सब बगल में बैठी साक्षी गौर से देख रही थी। साक्षी ने अपनी भौहें चढ़ाईं, और दबी आवाज़ में, आँखों में शरारत लिए पूछा:"समीक्षा... तुझे सृजन कैसा लड़का लगता है?" (मुस्कराते हुए पुछा)समीक्षा का दिल धक से रह गया। उसे लगा जैसे पूरी क्लास के सामने उसकी चोरी पकड़ी गई हो। उसका चेहरा फिजिक्स के लाल डायग्राम जैसा सुर्ख हो गया। वह थोड़ा सकपका गई, फिर खुद को संभालते हुए बोली:"सृजन? ... वो... वो तो ठीक ही तो है। क्यों पूछ रही हो तुम मुझसे?"समीक्षा ने अपनी नज़रों को इधर-उधर घुमाया, जैसे वह पढ़ाई में बहुत व्यस्त हो। लेकिन साक्षी तो साक्षी थी, पढ़ाई में भी तेज़ और दोस्तों की नब्ज़ पकड़ने में भी।साक्षी ने अपनी नोटबुक वापस सीधी की, समीक्षा की आँखों में झाँका और एक जानलेवा मुस्कान के साथ बोली:"अइसे ही पूछा... बस मन किया तो।" (समीक्षा की तरफ देख के मुस्कराते हुए बोली)समीक्षा थोड़ी शर्माई और उसने घबराकर पेन उठाया। वह कुछ लिखने का नाटक करने ही वाली थी कि तभी स्कूल की घंटी गूंज उठी—टन! टन! टन!लंच ब्रेक!यह आवाज़ छात्रों के लिए किसी आज़ादी के ऐलान से कम नहीं थी। क्लासरूम से निकलकर बच्चे सीढ़ियों की तरफ ऐसे भागे जैसे कोई रेस लगी हो। 12वीं क्लास के 'सीनियर' होने के बावजूद, लड़कों की हरकतें किसी छोटे बच्चे से कम नहीं थीं।समीक्षा और साक्षी भी अपनी बेंच से उठीं। समीक्षा हमेशा की तरह शांत थी, भीड़भाड़ से बचकर चलने वाली। वे दोनों कॉरिडोर से निकलकर सीढ़ियों की तरफ बढ़ीं। वहाँ पहले से ही छात्रों का हुजूम था। धक्का-मुक्की और शोरगुल के बीच हर कोई पहले नीचे उतरना चाहता था।अचानक, पीछे से लड़कों का एक झुंड तेज़ी से आया।"हटो... हटो! जगह दो!" का शोर मचा।इस अफ़रा-तफ़री में किसी का हाथ समीक्षा के कंधे से टकराया। समीक्षा का संतुलन बिगड़ा।"आह!"एक हल्की सी चीख के साथ वह खुद को संभाल नहीं पाई और सीढ़ियों के पास ही लड़खड़ाकर गिर पड़ी। उसके घुटने और हथेली ज़मीन पर जोर से रगड़े।"समीक्षा!" साक्षी चिल्लाई और तुरंत उसके पास झुकी।समीक्षा के घुटने से खून रिसने लगा था और हाथ में मोच आ गई थी। दर्द के मारे उसकी आँखों में पानी भर आया। भीड़ उसे अनदेखा करके बगल से निकल रही थी।
तभी साक्षी ने देखा सामने से सृजन आ रहा था साक्षी को लगा कि सृजन मदद कर सकता है।साक्षी ने ज़ोर से आवाज़ लगाई:"सृजन! ओए सृजन! ज़रा रुकना! मदद करना!"सृजन ने आवाज़ सुनी। उसने चलते-चलते एक पल के लिए मुड़कर नीचे गिरी हुई समीक्षा और घबराई हुई साक्षी को देखा।समीक्षा की नज़रें उम्मीद से सृजन पर टिकी थीं। उसे लगा सृजन उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ाएगा।लेकिन सृजन... वह बस एक पल रुका। उसने एक नज़र डाली, फिर अपने दोस्तों की तरफ देखा और लापरवाही से कंधे उचकाते हुए बोला:"अरे यार,मुझे क्रिकेट खेलने जाना है और वह... आगे बढ़ गया। बिना रुके। बिना मुड़े।साक्षी सन्न रह गई। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। जिस लड़के के लिए उसकी सहेली मुस्कराती थी, वह इतना निर्दयी कैसे हो सकता है?सृजन का ठहाका सीढ़ियों के नीचे गूंज रहा था, और यहाँ ऊपर, समीक्षा की आँखों से दर्द का एक आंसू चुपचाप गाल पर लुढ़क गया।साक्षी ने दांत पीसते हुए मन ही मन कहा, "पत्थर दिल!"दादरा की हवा में आज एक अजीब सी कड़वाहट घुल गई थी। कहानी शुरू तो हुई थी प्यार से, लेकिन पहला पन्ना ही आंसुओं से भीग गया था।
जारी है.............