नूतन
नूतन शहर नई उम्मीदों लेकर आई हैं l
दिल ने चैन औ सुकून की साँस पाई हैं ll
नया सवेरा नया उजाला साथ साथ l
हर तरफ़ आशाओं की किरनें छाई हैं ll
उमंग होशो हवास में भर आगे बढ़ो l
फिझाओ ने खुशी से रागिनी गाई हैं ll
जोर शोर से स्वागत करने के लिए l
बयारे भी साथ अपने रंगत लाई हैं ll
अधूरी अभिलाषा को पूरा करने में l
भोर की ताजगी तनमन को भाई हैं ll
१-१-२०२६
संकल्प
सब से हट कर लेना संकल्प वो अनोखा भी चाहिए l
आसानी से मुकम्मल पूरा कर सके ऐसा भी चाहिए ll
शिद्दत और अपनापन से डूबा हरा भरा भी हो ओ l
नाले जैसा नहीं समन्दर से प्यार गहरा भी चाहिए ll
यार दोस्तों को इकट्ठा करने में देर नहीं लगेगी l
महफिल सजा दे पर ग़ज़ल बोलनेवाला भी चाहिए ll
जिंदगी का फलसफा यही है के सफ़र आसान भी हो l
एक जान से प्यारा हसीन इन्सान होना भी चाहिए ll
अकेले में गले से लगाने से कोई नई बात नहीं है कि l
सरे महफिल में हाथ थामने को कलेजा भी चाहिए ll
२-१-२०२६
माघ
माघ के मौसम में अरमान खिलते हैं गुलाबों की तरह l
यही गुलाब संभाले रखेंगे ताउम्र ख़्वाबों की तरह ll
मौसम, ठंड और धुंध से भरी खुशनुमा ये हवा l
कुहासे में लिपटे सूर्य की किरणें हिजाबों की तरह ll
माघ का धुँधला सवेरा बड़ा खूबसूरत लागे है l
वादियाँ औ घाटियाँ लगती शीत सराबों की तरह ll
क़ायनात की हर एक रचना मनमोहन दिखे कि l
पढ़ने जैसी रसप्रद मनोरमनीय किताबों की तरह ll
तेज धूप ने घेरा क्यूँ किया हुआ था शहर का l
शीत ऋतु का साथ पिटारा होता हिसाबों की तरह ll
३-१-२०२५
बेइंतिहा और बेपनाह प्यार की जकड़ में l
दो पल दूर रहकर सब्र-आज़मा चाहता हूँ ll
बात मानो मेरी सम्भाले न संभलेगा दिल l
आज फ़िर भी आमना सामना चाहता हूँ ll
४-१-२०२६
तसव्वुर
प्यारा सा तसव्वुर ख्यालों में उठता हैं l
चल खड़ा हो सपनें पूरे कर कहता हैं ll
उसने मुड़कर एक बार देखा भी नहीं l
जिस पर रोज दिल दिन रात मरता हैं ll
किया हुआ वादा अभी निभाया नहीं l
अपनी जूठी चाहतों का दम भरता हैं ll
कैसे भरोसा करे कमबख्त पर जो l
बार बार ख़ुद की जुबान से फिरता हैं ll
अपना हाथ जगन्नाथ पर विश्वास करो l
छोड़ो उसे जो रहमकरम पर पलता हैं ll
५-१-२०२६
ख़्वाब
ख्वाब को हकीकत में बदलने का हौसला रखो l
अपने हक्क के वास्ते गरज़ने का हौसला रखो l
जहां मान न हो वहांसे सरकने का हौसला रखो l
ख़्वाब
आज ख़्वाब ने दिल्लगी कर ली l
उसने अजनबी से दोस्ती कर ली ll
महफिल में जाने को मना था कि l
निगाहों से बहुत दूर गली कर ली ll
बोलने से दूरियाँ ज़्यादा बढ़ती तो l
चुपचाप खामोशी प्यारी कर ली ll
ताउम्र का सफ़र करते रहना है ओ l
किस्मत ने भी कलाकारी कर ली ll
बात जब कुछ देने की आई तब l
सखी ख़ुदा ने मनमानी कर ली ll
६-१-२०२६
मुलाकात
मुलाकात का वादा जीने का बहाना बन गया हैं l
यही मायाजाल जिंदगी का सहारा बन गया हैं l
ये पल कल हो ना बस यहीं जीवन का सत्य है l
कल तक जिन्दा था आज सितारा बन गया हैं l
बार बार भरोसा कर लिया बेवफा जानेजाँ से l
किस्मत में लिखा था उल्लू दुबारा बन गया हैं l
रोज बड़ी वाह वाही से पुरस्कृत किया गया है l
दुनिया के वास्ते एकाएक नकारा बन गया हैं l
बड़े दिल फेंक होते है मुहब्बत करने वाले देखो l
जहां हसीन खूबसूरती देखी कुंवारा बन गया हैं l
७-१-२०२६
बेवफ़ा
शिद्दत से बेवफ़ा ने बेवफ़ाई से वफ़ा निभाई हैं l
आंख मिचकें प्यार न करना बात समजाई हैं ll
मोहब्बत का दम भरने वाले ने आसानी से l
शुभचिंतक बन कर तन्हाई की राह दिखाई है ll
मयखाने में वस्ल के बहाने इश्क़ ने प्यार से l
जाम की प्याली में ज़हर की दवा पिलाई हैं ll
बड़े बेदर्द और बेरहम होते हैं इश्क़ वाले देखो l
जुदाई में अश्क़ न बहाने की क़सम दिलाई हैं ll
चैन से जीने तो न दिया अब मरने भी न देंगे l
जाते जाते आसूं भरी निगाहें भी मिलाई हैं ll
८-१-२०२६
महफ़िलों में हुस्न के सजदे में छलके है ग़ज़ल l
आसमाँ से तारा टूटे तब उतरती है ग़ज़ल l
कल्पनाओं के क्षितिज पर तब उभरती है ग़ज़ल l
हालात
जब दुआ बे - असर हो जाएगी l
जिन्दगी दर-ब-दर हो जाएगी ll
हालात भी बदलते जायेंगे कि l
साँस हम-सफ़र हो जाएगी ll
मुलाकात का लुफ्त उठा लो l
बातें करले सहर हो जाएगी ll
चार दिन तो जीना है सखी l
ग़म न कर बसर हो जाएगी ll
बहुत सोचने की जरूरत नहीं l
जल्द आसान सफ़र हो जाएगी ll
९-१-२०२६
रहनुमा
रहनुमा हो तो साथ सफ़र क्यूँ नहीं करते?
जिंदगी बन हमसफ़र बसर क्यूँ नहीं करते?
बारहा लोगों से क्यूँ रास्ता पूछते रह्ते हो l
आज गूगल मेप से गुजर क्यूँ नहीं करते?
गर देखनी जलचर रंगबिरंगी दुनिया तो l
समंदर के पानी में उतर क्यूँ नहीं करते?
सारे शहर की लेटेस्ट न्यूज कहते हो l
बात मोहब्बत की मग़र क्यूँ नहीं करते?
कब तक यूँ यहां से वहां घूमते रह्ते हो?
अस्तव्यस्त हालात सँवर क्यूँ नहीं करते?
१०-१-२०२६
नक़ाब
महफिल में रुख़ पे नक़ाब रहने दो l
न कोई सवाल-ओ-जवाब रहने दो l
सब अनपढ़ बैठे हुए हो वहां पर l
अब नहीं पढ़नी किताब रहने दो ll
किसी पर जबरदस्ती न चलती l
मरज़ी नहीं है तो दाब रहने दो ll
बड़े तहजीब वाले इकट्ठा हुए है l
कुछ ओर पी लो सराब रहने दो ll
लगातार बारिस से परेशान है कि l
बादल हटा दो आफ़्ताब रहने दो ll
११-१-२०२६
लुप्त होती स्त्रियाँ
पुरुष समोवड़ी बनने की होड़ में l
कुछ कर दिखाने व भाग दौड़ में l
घर आँगन से लुप्त होती स्त्रियाँ ll
करियर बनाने की भगदड़ में l
खुद की हेसियत की ज़ंग में l
घर आँगन से लुप्त होती स्त्रियाँ ll
सुबह से शाम भागती रहती है l
ऑफिस में पिसती रहती हैं l
घर आँगन से लुप्त होती स्त्रियाँ ll
घर की जिम्मेदारीयों में खो गई l
बच्चों के अक्खड़पन में धों गई l
घर आँगन से लुप्त होती स्त्रियाँ ll
न माज़ी, न किनारा, न सहारा l
आँधी में न कोई सम्भालने वाला l
घर आँगन से लुप्त होती स्त्रियाँ ll
१२-१-२०२६
अधूरी रही दास्ताँ
अधूरी रही दास्ताँ फ़िर भी चाहत का दम भरते हैं l
आज भी बेवफा से एकतरफ़ा मोहब्बत करते हैं ll
इश्क़ वाले तो होते है नासमझ पर हुस्न ने की नादानी l
क्यूँ गलती हुई रोज अपनेआप से बारहा लड़ते हैं ll
एक वो वक्त था देखे बिना लम्हा नहीं जी सकते थे l
आज बस उन्हीं की यादों में तन्हाइयों में सरते हैं ll
जाने कैसे लोग रिश्ता निभा लेते है एक दूसरे से l
ख्यालों में नशीली मुलाकात की कश्ती में चढ़ते हैं ll
जाने वाला शायद लौटकर वापिस आ जाए बस यूँ l
चाहे दास्ताँ अधूरी रही हम फ़िर से इश्क़ में पड़ते हैं ll
१३-१-२०२६
ज़ुल्म-ओ-सितम
ज़ुल्म-ओ-सितम के शिकार होने से डर लगता हैं l
जी जान से मार देने वाला खूनी ज़हर लगता हैं ll
वहसियत और खूना मरकी आम बात हो गई है l
अपने शहर में अपने ही लोगों से डर लगता हैं ll
पडोश वाले कंटक दिन रात बद्दुआ दे रहे हैं कि l
गहरा और सहमा सा गुलाब का शजर लगता है ll
अल्लडपन और जिद्द थी के मंज़िल पा लेगे पर l
अकेले निकल तो पड़े तो लम्बा सफ़र लगता है ll
जिंदगी आसानी से काट ने के लिए माँ का आँचल l
जहाँ में सब से सुरक्षित बाप का घर लगता हैं ll
१४-१-२०२५
जहर बनी जिन्दगी
बेवफा के रहनुकरम से जहर बनी जिन्दगी l
ख़ालिक की कृपा से जन्नत बनी जिन्दगी ll
जब से दर्दों ग़म देकर चल दिये तब से l
अश्कों के गुलों का सजर बनी जिन्दगी ll
दुनिया में सबसे ज्यादा शुभचिंतक होते उस l
माँ बाप के बिना लघरवघर बनी जिन्दगी ll
बचपन से आज तक इम्तिहान देते आये हैं l
जहर का घूँट पीकर बेअसर बनी जिन्दगी ll
खुद को काम के नशे में व्यस्त कर लिया l
नशीली तन्हाई का सफ़र बनी जिन्दगी ll
१५-१-२०२६