EPISODE 4
एक अनचाहा बंधन। एक अनियंत्रित जुनून।
सफ़र-ए-दिल उन दो आत्माओं की कहानी है जो एक दूसरे के लिए ज़हर हैं, मगर क़िस्मत ने उन्हें एक ही प्याले से पीने पर मजबूर कर दिया है।
नियम उन्हें बाँधते हैं, लेकिन हर स्पर्श एक ख़तरनाक आग लगाता है। यह नफ़रत से शुरू हुआ खेल जल्द ही एक ऐसे जुनूनी आकर्षण में बदल जाता है जिसे वे दोनों नकार नहीं सकते। यह आग इतनी भयानक है कि यह उन्हें या तो तबाह कर देगी, या उन्हें हमेशा के लिए बदल देगी।
मगर जब अभिमान प्यार से बड़ा हो जाता है, और जब उन राज़ों की गूँज सुनाई देती है जो रिश्ते की नींव को हिला सकते हैं, तब सफ़र का असली इम्तिहान शुरू होता है।
यह सफ़र सिर्फ़ मिलना नहीं है, बल्कि अपनी इच्छाओं, अहंकार और समाज से लड़कर प्यार को जीतने की एक ज़बरदस्त ज़िद है।
क्या वे नियमों की बेड़ियाँ तोड़कर उस जुनून को चुनेंगे जो उन्हें हर पल जला रहा है?
पढ़िए 'सफ़र-ए-दिल' – जहाँ हर बंधन टूटता है और जुनून ही एकमात्र नियम बन जाता है!
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🔥 एपिसोड 3: जुनून का बंधन और ज़ोर-ज़बरदस्ती
बलिदान। अन्वेषा अपनी आज़ादी बेचती है। अभिमान का अभिमानपूर्ण जुनून, अब एक निर्दयी अधिकार में बदल चुका है।
(शुरुआत: अभिमान का निजी दफ़्तर, सुबह 8:30 बजे)
जयपुर की सर्दीली सुबह की पहली किरणें अभिमान राठौड़ की हवेली के विशाल, निजी दफ़्तर पर पड़ रही थीं, लेकिन भीतर का माहौल बर्फ़ से भी ज़्यादा ठंडा था। दफ़्तर की दीवारें काले अखरोट की लकड़ी की थीं, और हर वस्तु—कलाकृति से लेकर डेस्क तक—अभिमान की निर्विवाद 'हुक़ूमत' का ऐलान कर रही थी।
अन्वेषा पट्टनायक दरवाज़े से कुछ फ़ीट की दूरी पर, कालीन पर खड़ी थी। वह बैठी नहीं, क्योंकि बैठना आत्मसमर्पण होता, और खड़े रहना उसके शेष बचे स्वाभिमान की आखिरी लड़ाई थी। उसके रेशमी सफ़ेद लिबास पर अब भी पिछली रात की भागमभाग की एक सूक्ष्म शिकन थी, लेकिन उसका चेहरा एक टूटी हुई मूर्ति की तरह शांत था—पीड़ा के हर भाव को छिपाता हुआ, पत्थर जैसा अटल।
अभिमान अपनी इम्पोर्टेड चमड़े की कार्यकारी कुर्सी पर बैठा था, उसके पैरों पर क्रॉको-पैटर्न वाले जूते थे। वह अन्वेषा को एक विजेता की नज़र से देख रहा था, जैसे कोई शिकारी अपने क़ीमती शिकार को फंदे में फँसा देख रहा हो। उसके हाथ मेज पर रखे थे, जैसे किसी राजा ने अपना सिंहासन थाम रखा हो।
अन्वेषा ने अपनी मुट्ठियाँ भींच रखी थीं, उसके नाखूनों ने उसकी हथेली में निशान बना दिए थे। जब उसने बोलना शुरू किया, तो उसकी आवाज़, हालाँकि शांत थी, लेकिन उसमें लाखों नसों के टूटने का दर्द भरा था।
अन्वेषा: "राहुल को छोड़ दीजिए। मैं आपसे शादी करने के लिए तैयार हूँ।"🔥✨️
यह चार शब्द एक विस्फोट की तरह थे। वे केवल एक वाक्य नहीं थे; वे अन्वेषा की आज़ादी, उसके सपनों, उसके प्रेम और उसके भविष्य की बलि थे।
अभिमान एक पल के लिए अपनी कुर्सी से सीधा हुआ। उसके चेहरे पर अब वह विजय का उन्माद था जिसकी आग पिछले एक साल से उसके सीने में जल रही थी। उसका जुनून अब पूर्ण, ठोस 'अधिकार' में बदल चुका था।
अभिमान (ठंडी, शोषक मुस्कान): "मुझे आप पर पूरा भरोसा था, अन्वेषा जी। मैंने हमेशा कहा था, आप एक तर्कसंगत, कर्तव्यपरायण महिला हैं जो जानती हैं कि सबसे बड़ा बलिदान क्या होता है।" उसने मेज पर रखे दो कागज़ों की ओर इशारा किया, "बैठिए, अब हमें औपचारिकताओं पर बात करनी है।"
अन्वेषा (गुस्से से, उसकी आँखों में नफ़रत की एक पतली, ख़तरनाक रेखा): "मैं यहाँ बैठने नहीं आई। मेरी शर्त सुनिए। यह शादी सिर्फ़ नाम की होगी। कोई पति-पत्नी का रिश्ता नहीं। आप मुझे छूने की कोशिश भी नहीं करेंगे।"
अभिमान ने एक भौंह उठाई। उसका धैर्य, उसकी विजय के चरम पर, एक मखमली क्रूरता में बदल गया।
अभिमान: "छूने की कोशिश? अन्वेषा जी, मैं कोई 'कोशिश' नहीं करता। मैं हुक़ूम देता हूँ। पर ठीक है," उसने आराम से झुककर, अपनी उँगलियों को आपस में जोड़ा, "आगे कहिए।"
उसने अपने दाहिने हाथ से एक मुहर लगे लिफाफे को मेज पर सरकाया।
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बने रहिए इस जुनून के सफर में......
अन्वेषा: "और छह महीने बाद, आप मुझे आज़ाद कर देंगे। आप तलाक़ देंगे। मेरा नाम, मेरी प्रतिष्ठा, मेरी आज़ादी—सब वापस करेंगे।" उसकी आवाज़ अब काँप रही थी, "अगर आपने राहुल को कोई नुकसान पहुँचाया... ज़रा भी नुकसान पहुँचाया, तो मैं आपको... मैं आपको कोर्ट में घसीटूंगी। मैं दुनिया को बताऊँगी कि आपने यह शादी ज़ोर-ज़बरदस्ती से की है।"
अभिमान (हंसता है—यह हंसी अपमानजनक और गहरी थी): "आप तो जेल की शर्त लगा रही हैं। एक भावी मुख्यमंत्री को धमकी? बहादुरी, अन्वेषा। मुझे यह पसंद आया।"