कहानियां न बहुत कुछ सिखाती है, कभी कभी मायूसी मैं रोशनी सी जगा देती है, हल्की सी सुबह की किरण जैसे खिड़की के पास ठहर सी जाती है, और उस रोशनी हम खुद को तलाश पाते है, इसी रोशनी में अक्सर रात के अंधेरे की बात को, सुबह की रोशनी जवाबो को तलाश पाते है कभी कभी कहानी के किरदार आगे बढ़ना सीखा देते है,
के रुको नही, बढ़ते रहो,
के रुको नही बढ़ते रहो,
चलते रहना जीवन का सार है,
और इस सार का मजा उठाते रहो,
रुक जाओगे, ठहर जाओगे,
रुक जाओगे, बैठ जाओगे,
जीवन की मंजिल को पाना है,
तो रुको नहीं बढ़ते हो,
खुशियों का दामन, या गम की चादर,
दोनो ही मिलेंगे, राह में...
पर रुक गए तो, ठहर जाओगे,
मंजिल की खुशियां, या गम पा नहीं पाओगे,
जीवन चलने का नाम,
तो रुको नही चलते रहो....
इसी लड़ी मैं कहानी का
पांचवां भाग
पथक अपने कमरे में राही की तस्वीर लेके बेड पर सोया हुआ था,
धीरे धीरे उसकी आंखे नम होने लगी और लेटे लेटे कुछ सोच रहा था,
(फ्लैश बैक)
फोन की रिंग बजती है,।
पथक: हेलो राही, कैसी हो तुम?
राही: हेलो, में ठीक हु पथक, तुम कैसे हो?
पथक: मैं भी ठीक हूं।
राही: ( थोड़े मस्ती वाले मूड में) कहो पथक आज कैसे याद किया इस नाचीज़ को?
पथक: (थोड़ा शायराना अंदाज मैं) अरे, जी आपको ही याद करके ही तो हमारे दिन की शुरुआत होती है, एक आप ही है जिन्हे हम कभी भी याद कर सकते है।
राही: क्या बात है जी बड़े शायर बने फिर रहे आज आप तो?
पथक: हांजी आजकल किसी शायर की कंपनी जो मिल रही है, ( पथक थोड़ा ठीक होते ही) राही मुझे तुमसे बात करनी थी।
राही: हां, बोलो ना पथक को सीरियस बात?? राही थोड़ा घबरा के बोली।
पथक: हां, बहुत ज्यादा सीरियस बात है?
राही: पथक तुम सीधे सीधे बताओ क्या बात है? खमखा टेंशन मत दो, नही तो मैं फोन रख रही हूं, राही गुस्से में बोली।
पथक: अच्छा बाबा बताता हु, वो सीरियस बात ये है, की मुझे तुमसे मिलना है, तुम मुझसे कब मिल सकती हो बताओ, जल्दी क्युकी अभी मुझे कोई बहाना नही सुनना है, तो अभी मुझे तुम बताओ।
राही: ठीक है, कल मिले शाम को, जगह तुम बता दो, मैं पहुंच जाऊंगी, तुम लोकेशन शेयर कर दो, i will be there tomorrow evening by 6' o'clock।
पथक के खुशी का ठिकाना नहीं रहा, उसने जल्दी से राही को जगह मैसेज कर दी,
इधर राही का भी हाल कुछ ऐसा ही था, वो दोनो पहली बार ऐसे मिलने वाले थे, हालाकि पहले एक बार मिल चुके है लेकिन तब सबके साथ मिले थे, आज उन्हें कुछ लम्हे खुद के साथ बिताने थे,
जैसे अधूरी ख्वाइश पूरी होने को है,
मन मैं तरंगे उठ ने को है,
पेट में जैसे तितलियां उड़ रही हो,
जैसे अचानक सब रंगीन लग रहा हो,
मन में कई सारे गाने गूंज रहे हो,
जैसे समय कट ही न रहा हो,
बस ऐसा ही कुछ दोनो का हाल था.।
बस शाम का इंतजार था,
राही के मन में गाना गूंज रहा है, " मेरे दिल को ये क्या हो गया,में न जानू कहां खो गया, क्यू लगे दिन में भी रात है, धूप में जैसे बरसात है, ऐसा क्यों होता है बार बार क्या इसको ही कहते है प्यार..."
और यहां पथक भी पहली बार डांस कर रहा था,
कितनी अच्छी फीलिंग होती है न ये प्यार वाली फीलिंग
बस रात गुजर रही है.....
To be continued.........