Pahli Nazar ki Chuppi - 10 in Hindi Love Stories by Priyam Gupta books and stories PDF | पहली नज़र की चुप्पी - 10

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पहली नज़र की चुप्पी - 10


वक़्त का सफ़र कितना अजीब होता है ना —
कभी किसी को रोज़ देखना भी कम लगता है,
और फिर एक दिन
वही इंसान
ज़िंदगी से ऐसे दूर चला जाता है
जैसे कभी पास था ही नहीं।
ना कोई लड़ाई,
ना कोई शिकायत,
ना कोई आख़िरी बात —
बस एक अधूरी-सी ख़ामोशी
जो धीरे-धीरे
पूरी ज़िंदगी में फैल जाती है।
कुछ रिश्ते
धीरे-धीरे नहीं टूटते।
वो बस एक दिन
बोलना छोड़ देते हैं।
और वही चुप्पी
उम्र भर साथ चलती है। 🌙
Prakhra आज
उसी मोड़ पर खड़ी थी
जहाँ हर रास्ता
कभी आरव तक पहुँचता था।
कॉफ़ी कैफ़े का वही पुराना कोना —
जहाँ कभी उसकी हँसी
दीवारों से टकराकर
बार-बार लौट आती थी।
जहाँ पहली बार
नज़रें मिली थीं,
और बातों से पहले
ख़ामोशी ने जगह बनाई थी।
सालों बाद
वहाँ लौटकर
उसे महसूस हुआ —
जगहें नहीं बदलतीं,
बस लोग बदल जाते हैं।
वही टेबल,
वही खिड़की,
वही हल्की-सी कॉफ़ी की खुशबू।
बस एक कुर्सी
ख़ाली थी।
वो कुर्सी
जो कभी आरव की होती थी।
Prakhra बैठी।
उसने कुर्सी को
हल्के से छुआ —
जैसे वक़्त को छू रही हो।
जैसे उस खालीपन से
कुछ पूछ रही हो।
धीमे से बोली —
“यहाँ अब भी
तुम्हारी हँसी गूंजती है, आरव…”
उसकी आवाज़
खुद से ही टकराकर
चुप हो गई।
उसने अपनी डायरी खोली —
वही पुरानी डायरी
जिसमें कभी
वो ‘अनकही बातें’ लिखा करती थी।
हर पन्ना
एक याद था।
कहीं उसकी आँखों की शरारत,
कहीं उसकी चुप्पी,
कहीं उसका इंतज़ार।
कहीं वो गुस्सा
जो प्यार से भरा होता था,
कहीं वो प्यार
जो कभी कहा नहीं गया।
कुछ पन्नों पर
सिर्फ़ तारीख़ें थीं,
क्योंकि उस दिन
लिखने से ज़्यादा
महसूस किया गया था।
कभी ऐसा सन्नाटा
जो बोलने से ज़्यादा कह जाता था।
उसी वक़्त
दरवाज़े की घंटी बजी।
और जैसे
वक़्त ने
एक बार फिर
करवट ली।
आरव सामने खड़ा था।
थोड़ा थका हुआ,
थोड़ा बदला हुआ,
पर अब भी वही नर्म मुस्कान लिए।
वही आँखें
जिनमें कभी
उसने खुद को देखा था।
कुछ पल
दोनों बस देखते रहे।
जैसे यक़ीन करना चाह रहे हों
कि ये सच है,
याद नहीं।
“कितना बदल गया सब, है ना?”
Prakhra ने कहा।
शब्द साधारण थे,
पर आँखों में
नमी थी।
आरव ने
धीमे से जवाब दिया —
“सब नहीं…
बस हम दोनों।”
उस एक वाक्य में
सालों की दूरी
सिमट आई।
कुछ देर
दोनों चुप रहे।
पर ये चुप्पी
अब भारी नहीं थी।
ये वो चुप्पी थी
जो बहुत कुछ सह चुकी हो
और अब
थककर शांत हो गई हो।
जैसे कोई पुराना गीत —
जो अब भी
दिल को सुकून देता है,
भले ही
उसका मतलब बदल चुका हो।
“काश उस दिन
कुछ कहा होता…”
Prakhra की आवाज़
हल्की-सी काँप गई।
उसमें पछतावा नहीं था,
बस एक सवाल था
जो सालों से
भीतर अटका हुआ था।
आरव ने
हल्की मुस्कान के साथ कहा —
“शब्दों की ज़रूरत ही
कब थी
हमारे बीच?”
उस पल
Prakhra समझ गई —
कुछ रिश्तों में
कहना ज़रूरी नहीं होता।
बस महसूस करना
काफ़ी होता है।
फिर एक
लंबी ख़ामोशी।
पर उस ख़ामोशी में
अब दर्द नहीं था।
वो एक
मुलायम-सा सुकून था।
एक closure —
जो शब्दों से नहीं,
दिल से निकला था।
Prakhra उठी।
धीरे से
डायरी टेबल पर रख दी।
“ये तुम्हारी है…
इसमें वो सब है
जो मैं कभी
कह नहीं पाई।”
उसकी आवाज़
अब स्थिर थी।
जैसे कह देने के बाद
कुछ हल्का हो गया हो।
आरव ने
डायरी उठाई।
हर पन्ने को
एक बार देखा।
और बस इतना कहा —
“तुमने जो नहीं कहा,
वो मैं
हमेशा समझता रहा।”
उस वाक्य में
कोई दावा नहीं था।
बस सच्चाई थी।
दरवाज़े से बाहर निकलते हुए
Prakhra ने
आख़िरी बार
मुड़कर देखा।
आरव वहीं खड़ा था —
उसी मुस्कान के साथ
जिससे उसने उसे
पहली बार देखा था।
उस मुस्कान में
अलविदा नहीं था,
बस स्वीकार था।
उस पल
Prakhra को एहसास हुआ —
कुछ रिश्ते
वक़्त के साथ
ख़त्म नहीं होते।
वो बस
ख़ामोशियों में
अमर हो जाते हैं।
कैफ़े के बाहर
हवा चल रही थी।
कहीं दूर
सूरज ढल रहा था।
और उसकी सुनहरी किरणों में
वो दोनों
अपनी पहली चुप्पी की
आख़िरी याद
छोड़ आए।
🕊️
“कुछ कहानियाँ
पूरी होकर भी
अधूरी लगती हैं…
और कुछ अधूरी होकर भी
मुकम्मल हो जाती हैं।”
— The End 🌙