AsurVidya - 3 in Hindi Adventure Stories by OLD KING books and stories PDF | असुरविद्या - 3

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असुरविद्या - 3

अध्याय - 3 पारस पत्थर

विहान के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान उभरी जिसने यक्षिणी को भी पल भर के लिए खामोश कर दिया. वह मुस्कान किसी मासूम इंसान की नहीं थी, बल्कि उस' विलेन' की थी जो अब अपनी नियति को खुद लिखने के लिए तैयार था.

विहान धीरे- धीरे हँसने लगा—एक कडवी, खतरनाक और रहस्यमयी हंसी.
खून? विहान ने अपनी खोखली आँखों से यक्षिणी को देखा. तुमने अभी मेरा शरीर देखा है? दो महीने अस्पताल में सडकर लौटा हूँ. मेरी रगों में तो इतना खून भी नहीं बचा कि यह पत्थर अपनी प्यास बुझा सके. अगर मैंने अपना खून दिया, तो मैं सोना बनने से पहले ही लाश बन जाऊँगा.
यक्षिणी ने अपनी भौहें सिकोडीं, तो क्या तू हार मान रहा है, नश्वर?
हार? विहान की हंसी और गहरी हो गई. नहीं. तुम जिस युग में कैद थी, वहां खून के लिए युद्ध करने पडते थे, गर्दनें काटनी पडती थीं. लेकिन यह दो हजार पच्चीस की मुंबई है. यहाँ खून बहाने की जरूरत नहीं, खून खरीदने की जरूरत है. यह दुनिया पैसों की है, यक्षिणी. यहाँ अगर जेब में पैसा हो, तो तुम लोगों का खून क्या, उनका दिल और जमीर भी खरीद सकते हो. ब्लड बैंक नाम की चीज सुनी है तुमने? वहां इंसानी खून बोतलों में बिकता है.
विहान ने उस काले पत्थर को गौर से देखा, जो उसके हाथों की गर्मी से अब हल्का गुनगुना हो रहा था.
अभी मेरे पास जो थोडा- बहुत खून बचा है, मैं उससे उतना ही सोना बनाऊँगा जिससे मैं बाजार में अपनी साख बना सकूँ, विहान ने ठंडे दिमाग से योजना बनाई. एक बार पैसा हाथ में आ गया, तो फिर इस' असुर- पारस' को कभी भूखा नहीं रहना पडेगा. मैं इतना खून खरीदूँगा कि तुम्हारी यह किताब उसमें डूब जाएगी.
यक्षिणी के चेहरे पर एक प्रशंसात्मक चमक आई. उसे उम्मीद नहीं थी कि यह नश्वर इतनी जल्दी असुरों जैसी चालाकी सीख जाएगा. तेरी बुद्धि तेरे शरीर से कहीं ज्यादा तेज है, स्वामी. तो फिर देर Kiss बात की?

रात के तीन: चौदह बज रहे थे. कमरा नंबर सत्रह के भीतर का सन्नाटा इतना गहरा था कि विहान को अपनी ही नसों में दौडते लहू की आवाज सुनाई दे रही थी. पीला बल्ब अब भी बुझा हुआ था, लेकिन कमरे में एक अजीब सी रक्तिम (खूनी) रोशनी तैर रही थी, जो उस' असुर- पारस' से निकल रही थी.
यक्षिणी विहान के चारों ओर हवा में ऐसे मंडरा रही थी जैसे कोई शिकारी अपने घायल शिकार के अंतिम क्षणों का आनंद ले रहा हो. उसके रेशमी वस्त्रों की सरसराहट किसी सांप के रेंगने जैसी ध्वनि पैदा कर रही थी. उसकी सुनहरी आँखें विहान की हर थराहट को पी रही थीं.
देरी किस बात की है, स्वामी. विहान ने दीवार का सहारा लेते हुए कहा. उसकी आवाज में एक अजीब सी कडवाहट थी. अभी- अभी तो तुम्हारे उस जादुई स्पर्श ने मेरी हड्डियों को जोडा था, मुझे लगा मैं फिर से जी उठा हूँ. और अगले ही पल. तुमने मौत का सौदा सामने रख दिया? मुझे डर लग रहा है. यह पत्थर. यह मुझे अंदर से खोखला कर रहा है.
यक्षिणी नीचे उतरी, उसके पैर फर्श से दो इंच ऊपर थे. उसने विहान के चेहरे के पास अपना चेहरा लाया—उसके शरीर से उठती गुलाबों और गंधक की गंध विहान के होश उडाने के लिए काफी थी.
भय तो केवल नश्वरता का प्रमाण है, स्वामी, वह मधुरता से फुसफुसायी, लेकिन उसकी आवाज में लोहे की खनक थी. शक्ति कभी उपहार में नहीं मिलती, वह हमेशा छीनी जाती है या खरीदी जाती है. तुम अपनी आँखों में प्रतिशोध की ज्वाला लिए बैठे हो, और प्रतिशोध बिना रक्त के कभी शांत नहीं होता. बोलो, क्या तुम फिर से उसी लंगडे भिखारी की जिंदगी में लौटना चाहते हो?
विहान ने दाँत पीसे. उसकी नजर मेज पर रखी एक पुरानी कलाई घडी पर पडी. यह महज एक घडी नहीं थी; यह उसकी छोटी बहन, पीहू की पहली कमाई का तोहफा था. पीहू ने ट्यूशन पढाकर अपने भाई के लिए यह घडी खरीदी थी. आज उस घडी का फीता गल चुका था और उसका शीशा चटका हुआ था—बिल्कुल विहान की जिंदगी की तरह.
उसने सामने रखी मेज पर अपना पीतल का पुराना कडा, दरवाजे का लोहे का ताला और नकली चैन को एक कतार में सजाया.
नहीं. उस नर्क में वापस कभी नहीं, विहान की आवाज अब फौलाद की तरह सख्त थी.
उसने मेज पर रखा एक पुराना, जंग लगा चाकू उठाया. उसका हाथ कांप रहा था, पर उसकी आँखों में पागलपन था. उसने अपनी हथेली पर चाकू की धार रखी और एक गहरा चीरा लगा दिया.
आह. विहान के गले से एक दबी हुई चीख निकली. ताजा, गर्म खून की धार फर्श पर गिरने के बजाय उस' असुर- पारस' की ओर खिंची चली गई. पत्थर ने उस लहू को ऐसे सोखा जैसे वह कोई प्यासा जीव हो. पत्थर अब काला नहीं रहा, वह एक दहकते हुए अंगारे की तरह चमकने लगा.
विहान ने उस जलते हुए पारस को सबसे पहले अपने कडे से छुआ.
स्रर्रर्र.
एक तीखी आवाज उठी, जैसे ठंडे पानी पर गर्म लोहा रखा गया हो. पीतल के अणु (Atoms) बिखरने लगे और देखते ही देखते वह कडा भारी, ठोस और शुद्ध चौबीस कैरेट सोने में बदल गया. विहान का सिर चकराया. उसे लगा जैसे किसी ने उसकी रीढ की हड्डी से सारी ऊर्जा खींच ली हो.
स्वामी. रुकना मत, यक्षिणी की आवाज उसके दिमाग में गूँजी. वह अब विहान के पीछे खडी थी, उसके लंबे बाल विहान के कंधों पर रेंग रहे थे. एक और. अभी और.
विहान ने कांपते हाथों से पत्थर को घडी और फिर ताले पर छुआ. हर स्पर्श के साथ' स्रर्रर्र' की आवाज आती और लोहा व प्लास्टिक स्वर्ण में बदल जाते. लेकिन इसकी कीमत विहान का शरीर चुका रहा था. उसका चेहरा किसी सफेद कागज की तरह पीला पड गया था. उसकी आँखों के नीचे काले गड्ढे उभर आए और उसे अपना ही वजन संभालना मुश्किल होने लगा.
अंतिम चीज—वह लोहे की चाबी—जैसे ही सोने की हुई, विहान के हाथ से पत्थर छूट गया. वह लडखडाकर कुर्सी पर गिरा, उसका शरीर पसीने से तरबतर था और साँसें उखड रही थीं.
काफी है. विहान ने हाँफते हुए कहा. अभी के लिए. इतना सोना काफी है.
मेज पर अब एक खजाना बिखरा था. एक सोने का ताला, एक सोने की घडी और एक चेन, कड़ा अंतिम चीजवह लोहे की चाबी, अंधेरे कमरे में उनकी चमक विहान की किस्मत बदलने के लिए पर्याप्त थी.
यक्षिणी ने झुककर विहान के चेहरे को अपनी ठंडी उंगलियों से छुआ. तुमने अपनी पहली परीक्षा पार कर ली, स्वामी. तुमने अपने ही रक्त से अपने साम्राज्य की नींव रखी है. जाओ, सुबह होने वाली है. इस' सुनहरी रद्दी' को बेचो और उस' लाल ईंधन' (खून) का प्रबंध करो, वरना अगली बार यह पत्थर तुम्हारी आत्मा मांग लेगा.
कमरे की हवा अब भी उन सुनहरे आभूषणों की चमक से भारी थी. यक्षिणी का शरीर धीरे- धीरे पारभासी (Transparent) होने लगा था, मानो वह सुबह की पहली किरण के साथ ही धुंध में मिल जाने वाली हो. उसे गायब होता देख, विहान के मन में अचानक एक अनजाना सा खालीपन और डर उभरा. इस खौफनाक रात में, वह स्त्री ही उसकी एकमात्र गवाह और शक्ति का स्रोत थी.
क्या. क्या तुम हमेशा के लिए जा रही हो? विहान ने लडखडाते हुए पूछा. उसकी आवाज में एक अजीब सी बेबसी थी. क्या यह सब महज एक रात का भ्रम था?
यक्षिणी रुकी. उसका आधा शरीर धुएँ में तब्दील हो चुका था, लेकिन उसकी सुनहरी आँखें अब भी विहान की रूह को चीर रही थीं. उसके होंठों पर एक ऐसी मुस्कान खिंची, जो जितनी सुंदर थी, उतनी ही डरावनी भी.
नहीं, नश्वर, उसकी आवाज कमरे की दीवारों से टकराकर गूँजी. आजादी इतनी आसान नहीं होती. मैं इस' असुरविद्या' से युगों से बंधी हूँ और अब. अब मैं तुझसे भी बंध चुकी हूँ. मेरा अस्तित्व तेरे रक्त और इस ग्रंथ के बीच झूल रहा है.
विहान ने मेज पर पडी उस काली किताब को देखा, जो अब शांत थी.
मैं केवल इस किताब की कैद से आजाद हुई हूँ, इसके अनुबंध (Contract) से नहीं, यक्षिणी ने हवा में अपनी उंगलियों से एक आकृति बनाते हुए कहा. जब भी तुझे मेरी आवश्यकता हो, बस इस किताब पर अपना हाथ रखना और मन से मुझे पुकारना. तेरा रक्त अब मेरी पुकार बन चुका है. मैं वहीं आ जाऊँगी, जहाँ तू होगा.
विहान का रिएक्शन मिला- जुला था. एक तरफ उसे सुकून मिला कि वह इस अंधेरे रास्ते पर अकेला नहीं है, लेकिन दूसरी तरफ उसे यह अहसास हुआ कि उसने एक ऐसी शक्ति को दावत दी है जो शायद उसे कभी चैन से जीने नहीं देगी. उसने अपनी मुट्ठी भींची, सोने का वह भारी कडा अब भी उसके हाथ में था.
तुम. तुम असल में क्या हो? और यह किताब क्या है? विहान ने अपनी जिज्ञासा को दबाते हुए पूछा.
यक्षिणी की आकृति अब और भी धुंधली हो गई, पर उसकी उपस्थिति का दबाव कम नहीं हुआ.
यह किताब साधारण पन्ने नहीं, बल्कि असुरों का वर्जित इतिहास है, उसकी आवाज अब एक गहरी फुसफुसाहट बन गई थी. इसमें वे असुर- विद्याएँ दर्ज हैं जिन्हें देवताओं ने छल से मिटा दिया था. मायावी अस्त्र बनाने की विधियाँ, मृत शरीर में प्राण फूंकने के मंत्र, और धातुओं को बदलने का वह विज्ञान जिसे तुम नश्वर' जादू' कहते हो. मुझे सदियों पहले एक महान असुर सम्राट के आदेश पर इस ग्रंथ की रक्षक बनाकर इसमें कैद किया गया था.
उसने विहान की ओर एक अंतिम बार देखा, उसकी आँखें अब पिघलते सोने की तरह नहीं, बल्कि एक प्राचीन गुरु की तरह गंभीर थीं.
याद रखना स्वामी. तूने अभी इसका एक पन्ना भी ठीक से नहीं पढा है. और मेरे बिना, तू इसे कभी पढ भी नहीं पाएगा. ये अक्षर केवल उसे ही दिखते हैं जिसके पास मेरी अनुमति हो. तू अभी बहुत निर्बल है, विहान. शक्ति का नशा चढने से पहले, शक्ति को संभालने का पात्र (Vessel) बनना सीख.
इन आखिरी शब्दों के साथ, यक्षिणी पूरी तरह से गायब हो गई. कमरे की लाइट झटके के साथ जल उठी, जिससे विहान की आँखें चौंधिया गईं.
विहान अकेला था. सन्नाटा इतना गहरा था कि वह अपनी उखडी हुई साँसों को साफ सुन सकता था. फर्श पर खून के सूखे निशान थे, मेज पर लाखों का सोना बिखरा था, और बगल में वह काली किताब—' असुरविद्या' —चुपचाप लेटी थी. विहान ने कांपते हाथों से किताब के कवर को छुआ. उसे एक हल्की सी गर्माहट महसूस हुई, जैसे किताब के भीतर कोई दिल धडक रहा हो.
उसने खिडकी के बाहर देखा. मुंबई जाग रही थी. सडकों पर गाडियों का शोर शुरू हो चुका था. दुनिया के लिए यह एक साधारण सुबह थी, लेकिन विहान के लिए, यह उसके साम्राज्य का पहला दिन था.