pita ka sunapn in Hindi Fiction Stories by Deepak Bundela Arymoulik books and stories PDF | पिता का सुनापन

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पिता का सुनापन

पिता का सुनापन

पिता… जो घर में होते हुए भी अकेले रह जाते हैं, घर में सब कुछ था, छत थी, दीवारें थीं, रसोई की खुशबू थी, हँसी-मज़ाक की आवाज़ें थीं, टीवी चलता था, मोबाइल बजते थे। बस एक चीज़ नहीं थी— पिता की अहमियत।

शिवनारायण जी रोज़ की तरह सुबह सबसे पहले उठे थे सूरज अभी ठीक से निकला भी नहीं था उन्होंने चुपचाप दरवाज़ा खोला बाहर झाड़ू लगाई, आँगन में तुलसी को पानी दिया, घर सो रहा था, और पिता… हमेशा की तरह जागते हुए भी अकेले थे।

कभी-कभी कोई चीज़ इतनी हमेशा साथ रहती हैं कि उसका होना हमें दिखना बंद हो जाता है। पिता भी वैसे ही होते हैं, वे घर की नींव होते हैं— मजबूत, स्थिर, पर नींव को कौन देखता है? अगर बेटा बाहर हो, तो पिता बार-बार घड़ी देखते हैं फोन उठाकर रखते हैं दिल में आशंका, मन में डर।

अगर बेटी घर से बाहर जाए, तो पिता का दिल उसके साथ चला जाता है, पर अगर पिता बाहर हों— तो घर चलता रहता है, 
कोई खालीपन नहीं, कोई बेचैनी नहीं, जैसे पिता का होना सिर्फ़ एक सुविधा बन गया हो, एक स्थायी वस्तु।

शिवनारायण जी कुर्सी पर बैठे थे हाथ में अख़बार था तो सही पर नज़र शब्दों पर नहीं थी, उन्हें याद आ रहा था— जब बच्चे छोटे थे
तब वे ऑफिस से थके-हारे आते, फिर भी बच्चों को गोद में उठा लेते थे अपनी थकान को बच्चों की हँसी में छुपा देते थे, आज बच्चे बड़े हो गए थे, और पिता…अनावश्यक।

बहू ने चाय बनाई, पर आवाज़ नहीं दी, बेटा कमरे से निकला, पर नज़र नहीं मिली, बेटी हेडफ़ोन लगाए गुज़र गई, जैसे पिता कोई फर्नीचर हों शिवनारायण जी ने मन ही मन सोचा- “अगर आज मैं न होता… तो क्या किसी को फर्क पड़ता?”

उस दिन वे बिना बताए घर से निकल गए, न कोई नाराज़गी, न कोई शिकायत, सिर्फ़ एक सवाल लेकर—“क्या इन्हे मेरी अनुपस्थिति महसूस होगी?”

वे शहर की सड़कों पर चलते रहे थे लोगों के बीच होते हुए भी खुद से बात करते रहे,पार्क में बैठे, पास ही एक बच्चा अपने पिता से कह रहा था— “पापा, मुझे ऊँचा उठाओ।”
शिवनारायण जी की आँखें भर आईं, उन्होंने सोचा— “कभी मैं भी किसी का ‘पापा’ था…
अब शायद सिर्फ़ एक खर्चा हूँ।”

यहां घर में दिन बीत गया, किसी ने नहीं पूछा— “पिताजी कहाँ हैं?”, रात का खाना बना
सबने खाया, पिता की थाली खाली रही—
पर किसी की नज़र नहीं पड़ी क्योंकि
पिता की मौजूदगी अब गिनी नहीं जाती थी।

शिवनारायण जी एक बेंच पर बैठे थे, सीने में अजीब सा दर्द था, उन्हें लगा जैसे पूरी उम्र देने के बाद अब उन्हें ज़रूरत नहीं रही,
उन्होंने खुद से कहा— “शायद मेरा काम पूरा हो गया है।” और वहीं उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया.

दूसरा दिन गुजरा और तीसरा दिन भी यूँ ही गुजर गया अब तक पिता का न होना
सामान्य लगने लगा था।

जब अस्पताल से फोन आया, तब घर के लोगों को झटका लगा, पहली बार बेटे को लगा— “पापा भी इंसान हैं।”

अस्पताल के बेड पर शिवनारायण जी बहुत छोटे लग रहे थे, जैसे सारी उम्र की जिम्मेदारियाँ उनसे छीन ली गई हों।

तभी डॉक्टर ने धीरे से कहा— “शरीर से ज़्यादा मन थका हुआ है, लंबे समय की उपेक्षा कई बार जान ले लेती है।”

होश में आने पर शिवनारायण जी ने कुछ शिकायत नहीं की बस इतना कहा— “मैं यह देखने गया था कि मेरे बिना घर सूना लगता है या नहीं… पर घर तो चल रहा था।”

यह वाक्य किसी थप्पड़ से कम नहीं था।
बेटे की आँखें झुक गईं, बेटी फूट-फूटकर रो पड़ी.

समझ देर से आती हैं उस दिन सबने जाना
पिता तब तक मजबूत रहते हैं जब तक वे चुप रहते हैं, जिस दिन वे बोलने लगें, उस दिन बहुत देर हो चुकी होती है।

अब घर में बदलाव आया, पर यह बदलाव
डर से पैदा हुआ था— पिता को खो देने के डर से. आज भी शिवनारायण जी घर के उसी कोने में बैठते हैं, फर्क बस इतना है—
अब कोई उन्हें देख लेता है, पर कितने पिता हैं जिन्हें यह मौका नहीं मिलता?

सत्यता यह हैं पिता की पीड़ा यह नहीं होती
कि उन्हें प्यार नहीं मिलता, पीड़ा यह होती है
कि उनकी ज़रूरत महसूस नहीं की जाती।

आर्यमौलिक