दोस्तों वर्तमान के समय में जो आजकल पत्नियां गुल खिला कर अख़बार और टीवी चैनलो की ब्रेकिंग बन कर चौका रही हैं ये सब देख कर दुःख तो होता ही हैं और शर्म से सर झुक भी जाता हैं अगर किसी की अंखों में नमक का नीर न होतो तो वो क्या इंसान हो सकता हैं... मैं तो नहीं ही कहूंगा खैर इन्ही घटनाओ को देखते हुए मेरी कलम भी चल पड़ी एक ऐसी कहानी को गढ़ने जिसे मुझे भी अपनी कलम का साथ देने को मजबूर होना पड़ा...तो चलिए दो मिनट का समय निकाल कर इस मनहूस की व्यथा को भी जान लीजिये...
मनहूस
कहते हैं "मनहूस" होना कितना भयवाह होता हैं हमारे समाज में ऐसे कई लोग हैं जो ऐसी ज़िन्दगी जी रहें हैं....ऐसा इंसान पल पल मरता और जीता हैं...
ऐसा ही दिनेश के साथ भी हैं किसी भी त्यौहार या शुभ दिन के आने से पहले दिनेश को बेचैनी होने लगती थी आज भी वो बेचैन था क्योकि आज उसका जन्मदिन था... दिन के 12 बजते बजते उसे उसके मोबाईल पर उसकी पत्नी का उसे फोटो मिला जो किसी के साथ शादी के जोड़े में श्रंगार करें हुए हैं और केप्सन में बस इतना ही लिखा था...
"मिस्टर मनहूस मैंने अपनी जंदगी की नई शुरुआत कर दी हैं.."
दिनेश मोबाइल की स्क्रीन को देखता ही रह गया। उसकी धुंधली आँखों से आँसू बहने लगे। एक पल को उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि उसकी जिंदगी का हमसफर इंसान इतनी निर्ममता से उसे ऐसा"तोहफ़ा" दे सकता है।
वो एक बार फिर अकेला हो जाता हैं... वो मायूसी भरी निगाहों से दिवार की घड़ी की तरफ देखता हैं घड़ी का कांटा टिक-टिक करता हुआ अपनी गति से दौड़ रहा था...और बाहर से आती आवाजें उसे और गहरे अकेलेपन की ओर धकेल रही थीं। वह सोच रहा था—"सही ही तो हैं मैं जिसके भी साथ होता हूं उसके लिए मनहूसियत ही तो देता हूं नहीं तो आज मेरे अपने भी मुझे नहीं ठुकराते "
उसका मन बार-बार अतीत की गलियों में चला जाता—वो दिन जब उसने अपनी पत्नी के लिए रात-रात भर मेहनत कर मेहनत का हर पैसा जोड़ा, उसकी छोटी-सी हंसी के लिए अपनी भूख-प्यास तक भूल गया। और आज उसी के मुंह से "मिस्टर मनहूस" का ताना...
उसके जन्मदिन के हर साल जैसे मनहूसियत का ठप्पा बन गए थे। बचपन में, जब उसने पहली बार अपना जन्मदिन मनाने की सोची, उसी दिन घर में पिता का देहांत हो गया था। तबसे हर बार उत्सव, त्योहार, या शुभ कार्य के दिन उसके जीवन में टूटन और तन्हाई ही आई।
वह जानता था कि अब किसी को समझाना व्यर्थ है। सच तो यही है—**वह खुद भी अब अपनी परछाईं से डरने लगा था।**
उसने मोबाइल नीचे रख दिया, और एक कोने में जाकर खिड़की से बाहर लम्बे समय तक टकटकी बाँधे देखता रहा। नीचे बच्चे पटाखे चला रहे थे, आसमान रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा उठा था… और उस रोशनी के बीच दीनू की दुनिया पहले से भी ज़्यादा अंधेरी लग रही थी।
वह फुसफुसाते हुए बोला—
"शायद सच में… मनहूस होना ही मेरी किस्मत है।"
आँखें बंद करते हुए उसके चेहरे पर पीड़ा और हार का अजीब सा संतुलन था। मगर दिल के किसी एक कोने में अभी भी एक सवाल कौध रहा था—
" क्या वाकई ईश्वर इतना निर्दयी है, या फिर मनहूसियत सिर्फ़ दूसरों की अज्ञानता की थोपी हुई एक बेड़ियाँ है जिसे मैं अब तक खुद ही ढो रहा हूं"
DB-ARYMOULIK 🙏