ऐसा ही होता है
दिन भर मशीन की गड़गड़ और घर की चख-चख से बड़ी दुर, गंदा नाला के उपर ब्रीज पर बैठना ज्ञान को बड़ा सुखद अनुभूति देता था। वह अपने नाक पे, श्वास पे तो अत्चाचार बर्दाश्त कर सकता था मगर मन-मस्कि पर कुठाराघात सहना उसके बूते के बाहर की बात थी। वो उस पुल पर अकेला नहीं बैठता था बल्कि उसके तरह और भी लोग थे जो उस दुर्गंध के अभयस्त थे। शुकून की अनुभूति सुगंध भी प्रतीत कराती थी।
दस रूपया जिसको कि वो अपने पारिवारिक खर्च से बचाकर रखता, चना खाने में खर्च करता था। चना का एक-एक दाना, दांतों के दो पाटों में ऐसे पीसता जैसे दुसरा दाना के मुंह में आने में बहूत देर है।
आज रह-रह कर ज्ञान का ध्यान, घर में हुई चख-चख पर पर चला जा रहा था।
तुनक कर पत्नी ने कहा था ’’ पैसा पुरा नहीं पड़ता है तो क्यों न दोहरी सिफ्ट कर लो। कारखाना में ही रह जाना, रविवार को आना और इकट्ठे खाएंगे-पीएंगे। ’’
ज्ञान ने भी तुनकमिजाजी में कहा था ’’ दोहरी सिफ्ट तो कर लूं, लेकिन जब तु मेरे सामने मेरी माँ से बकवास करती है तो मेरे पीठ पीछे क्या करेगी। ’’
ऐसा कहाँ होता है कि सिर्फ झगड़ा ही होता है, प्यार नहीं होता है और सिर्फ प्यार ही प्यार होता है, वहाँ झगड़ा नहीं होता है।
मेघा के मन में आया कि वो पुछे ’’ कितनी झगड़ालू हूं मैं, एक सप्ताह काम छोड़ कर, घर में ही बैठकर देख लो। ’’ लेकिन मेघा ने कुछ भी नहीं कहा और रसोई घर जाकर ज्ञान के लिए चाय बना लायी। मिठास का काम ही है कड़वाहट को दुर करना। मगर चाय में चीनी की मिठास ज्ञान के मन की कड़वाहट को कम नहीं कर पाया।
चना का आखिरी दाना मुंह में डाल कर ज्ञान ने घड़ी देखी, आधा घंटा और बैठा जा सकता है, मगर आज पता नहीं क्यों उतनी देर बैठने का मन नहीं किया।
किशन धाबा पार करने के बाद ज्ञान के चाल में तेजी आयी। घर के पास पहूंचा तो दरवाजा खटखटाया और हद तो तब हो गई जब उसने बिना एक क्षण इंतजार किए ही बेसब्रे की तरह दो बार और दरवाजा खटखटाया।
दरवाजा तो मेघा ने ही खोला और बिना कुछ कहे ही अंदर चली गयी तो ज्ञान के मन में फिर खटका कि आज मेघा ने मिठाई के लिए कोई जिद नहीं की। हो न हो उसका गुस्सा अब तक भी शांत नहीं हुआ है। यही सोचकर ज्ञान का चेहरा तमतमाया , मगर अगले ही क्षण उसका गुस्सा ठंडा पड़ गया, जब ज्ञान ने देखा कि मेघा, मेरी माँ के पाँव दबा रही है। माँ के चेहरे पर शुकून तो दिख ही रहा है मगर मेघा के चेहरे पर भी अजीब तरह की खुशी झलक रही है।
मेघा ने ज्ञान से कहा ’’ आप समय से थोड़ा पहले आ गए हैं, आइए, सास-बहु का झगड़ा देखिए। ’’ बोलकर मेघा खिलखिला कर हंस पड़ी।
हंसते हुए ज्ञान ने अपनी एक आँख दबाकर मेघा से पुछा ’’ यह रोज हो रहा है कि आज दिखाने के लिए कर रही है। ’’
मेघा ने तो कुछ नहीं कहा मगर ज्ञान की माँ ने कहा ’’ दिखावा किस बात का बेटा, बहु ही तो मेरा ख्याल रखती है, नहीं तो और कौन रखेगा। गुस्सा अपनी जगह पर और प्यार अपनी जगह पर।
उस गंदा नाला के पूल पर तो लोग आज भी बैठते हैं लेकिन ज्ञान अपने घर चला आता है।
समाप्त