uparvaale ki adalat in Hindi Motivational Stories by Harshad Kanaiyalal Ashodiya books and stories PDF | ऊपरवाले की अदालत

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ऊपरवाले की अदालत

ऊपरवाले की अदालत

 

एक छोटे से गाँव में रहता था एक धनी सेठ रामेश्वर। वह गाँव का सबसे अमीर व्यापारी था – सूद पर पैसा देने वाला, जमीनें खरीदने वाला। उसके पास धन की कोई कमी नहीं थी, लेकिन दिल में लालच की आग हमेशा जलती रहती थी। गाँव के किनारे एक गरीब विधवा बूढ़ी माँ रहती थीं, नाम था गंगाबाई। उनके पति के देहांत के बाद वही छोटी-सी जमीन उनकी एकमात्र सहारा थी। उस पर वे थोड़ी-सी फसल उगाकर गुजारा करती थीं।

 

एक दिन रामेश्वर की नजर उस जमीन पर पड़ी। उसने सोचा – यह जमीन मेरे खेत से सटी हुई है, अगर यह मिल जाए तो मेरा खेत बड़ा हो जाएगा। उसने गंगाबाई से जमीन खरीदने की बात की, लेकिन बूढ़ी माँ ने मना कर दिया। “बेटा, यह मेरी आखिरी निशानी है, इससे मैं अपना पेट पालती हूँ।”

 

रामेश्वर को इनकार बर्दाश्त नहीं हुआ। वह चालाक था, कागजों का खेल जानता था। उसने गंगाबाई को सूद पर कुछ पैसा दिया और धीरे-धीरे कर्ज का जाल बुनता गया। जब कर्ज बढ़ गया, तो उसने कहा – “माँजी, कर्ज चुकाओ वरना जमीन ले लूँगा।” गंगाबाई के पास कुछ नहीं था। रामेश्वर ने चालाकी से कागज तैयार करवाए, जिनमें लिखा था कि गंगाबाई ने स्वेच्छा से जमीन बेच दी है। बूढ़ी माँ अनपढ़ थीं, उन्होंने जहाँ अँगूठा लगाया, वहाँ बिक्री का कागज था। इस तरह रामेश्वर ने जमीन हड़प ली।

 

गंगाबाई रोती रहीं, हाथ जोड़ती रहीं। “बेटा, यह अन्याय है। मेरी जमीन लौटा दो, मैं तेरी गुलाम बनकर रहूँगी।” लेकिन रामेश्वर का दिल पत्थर था। उसने हँसते हुए कहा, “माँजी, अब यह मेरी है। जो करना हो करो, अदालत जाओ।”

 

गंगाबाई ने गाँव वालों की सलाह पर अदालत का दरवाजा खटखटाया। मुकदमा चला। रामेश्वर के पास सारे कागज थे – गवाह थे, नोटरी थी। सब कुछ कानूनी लगता था। सुनवाइयाँ होती गईं, और केस रामेश्वर के पक्ष में मजबूत होता गया। गंगाबाई की आँखों में आँसू सूखने लगे।

 

एक दिन गंगाबाई सीधे जज साहब के घर पहुँचीं। जज का नाम था श्रीनिवास राव – दयालु, धर्मपरायण इंसान। गंगाबाई ने रोते-रोते सारी कहानी सुना दी। जज साहब ने गौर से सुना, लेकिन कागज देखकर लाचार थे। बोले, “माँ, मैं कोशिश करूँगा, लेकिन सबूत तो उसी के पक्ष में हैं।”

 

फिर जज साहब ने रामेश्वर को अपने घर बुलाया। अकेले में बात की। “सेठजी, यह केस लंबा चलाना मुझे पसंद नहीं। अगली तारीख पर ही आपके हक में फैसला सुना दूँगा, लेकिन एक छोटी-सी शर्त है।”

 

रामेश्वर की आँखें चमक उठीं। “बताइए जज साहब, क्या हुक्म है?”

 

जज साहब मुस्कुराए, “मेरे बगीचे के लिए एक बड़ा बोरा काली मिट्टी चाहिए। वह मिट्टी उसी विवाद वाली जमीन की होनी चाहिए, और बोरा आपको खुद उठाकर लाना है।”

 

रामेश्वर को लगा – छोटी-सी बात है। वह तुरंत राजी हो गया। अगले दिन जज साहब खुद उसके साथ उस खेत पर गए। खेत के ठीक बीच में जाकर जज साहब ने खुद बोरा भरवाया – भरी मिट्टी से लबालब। फिर बोले, “अब सेठजी, इसे कंधे पर उठाइए।”

 

रामेश्वर ने कोशिश की। एक बार, दो बार... लेकिन बोरा टस-से-मस न हुआ। उसका चेहरा लाल हो गया, पसीना छूट गया।

 

जज साहब गंभीर स्वर में बोले, “सेठजी, मेरे जैसे गरीब जज के सामने एक बोरा मिट्टी भी नहीं उठा सके, तो ऊपरवाले जज के सामने यह सारा खेत कैसे उठाएँगे?”

 

यह सुनकर रामेश्वर के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे समझ आ गया कि जज साहब क्या कहना चाहते हैं।

 

> **विद्यते देवता नूनं नास्ति देवेति निश्चयः ।** 

> **यतः सर्वं प्रवर्तेत देवो हि परमेश्वरः ॥** 

>

> (अर्थ: निश्चय ही देवता विद्यमान हैं, यह नहीं कि देवता नहीं हैं। क्योंकि सब कुछ उसी से चलता है, वही परमेश्वर है। वह सब देख रहा है।)

 

और याद आया वह पुराना श्लोक:

 

> **अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ।** 

> **नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ॥** 

>

> (अर्थ: किया हुआ शुभ-अशुभ कर्म अवश्य भोगना पड़ता है। करोड़ों कल्प बीत जाएँ, तब भी अक्षय कर्म क्षय नहीं होता।)

 

रामेश्वर के मन में डर समा गया। उसे लगा – कानून की अदालत तो बच सकती है, लेकिन ऊपरवाली अदालत से कोई नहीं बचता।

 

> **जैसी करनी वैसी भरनी,** 

> **कहते हैं ऋषि-मुनि पुराने।** 

> **अन्याय का बोझ भारी होता,** 

> **एक दिन कंधों पर आ गिरे।** 

>

> **धन का लालच अंधा कर दे,** 

> **दिल को पत्थर बना देता है।** 

> **पर ऊपर वाला सब देखता,** 

> **न्याय का तराजू कभी नहीं डगमगाता।**

 

रामेश्वर को न भगवान का डर था, न कानून का। डर था तो बस इस बात का कि कहीं जज साहब कोई और खेल न खेल दें। लेकिन जज साहब की बात उसके दिल में घर कर गई। उसने उसी दिन गंगाबाई को बुलाया और सारे कागज फाड़कर जमीन वापस लौटा दी।

 

गंगाबाई की आँखों में आँसू आ गए – इस बार खुशी के। उन्होंने जज साहब के पैर छुए। गाँव में बात फैल गई। लोग कहने लगे – “सच तो यह है कि सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर एक अदालत है, जहाँ कोई वकील नहीं, कोई झूठा गवाह नहीं – सिर्फ सच्चाई का तराजू।”

 

और रामेश्वर? उस दिन के बाद उसका लालच कुछ कम हुआ। वह समझ गया था कि धन इकट्ठा करना आसान है, लेकिन उस बोझ को उठाना... बहुत भारी पड़ता है।

 

> **परपीडन से पाप लगता,** 

> **परोपकार से पुण्य मिलता।** 

> **अन्याय का अंत होता है,** 

> **न्याय की जीत निश्चित है।**