हनुमान का रोमंथन एवं मानसिक ताप
गंगा के उत्समुख गंगोत्री के समीप एक विशाल विस्तृत शिलाखंड के ऊपर अधोवदन उपवेशन करके महाबली चिरंजीवी हनुमान विषण्णवदन रोमंथन कर रहे थे –
उनके जन्मग्रहण के पश्चात् कितने सहस्र वर्ष व्यतीत हो गये हैं, इस धराधाम में कितनी कुछ घटित हो गयी है, कितने राजा-महाराजा-सम्राटों का उत्थान-पतन हुआ है, कितने दुर्योगों में प्राणीसमूह विपन्न हुआ है, सत्ता की लालच में कितने युद्ध-विग्रह घटित हुए हैं, उन्होंने सब कुछ स्वयं आंखों से देखा है। चिरंजीवी होने के वरप्राप्ति में वे यौवनारम्भ में उल्लसित हो गये थे, किन्तु श्रीरामचन्द्र के जीवनावसान के पश्चात् तथा उनके सभी स्वजन मित्र एवं सुहृदों के स्वर्गारोहण के पश्चात् जितने दिन व्यतीत हो रहे हैं वे एकाकीत्व की यंत्रणा में मानसिक रूप से तितर बितर हो रहे हैं। मानसिक यंत्रणा से मुक्ति पाने के लिए वे निरंतर पृथ्वी के विभिन्न प्रान्तों में अदृश्य रूप से विचरण करने लगे हैं, किन्तु उनका दुःसहननीय मानसिक यंत्रणा निवारण न होकर क्रमशः वृद्धि पा रहा है। सुहृद्, स्वजन एवं मित्रहीन हो जाने के पश्चात् कुछ सहस्र वर्षों तक सम्पूर्ण पृथ्वी का निरन्तर भ्रमण करने के समय वे कभी-कभी विभीषण, परशुराम, वेदव्यास, मार्कण्डेय, अश्वत्थामा आदि चिरंजीवियों के दर्शन पा चुके हैं। उनके साथ बार्तालाप में हनुमान जान पाये हैं कि वे भी हनुमान के समान जीवन के प्रति विरक्त होकर विविध उपायों से प्राणत्याग करने का प्रयास कर चुके हैं किन्तु चिरंजीवी होने के कारण सफल न हो सके। चिरंजीवी होने का वरदान उनके जीवन में अभिशाप में परिणत हो गया है।
हनुमान के स्मरण में आया, किष्किन्धा के नृपति सुग्रीव एवं श्रीरामचन्द्र के आदेश से माता जानकी की खोज करने के समय बालिपुत्र अंगद, जाम्बवान आदि के साथ समुद्रतट पर उपस्थित होकर समुद्र लंघन करके लंका जाने के समय जाम्बवान ने उन्हें उनका जन्मवृत्तान्त इस प्रकार कहा था –
“एकदा एक तपस्वी वानर के रूप धारणपूर्वक वन में तपस्यारत थे। पुञ्जिकस्थला नामक एक अप्सरा क्रीडाच्छले एक दिन उस तपस्वी की तपस्या में विघ्न डालने पर तपस्वी ने पुञ्जिकस्थला को यह कहकर अभिशाप दिया कि वह वानरी के रूप में जन्मग्रहण करेगी। तपस्वी के अभिशाप से पुञ्जिकस्थला कुंजर नामक एक वानरराज की कन्यारूप में जन्मग्रहण करने पर उसका नामकरण हुआ अंजना। अंजना यौवनवती हो जाने पर सुमेरु पर्वत के वानरराज केसरी के साथ उसका विवाह हो गया था। विवाह के बहुत दिनों बाद वसन्तकाल के एक मनोरम द्विप्रहर में उद्भिन्नयौवना अंजना अति स्वच्छ सूक्ष्म वस्त्रावृता होकर एक सुरम्य वनमध्य में सरोवर में स्नान करने के लिए उपस्थित हुई। तभी कोकिल के कूहूतान और नानाविध पक्षियों के कूजन से वनभूमि मुखरित हो उठी थी। विभिन्न वनफुलों के सौरभ से वनभूमि सुगंधित हो रही थी। झिरझिरि दक्षिण बायु में अंजना का सूक्ष्म वस्त्र बारम्बार खिसकने से अंजना के यौवनदृप्त शरीर के आकर्षक अंगप्रत्यंग दृश्यमान हो रहे थे। अंजना के अपरूप रूप दर्शन से वायुदेवता पवनदेव कामार्त होकर अंजना के निकट उपस्थित होकर उसे आलिङ्गन करके संभोग करने को उद्यत हो गये तो अंजना लज्जापूर्ण बाधा देने लगी। तत्पश्चात् पवनदेव ने आत्मपरिचय देकर अंजना से कहा, हे अनिन्द्यसुन्दरी, तुम्हरी मनोहर रूपदर्शन से मैं कामातुर हो गया हूं। मैं तुम्हरी साथ संभोग करूं तो तुम्हरी एक वीर्यवान, बुद्धिमान, महाबल पुत्र जन्मग्रहण करके त्रिभुवन में अक्षय कीर्ति स्थापित करेगा। अंजना पवनदेव के साथ मिलित होने के परिणामस्वरूप यथाकाल में अंजना एक पुत्रसंतान प्रसव की। जन्मग्रहण के कुछ दिनों पश्चात् एक दिन प्रभातकाल में आकाश में उदियमान सूर्य को दर्शन करके अंजनापुत्र किसी सुपक्व फल समझकर उसे खाने के उद्देश्य से भयंकर वेग से सूर्य की ओर धावित हो गया। उस समय सूर्य को ग्रास करने के लिए राहु सूर्य की ओर अग्रसर हो रहा था किन्तु अंजनापुत्र को सूर्य की ओर धावमान होते देखकर राहु भयभीत होकर इन्द्र को स्मरण करने लगा तो इन्द्र उपस्थित होकर अंजनापुत्र को अपने वज्र से आघात किया। इन्द्र के वज्र के आघात से अंजनापुत्र की हनु (चोयाल) भंग हो जाने पर वह अचेत अवस्था में भूमि पर पतित हो गया। अंजनापुत्र की इस अवस्था दर्शन से पवनदेव क्रुद्ध होकर पृथ्वी के समस्त वायुप्रवाह स्थिर कर प्रत्याहृत कर लिये तो वायु के अभाव से समस्त प्राणीसमूह का प्राणसंशय हो उठा। समस्त प्राणीसमूह के प्राणसंशय देखकर महादेव, ब्रह्मा, वरुण, अग्निदेव आदि ने पवनदेव को अनुनय किया कि वायु को मुक्त कर देने से किंउ कि सृष्टि विनष्ट न हो जाय। समस्त देवताओं के अनुनय पर पवनदेव ने कहा सभी देवता मेरे पुत्र को वरदान दें तो मैं वायु को मुक्त कर दूंगा। यद्यपि देवराज इन्द्र के द्वारा प्रक्षिप्त वज्र के आघात से हनुमान अचेत हो गया था, अतः उन्होंने अंजनापुत्र को वरदान दिया कि अंजनापुत्र का शरीर इन्द्र वज्र के समान कठिन एवं शक्तिशाली होगा तथा वज्र का आघात भी उसके ऊपर व्यर्थ होगा। तत्पश्चात् अन्यान्य देवताओं ने भी हनुमान को इस प्रकार वर दिया - अग्निदेव ने वर दिया कि अग्नि उसे दहन नहीं करेगी, वरुणदेव ने वरदान किया कि जल उसे कोई क्षति नहीं पहुंचायेगा, पवनदेव ने वरदान किया कि हनुमान वायु के समान वेगवान होंगे तथा वे यथेच्छा बिना बाधायं जाने में समर्थ होंगे तथा वायु से उन्हें कोई क्षति नहीं होगी। ब्रह्मा ने उन्हें अमर वर दिया तथा उनका नाम रखा हनुमान, और तूम ही वह हनुमान हो। इस प्रकार नानाविध वरप्राप्ति के फलस्वरूप तूम असीम एवं अलौकिक शक्ति का अधिकारी होकर किशोरावस्था में अपनी शक्तियों को अनावश्यक रूप से विभिन्न व्यक्तियों पर प्रयुक्त करके क्रीडा उपभोग करते थे। एकदा इस प्रकार ध्यानमग्न ऋषियों के साथ क्रीडा करने पर ऋषिगण ने तुम्हे अभिशाप दिया कि तूम अपनी अपरिमित शक्तियों का विषय भूल जाओगे, तथापि यदि कोई कभी तुम्हरा यौवनावस्था में देवताओं के वरदान से प्राप्त अपार शक्तियों का विषय स्मरण करा देंगे तो तूम पुनः अपनी शक्तियों के विषय में अवहित हो सकेगा।”
हनुमान के पुनः स्मरण में आया, समुद्र लंघन के समय उन्होंने अपना शरीर पर्वत के समान विस्तृत करके लंका पहुंचने के लिए प्रचंड वेग से उन्मुष्टि करके समुद्र अतिक्रमण कर रहे थे, तभी नागमाता सूरसा सर्पिणी ने उनकी शक्ति परीक्षा करने के लिए यात्रापथ में बाधा उत्पन्न की थी, तत्पश्चात् सिंहिका राक्षसी ने उनकी गतिरोध किया तो उन्होंने उस राक्षसी का संहार कैसे किया था। लंका पहुंचकर अशोकवन में राक्षसियों से घिरी माता जानकी को देखने पर उन्होंने श्रीराम प्रदत्त अंगुलीय प्रदर्शित करके अपना लंका आने का अभिप्राय बताकर रावण पुत्र अक्षय का संहार करकए लंकापुरी को दहन कर दिया था। हनुमान के स्मृतिपट पर उभरा - श्रीराम एवं रावण के युद्ध के समय उन्होंने प्रबल बिक्रम से धूम्राक्ष, अकम्पन, जम्बुमाली आदि राक्षस सैनापतियों को तथा रावण के दो पुत्र त्रिशिरा एवं देवान्तक सहित बहुसहस्र राक्षससेना का संहार किया था। रावण के प्रबल पराक्रान्त पुत्र इन्द्रजित को लक्ष्मण वध करने के पश्चात् प्रिय पुत्रवध का प्रतिशोध लेने के लिए रावण ने लक्ष्मण पर शक्तिशेल प्रयुक्त किया तो लक्ष्मण अचेत हो पड़े थे। लक्ष्मण की इस अवस्था दर्शन से वानरों में वैद्यराज सुषेण ने कहा कि सूर्योदय के पूर्व विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी, अस्ति-सञ्जारिणी एवं मृतसञ्जीवनी नामक वनौषधि प्रयोजन न किया तो लक्ष्मण का प्राणान्त हो जायेगा, वे औषधि गन्धमादन पर्वत पर मिलेंगी। सुषेण का यह निदान श्रीराम को भी विचलित कर गया था, क्योंकि सुदूर गन्धमादन पर्वत जाकर सूर्योदय से पूर्व वनौषधि लाना साध्यातीत था। लंका के समुद्रतट पर अचेत प्रिय भ्राता का मस्तक गोद मे लिये श्रीराम रो रहे थे। इस घोर संकट में उन्होंने श्रीराम को आश्वस्त करके पवनगति से गन्धमादन पर्वत पर उपस्थित होकर सुषेण वर्णित वनौषधि चिन्हित न कर पाने पर गन्धमादन पर्वत उखाड़ कर सूर्योदय से पूर्व ला दिया तो गन्धमादन पर्वत से औषधि संग्रहपूर्वक वैद्यराज सुषेण ने लक्ष्मण के मृतप्राय शरीर पर प्रयोजित करके लक्ष्मण को बचाया था।
श्रीराम एवं रावण के उस भयंकर युद्ध के समय महीरावण ने श्रीराम एवं लक्ष्मण को मायाबल से हरण कर पाताललोक में बन्दी बनाया तो उन्होंने महीरावण एवं अहिरावण का संहार करके श्रीराम एवं लक्ष्मण को पाताललोक से उद्धार किया था। तदनन्तर, विभीषण के उपदेश से उन्होंने ब्राह्मण के छद्मवेश धारण करके रावण पत्नी मन्दोदरी को छलना करके उसके निकट से रावण का मृत्युबाण लाकर श्रीराम को अर्पित किया तो उस मृत्युबाण निक्षेप करके श्रीराम ने रावण का संहार किया था। रावणवध के अनन्तर माता जानकी को उद्धार करके लाने के बाद उनकी सतीत्व में संदेह प्रकट करके श्रीराम जब माता जानकी को अग्निपरीक्षा देने को बाध्य कर रहे थे, तभी हनुमान असहननीय मानसिक यंत्रणा से करुण होकर भी श्रीराम के प्रति अटल भक्ति वश उस मानसिक यंत्रणा का प्रकट न कर सके। माता जानकी अग्निपरीक्षा में उत्तीर्ण हो जाने पर, विभीषण को लंका के राजपद पर अभिषिक्त करके श्रीराम, लक्ष्मण, माता जानकी, सुग्रीव, अंगद एवं वानरसेना के साथ हनुमान अयोध्या नगरी में उपनीत हो जाने पर सारे अयोध्यावासी द्वारा किया गया भावमथित विशाल संवर्धना आज तक हनुमान के मानसपट पर समुज्ज्वल है।
अयोध्या आगमन के पश्चात् बहुत दिनों तक सुग्रीव, अंगद एवं वानरसेना वहां नानाविध आनन्द-प्रमोद उपभोग करके श्रीराम प्रदत्त प्रचुर उपहार ग्रहणपूर्वक किष्किन्धा लौट गये तो हनुमान श्रीराम एवं माता जानकी के सेवक रूप में अयोध्या में रहे गए। अयोध्या में परमानन्द से कुछ दिनों व्यतीत करने के बद माता जानकी गर्भवती हो गयीं जानकर हनुमान बहुत आनन्दित हुया था। किन्तु, कुछ दिनों में ही श्रीराम प्रजाप्रीति के लिए गर्भवती माता जानकी को परित्याग करके वनमध्य में निर्वासित करने का आदेश दिये जाने की सूचना पाकर हनुमान निदारुण मनोकष्ट से अन्तराल में अश्रुमोचन कर रहे थे। माता जानकी को परित्याग करके वनमध्य निर्वासित करने पर महामुनि वाल्मीकि ने उन्हें अपना आश्रम में लाकर अपनी कन्या के समान यतन से रखा था। यथाकाल में माता जानकी युगल पुत्र प्रसव करने पर महामुनि वाल्मीकि ने उनका नामकरण किया कुश एवं लव और उन्हें बाल्यावस्था में सर्वप्रकार शास्त्र एवं शस्त्र की शिक्षा दी थी। कुश एवं लव शस्त्रविद्या में इतने पारंगत हो गये थे कि स्वयं श्रीराम एवं लक्ष्मण उनके साथ युद्ध में पराजित हो गये थे।
हनुमान सातिशय मनोवेदना के साथ स्मरण किया कि श्रीराम यज्ञ का आयोजन करके पुत्र के साथ माता जानकी को आनयन किया। यज्ञ आरम्भ होने से पहले माता जानकी के सतीत्व सम्बन्ध में प्रजावर्ग के संदेह निरसन के लिए श्रीराम ने पुनः माता जानकी को अग्निपरीक्षा देने का आदेश दिया तो माता जानकी अत्यन्त तापित होकर सशरीर भूमिमध्य में प्रविष्ट होक प्राणविसर्जन दे दीं। माता जानकी की इस करुण परिणति दर्शन पर हनुमान हाहाकार करके अश्रुमोचन कर रही थे। माता जानकी भूमिमध्य प्रविष्ट होकर प्राणविसर्जन देने के पश्चात् से हनुमान सदा विमृष्ट रहते थे तथा उनके लोचनद्वय अश्रुपूर्ण हो उठते। हनुमान को भोजन में रुचि न रही, नेत्रों से निद्रा अन्तर्हित हो गयी, शरीर क्रमशः क्षीण होने लगा, किसी कर्म में मनोनिवेश न कर पाते थे। अतःपर बहुत वर्ष व्यतीत होने पर श्रीराम पार्थिव शरीर त्याग करके वैकुण्ठलोक में गमन करने पर हनुमान अयोध्या त्याग करके पृथ्वी के विभिन्न स्थानों में शोकाकुल चित्त से भ्रमण करने लगे।
हनुमान इस प्रकार बहुतशत वर्ष अस्थिरचित्त से भूमण्डल के सर्वत्र विचरण करते करते त्रेतायुग का अन्त होकर द्वापरयुग आरम्भ होने के बाद बहुतशत वर्ष व्यतीत हो जाने पर हनुमान कुछ दिन गन्धमादन पर्वत के सानुदेश से स्वर्गलोक जाने के पथिमध्य में एक दिन एक विशाल शिला के ऊपर अवस्थान कर रहे थे। उस समय एकदिन हनुमान देख पाये कि भीमसेन वह पथ से स्वर्गलोक के ओर आ रहे हैं। वह पथ संकीर्ण होने से केवल एक व्यक्ति चलने के योग्य था। हनुमान अवहित थे कि जैसे वे पवनदेव के औरसजात पुत्र भीमसेन भी वैसे ही पवनदेव के औरसजात पुत्र हैं, अतः भीमसेन उनके भ्राता हैं। उन्होंने भीमसेन की शक्ति परीक्षा के लिए उस शिला पर शयन करके अपने विशाल लंगूल आन्दोलन करने लगे तो प्रचंड शब्द उत्पन्न होकर पर्वत की गुफा में प्रतिध्वनित हो रहा था। उस शब्द श्रवण पर भीमसेन शिहरित होकर देखा कि स्वर्गलोक जाने का पथ रुद्ध करके पर्वत के समान एक महाकपि एक शिला पर शयन करके लंगूल आन्दोलन कर रहा है। भीमसेन निर्भय होकर हनुमान के निकट उपस्थित होकर उच्चनाद से गर्जन करके उसे पथ से हटने को कहा तो हनुमान ने उनके नेत्र ईषत् उन्मीलन करके भीम की ओर अवज्ञाभर दृष्टि से देखकर कहा, मैं सुख से निद्रामग्न था, तूमने मुझे क्यों जगाया? भीम ने आत्मपरिचय देकर कठोर स्वर में कहा, तूम कौन हो, मेरा पथ छोड़ दो? हनुमान ने कहा, मैं साधारण वानर हूं, वृद्धावस्था के कारण उठने की शक्ति नहीं है, मुझे लंघन करके या मेरी लंगूल हटा कर जाओ। तत्पश्चात् भीमसेन ने वानर को यमालय भेजने का निश्चय करके उसकी लंगूल धर ली किन्तु न हिला सके। भीमसेन सर्वशक्ति से प्रयास कर रहे थे, उनके शरीर से द्रवसिक्त धारा से स्वेद निर्गत हो रहा था किन्तु लंगूल न हिला सके। विफल होकर भीमसेन नत होकर हनुमान को प्रणाम करके विनयपूर्वक कहा, हे वानरश्रेष्ठ, प्रसन्न हों, मेरे कठोर वचन क्षमा करें। मैं आपका शरणागत हुं आपका परिचय जानना चाहता हूं?
हनुमान ने तत्पश्चात् आत्मपरिचय दिया तो भीमसेन उच्छ्वसित होकर कहा, आप मेरे ज्येष्ठ भ्राता हैं, आपके दर्शन पाकर मैं धन्य हो गए। हे महावीर, समुद्र लंघन काल में आपका जो रूप था वह रूप दर्शन कराकर मुझे कृतार्थ करें। हनुमान ने भीम की प्रार्थना पूर्ण की तो भीमसेन ने उनके उस आश्चर्य भयंकर विन्ध्यपर्वत के समान कलेवर दर्शन करके रोमांचित हो गये। अतःपर हनुमान ने अपना शरीर संकुचित करके भीम को आलिङ्गन करके कहा, कुन्तीपुत्र, दुर्योधन आदि के साथ तुम्हारा युद्ध काल में मैं अर्जुन की पताका पर अदृश्य रूप से उपवेशन करके भयंकर गर्जन करूंगा, जिससे तुम शत्रुवध सहज कर सकोगे। भीमसेन को यह कहकर हनुमान अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर, कुरुक्षेत्र में कौरव एवं पाण्डवों के महायुद्ध के समय हनुमान अर्जुन की पताका पर अदृश्य रूप से उपवेशन करके भयंकर गर्जन करके कौरवों के चित्त में त्रास संचार किया था।
कुरुक्षेत्र में कौरव एवं पाण्डवों के महायुद्ध के पश्चात् अल्पाधिक पंच सहस्राधिक वर्ष व्यतीत होकर पृथ्वी पर अब कलियुग। इस सुदीरघकाल हनुमान अपने चिरंजीवीत्व को अभिशाप गण्य कर निदारुण मानसिक ताप से पीड़ित होकर अस्थिरचित्त निरन्तर भूमण्डल में विभिन्न स्थानों पर भ्रमण कर रहे हैं। कलियुग आरम्भ होने के पश्चात् से अद्यावधि हनुमान प्रत्यक्ष किए हैं मनुष्य एकदा प्रकृति पर पूर्णतः निर्भर रहकर क्रमशः अपनी मेधाशक्ति से विशेष ज्ञान अर्जन करके जीवनयात्रा निर्वाह सहज करने के लिए नानाविध अप्राकृत वस्तुओं का उद्भावन किया है। एक वर्ग के मनुष्य ने अपने विशेष ज्ञान का अपव्यवहार करके बहुविध विनाशकारी वस्तुओं का उद्भावन किया है तथा सम्पूर्ण भूमण्डल के वातावरण को दूषित करके प्राणीसमूह का जीवन दुर्बिसह बना दिया है। भूमण्डल में मनुष्य छोड़के अन्य किसी प्राणी में आत्मघाती एवं विनाशकारी आचरण दृष्ट नहीं होता।
हनुमान ने त्रेता एवं द्वापर युग में देवता, दानव, असुर, यक्ष, राक्षस आदि प्रत्यक्ष देखे थे, मनुष्यों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र चार वर्णभेद हैं ऐसा जानते थे। हनुमान यह दर्शन करके सातिशय शंकित हैं कि कलियुग का प्रारम्भकाल से सहस्राधिक वर्षावधि तक भूमण्डल में मनुष्यों में एक मात्र धर्म प्रचलित था, जिसके शास्त्रावली पर कुछ ब्राह्मण स्वार्थसिद्धि के उद्देश्य से संयोजन, वियोजन एवं विकृति घटाकर अब्राह्मणों को, विशेषतः दरीद्र शूद्रवर्ण मनुष्यों को नाना छल से त्रस्त एवं शोषण कर रहे हैं। प्रथम दिक एक मात्र धर्म प्रचलित था जो सनातन नाम से प्रसिद्धि पाया है तथा उसके अवलम्बी हिन्दु नाम से विदित। परवर्ती काल में विभिन्न समयों में कतिपय मनुष्यों ने और भी अनेक धर्मों का प्रवर्तन करके मनुष्यकुल में विभाजन घटाकर एक दूसरे के विरुद्ध लड़ाई में प्रवृत्त हो गये हैं, जिसके जहरिला फल में कोटि कोटि मनुष्यों का रक्त से धराभूमि स्नात हो गयी है।
हनुमान सर्वथा अवगत हैं कि देवताओं के वर से अग्नि उन्हें दहन नहीं करेगी, जल कोई क्षति नहीं करेगा, वे वायु के समान वेगवान होंगे तथा यथेच्छा बिना बाधाएं जाने में समर्थ होंगे एवं अमरत्व प्राप्त करेंगे, किन्तु उनकी कोई दैवी या अलौकिक शक्ति नहीं है, वे किसी के रोगमुक्ति नहीं कर सकते, किसी के मनोरथ पूर्ण नहीं कर सकते, किसी का भाग्य भी परिवर्तन नहीं कर सकते। वे वानर वर्ग के अंतर्भुक्त हैं, अतः वे मनुष्य के चतुर्वर्ण में गण्य नहीं। वे देवता नहीं हैं, तथापि कतिपय नीचाशय धुरंधर व्यक्ति आत्मस्वार्थसिद्धि के लिए दुरभिसंधि वश उन्हें देवत्व आरोप कर सहस्र सहस्र मन्दिर निर्माण करके उनके कल्पित अजस्र मूर्तियां प्रतिष्ठा करके दुर्बलचित्त अज्ञानान्ध मनुष्यों को निरन्तर छलना कर रहे हैं, किन्तु इसे रुद्ध करने की शक्ति उनके पास नहीं हैं।
हनुमान सम्यक् अरूप से वहित हैं कि सत्य त्रेता एवं द्वापर युग में कोई संतान उसके पिता के औरसजात न कनीन न क्षेत्रज होने में कोई प्रश्न या विरूप समालोचना न की जाती थी। किन्तु कलियुग में कतिपय मनुष्य उनके वास्तविक पिता वानरराज केसरी न पवनदेव इस प्रश्न एवं विरूप समालोचना करने लगे हैं जिससे वे अत्यन्त विड़म्बित अनुभव कर रहे हैं।
सम्पूर्ण भूमण्डल में मनुष्य जैसा पापाचरण कर रहे हैं, मनुष्य चरित्र का जैसा संक्षालन हुआ है, ईश्वर एवं धर्म के नाम से जैसा घृणा विष से मनुष्यसमाज को कलुषित कर रहे हैं, तददर्शन पर हनुमान प्रतिदिन अपनी मृत्युकामना कर रहे हैं। किन्तु चिरंजीवीत्व वरप्राप्तिजन्य दुःसहन अभिशाप उनके मृत्यु पथ में कंटक स्वरूप होने से वे नीरव आश्रुमोचन करने लगे।
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