खेतों के बीच से गुजरती वह कच्ची राह, जहाँ लाजो अक्सर अपनी सहेलियों के साथ पानी भरने जाती थी। सावन का उसे दूर से देखना और लाजो का अपनी ओढ़नी के पल्लू को उँगलियों में लपेटना।
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गाँव की पगडंडियों पर लाजो की पायल जब झनझनाती, तो सावन का दिल धड़क उठता। लाजो सादगी की मूरत थी—आँखों में काजल और मन में
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सावन के लिए अटूट विश्वास। लेकिन उनके बीच एक गहरी खाई थी: उनके परिवारों की पुरानी रंजिश।
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लाजो के पिता की सख्ती पूरे गाँव में मशहूर थी; उनके लिए 'मर्यादा' उनकी पगड़ी थी, जिसके आगे बेटी की खुशी का कोई मोल न था। सावन और लाजो अक्सर
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खेतों की ओट में बस नजरों से बातें करते, क्योंकि शब्दों का इस्तेमाल मौत को दावत देने जैसा था।
जब लाजो के घर वाले उसकी शादी कहीं और तय करने लगे, तो उसने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा
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फैसला लिया। अमावस्या की उस काली रात में, जब पूरा गाँव सन्नाटे में डूबा था, लाजो अपने घर की दीवार
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फांदकर बाहर निकली। सावन मंदिर की सीढ़ियों पर उसका इंतज़ार कर रहा था। मंदिर के भीतर, दीये की
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मद्धम रोशनी में, दोनों के हाथ कांप रहे थे। सावन ने जैसे ही सिंदूर उठाया, लाजो की आँखों से आँसू छलक पड़े। यह सिंदूर सिर्फ मिलन का नहीं, अपनों से
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बिछड़ने का भी निशान था। मंत्रों की गूंज के बीच, उन्होंने सात फेरे लिए और एक-दूसरे के होने का वचन दिया।
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सुबह की पहली किरण के साथ, दोनों लाजो के घर पहुँचे। लाजो ने उम्मीद की थी कि उसका लाल जोड़ा देखकर पिता का दिल पिघल जाएगा। लेकिन जैसे ही वे चौखट पर पहुँचे, पिता ने हाथ में लाठी लेकर रास्ता
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रोक लिया। लाजो ने उनके पैर छूने चाहे, पर पिता पीछे हट गए। उन्होंने गरजते हुए कहा, "मेरे लिए मेरी बेटी उसी वक्त मर गई थी जब उसने इस चौखट को लांघा था। जाओ यहाँ से!"
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लाजो की रुलाई फूट पड़ी, पर पिता ने दरवाजे की सांकल चढ़ा दी। वह भारी मन और भरी आँखों के साथ सावन का हाथ थामकर मुड़ गई। शादी तो पूरी हुई थी, पर पीछे छूटा था वह घर जहाँ उसका बचपन बीता था।
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लाजो ने कांपती हथेलियों से उस बंद लकड़ी के दरवाजे को छुआ, जिस पर कभी उसके बचपन की किलकारियां अंकित थीं। उसने अपनी सिसकियों को रोकते हुए मन ही मन पिता से कहा:
"बाबू, आज आपने सिर्फ अपनी बेटी के लिए दरवाजा नहीं बंद किया, बल्कि उस बचपन के लिए भी सांकल चढ़ा दी जो आपकी गोद में बीता था। आपने कहा था कि सिंदूर सौभाग्य की निशानी होता है, पर मेरा सिंदूर
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तो आज अपनों के आँसुओं में धुल गया। मैं सावन के साथ एक नई दुनिया बसाने तो जा रही हूँ, पर मेरा एक हिस्सा हमेशा इसी चौखट पर बैठा रहेगा, इस उम्मीद में कि शायद कभी ये किवाड़ खुलें और आप कहें—'बिटिया, घर आ जा'।"
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उसने एक आखिरी बार मिट्टी को माथे से लगाया और बिना पीछे मुड़े सावन की परछाईं में खो गई। पीछे रह गया तो बस पिता का अहंकार और लाजो के कदमों के वे निशान, जिन्हें आने वाली बारिश भी नहीं मिटा सकती थी।
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Manoj rajput