Looks Chhipi in Hindi Children Stories by Rajeev kumar books and stories PDF | लुका-छीपी

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लुका-छीपी

 

बचपन के निराले दिन, कब लौट के आने वाले दिन। घुमना-फिरना, मिलना-मिलाना, हंसी-ठहाके, सब यादों में बसे हैं। मेरे बचपन के तरह ही गुजरा, छाया और रोहना का बचपन। रमणीक अपार्टमेंन्ट के प्रथम तल पर छाया और दुसरे तल पर रोहन का घर। सभी बच्चों में ही लगाव था, लेकिन एक ही अपाटमेन्ट में होने के कारण छाया और रोहन का आपसी लगाव अधीक था।
छाया ने तुतलाते हुए कहा ’’ मैं जहाँ चुपती हुं, तुम ढुंढ लेते हो। जलूल अमर ही होगा जो तुमको मेरे बारे में आज भी बता दिया। ’’
रोहन ने भी थोड़ा मुस्करा कर कहा ’’ लुका-छिपी के खेल में मुझसे कोई भी नहीं जीत सकता। ’’
’’ आ हा हा, बले आए तीसमार खां। तुम छुपो और देखना मैं कैसे तुमको ढुंढ लेती हूं। ’’
छाया की इस बात को रोहन ने चैलेंज की तरह स्वीकार किया और ऐसी जगह ढुंढना शुरू किया, जहाँ छाया तो क्या कोई भी पता न लगा पाए।
छाया ढुंढते-ढुंढते परेशान हो गई, तभी अचानक चिखने चिल्लाने की आवाज आयी। छाया ने मन ही मन कहा ’’ अरे ये तो रोहन की आवाज है। ’’
छाया ने आवाज लगाई ’’ रोहन, कहाँ हो तुम ? ’’
’’ छाया ,मैं यहाँ हूं, तुम जल्दी आओ। ’’
नन्ही छाया ने तार लिया कि यह आवाज बाहर से आ रही है। छाया कैम्पस से बाहर जाने लगी तो और बच्चों ने कहा ’’ कैम्पस से बाहर जाएंगे तो हमलोगों को बड़ी मार पड़ेगी। ’’
साँप को तो छाया ने हट-हट कह कर भगा दिया। छाया ने रोहन के कान ऐंठकर कहा ’’ यहाँ झाड़ी में क्यों छुपे थे। कैम्पस से बाहर क्यों आए। ’’
रोहन की आँखें रूआंसी देखकर छाया ने उसके कान सहलाते हुए कहा ’’ यहाँ नहीं न आना चाहिए। ’’ चॉकलेट देकर कहा ’’ लो चॉकलेट खाओगे। ’’
समय तो अपनी नियत चाल से चल रहा था। पढ़ाई-लिखाई दोनों ने एक साथ की। दोनों में घनिष्ठ आकर्षण का जन्म हुआ। यह आकर्षण बढ़ कर प्रगाढ़ प्रेम में परिणत हुआ। और दुसरे प्रेमी जोड़ों की तरह ही छाया और रोहन ने घरवालों और समाज का गुस्सा झेला। दोनों के माता-पिता ने प्रेमी जोड़े के आगे घुटने टेकते हुए दोनों को विवाह के बंधन में बांध दिया।
अब आपसी प्रेम को सम्भालने की जिम्मेदारी छाया और रोहन की थी। विवाहोपरान्त नोक-झांक तुल पकड़ कर बड़ी बात हो गई।
बहुत सी प्रेम विवाह की परिस्थितियों में देखा गया है कि प्रेम संबंध विवाहोपरान्त अंत। इसके बाद भी कभी प्यार कभी तकरार और कभी नांक-झोंक चलता रहा
नोंक-झोंक का कद बढ़ते-बढ़ते आपसी नापसंद तक बात बढ़ गयी। उनके माता-पिता जो कभी दोनों के विवाह के दुश्मन थे वो अब दोनों के वैवाहिक रिश्ते को संभालने में एंड़ी-चोटी का दम लगाने लगे।
दफ्तर में ही रोहन को अपनी गलती का एहसास हुअ। दफ्तर से लौटने के बाद रोहन ने छाया को घर में नहीं पाया तो, उसने सोचा कि हो सकता है कि अपने माँ के पास गई हो। वहाँ भी नहीं मिलने के बाद रोहन हक्का-बक्का रह गया। फोन तो कई बार ट्राई किया मगर बंद ही मिला। काफी समय के बाद रोहन ने जब फोन लगाया तो फोन रिसीव हो गया।
रोहन ने कहा ’’ लुका-छिपी खेलने की तुम्हारी आदत अब तक नहीं गयी। नहीं ढुंढ सकता मैं, अब हार मान रहा हूं, प्लीज घर आ जाओ। ’’
फोन के उस तरफ से आवाज आयी ’’ जानती हुं कि तुम नहीं ढुंढ सकते, और ढुंढने की कोशिश भी मत करना। ’’
फोन कट होने के बाद रोहन और भी परेशान हो गया।
अनिल के साथ आने पर छाया को पछतावा तो था, मगर रोहन को इस ढीठाई से बोलकर और भी पछतावा हुआ।
छाया, अनिल के साथ रोमांस तो कर पा रही थी मगर दिल के एक कोने से रोहन के प्यार को नहीं निकाल पा रही थी।
कतरा को समन्दर बनते देर नहीं लगती, तील ताड़ बन ही जाते हैं और राई का पहाड़ बन ही जाता है। ऐसा होने से कोई भी रोक नहीं सकता है। छाया रोहन को छोड़ते वक्त भी खुद को रोक नहीं पायी थी उसी प्रकार अब भी छाया खुद को रोक नहीं पायी।
रोहन के लिए दिल के एक कोने में सिमट गया प्यार कब पुरे दिल पर हाबी हो गया, छाया समझ नहीं पायी। छाया न घर की न घाट की, न इधर की और न उधर की, न निगलते बने और न उगलते बने।
अंततः छाया ने उगलने का ही फैसला लेते हुए अनिल से कहा ’’ शादीशुदा लड़की से दोस्ती क्या हुई, तुम तो शादी के मंनसूबे बांधन लगे। हम दोनों पहले भी अच्छे दोस्त थे और आज भी अच्छे दोस्त हैं। ’’
यह बोलकर छाया झट कमरे से निकल गयी।
हक्का-बक्का हुए अनिल के मुंह से सिर्फ यही वाक्य निकला ’’ क्या बोल रही हो, सुनो मो मेरा क्या होगा। ’’
दिल में दुविधा और आँखों में लहु सदृश आँसू लेकर छाया बेसूध सी चली जा री है, सड़क पर सामने कौन आया, कौन गाड़ी का हार्न बजा रहा है, कुछ खबर नहीं। छाया के मन में तो सिर्फ यही बात चल रही थी कि अब वो रोहन का समाना किस प्रकार कर पाएगी।
रोहन को सामने पाकर छाया की आँखें डबडबा गयी, छाया ने कहा ’’ लुका-छिपी के खेल में हमको भी कोई नहीं हरा सकता है। ’’
रोहन ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा ’’ पहले तो लुका-छिपी के खेल में तुम दस मिनट के अन्दर खुद को हाजिर कर देती थी, मगर एक सप्ताह की लुका-छिपी दोबारा मत खेलना छाया। नहीं तो मैं मर जाउंगा। ’’
रोहन ने छाया को अपने सीने से लगा लिया। दोनों का दिल धड़क-धड़क कर एक-दुसरे को माफ कर रहा था।

समाप्त