Radhey - Series 2 in Hindi Love Stories by Soni shakya books and stories PDF | राधे..प्रेम की अनोखी दास्तां (सीज़न 2)

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राधे..प्रेम की अनोखी दास्तां (सीज़न 2)

इस शाम की तरह जिंदगी भी ढल रही थी राधा की....

शाम के 4:00 रहे थे, राधा अपने कमरे से निकल कर बाहर आती है।

क्या हुआ राधा कुछ चाहिए क्या तुम्हें?

तुम उठकर क्यों चली आई मुझे बता देती मैं ले आती तुम्हारे लिए,, नरम  लहजे में बोली माया देवी।

राधा बोली -नहीं मां मुझे कुछ नहीं चहिए वो तो मैं पड़े पड़े बोर हो गई थी इसलिए सोचा चल कर थोड़ा घूम आती हुं।

ठीक है राधा तुम यहां आकर सोफे पर बैठो मैं तुम्हारे लिए पानी ले आती हूं।

नहीं मां मुझे कुछ नहीं चाहिए। 

तो काफी बना दूं तेरे लिए, 

नहीं मां मन नहीं है मेरा कहते हुए राधा सोफे पर बैठ गई।

मायादेवी भी सोफे पर आकर राधा के साथ बैठ गई फिर बोली-राधा ये क्या हाल बना लिया है तुमने अपना ,

अच्छे से रहा करो बेटा।

क्या हुआ मां मैं तो एकदम ठीक हूं। 

नहीं राधा मैं जानती हूं कि तुम अंदर से टूट गई हो।

नहीं मां ऐसा कुछ नहीं है मैं एकदम ठीक हूं।

राधा तुम्हारी इस हालात की कही ना कही मै‌ भी जिम्मेदार हुं।

नहीं मां ऐसा कुछ नहीं है ,तुम तो यु ही परेशान हो रही हो,

नियति ने जो मेरे भाग्य में लिखा था वही मुझे मिला है मां..

माया देवी बीच में ही बोल पड़ी--उस वक्त मैं तेरी बात मान लेती तेरा साथ देती तो .. तुझेे वो मिला होता जो तू चाहती थी।

नहीं मां अपने आप को दोश मत दो..

जो मिलना होता है वह बिन मांगे ही मिल जाता है जैसे मुझे यह बीमारी बिन मांगे ही मिल गई ।

पर राधा मुझे फिर भी लगता है कि मुझे तेरी बात सुननी चाहिए थी।

छोड़ो ना मां इतना मत सोचो,

बहुत बड़ी हो गई है ना राधा बड़ी बड़ी बातें करने लगी है।

वक्त ने सिखा दिया है मां,

माया देवी की आंखें नम थी।

तभी राधा बोली __ये सब छोड़ो मां..

चलो ना पास वाले गार्डन में चलते है थोड़ी देर के लिए।

हां ठीक है, पर हम जल्दी लौट आएंगे क्योंकि शाम होने को है ‌

दोनों गार्डन की ओर जाते हैं ।

.......        ........        ........ ‌

 राधा अब तो वह गार्डन और भी अच्छा बन गया है शाम के वक्त बहुत से लोग उस गार्डन में घूमने आते हैं।

राधा कुछ नहीं बोली बस चुपचाप सुन रही थी । थोड़ी देर में ही गार्डन आ गया। 

गार्डन देखते ही राधा आत्म विभोर हो गई ।

थोड़ी देर रूकी और सामने एक बेंच के पास जाकर खड़ी हो गई।

राधा बेंच को ऐसे निहार रही थी जैसे --जीवन की किताब से अतीत का कोई पन्ना सामने आ गया हो।

राधा की आंखें नम हो गई थी और चेहरे पर दर्द भरी मुस्कान..!!

राधा बेंच पर इस तरह हाथ फेर रही थी मानो किसी को सहला रही हो।

तभी उसके भीतर से आवाज आई ...8 साल 

हां 8 साल हो गए जब मैं तुमसे मिली थी देव,,इसी गार्डन में 

पर... इन आठ सालों में कुछ भी तो नहीं बदला

वहीं झाड़, वही पेड़, वही बेचें, वही नजारे 

सब वही की वही है देव --बस तुम्हारी कमी है।

अब देखती ही रहोगी या बैठोगी भी राधे..

अचानक देव की आवाज सुनकर राधा चौंक गयी उसने सर उठा कर देख सामने देव खड़ा था। 

मुस्कुराते हुए बोला-- अब बैठ भी जाओ !!

राधा का दिल गार्डन में खिले फूलों की तरह खिल गया मुस्कुराते हुए वह बेंच पर बैठ गई। 

क्या सोच रही थी राधे ,यही कि 8 साल हो गए हमें मिले।

राधा सिर्फ हां कहकर रुक गई।

राधे ..क्या तुम्हें सचमुच ऐसा लगता है कि -हमे मिले हुए 8 साल हो गए ??

नहीं देव.!!

फिर तुम्हारे मन में ऐसा विचार आया ही क्यों।

मैं तो बस यू ही..

मैं तो तुमसे कभी दूर हुआ ही नहीं राधे.. बीच में बोल पड़ा देव

राधे.. हमारा रिश्ता तो हवा के जैसा है,,

जैसे हवा चलती तो है पर दिखाई नहीं देती वैसे ही तुम भी हमेशा मेरे  साथ रहती हो बस दिखाई नहीं देती ।

राधे.. बेशक यह जीवन मेरा है पर सांसे तुम्हारे नाम की चलती है।

.... ‌‌.....  ‌‌...

क्या सोच रही हो राधा तुम्हारा ध्यान किधर है बैठ जाओ ।

राधा ने  यु देखा जैसे उसकी तृद्रां भंग हो गई  हो उसने देखा उसके सामने मां खड़ी थी उसने चारों ओर निगाहें फेरी पर..देव कहीं नजर नहीं आया ।

क्या था ये . एक भ्रम या देव का ख्याल..

भ्रम ही था जो राधा की आंखों को नम कर गया ।

बेंच पर बैठी राधा अपने आप से पूछती है क्यों देव..

तुम्हारा ख्याल ,क्यों मेरे अंदर से चला नहीं जाता..!!

क्यों तुम मुझे अपने हाल पर नहीं छोड़ नहीं देते ?

प्रताणित करता है तुम्हारा ख्याल ..

ये क्या कह दिया तुमने राधे.. क्या सच में मेरा ख्याल तुम्हें प्रताणित करता है ...

मुझे कुछ नहीं कहना है बस मुझे अकेला छोड़ दो देव...