Chiththi ka Intzaar - 2 in Hindi Fiction Stories by Deepak Bundela Arymoulik books and stories PDF | चिट्ठी का इंतजार - भाग 2

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चिट्ठी का इंतजार - भाग 2

भाग दो

"चिठ्ठी का इन्तजार"

मोहन को गए हुए तीन बरस हो चुके थे।

तीन बरस — कहने को तो बस तीन शब्द,
पर अम्मा के लिए हर बरस एक पूरी उम्र था।
शहर जाने के दिन मोहन ने जाते-जाते कहा था, “अम्मा, बस काम लग जाए, फिर आपको भी बुला लूँगा।” अम्मा मुस्कुरा दी थीं। माँ जानती है, बेटे झूठ नहीं बोलते,
बस समय सच नहीं बोलने देता।

उस दिन के बाद से अम्मा की सुबहें बदल गई थीं। अब वह सूरज से पहले उठ जातीं।
चूल्हे पर चढ़ती पहली रोटी भगवान को नहीं,
मोहन को अर्पित होती। “जहाँ भी हो, पेट भर के खाना…” वे बुदबुदातीं।

मोहन शहर में था —
पर अम्मा के मन में वह हर पल आँगन में ही घूमता रहता।

मोहन की चिट्ठियाँ सीधी-सादी होती थीं न ज़्यादा शिकायत, न ज़्यादा खुशी।

“काम ठीक है।”, “खाना मिल जाता है।”
“आप लोग चिंता न करें।”

बाबूजी हर चिट्ठी को दो बार पढ़ते, पहली बार शब्दों के लिए, दूसरी बार शब्दों के बीच की ख़ामोशी के लिए।

“देखा,” बाबूजी एक दिन बोले,- “यह लड़का अपने दुःख लिखता ही नहीं।”

अम्मा ने चुपचाप चिट्ठी मोड़ दी मोहन के जवाब में अम्मा खुद चिट्ठी लिखती थीं
बाबूजी ने कई बार कहा,

“मैं लिख दूँ?”

पर अम्मा मना कर देतीं।

“नहीं… बेटे को माँ की लिखावट चाहिए।”

उनकी लिखावट टेढ़ी-मेढ़ी थी, कहीं स्याही ज़्यादा, कहीं कम, कहीं शब्द आधा, कहीं पूरा, पर उस स्याही में जो ताप था. वह किसी पढ़े-लिखे खत में नहीं हो सकता था, वे लिखतीं —

“बेटा, यहाँ सब ठीक है, तेरे बाबूजी की कमर में थोड़ा दर्द है, पर खेत तो अब भी देख लेते हैं।”

दर्द को ‘थोड़ा’ लिखकर, वे अपने मन का बोझ हल्का कर लेतीं, वे कभी यह नहीं लिखतीं कि रात को नींद नहीं आती कि हर आहट पर लगता है, मोहन आ गया।

माँ की चिट्ठी में दुःख नहीं होता, सिर्फ आश्वासन होता है मोहन की अगली चिट्ठी देर से आई पूरे पंद्रह दिन बाद अम्मा की बेचैनी बढ़ने लगी हर दोपहर वे चौकी पर बैठ जातीं।

“आज आएगी…”
“कल तो जरूर आएगी…”

डाकिया चाचा आते, पर मोहन की चिट्ठी नहीं होती हर बार अम्मा मुस्कुरा देतीं, पर आँखें धोखा नहीं खाती थीं।

एक दिन बाबूजी बोले

“शहर बड़ा है… चिट्ठी आने में देर हो जाती होगी।”

अम्मा ने कुछ नहीं कहा बस दीये के सामने बैठकर देर तक प्रार्थना करती रहीं।

उस रात उन्होंने पहली बार सपने में मोहन को देखा कमज़ोर, थका हुआ, सुबह उठकर उन्होंने फिर चिट्ठी लिखी।

“बेटा, बहुत दिन हो गए, तेरी चिट्ठी नहीं आई, माँ का मन घबराता है।”

स्याही की एक बूँद काग़ज़ पर फैल गई।
शायद आँसू थे।

तीसरे हफ़्ते डाकिया चाचा आए।

इस बार उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

“मोहन की चिट्ठी है,” उन्होंने कहा।

अम्मा ने राहत की साँस ली।

चिट्ठी में लिखा था —

“अम्मा, काम थोड़ा बदल गया है, थकान ज़्यादा रहती है, पर घबराना मत, मैं संभाल लूँगा।”

बाबूजी ने चिट्ठी पढ़ते हुए रुक-रुक कर साँस ली।

“थकान ज़्यादा रहती है…” उन्होंने धीरे से दोहराया।

अम्मा ने तुरंत कहा, “काम करता है, थकेगा ही।”

पर माँ का मन मानता नहीं।

उस रात उन्होंने मोहन की पुरानी कमीज़ निकाल ली उसे छूकर देर तक बैठी रहीं.
माँ के लिए कपड़ा नहीं, वह बेटे की देह की गर्मी थी।

कस्बे में बातें फैलने लगती हैं, खामोशी से।

“आजकल शहर में काम मुश्किल है।”
“कई लड़के बीमार हो गए हैं।”
“खाने-पानी भी ठीक ठाक नहीं।”

अम्मा हर बात सुनतीं, और हर बात को दिल से दूर रखतीं।

“मेरा बेटा अलग है,” वे खुद से कहतीं।

माँ का विश्वास, दुनिया के अनुभव से ज़्यादा मजबूत होता है।

मोहन की अगली चिट्ठी आई, पर इस बार स्याही हल्की थी। जैसे लिखते हाथ काँप रहे हों।

“अम्मा,कभी-कभी बहुत मन करता है घर आने का पर अभी नहीं आ सकता।”
बस इतना ही।

अम्मा देर तक काग़ज़ को देखती रहीं।

“मन करता है…” उन्होंने शब्द दोहराए।
माँ जानती है, जब बेटा मन की बात लिखने लगे, तो देह साथ नहीं दे रही होती।

उस रात अम्मा ने पहली बार भगवान से सवाल किया —“अगर बेटे का दुःख माँ को नहीं मिलेगा, तो किसे मिलेगा?”

उसके बाद चिट्ठियाँ तो आती रही पर शब्द कम होते गए, जैसे कोई धीरे-धीरे बोलना छोड़ रहा हो, अम्मा हर चिट्ठी के बाद और ज़्यादा चुप रहने लगीं, उनकी स्याही अब गाढ़ी हो गई थी, हाथ काँपने लगे थे पर वे लिखना नहीं छोड़ती थीं।

क्योंकि जब तक चिट्ठी जा रही थी, तब तक बेटा जीवित था और माँ का विश्वास भी।

क्रमशः-3