इस घर में प्यार मना है…
क्योंकि यहाँ प्यार ने कभी किसी को पूरा नहीं छोड़ा।
या शायद…
क्योंकि इस घर का मालिक प्यार से नफरत करता है।
अध्याय 1— एक अनचाही शादी
“संस्कृति… तैयार हो जाओ।”
माँ की आवाज़ कानों में पड़ी, लेकिन संस्कृति का ध्यान आईने में दिख रही अपनी ही परछाईं पर अटका था। लाल जोड़ा, भारी गहने और आँखों में वो डर… जो किसी दुल्हन का नहीं होता।
आज उसकी शादी थी। कार्तिक रघुवंशी से।
एक ऐसा नाम… जिसे सुनते ही पूरे शहर में खामोशी छा जाती थी।
संस्कृति ने धीरे से खुद से पूछा—
“क्या शादी के बाद ज़िंदगी शुरू होती है… या यहीं खत्म हो जाती है?”
अध्याय 2 — कार्तिक रघुवंशी
कार्तिक रघुवंशी।
एक ऐसा इंसान… जिसकी आँखों में भावनाएँ नहीं, नियम बसते थे।
उसके लिए प्यार एक बीमारी थी। एक कमजोरी।
कार्तिक बोला -
“प्यार इंसान को खोखला कर देता है,”
वो अक्सर कहा करता।
आज उसकी शादी हो रही थी…
लेकिन चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी।
सिर्फ एक समझौता।
अध्याय 3 — सात फेरे, सात खामोशियाँ
मंत्र चल रहे थे।
लोग खुश थे।
लेकिन दो लोग… बिल्कुल अकेले।
संस्कृति की उँगलियाँ काँप रही थीं,
और कार्तिक की पकड़… जरूरत से ज़्यादा सख्त थी।
कार्तिक बोला -
“डरने की जरूरत नहीं,”
कार्तिक ने बिना उसकी तरफ देखे कहा —
“मैं तुमसे कुछ उम्मीद नहीं रखता।”
संस्कृति की आँखें भर आईं।
शायद उम्मीद ही तो वो चीज़ थी…जो वो चाहती थी।
अध्याय 4 — इस घर के नियम
रघुवंशी हवेली में कदम रखते ही
संस्कृति को एहसास हो गया—
ये कोई आम घर नहीं है।
कार्तिक की आवाज़ गूँजी—
“इस घर में तीन बातें मना हैं।”
संस्कृति ने डरते हुए पूछा —
“कौन-सी?”
वो बोला —
“प्यार, सवाल और आँसू।”
संस्कृति ने सिर झुका लिया।
लेकिन दिल में कुछ टूट गया।
अध्याय 5 — पहली रात, आख़िरी उम्मीद
कमरा रोशनी से भरा था… लेकिन संस्कृति के अंदर अंधेरा था।
वो दुल्हन बनकर पलंग के किनारे बैठी थी।
हाथों की मेहंदी अभी भी गीली लग रही थी, और दिल… डर से सिमटा हुआ।
हर लड़की की तरह उसके मन में भी एक छोटी-सी उम्मीद थी—
शायद वो सख्त है, शायद बोलता कम है… लेकिन दिल का बुरा नहीं होगा।
दरवाज़े के बाहर कदमों की आहट हुई।
क्लिक।
दरवाज़ा खुला। कार्तिक अंदर आया।
चेहरे पर वही ठंडा सुकून,वही दूरी। उसकी नज़र सीधे संस्कृति पर पड़ी… और फिर अगले ही पल हट गई।
कई सेकंड की खामोशी।
संस्कृति ने हिम्मत जुटाकर धीरे से कहा—
“आप… बैठेंगे नहीं?”
कार्तिक ने कोट उतारते हुए जवाब दिया—
“ये सब करने की ज़रूरत नहीं है।”
संस्कृति चौंक गई। उसने कुछ समझने की कोशिश की।
कार्तिक टेबल तक गया, एक फाइल उठाई और पलंग पर उसके सामने रख दी।
कार्तिक बोला -
“इसे पढ़ लो।”
संस्कृति ने काँपते हाथों से फाइल खोली।
वो…एग्रीमेंट पेपर्स थे। उसकी आँखें फैल गईं।
संस्कृति बोली -
“ये… ये क्या है?”
कार्तिक ने बिना किसी भावना के कहा—
“हमारी शादी सिर्फ नाम की है।
तुम इस घर की बहू हो, मेरी पत्नी नहीं।”
संस्कृति की साँस अटक गई।
कार्तिक बोला -
“इस कमरे में तुम रहोगी,
मैं नहीं। मेरे और तुम्हारे बीच कोई रिश्ता नहीं होगा—
सिवाय इस दीवार के।”
वो कमरे के एक हिस्से की तरफ इशारा करता है।
कार्तिक बोला -
“मेरी ज़िंदगी में प्यार के लिए कोई जगह नहीं है।
और ना कभी होगी।”
संस्कृति की आँखों से आँसू अपने आप बहने लगे।
संस्कृति (टूटती आवाज़ में) बोला -
“अगर… अगर आपको ये शादी नहीं चाहिए थी,
तो आपने मना क्यों नहीं किया?”
कार्तिक पहली बार उसकी तरफ देखता है।
सीधी, बेरहम नज़र।
कार्तिक बोला -
“क्योंकि इस घर में औरतों की पसंद से शादियाँ नहीं होतीं।
और मर्दों की मजबूरी से होती हैं।”
संस्कृति सन्न रह गई।
कार्तिक दरवाज़े की तरफ बढ़ा।
जाते-जाते रुका।
कार्तिक बोला -
“और हाँ…रोना मत।
तुम्हें बताया गया था—
इस घर में आँसू मना हैं।”
दरवाज़ा बंद हो गया।
धड़ाम।
संस्कृति वहीं बैठी रह गई।
हाथ में वो फाइल, दिल में हज़ार टुकड़े।
आज वो दुल्हन बनी थी… लेकिन पत्नी बनने से पहले ही
अकेली कर दी गई थी।
उसने खुद से सवाल किया—
“क्या प्यार सच में गुनाह है…
या गुनाह सिर्फ इस घर में आना है।